Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
धर्मराजका सावित्रीको अशुभ कर्मोके फल बताना
श्रीनारायण उवाच
मायाबीजं महामन्त्रं प्रदत्त्वा विधिपूर्वकम्।
कर्माशुभविपाकं च तामुवाच रवेः सुतः॥ १
धर्मराज उवाच
शुभकर्मविपाकान्न नरकं याति मानवः।
कर्माशुभविपाकं च कथयामि निशामय॥ २
नानापुराणभेदेन नामभेदेन भामिनि।
नानाप्रकारं स्वर्ग च याति जीवः स्वकर्मभिः॥ ३
शुभकर्मविपाकान्न नरकं याति कर्मभिः।
कुकर्मणा च नरकं याति नानाविधं नरः॥ ४
नरकाणां च कुण्डानि सन्ति नानाविधानि च।
नानाशास्त्रप्रमाणेन कर्मभेदेन यानि च॥५
विस्तृतानि च गर्तानि क्लेशदानि च दु:खिनाम्।
भयङ्कराणि घोराणि हे वत्से कुत्सितानि च॥ ६
षडशीति च कुण्डानि एवमन्यानि सन्ति च।
निबोध तेषां नामानि प्रसिद्धानि श्रुतौ सति॥ ७
898 श्रीमददेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]—6 ^
श्रीनारायण बोले- [हे नारद !] सूर्यपुत्र यमराज
सावित्रीको विधिपूर्वक भगवतीके महामन्त्र मायाबीजकी
दीक्षा प्रदानकर उसे प्राणियोंके अशुभ कर्मका फल
बताने लगे॥ १॥
धर्मराज बोले-शुभ कर्मके विपाकके कारण
मनुष्य नरकमें नहीं जाता है। अब मैं अशुभ कर्मोंका
फल कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो- ॥ २॥
हे भामिनि! अनेक प्रकारके पुराणोंके अनुसार
नामभेदसे अनेकविध स्वर्ग हैं। अपने-अपने कर्मोके
अनुसार जीव वहाँ जाता है॥ ३॥
मनुष्य अपने शुभ कर्मोके फलसे नरकमें नहीं
जाता है। वह अपने बुरे कर्मके कारण अनेक प्रकारके
नरकमें पड़ता है॥ ४॥
नरकोंके अनेक प्रकारके कुण्ड हैं। हे वत्से!
विविध शास्त्रोंके प्रमाणोंके अनुसार तथा जीवोंके
कर्मभेदसे प्राप्त होनेवाले अत्यन्त विस्तृत, गहरे,
पापियोंके लिये क्लेशदायक, भयंकर, घोर तथा
कुत्सित कुल छियासी कुण्ड हैं; इसके अतिरिक्त
कुछ अन्य कुण्ड भी हैं। हे साध्वि! उन
कुण्डोंके वेदप्रसिद्ध नामोंको बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक
सुनो॥ ५-७॥
४८२
वह्निकुण्डं तप्तकुण्डं क्षारकुण्डं भयानकम्।
विट्कुण्डं मूत्रकुण्डं च श्लेष्मकुण्डं च दुःसहम्॥ ८
गरकुण्डं दूषिकुण्डं वसाकुण्डं तथैव च।
शुक्रकुण्डमसृक्कुण्डमश्रुकुण्डं च कुत्सितम्॥ ९
कुण्डं गात्रमलानां च कर्णविट्कुण्डमेब च।
मज्ाकुण्डं मांसकुण्डं नक्रकुण्डं च दुस्तरम्॥ १०
लोमकुण्डं केशकुण्डमस्थिकुण्डं च दुस्तरम्।
ताम्रकुण्डं लोहकुण्डं प्रतप्तं क्लेशदं महत्॥ ११
चर्मकुण्डं तप्तसुराकुण्डं च परिकीर्तितम्।
तीक्ष्णकण्टककुण्डं च विषोदं विषकुण्डकम्॥ १२
प्रतप्तकुण्डं तैलस्य कुन्तकुण्डं च दुर्वहम्।
कृमिकुण्डं पूयकुण्डं सर्पकुण्डं दुरन्तकम्॥ १३
मशकुण्डं दंशकुण्डं भीमं गरलकुण्डकम्।
कुण्डं च वञ्रदंष्ट्राणां वृश्चिकानां च सुव्रते॥ १४
शरकुण्डं शूलकुण्डं खड्गकुण्डं च भीषणम्।
गोलकुण्डं नक्रकुण्डं काककुण्डं शुचास्पदम्॥ १५
मन्थानकुण्डं बीजकुण्डं वज्रकुण्डं च दुःसहम्।
तप्तपाषाणकुण्डं च तीक्ष्णपाषाणकुण्डकम्॥ १६
लालाकुण्डं मसीकुण्डं चूर्णकुण्डं तथैव च।
चक्रकुण्डं वक्रकुण्डं कूर्मकुण्डं महोल्बणम्॥ १७
ज्चालाकुण्डं भस्मकुण्डं दग्धकुण्डं शुचिस्मिते।
तप्तसूचीमसिपत्रं क्षुरधारं सूचीमुखम्॥ १८
गोकामुखं नक्रमुखं गजदंशं च गोमुखम्।
कुम्भीपाकं कालसूत्रं मत्स्योदं कृमितन्तुकम्॥ १९
पांसुभोज्यं पाशवेष्टं शूलप्रोतं प्रकम्पनम्।
उल्कामुखमन्धकूपं वेधनं ताडनं तथा॥ २०
जालरन्ध्रं देहचूर्णं दलनं शोषणं कषम्।
शूर्पं ज्वालामुखं चैव धूमान्धं नागवेष्टनम्॥ २१
कुण्डान्येतानि सावित्रि पापिनां क्लेशदानि च।
नियुतैः किङ्करगणै रक्षितानि च सन्ततम् ॥ २२
दण्डहस्तैः पाशहस्तैर्मदमत्तैर्भयङ्करैः ।
शक्तिहस्तैर्गदाहस्तैरसिहस्तैः सुदारुणैः ॥ २३
898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-6 8
श्रीमहदेवी भागवत
[ अ० ३२
वहिकुण्ड, तप्तकुण्ड, भयानक क्षारकुण्ड,
विट्कुण्ड, मूत्रकुण्ड, दुःसह श्लेष्मकुण्ड, गरकुण्ड,
दूषिकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड,
कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड,
मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नक्रकुण्ड, लोमकुण्ड,
केशकुण्ड, दुस्तर अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, प्रतप्त एवं
महान् कष्टदायक लोहकुण्ड, चर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड,
तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विषपूर्ण विषकुण्ड-ये कुण्ड
बताये गये हैं॥ ८-१२॥
हे सुत्रते! इसी प्रकार प्रतप्त तैलकुण्ड, दुर्वह
कुन्तकुण्ड, कृमिकुण्ड, पूयकुण्ड, अत्यन्त कष्टप्रद
सर्पकुण्ड, मशककुण्ड, दंशकुण्ड, भयानक गरलकुण्ड
और वज्रके समान दाँतोंवाले बिच्छुओंके भी कुण्ड
हैं। हे शुचिस्मिते! शरकुण्ड, शूलकुण्ड, भयंकर
खड्गकुण्ड, गोलकुण्ड, नक्रकुण्ड, कष्टदायक
काककुण्ड, मन्थानकुण्ड, बीजकुण्ड, दुःसह वज्रकुण्ड,
तप्तपाषाणकुण्ड, तीक्ष्णपाषाणकुण्ड, लालाकुण्ड,
मसीकुण्ड, चूर्णकुण्ड, चक्रकुण्ड, वक्रकुण्ड, महाभयंकर
कूर्मकुण्ड, ज्चालाकुण्ड, भस्मकुण्ड, दग्धकुण्ड,
तप्तसूचीकुण्ड असिपत्रकुण्ड, क्षुरधारकुण्ड,
सूचीमुखकुण्ड, गोकामुखकुण्ड, नक्रमुखकुण्ड,
गजदंशकुण्ड, गोमुखकुण्ड, कुम्भीपाककुण्ड,
कालसूत्रकुण्ड, मत्स्योदकुण्ड, कृमितन्तु-कुण्ड,
पांसुभोज्यकुण्ड, पाशवेष्टकुण्ड, शूलप्रोतकुण्ड,
प्रकम्पनकुण्ड, उल्कामुखकुण्ड, अन्धकूपकुण्ड,
वेधनकुण्ड, ताडनकुण्ड, जालरन्ध्रकुण्ड, देहचूर्णकुण्ड,
दलनकुण्ड, शोषणकुण्ड, कषकुण्ड, शूर्पकुण्ड,
ज्चालामुखकुण्ड, धूमान्धकुण्ड और नागवेष्टनकुण्ड-
ये कुण्ड कहे गये हैं॥ १३-२१॥
हे सावित्रि! ये सभी कुण्ड पापियोंके लिये
क्लेशप्रद हैं। दस लाख अनुचर सदा इन कुण्डोंकी
रखवाली करते रहते हैं। वे सभी निर्दयी, अभिमानमें
चूर तथा भयंकर सेवकगण अपने हाथोंमें दण्ड, पाश,
शक्ति, गदा और तलवार लिये रहते हैं। वे तमोगुणसे
युक्त तथा दयाशून्य रहते हैं और कोई भी उनका
प्रतिरोध नहीं कर सकता। उन तेजस्वी तथा निर्भीक
अनुचरोंकी आँखें ताँबेके सदृश तथा कुछ-कुछ पीले
अ० ३३ ]
नवम स्कन्ध
४८३
तमोयुक्तैर्दयाहीनैर्निवार्यैशच न सर्वतः।
तेजस्विभिश्च निःशङ्केराताम्रपिङ्गलोचनैः॥ २४
योगयुक्तैः सिद्धियुक्तैर्नानारूपधरैर्भटे: ।
आसन्नमृत्युभिर्दृष्टैः पापिभिः सर्वजीविभिः॥ २५
स्वकर्मनिरतैः सर्वे: शाक्तैः सौरैश्च गाणपैः।
अदृश्यैः पुण्यकृद्भिश्च सिद्धैर्योगिभिरेव च॥ २६
स्वधर्मनिरतैर्वापि विततैर्वा स्वतन्त्रकैः।
बलवद्धिश्च निःशङ्कः स्वप्नदृष्टैश्च वैष्णवैः॥ २७
एतत्ते कथितं साध्वि कुण्डसंख्यानिरूपणम्।
येषां निवासो यत्कुण्डे निबोध कथयामि ते॥ २८
वर्णको हैं । योगयुक्त तथा सिद्धियोंसे सम्पन्न वे सभी
सेवक अनेक प्रकारके रूप धारण कर लिया करते हैं।
वे सेवक समस्त पापी प्राणियोंको उनकी मृत्यु निकट
आनेपर दिखायी पड़ते हैं । शक्ति, सूर्य तथा गणपतिके
उपासकों एवं अपने कर्मोमें लगे रहनेवाले पुण्यशाली
सिद्धों तथा योगियोंको वे दिखायी नहीं पड़ते। इसी
प्रकार जो सदा अपने धर्ममें लगे रहते हैं, जिनका
हृदय विशाल है, जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं तथा जिन्हें
स्वप्नमें या कहीं भी अपने इष्टदेवका दर्शन हो चुका
है—ऐसे वैष्णवजनोंको वे बलवान् तथा निःशंक
यमदूत कभी दिखायी नहीं पड़ते॥ २२-२७॥
हे साध्वि! यह मैंने तुमसे कुण्डोंकी संख्याका
निरूपण कर दिया। जिन-जिन पापियोंका जिन-जिन
कुण्डोंमें वास होता है, अब मैं तुम्हें यह बता रहा
हूँ, ध्यानसे सुनो ॥ २८॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रघां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे
सावित्र्युपाख्याने कुण्डसंख्यानिरूपणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥
AO oS
अथ त्रयस्त्रिशोऽध्यायः
विभिन्न नरककुण्डोंमें जानेवाले पापियों तथा उनके पापोंका वर्णन
धर्मराज उवाच
हरिसेवारतः शुद्धो योगसिद्धो व्रती सति।
तपस्वी ब्रह्मचारी च न याति नरकं श्रुवम्॥ १
कटुवाचा बान्धवांश्च बललेपेन यो नरः।
दग्धान्करोति बलवान् वह्निकुण्डं प्रयाति सः॥ २
स्वगात्रलोममानाब्दं तत्र स्थित्वा हुताशने।
पशुयोनिमवाप्नोति रौद्रदग्धां त्रिजन्मनि॥ ३
ब्राह्मणं तृषितं तप्तं क्षुधितं गृहमागतम्।
न भोजयति यो मूढस्तप्तकुण्डं प्रयाति स:॥ ४
तत्र तल्लोममानं च वर्ष स्थित्वा च दुःखदे।
तप्तस्थले वह्नितल्पे पक्षी च सप्तजन्मसु॥ ५
898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]—6 ©
धर्मराज बोले हे साध्वि! भगवान् श्रीहरिकी
सेवामें संलग्न रहनेवाला, विशुद्धात्मा, योगसिद्ध, व्रती,
तपस्वी तथा ब्रह्मचारी पुरुष निश्चित ही नरकमें नहीं
जाता॥ १॥
जो बलशाली मनुष्य बलके अभिमानमें आकर
अपने कटुवचनसे बान्धवोंको दग्ध करता है, वह
वहिकुण्ड नामक नरकमें जाता है और अपने शरीरमें
विद्यमान रोमोंको संख्याके बराबर वर्षांतक उस
वहिकुण्डमें वास करके वह तीन जन्मोंतक रौद्रदग्ध
पशुयोनि प्राप्त करता है॥ २-३॥
जो मूर्ख घरपर आये हुए भूखे-प्यासे दु:खी
ब्राह्मणको भोजन नहीं कराता है, वह तप्तकुण्ड
नामक नरकमें जाता है। उस ब्राह्मणके शरीरमें
विद्यमान रोमोंको संख्याके बराबर वर्षांतक उस
दु:खप्रद नरकमें वास करके वह सात जन्मोंतक
पक्षीकी योनिमें पैदा होकर तपते हुए स्थानपर
बह्विशय्यापर यातना भोगता है॥ ४-५॥
४८४
रविवारे च संक्रान्त्याममायां श्राद्धवासरे।
वस्त्राणां क्षारसंयोगं करोति केवलं नरः॥ ६
स याति क्षारकुण्ड च सूत्रमानाब्दमेव च।
स व्रजेद्रजकीं योनिं सप्तजन्मसु भारते॥ ७
मूलप्रकृतिनिन्दां यः कुरुते मानवाधमः।
वेदनिन्दां शास्त्रनिन्दा पुराणानां तथैव च॥ ८
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा निन्दापरो जनः।
गौरीवाण्यादिंदेवीनां तथा निन्दापरो जनः॥ ९
ते सर्वे निरये यान्ति तस्मिन्कुण्डे भयानके ।
नातः परतरं कुण्डं दुःखदं तु भविष्यति॥ १०
तत्र स्थित्वानेककल्पं सर्पयोनिं ब्रजेत्पुनः।
देवीनिन्दापराधस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते॥ ११
स्वदत्तां परदत्तां वा वृत्तिं च सुरविप्रयोः।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि विट्कुण्डं च प्रयाति सः॥ १२
तावन्त्येव च वर्षाणि विड्भोजी तत्र तिष्ठति।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि विट्कृमिश्च पुनर्भुवि॥ १३
परकीयतडागे च तडागं यः करोति च।
उत्सृजेहेबदोषेण मूत्रकुण्डं प्रयाति सः॥ १४
तद्रेणुमानवर्षं च तद्धोजी तत्र तिष्ठति।
पुनः पूर्णशताब्दं च स वृषो भारते भवेत्॥ १५
एकाकी मिष्टमश्नाति श्लेष्मकुण्डं प्रयाति च।
पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति॥ १६
ततः पूर्णशताब्दं च स प्रेतो भारते भवेत्।
श्लेष्ममूत्रपरं चैव पूयं भुङ्के ततः शुचि: ॥ १७
2898 श्रीमददेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]6 0
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३३
जो मनुष्य रविवार, सूर्यसंक्रान्ति, अमावास्या और
श्राद्धे अवसरपर क्षार पदार्थासे वस्त्र धोता है, वह
क्षारकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उस सस्त्रमें
विद्यमान सूतोंकी संख्याके बराबर वर्षोतक वहाँ निवास
करता है। इसके बाद भारतवर्षमें सात जन्मोंतक
रजकयोनिमें उसे जन्म लेना पड़ता है॥ ६-७॥
जो अधम मनुष्य मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाको
निन्दा करता है, जो वेद-शास्त्र तथा पुराणोंकी निन्दा
करता है, जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव आदि देवताओंकी
निन्दामें संलग्न रहता है और जो मनुष्य गौरी-
सरस्वती आदि देवियोंकी निन्दामें तत्पर रहता है—
वे सब उस भयानक नरककुण्डमें जाते हैं, जिससे
बढ़कर दुःखदायी दूसरा कोई कुण्ड नहीं होता। उस
कुण्डमें अनेक कल्पोंतक वास करके वह मनुष्य
सर्पयोनिको प्राप्त होता है। भगवतीकी निन्दाके
अपराधका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है॥ ८-११॥
जो मनुष्य अपने या दूसरेके द्वारा दी गयी देवता
अथवा ब्राह्मणकी वृत्तिको छीनता है, वह साठ हजार
वर्षोके लिये विट्कुण्ड नामक नरकमें जाता है और
उतने ही वर्षांतक विष्ठाभोजी बनकर वहाँ रहता है ।
इसके बाद वह पुनः पृथ्वीपर साठ हजार वर्षोतक
विष्ठाका कृमि होता है॥ १२-१३॥
जो व्यक्ति दूसरोंके बनवाये तड़ागमें अपने
नामसे निर्माण करता है और फिर जनताके लिये
उसका उत्सर्ग (लोकार्पण) करता है, बह उस
दोषके कारण मूत्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है।
वहाँपर वह उस तड़ागके रज-कणकी संख्याके
बराबर वर्षोतक उसी मूत्र आदिको ग्रहण करते हुए
रहता है और पुन: भारतवर्षमें पूरे सौ वर्षांतक वृषको
योनिमें रहता है॥ १४-१५॥
जो अकेले ही मिष्टान्न आदिका भक्षण करता
है, वह श्लेष्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उसी
श्लेष्माको खाते हुए पूरे सौ वर्षोतक वहाँ रहता है।
इसके बाद वह भारतवर्षमें पूरे सौ वर्षांतक प्रेतयोनिमें
पड़ा रहता है; यहाँ श्लेष्मा, मूत्र तथा पीव आदिका
उसे भक्षण करना पड़ता है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि
हो जाती है॥ १६-१७॥
अ० ३३]
नवम स्कन्ध
४८५
पितरं मातरं चैव गुरुं भार्या सुतं सुताम्।
यो न पुष्णात्यनाथं च गरकुण्डं प्रयाति सः॥ १८
पूर्णमब्दशतं चैव तद्धोजी तत्र तिष्ठति।
ततो व्रजेद्धतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः॥ १९
दूष्ट्वातिथिं वक्रचक्षुः करोति यो हि मानव: ।
पितृदेवास्तस्य जलं न गृह्णन्ति च पापिनः॥ २०
यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च।
इहैव लभते चान्ते दूषिकाकुण्डमाब्रजेत्॥ २१
पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति।
ततो व्रजेद्धूतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः॥ २२
दत्त्वा द्रव्यं च विप्राय चान्यस्मै दीयते यदि।
स तिष्ठति वसाकुण्डे तद्घोजी शतवत्सरम्॥ २३
कृकलासो भवेत्सोऽपि भारते सप्तजन्मसु।
ततो भवेन्महारौद्रो दरिद्रोऽल्पायुरेव च॥ २४
पुमांसं कामिनी वापि कामिनीं वा पुमानथ।
यः शुक्रं पाययत्येव शुक्रकुण्डं प्रयाति सः॥ २५
पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति।
कृमियोनिं शताब्दं च व्रजेद्भूत्वा ततः शुचिः ॥ २६
सन्ताड्य च गुरुं विप्रं रक्तपातं च कारयेत्।
स च तिष्ठत्यसुक्कुण्डे तद्धोजी शतवत्सरम्॥ २७
ततो लभेद्व्याघ्रजन्म सप्तजन्मसु भारते।
ततः शुद्द्रिमवाप्नोति मानवश्च क्रमेण ह॥ २८
जो मनुष्य माता, पिता, गुरु, पत्नी, पुत्र, पुत्री
और अनाथका भरण-पोषण नहीं करता; वह
गरकुण्ड (विषकुण्ड) नामक नरकमें जाता है
और वहाँपर उसी विषको खाते हुए वह पूरे सौ
वर्षोतक पड़ा रहता है । तदनन्तर वह सौ वर्षोंतकके
लिये भूतयोनिमें जाता है, इसके बाद वह शुद्ध
होता है॥ १८-१९॥
जो मनुष्य अतिथिको देखकर [उसके प्रति
उपेक्षाभावसे] अपनी दृष्टिको वक्र कर लेता है, उस
पापीके जलको देवता तथा पितर ग्रहण नहीं करते
और ब्रह्महत्या आदि जो कुछ भी पाप हैं, उन सबका
फल उसे इसी लोकमें भोगना पड़ता है। अन्तमें वह
दूषिकाकुण्ड नामक नरकमें जाता है और वहाँपर
दूषित पदार्थोंको खाते हुए पूरे सौ वर्षोतक निवास
करता है। तत्पश्चात् सौ वर्षोतक भूतयोनिमें रहनेके
अनन्तर उसको शुद्धि हो जाती है॥ २०-२२॥
यदि कोई मनुष्य ब्राह्मणको द्रव्यका दान करनेके
बाद वह द्रव्य किसी अन्यको दे देता है, तो
वह वसाकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उसी
वसाको खाते हुए उसे सौ वर्षोतक वहीं रहना
पड़ता है। तदनन्तर उसे भारतवर्षमें सात जन्मोंतक
गिरगिट होना पड़ता है। उसके बाद वह महान्
क्रोधी, दरिद्र तथा अल्पायु प्राणीके रूपमें जन्म लेता
है॥ २३-२४॥
यदि कोई स्त्री परपुरुषसे सम्बन्ध रखती है
अथवा कोई पुरुष परनारीमें वीर्याधान करता है, वह
शुक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है। वहाँपर उसी
वीर्यको खाते हुए उसे पूरे सौ वर्षोतक रहना पड़ता
है। इसके बाद वह सौ वर्षोतक कीोटयोनिमें रहता है,
तदनन्तर शुद्ध होता है॥ २५-२६॥
जो व्यक्ति गुरु अथवा ब्राह्मणको मारकर उनके
शरीरसे रक्त बहाता है, वह असृक्कुण्ड नामक
नरकमें जाता है और उसी रक्तका पान करते हुए उसे
वहाँ सौ वर्षोतक रहना पड़ता है। तदनन्तर वह
भारतवर्षमें सात जन्मोंतक व्याध्रका जन्म प्राप्त करता
है। इस प्रकार वह क्रमसे शुद्ध होता है और वह
फिरसे मानवयोनिमें जन्म लेता है॥ २७-२८॥
४८६
योऽश्रु तत्याज गायन्तं भक्तं दृष्ट्या सगद्गदम्।
श्रीकृष्णगुणसङ्गीते हसत्येव हि यो नरः॥२९
स वसेदश्रुकुण्डे च तद्भोजी शतवर्षकम्।
ततो भवेच्च चाण्डालस्त्रिजन्मनि ततः शुचि: ॥ ३०
करोति शठतां तद्ठन्नित्यं सुहृदि यो नरः।
कुण्डं गात्रमलानां च स प्रयाति शताब्दकम्॥ ३१
ततः स गार्दभीं योनिमवाप्नोति त्रिजन्मनि।
त्रिजन्मनि च शार्गालीं ततः शुद्धो भवेद् श्रुवम्॥ ३२
बधिरं यो हसत्येव निन्दत्येवाभिमानतः।
स वसेत्कर्णविट्कुण्डे तद्घोजी शतवत्सरम्॥ ३३
ततो भवेत्स बधिरो दरिद्रः सप्तजन्मसु।
सप्तजन्मन्यङ्गहीनस्ततः शुद्धिं लभेद् श्रुवम्॥ ३४
लोभात्स्वभरणार्थाय जीविनं हन्ति यो नरः।
मज्जाकुण्डे वसेत्सोऽपि तद्धोजी लक्षवत्सरम्॥ ३५
ततो भवेच्च शशको मीनश्च सप्तजन्मसु।
त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु ॥ ३६
एणादयश्च कर्मभ्यस्ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम्।
स्वकन्यापालनं कृत्वा विक्रीणाति च यो नरः॥ ३७
अर्थलोभान्महामूढो मांसकुण्डं प्रयाति सः।
कन्यालोमप्रमाणाब्दं तद्धोजी तत्र तिष्ठति॥ ३८
श्रीमद्देवीभागवत
[ अ० ३३
भगवान् श्रीकृष्णका प्रेमपूर्वक गुणगान करनेवाले
भक्तको देखकर जो मनुष्य खेदपूर्वक आँसू बहाता है
तथा उनके गुणसम्बन्थी संगीतके अवसरपर जो
उपहास करता है, वह सौ वर्षोंतक अश्रुकुण्ड नामक
नरकमें वास करता है और वहाँ उसी अश्रुको भोजनके
रूपमें उसे ग्रहण करना पड़ता है, तत्पश्चात् वह तीन
जन्मोंतक चाण्डालकी योनिमें पैदा होता है, तब वह
शुद्ध होता है॥ २९-३०॥
उसी प्रकार जो मनुष्य सहदय व्यक्तिके साथ
सदा शठताका व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड
नामक नरकमें जाता है और सौ वर्षोतक वहाँ
वास करता है। तदनन्तर वह तीन जन्मोंतक गर्दभ-
योनिमें तथा तीन जन्मोंतक श्रृगाल-योनिमें जन्म लेता
है, इसके बाद वह निश्चित ही शुद्ध हो जाता
है॥ ३१-३२॥
जो मनुष्य किसी बहरेको देखकर हँसता है
और अभिमानपूर्वक उसकी निन्दा करता है, वह
कर्णविट्कुण्ड नामक नरकमें सौ वर्षोतक वास
करता है और वहाँ रहते हुए कानकी मैलका भोजन
करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक दरिद्र तथा
बहरा होता है। पुनः सात जन्मोंतक अंगहीन होकर
वह जन्म लेता है, तदनन्तर उसकी शुद्धि होती
है॥ ३३-३४॥
जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर अपने भरण-
पोषणके लिये जीवोंकी हत्या करता है, वह मज्जाकुण्ड
नामक नरकमें लाख वर्षोतक वास करता है और
वहाँपर भोजनमें उसे वही मज्जा ही मिलती है।
तदनन्तर वह सात जन्मोंतक खरगोश और मछली.
तीन जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक कुक्कुट
होकर जन्म लेता है, फिर कर्मोके प्रभावसे वह मृग
आदि योनियाँ प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वह शुद्धि
प्राप्त कर लेता है॥ ३५-३६३ ॥
जो मनुष्य अपनी कन्याको पाल-पोसकर धनके
लोभसे उसे बेच देता है, वह महामूर्ख मांसकुण्ड
नामक नरकमें जाता है। उस कन्याके शरीरमें
विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोतक वह उस
नरकमें रहता है और वहाँपर उसे भोजनके रूपमें वही
अ० ३३ ]
नवम स्कन्ध
४८७
तस्य दण्डप्रहारं च कुर्वन्ति यमकिङ्कराः ।
मांसभारं मूर्ध्नि कृत्वा रक्तभारं लिहेत्क्षुधा ॥ ३९
ततो हि भारते पापी कन्याविट्कृमिगो भवेत्।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि व्याधश्च सप्तजन्मसु॥ ४०
त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु।
मण्डूको हि जलौकाश्च सप्तजन्मसु भारते॥ ४१
सप्तजन्मसु काकश्च ततः शुद्धिं लभेद् धुवम्।
ब्रतानामुपवासानां श्राद्धादीनां च सङ्गमे॥ ४२
करोति यः क्षौरकर्म सोऽशुचिः सर्वकर्मसु।
स च तिष्ठति कुण्डे च नखादीनाञ्च सुन्दरि॥ ४३
तदह्वैवदिनमानाब्दं तद्धोजी दण्डताडितः।
सकेशं पार्थिवं लिङ्गं यो वार्चयति भारते॥ ४४
स तिष्ठति केशकुण्डे मृद्रेणुमानवर्षकम्।
तदन्ते यावनीं योनिं प्रयाति हरकोपतः॥ ४५
शताब्दाच्छुद्द्धिमाप्नोति राक्षसः स भवेद् ध्रुवम्।
पितृणां यो विष्णुपदे पिण्डं नैव ददाति च॥ ४६
स च तिष्ठत्यस्थिकुण्डे स्वलोमाब्दं महोल्बणे।
ततः सुयोनिं सम्प्राप्य कुखञ्जः सप्तजन्मसु ॥ ४७
भवेन्महादरिद्रश्च ततः शुद्धो हि देहतः।
यः सेवते महामूढो गुर्विणीं च स्वकामिनीम्॥ ४८
प्रतप्ते ताम्रकुण्डे च शतवर्षं स तिष्ठति।
अवीरान्नं च यो भुङ्के ऋतुस्नातान्नमेव च॥ ४९
मांस खाना पड़ता है। यमदूत उसपर दण्ड-प्रहार
करते हैं। उसे मांस तथा रक्तका बोझ मस्तकपर
उठाकर ढोना पड़ता है और रक्त आदिको चाटकर
वह अपनी क्षुधा शान्त करता है । तत्पश्चात् वह पापी
साठ हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें उस कन्याकी विष्ठाका
कोड़ा बनकर रहता है। इसके बाद भारतवर्षमें सात
जन्मोंतक व्याध, तीन जन्मोंतक सूअर, सात जन्मोंतक
कुक्कुट, सात जन्मोंतक मेढक और जोंक तथा पुनः
सात जन्मोंतक कौएकी योनि प्राप्त करता है, तत्पश्चात्
वह शुद्ध होता है॥ ३७-४१ ॥
जो मनुष्य व्रतों, उपवासों और श्राद्धों आदिके
अवसरपर क्षौरकर्म करता है, वह सम्पूर्ण कर्मोके लिये
अपवित्र हो जाता है। हे सुन्दरि! वह नख आदि
कुण्डॉमें उन दिनोंकी संख्याके बराबर वर्षोतक वास
करता है, उन्हीं दुष्पदार्थोका भक्षण करता है और
डण्डोंसे पीटा जाता है॥ ४२-४३६ ॥
जो भारतवर्षमें केशयुक्त मिट्टीसे बने पार्थिव
लिंगको पूजा करता है, वह उस मृदामें विद्यमान
रजकणोंको संख्याके बराबर वर्षोतक केशकुण्ड
नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर भगवान्
शिवके कोपके कारण वह यवनयोनिमें जन्म लेता
है और फिर वह राक्षसयोनिमें जन्म ग्रहण करता है
तथा सौ वर्षके पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती
है ॥ ४४-४५६ ॥
जो मनुष्य विष्णुपदतीर्थ (गयातीर्थ)-में
पितरोंको पिण्ड नहीं देता, वह अपने शरीरके
रोमोंको संख्याके बराबर वर्षोतक अस्थिकुण्ड नामक
अत्यन्त भयानक कुण्डमें वास करता है। तत्पश्चात्
बह मानवयोनि प्राप्तकर सात जन्मोंतक लँगड़ा तथा
महान् दरिद्र होता है । तत्पश्चात् उसकी देहशुद्धि हो
जाती है॥ ४६-४७ ॥
जो महामूर्ख मनुष्य अपनी गर्भवती स्त्रीके साथ
सहवास करता है, वह सौ वर्षोंतक अत्यन्त तपते हुए
ताप्रकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है॥ ४८६ ॥
जो व्यक्ति पति-पुत्रहीन स्त्री तथा ऋतुस्नाता
स्त्रीका अन्न खाता है, वह जलते हुए लोहकुण्ड
नामक नरकमें सौ वर्षोतक रहता है। इसके बाद वह
४८८
लोहकुण्डे शताब्दं च स च तिष्ठति तप्तके ।
स व्रजेद्रजकों योनिं काकानां सप्तजन्मसु॥ ५०
महाब्रणी दरिद्रश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः।
यो हि चर्माक्तहस्तेन देवद्रव्यमुपस्पृशेत्॥ ५१
शतवर्षप्रमाणं च चर्मकुण्डे स तिष्ठति।
यः शूद्रेणाभ्यनुज्ञातो भुङ्के शूद्रान्नमेव च॥ ५२
स च तप्तसुराकुण्डे शताब्दं तिष्ठति द्विजः।
ततो भवेच्छूद्रयाजी ब्राह्मणः सप्तजन्मसु॥ ५३
शूद्रश्राद्धान्नभोजी च ततः शुद्धो भवेद् धुवम्।
वाग्दुष्ट: कटुको वाचा ताडयेत्स्वामिनं सदा॥ ५४
तीक्ष्णकण्टककुण्डे स तद्भोजी तत्र तिष्ठति।
ताडितो यमदूतेन दण्डेन च चतुर्गुणम् ॥ ५५
ततः उच्चैः श्रवाः सप्तजन्मस्वेव ततः शुचिः।
विषेण जीवनं हन्ति निर्दयो यो हि मानवः॥ ५६
विषकुण्डे च तद्भोजी सहस्त्राब्दं च तिष्ठति।
ततो भवेन्नृघाती च व्रणी च शतजन्मसु॥ ५७
सप्तजन्मसु कुष्ठी च ततः शुद्धो भवेद् ध्रुवम्।
दण्डेन ताडयेद् गां हि वृषञ्च वृषवाहकः॥ ५८
भृत्यद्वारा स्वतन्त्रो वा पुण्यक्षेत्रे च भारते।
प्रतप्ते तैलकुण्डेऽग्नौ तिष्ठति स्म चतुर्युगम्॥ ५९
गवां लोमप्रमाणाब्दं वृषो भवति तत्परम्।
कुन्तेन हन्ति यो जीवं वह्निलोहेन हेलया॥ ६०
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३३
सात जन्मोंतक रजक तथा कौएकी योनि पाता है।
उस समय वह दरिद्र रहता है और विशाल घावोंसे
युक्त रहता है, तदनन्तर वह मनुष्य शुद्ध हो जाता
है ॥ ४९-५०३ ॥
जो व्यक्ति चर्मसे स्पर्शित हाथके द्वारा देवद्रव्यका
स्पर्श करता है, वह सौ वर्षांतक चर्मकुण्ड नामक
नरकमें वास करता है॥ ५१३ ॥
जो ब्राह्मण किसी शूद्रसे स्वीकृति प्राप्तकर उसका
अन्न खाता है, वह तप्तसुराकुण्ड नामक नरकमें सौ
वर्षोतक वास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक
शूद्रयाजी (शूद्रोंका यज्ञ करानेवाला) ब्राह्मण होता है
और शुद्रोंका श्राद्धान्न ग्रहण करता है, तदनन्तर वह
अवश्य ही शुद्ध हो जाता है॥ ५२-५३३ ॥
जो कटुभाषी मनुष्य कठोर वचनके द्वारा
अपने स्वामीको सदा पीडित करता रहता है, वह
तीक्ष्णकण्टककुण्ड नामक नरकमें वास करता है
और उसे वहाँपर कण्टक ही खानेको मिलते हैं ।
यमदूतके द्वारा डंडेसे वह चार गुना ताडित
किया जाता है। उसके बाद वह सात जन्मतक
अश्वकी योनि प्राप्त करता है, फिर वह शुद्ध हो
जाता है॥ ५४-५५ ॥
जो दयाहीन मनुष्य विषके द्वारा किसी प्राणीको
हत्या करता है, वह हजार वर्षोतक विषकुण्ड नामक
नरकमें रहता है और वहाँपर उसे उसी विषका भोजन
करना पड़ता है। उसके बाद वह नरघाती सात
जन्मोंतक बड़े-बड़े घावॉंसे युक्त तथा सात जन्मोंतक
कोढ्से ग्रस्त रहता है, तत्पश्चात् वह अवश्य ही शुद्ध
हो जाता है॥ ५६-५७३ ॥
पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जो वृषवाहक गायको और
बैलको डण्डेसे स्वयं मारता है अथवा सेवकके द्वारा
मरवाता है, उसे चार युगोंतक तपते हुए तैलकुण्ड
नामक नरकमें वास करना पड़ता है और तत्पश्चात्
उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोतक
उसे बैल होना पड़ता है॥ ५८-५९६ ॥
हे साध्वि! जो मनुष्य भालेसे अथवा अग्निमें
तपाये गये लोहेसे किसी प्राणीको उपेक्षापूर्वक हत्या
कर देता है, वह दस हजार वर्षोतक कुन्तकुण्ड
अ० ३३]
कुन्तकुण्डे वसेत्सोऽपि वर्षाणामयुतं सति।
ततः सुयोनिं सम्प्राप्य चोदरे व्याधिसंयुतः॥ ६१
जन्मनैकेन क्लेशेन ततः शुद्धो भवेन्नरः।
यो भुङ्के च वृथा मांसं मांसलोभी द्विजाधमः॥ ६२
हरेरनैवेद्यभोजी कृमिकुण्डं प्रयाति सः।
स्वलोममानवर्ष च तद्भोजी तत्र तिष्ठति॥ ६३
ततो भवेम्लेच्छजातिस्त्रिजन्मनि ततो द्विजः।
ब्राह्मणः शूद्रयाजी च शूद्रश्राद्धानभोजकः॥ ६४
शूद्राणां शवदाही च पूयकुण्डे वसेद् श्रुवम्।
यावल्लोमप्रमाणाब्दं यमदण्डेन सुव्रते॥ ६५
ताडितो यमदूतेन तद्धोजी तत्र तिष्ठति।
ततो भारतमागत्य स शूद्रः सप्तजन्मसु॥ ६६
महारोगी दरिद्रश्च बधिरो मूक एव च।
कृष्णं पदां च के यस्य तं सर्प हन्ति यो नरः॥ ६७
स्वलोममानवर्ष च सर्पकुण्डं प्रयाति सः।
सर्पेण भक्षितः सोऽथ यमदूतेन ताडितः॥ ६८
वसेच्च सर्पविड्भोजी ततः सपों भवेद् श्रुवम्।
ततो भवेन्मानवश्च स्वल्पायुर्दद्रुसंयुतः ॥ ६९
महाक्लेशेन तन्मृत्युः सर्पेण भक्षिताद् श्रुवम्।
विधिप्रदत्तजीव्यांश्च क्षुद्रजन्तूंश्च हन्ति यः॥ ७०
नवम स्कन्ध
४८९
नामक नरकमें वास करता है। तत्पश्चात् उत्तम
मानवयोनिमें जन्म प्राप्त करके वह उदररोगसे
पीडित होता है। इस प्रकार एक ही जन्ममें
कष्ट भोगनेके पश्चात् वह मनुष्य शुद्ध हो जाता
है॥ ६०-६१६ ॥
जो अधम द्विज भगवत्प्रसादका त्याग करके
मांसस्वादके लोभसे व्यर्थ ही मांस-भक्षण करता
है, वह कृमिकुण्डमें जाता है। वहाँ अपने शरीरके
रोमोंको संख्याके समान वर्षोतक रोमका ही
भक्षण करता हुआ वह पड़ा रहता है। फिर तीन
जन्मोंतक म्लेच्छ जातिमें जन्म लेकर पुनः द्विज
होता है॥ ६२-६३६ ॥
जो ब्राह्मण शूद्रोंका यज्ञ कराता है, शूट्रोंका
श्राद्धान्न खाता है तथा शूद्रोंका शव जलाता है, वह
अपने शरीरमें जितने रोएँ हैं; उतने वर्षोतक पूयकुण्ड
नामक नरकमें अवश्य वास करता है। हे सुव्रते! बह
उस नरकमें यमदूतके द्वारा यमदण्डसे पीटा जाता है
तथा पीवका भोजन करते हुए पड़ा रहता है।
तत्पश्चात् वह भारतवर्षमें जन्म लेकर सात जन्मोंतक
शूद्र रहता है। उस समय वह अत्यन्त रोगी, दरिद्र,
बहरा तथा गूँगा रहता है ॥ ६४-६६६ ॥
कृष्णवर्णवाले तथा जिसके मस्तकपर कमल-
चिह्न विद्यमान हो, उस सर्पको जो मनुष्य मारता
है, वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर
वर्षोतकके लिये सर्पकुण्ड नामक नरकमें जाता है।
उसे वहाँपर सर्प काटते हैं तथा यमदूत उसे पीरते हैं।
सर्पको विष्ठा खाते हुए वह उस नरकमें वास करता
है। तत्पश्चात् उसे निश्चय ही सर्पयोनि प्राप्त होती
है। तदनन्तर वह मानवयोनि प्राप्त करता है, उस
समय वह दाद आदि रोगोंसे युक्त तथा अल्प
आयुवाला होता है। उसके बाद सर्पके काटनेसे
अत्यन्त कष्टपूर्वक उसकी मृत्यु होती है, यह निश्चित
है॥ ६७-६९६ ॥
ब्रह्मके विधानके अनुसार रक्तपान आदिपर
जीवित रहनेवाले [मच्छर आदि] क्षुद्र जन्तुओंको जो
व्यक्ति मारता है, वह उन जन्तुओंकी संख्याके बराबर
वर्षांतक दंशकुण्ड और मशककुण्ड नामक नरकमें
४९०
स दंशमशयोः कुण्डे जन्तुमानाब्दमेव च।
दिवानिशं भक्षितस्तैरनाहारश्च शब्दवान्॥ ७१
हस्तपादादिबद्धश्च यमदूतेन ताडितः।
ततो भवेत्षुद्रजन्तुर्जातिश्च यावनी भवेत्॥ ७२
ततो भवेन्मानवश्च सोऽङ्गहीनस्ततः शुचिः।
यो मूढो मधुमश्नाति हत्वा च मधुमक्षिकाः॥ ७३
स एव गारले कुण्डे जीवमानाब्दकं वसेत्।
भक्षितो गरलैर्दग्धो यमदूतेन ताडितः॥ ७४
ततो हि मक्षिकाजातिस्ततः शुद्धो भवेन्नरः।
दण्डं करोत्यदण्ड्ये च विप्रे दण्डं करोति च॥ ७५
स कुण्डं वज्रदंष्ट्राणां कीटानां याति सत्वरम्।
स तल्लोमप्रमाणाब्दं तत्र तिष्ठत्यहर्निशम्॥ ७६
शब्दकृद्भक्षितस्तैस्तु यमदूतेन ताडितः।
करोति रोदनं भत्रे हाहाकारं क्षणे क्षणे॥ ७७
पुनः सूकरयोनौ च जायते सप्तजन्मसु।
त्रिजन्मनि काकयोनौ ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ ७८
अर्थलोभेन यो मूढः प्रजादण्डं करोति सः।
वृश्चिकानां च कुण्डं च तल्लोमाब्दं वसेद् ध्रुवम् ॥ ७९
ततो वृश्चिकजातिश्च सप्तजन्मसु भारते।
ततो नरश्चाङ्गहीनो व्याधिशुद्धो भवेद् ्रुवम्॥ ८०
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३३
निवास करता है। वे जन्तु उसे दिन-रात कारते
रहते हैं, उसे वहाँ खानेको कुछ भी नहीं मिलता और
वह जोर-जोरसे रोता-चिल्लाता रहता है। यमदूत
उसके हाथ-पैर बाँधकर उसे पीटते हैं । तत्पश्चात् वह
उन्हीं क्षुद्र जन्तुओंको योनिमें जाता है और पुनः
यवनजातिमें जन्म लेता है। तदनन्तर वह अंगहीन
मानव होकर जन्म लेता है, तब उसकी शुद्धि हो
जाती है॥ ७०-७२६ ॥
जो मूर्ख मनुष्य मधुमक्खियोंको मारकर मधुका
भक्षण करता है, वह उन मारी गयी मक्खियोंकी
संख्याके बराबर वर्षोतक गरलकुण्डमें वास करता है।
वहाँपर उसे मधुमक्खियाँ काटती रहती हैं, बह सदा
विषसे जलता रहता है और यमदूत उसे पीटते रहते
हैं। उसके बाद वह मक्खियोंकी योनिमें जन्म लेता
है, तदनन्तर उसकी शुद्धि होती है॥ ७३-७४६ ॥
जो मनुष्य किसी विप्रको अथवा दण्ड न
देनेयोग्य किसी व्यक्तिको दण्डित करता है, वह
वञ्रके समान दाँतोंबाले भयानक जन्तुओंसे भरे
बज्रदंष्ट्रकुण्ड नामक नरकमें शीघ्र ही जाता है। उस
दण्डित व्यक्तिके शरीरमें जितने रोम होते हैं; उतने
वर्षोतक वह उस नरकमें निवास करता है। उसे
नरकके वे कीड़े दिन-रात काटते रहते हैं और वह
चीखता-चिल्लाता है। हे भद्रे! यमदूत उसे सदा
पीटते रहते हैं, जिससे वह रोता है और प्रतिक्षण
हाहाकार करता रहता है । तदनन्तर वह सात जन्मोंतक
सूअरकी योनिमें और तीन जन्मोंतक कौवेकी योनिमें
उत्पन्न होता है, उसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता
है ॥ ७५-७८ ॥
जो मूर्ख धनके लोभसे प्रजाको दण्ड देता है,
वह वृश्चिककुण्ड नामक नरकमें जाता है और उस
प्रजाके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षांतक उस
नरकमें वास करता है । तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह
भारतवर्षमें बिच्छुओंकी योनिमें जन्म लेता है। इसके
पश्चात् मनुष्ययोनिमें जन्म प्राप्त करता है तथा
अंगहीन और रोगी होकर वह शुद्ध हो जाता है—
यह सत्य है॥ ७९-८०॥
अ०: ३३ ]
ब्राह्मण: शस्त्रधारी यो ह्यान्येषां धावको भवेत्।
सन्ध्याहीनश्च यो विप्रो हरिभक्तिविहीनकः॥ ८१
स तिष्ठति स्वलोमाब्दं कुण्डेषु च शरादिषु।
विद्धः शरादिभिः शश्वत्ततः शुद्धों भवेन्नरः ॥ ८२
कारागारे सान्धकारे प्रणिहन्ति प्रजाश्च य: ।
प्रमत्त: स्वस्य दोषेण गोलकुण्डं प्रयाति सः ॥ ८३
स पङ्कतप्ततोयाक्तं सान्धकारं भयङ्करम्।
तीक्ष्णदंष्ट्रेशच कीटैश्च संयुक्तं गोलकुण्डकम्॥ ८४
कीटैर्विद्धो वसेत्तत्र प्रजालोमाब्दमेव च।
ततो भवेत्प्रजाभृत्यस्ततः शुद्धो भवेत्क्रमात् ॥ ८५
सरोवरादुत्थितांश्च नक्रादीन्हन्ति यो नरः।
नक्रकण्टकमानाब्दं नक्रकुण्डं प्रयाति सः॥ ८६
ततो नक्रादिजातीयो भवेन्नक्रादिषु श्रुवम्।
ततः सद्यो विशुद्धो हि दण्डेनैव पुनः पुनः ॥ ८७
वक्षः श्रोणीस्तनास्यञ्च यः पश्यति परस्त्रियाः ।
कामेन कामुको यो हि पुण्यक्षेत्रे च भारते॥ ८८
स वसेत्काककुण्डे च काकैः संचूर्णलोचनः।
ततः स्वलोममानाब्दं भवेह्ग्धस्त्रिजन्मनि॥ ८९
स्वर्णस्तेयी च यो मूढो भारते सुरविप्रयोः ।
स च मन्थानकुण्डे वै स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्॥ ९०
“5 जबम स्कन्ध
४९९
जो ब्राह्मण शस्त्र लेकर दूसरे लोगोंके लिये
दूतका काम करता है, जो विप्र सन्ध्या-वन्दन नहीं
करता तथा जो भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख है,
वह शर आदिके कुण्डोंमें (शरकुण्ड, शूलकुण्ड,
खड्गकुण्ड आदिमें) अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके
बराबर वर्षोतक निवास करता है। वह वहाँपर निरन्तर
शर आदिसे बेधा जाता है, इसके पश्चात् वह मनुष्य
शुद्ध हो जाता है॥८१-८२॥
अभिमानमें चूर रहनेवाला जो व्यक्ति अन्धकारपूर्ण
कारागारमें प्रजाओंको मारता-पीटता है, वह अपने
इस दोषके प्रभावसे गोलकुण्ड नामक नरकमें जाता
है। वह गोलकुण्ड प्रतप्त कीचड़ तथा जलसे युक्त,
अन्धकारपूर्ण, अत्यन्त भयंकर तथा तीखे दाँतोंवाले
कोटोंसे परिपूर्ण है। उन कीड़ोंसे सदा काटा जाता
हुआ वह व्यक्ति प्रजाओंके शरीरमें विद्यमान रोमोंको
संख्याके बराबर वर्षांतक उस नरकमें निवास करता
है। तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाकर वह उन प्रजाओंका
सेवक बनता है, इस प्रकार क्रमसे वह शुद्ध हो जाता
है॥ ८३-८५॥
जो मनुष्य सरोवरसे निकले हुए नक्र आदि
जल-जन्तुओंकी हत्या करता है, बह नक्रकुण्ड
नामक नरकमें जाता है और वहाँ उस नक्रके शरीरमें
विद्यमान काँटोंकी संख्याके बराबर वर्षोतक निवास
करता है। तत्पश्चात् वह निश्चितरूपसे नक्र आदि
योनियोंमें जन्म लेता है और बार-बार दण्ड पानेपर
शीघ्र ही उसको शुद्धि हो जाती है॥ ८६-८७॥
जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जन्म लेकर
कामवासनाके वशीभूत हो परायी स्त्रीका वक्ष,
नितम्ब, स्तन तथा मुख देखता है; बह अपने शरीरके
रोमोंको संख्याके बराबर वर्षांतक काककुण्ड नामक
नरकमें वास करता है। वहाँ कौवे उसकी आँखें
नोचते रहते हैं । तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक संतप्त
होता रहता है॥ ८८-८९॥
जो मूढ भारतवर्षमें जन्म पाकर देवता तथा
ब्राह्मणका स्वर्ण चुराता है, वह अपने शरीरके रोमोंकी
संख्याके बराबर वर्षांतक मन्थानकुण्ड नामक नरकमें
अवश्य वास करता है । यमदूत उसकी आँखोंपर पट्टी
४९२
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३३
बाँधकर उसे डण्डोंसे पीटते हैं। उसे वहाँ उनकी
ताडितो यमदूतेन मन्थानैश्छन्नलोचनः।
तद्विड़्भोजी च तत्रैव ततश्चान्धस्त्रिजन्मनि॥ ९९
सप्तजन्म दरिद्रश्च महाक्रूरश्च पातको।
भारते स्वर्णकारश्च स च स्वर्णवणिक् ततः ॥ ९२
यो भारते ताम्रचौरो लोहचौरश्च सुन्दरि।
स च स्वलोममानाब्दं बीजकुण्डं प्रयाति स:॥ ९३
तत्रैव बीजविड्भोजी बीजैश्च छन्नलोचन: ।
ताडितो यमदूतेन ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ ९४
भारते देवचौरशच देवद्रव्यापहारकः।
स दुस्तरे वज्रकुण्डे स्वलोमाब्दं वसेद् श्रुवम्॥ ९५
देहदग्धोऽपि तद्वञ्जैरनाहारश्च शब्दकृत्।
ताडितो यमदूतैश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ ९६
रौप्यगव्यांशुकानां च यश्चौरः सुरविप्रयोः ।
तप्तपाषाणकुण्डे च स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम्॥ ९७
त्रिजन्मनि च कंसोऽपि श्वेतरूपस्त्रिजन्मनि।
जन्मैकं शवेतचिह्ूशच ततोऽन्ये शवेतपक्षिणः॥ ९८
ततो रक्तविकारी च शूली वै मानवो भवेत्।
सप्तजन्मसु चाल्पायुस्ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ ९९
शेतं कांस्यमयं पात्रं यो हरेहदेवविप्रयोः।
तीक्ष्णपाषाणकुण्डे च स्वलोमाब्दं वसेन्नरः ॥ १००
स भवेदश्वजातिश्च भारते सप्तजन्मसु।
ततोऽधिकाङ्गजातिश्च पादरोगी ततः शुचि: ॥ १०१
विष्ठा खानी पडती है । तत्पश्चात् बह तीन जन्मोंतक
अन्धा तथा सात जन्मोंतक दरिद्र रहता है। तदनन्तर
वह पापी तथा अति क्रूर मनुष्य भारतमें स्वर्णकारका
जन्म लेकर स्वर्णका व्यवसाय करता है ॥ ९०-९२॥
हे सुन्दरि! जो मनुष्य भारतवर्षमें जन्म पाकर
ताँबे तथा लोहेकी चोरी करता है, वह बीजकुण्ड
नामक नरकमें जाता है और अपने शरीरके रोमोंकी
संख्याके बराबर वर्षोतक वहाँ निवास करता है। वहाँ
कोड़ोंकी विष्ठा खाता हुआ कीड़ोंसे ढकी आँखोंवाला
वह प्राणी यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है और तब
कालक्रमसे वह शुद्ध होता है॥ ९३-९४॥
जो व्यक्ति भारतवर्षमें जन्म पाकर देवताओंकी
मूर्ति तथा देवसम्बन्धी द्रव्योंकी चोरी करता है, वह
अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर
वर्षोतक दुस्तर वज्रकुण्ड नामक नरकमें निश्चित-
रूपसे निवास करता है। उसे वहाँ भूखा रहना
पड़ता है। उन वज्रोंके द्वारा यमदूतोंसे पीटे जानेपर
उसका शरीर दग्ध हो जाता है और वह रोने-
चिल्लाने लगता है, तत्पश्चात् उस मनुष्यकी शुद्धि हो
जाती है॥ ९५-९६॥
जो मनुष्य ब्राह्मण और देवताके रजत, गव्य
पदार्थ तथा वस्त्रोंको चुराता है; वह अपने शरीरके
रोमोंको संख्याके बराबर वर्षोंतक तप्तपाषाणकुण्ड
नामक नरकमें निश््चितरूपसे वास करता है । तत्पश्चात्
तीन जन्मोंतक कच्छप, तीन जन्मोंतक श्वेतकुष्ठी,
एक जन्ममें श्वेत दागवाला और फिर श्वेत पक्षी होता
है। उसके बाद वह सात जन्मोंतक रक्तदोषसे युक्त,
शूलरोगसे पीडित तथा अल्पायु मनुष्य होता है;
तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है॥ ९७-९९॥
जो व्यक्ति देवता और ब्राह्मणके पीतल तथा
कांसेके बर्तनोंका हरण करता है, बह अपने शरीरके
लोमसंख्यक वर्षोतक तीक्ष्णपाषाणकुण्ड नामक नरकमें
वास करता है। फिर वह सात जन्मोंतक भारतवर्षमें
घोड़ेको योनिमें उत्पन्न होता है। उसके बाद वह
अधिक अंगोंवाला तथा पैरके रोगसे ग्रस्त होता है।
तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है॥ १००-१०१॥
आ० ३३]
पुंश्चल्यन्नं च यो भुङ्के पुंएचलीजीव्यजीविन: ।
स्वलोममानवर्ष च लालाकुण्डे वसेद् ध्रुवम्॥ १०२
ताडितो यमदूतेन तद्धोजी तत्र दुःखितः।
ततश्चक्षुःशूलरोगी ततः शुद्धः क्रमेण सः॥ १०३
म्लेच्छसेवी मसीजीवी यो विप्रो भारते भुवि।
वसेत्स्वलोममानाब्दं मसीकुण्डे स दुःखभाक् १०४
ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र तिष्ठति।
ततस्त्रिजन्मनि भवेत्कृष्णवर्णः पशुः सति॥ १०५
त्रिजन्मनि भवेच्छागः कृष्णवर्णस्त्रिजन्मनि।
ततः स तालवृक्षश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ १०६
धान्यादिसस्यं ताम्बूलं यो हरेत्सुरविप्रयोः।
आसनं च तथा तल्पं चूर्णकुण्डे प्रयाति स: ॥ १०७
शताब्दं तत्र निवसेद्यमदूतेन ताडितः।
ततो भवेन्मेषजातिः कुक्कुटश्च त्रिजन्मनि॥ १०८
ततो भवेद्वानरश्च कासव्याधियुतो भुवि।
वंशहीनो दरिद्रश्च स्वल्पायुश्च ततः शुचि: ॥ १०९
करोति चक्र विप्राणां हत्वा द्रव्यं च यो जन: ।
स वसेच्चक्रकुण्डे च शताब्दं दण्डताडितः॥ ११०
ततो भवेन्मानवश्च तैलकारस्त्रिजन्मनि।
व्याधियुक्तो भवेद्रोगी वंशहीनस्ततः शुचिः ॥ १११
नवम स्कन्ध
४९३
जो मनुष्य किसी व्यभिचारिणी स्त्रीका अन्न तथा
उस स्त्रीको जीविकापर आश्रित रहनेवाले व्यक्तिका अन्न
खाता है, वह अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके
बराबर वर्षोतक लालाकुण्ड नामक नरकमें निश््चितरूपसे
निवास करता है । वहाँपर वह यमदूतोंद्वारा पीटा जाता
है और अत्यन्त दु:खी होकर उसे वही लाला (लार)
खानी पड़ती है। तदनन्तर वह मानवयोनिमें उत्पन्न
होकर नेत्र तथा शूलके रोगसे पीड़ित होता है। इसके
बाद वह क्रमसे शुद्ध हो जाता है॥ १०२-१०३॥
जो ब्राह्मण भारतवर्षमें म्लेच्छोंकी सेवा करनेवाला
तथा मसिजीवी (मसिपर आश्रित रहकर अपनी
जीविका चलानेवाला) है, बह अपने शरीरके रोमोंकी
संख्याके बराबर वर्षांतक मसीकुण्ड नामक नरकमें
वास करता है और वहाँ बहुत दुःख पाता है । यमदूत
उसे पीटते हैं और उसे वहाँपर उसी मसि (स्याही)-
का सेवन करना पड़ता है। हे साध्वि! तत्पश्चात् वह
तीन जन्मोंतक काले रंगका पशु होता है। तदनन्तर
वह तीन जन्मोंतक काले रंगका छाग बकरा होता है
और उसके बाद तीन जन्मोंतक ताड़का वृक्ष होता है;
तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है॥ १०४—१०६॥
जो मनुष्य देवता अथवा ब्राह्मणके अन्न, फसल,
ताम्बूल, आसन और शय्या आदिकी चोरी करता है;
वह चूर्णकुण्ड नामक नरकमें जाता है और वहाँ सौ
वर्षोतक निवास करता है। वह यमदूतोंद्वारा पीटा
जाता है। तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक मेष और
कुक्कुट होता है। उसके बाद वानर होता है । तदनन्तर
भारतभूमिपर काशरोगसे पीडित, वंशहीन, दरिद्र तथा
अल्पायु मनुष्य होता है; इसके बाद उसकी शुद्धि हो
जाती है॥ १०७-१०९॥
जो मनुष्य किसी ब्राह्मणके धनका हरण करके
उससे चक्र (कोल्हू)-सम्बन्धी व्यवसाय करता है,
वह चक्रकुण्ड नामक नरकमें डण्डोंसे पीटा जाता
हुआ सौ वर्षोंतक वास करता है। उसके बाद वह
मानवयोनिमें उत्पन्न होता है और तीन जन्मोंतक
अनेक प्रकारको व्याधियोंसे युक्त रोगी तथा वंशहीन
तैलकार (तेलका व्यापार करनेवाला) होता है;
तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती है॥ ११०-१११॥
४९४
गोधनेषु च विप्रेषु करोति वक्रतां पुमान्।
प्रयाति वक्रकुण्डं स तिष्ठेद्युगशतं सति॥ ११२
ततो भवेत्स वक़्ाङ्को हीनाङ्गः सप्तजन्मनि।
दरिद्रो वंशहीनश्च भार्याहीनस्ततः शुचिः ॥ ११३
ततो भवेद् गृध्चजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः।
त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च त्रिजन्मनि॥ ११४
निषिद्धं कूर्ममांसं च ब्राह्मणो यो हि भक्षति।
कूर्मकुण्डे वसेत्सोऽपि शताब्दं कूर्मभक्षितः ॥ ११५
ततो भवेत्कूर्मजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः।
त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च ततः शुचिः ॥ ११६
घृतं तैलादिकं चैव यो हरेत्सुरविप्रयोः।
स याति ज्चालाकुण्डं च भस्मकुण्डं च पातकी॥ ११७
तत्र स्थित्वा शताब्दं च स भवेत्तैलपाचितः।
सप्तजन्मनि मत्स्यश्च मूषकश्च ततः शुचिः॥ ११८
सुगन्धितैलं धात्रीं वा गन्धद्रव्यान्यदेव वा।
भारते पुण्यवर्षे च यो हरेत्सुरविप्रयोः॥ ११९
स वसेद्दग्धकुण्डे च भवेहग्धो दिवानिशम्।
स्वलोममानवर्ष च ततो दुर्गन्धिको भवेत्॥ १२०
दुर्गन्धिकः सप्तजन्म मृगनाभिस्त्रिजन्मनि।
सप्तजन्मसु मन्थानस्ततो हि मानवो भवेत्॥ १२१
बलेनैव छलेनैव हिंसारूपेण वा सति।
बलिष्ठश्च हरेद्भूमिं भारते परपैतृकीम्॥ १२२
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३३
हे साध्वि! जो व्यक्ति गौओं और ब्राह्मणके
साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता है, वह सौ युगोंतक
वक्रतुण्ड नामक नरकमें निवास करता है । तत्पश्चात्
वह सात जन्मोंतक वक्र अंगोंवाला, हीन अंगवाला,
दरिद्र, वंशहीन तथा भार्याहीन मानव होता है । उसके
बाद वह तीन जन्मोंतक गीध, तीन जन्मोंतक
सूअर, तीन जन्मोंतक बिल्ली और तीन जन्मोंतक
मोर होता है; तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती
है॥ ११२-११४॥
जो ब्राह्मण कछुएका निषिद्ध मांस खाता है,
वह सौ वर्षोतक कूर्मकुण्ड नामक नरकमें निवास
करता है। वहाँपर उसे कछुए सदा नोंच-नोंचकर
खाते रहते हैं। तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक कछुए,
तीन जन्मोंतक सूअर, तीन जन्मोंतक बिल्ली और तीन
जन्मोंतक मोरकी योनिमें जन्म लेता है। उसके बाद
वह शुद्ध हो जाता है॥ ११५-११६ ॥
जो व्यक्ति किसी देवता या ब्राह्मणका घृत,
तेल आदि चुराता है, वह पापी ज्वालाकुण्ड और
भस्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है । वहाँपर वह एक
सौ वर्षोतक वास करते हुए तेलमें पकाया जाता है।
इसके बाद वह सात जन्मोंतक मछली और सात
जन्मोंतक चूहा होता है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो
जाती है॥ ११७-११८ ॥
जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें किसी देवता या
ब्राह्मणके सुगन्धित तेल, इत्र, आँवलाचूर्ण तथा अन्य
सुगन्धित द्रव्यको चोरी करता है; वह दग्धकुण्ड
नामक नरकमें वास करता है। वहाँपर वह अपने
शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोतक
निवास करता है और दिन-रात दग्ध होता रहता है।
इसके बाद वह सात जन्मोंतक दुर्गन्धिक होता है।
पुनः तीन जन्मोंतक कस्तूरी मृग और सात जन्मोंतक
मन्थान नामक कोड होता है, तत्पश्चात् वह मनुष्ययोनिमें
उत्पन्न होता है॥ ११९-१२१॥
हे साध्वि! जो बलिष्ठ पुरुष भारतवर्षमें अपने
बलसे अथवा छलसे अथवा हिंसाके द्वारा किसी
दूसरेकी पैतृकसम्पत्तिका हरण करता है, वह तप्तसूचीकुण्ड
नामक नरकमें वास करता है। वह उस नरकमें
अ० ३४]
स वसेत्तप्तसूचिं च भवेत्तापी दिवानिशम्।
तप्ततैले यथा जीवो दग्धो भवति सन्ततम्॥ १२३
भस्मसान्न भवत्येव भोगे देही न नश्यति।
सप्तमन्वन्तरं पापी सन्तप्तस्तत्र तिष्ठति॥ १२४
शब्दं करोत्यनाहारो यमदूतेन ताडितः।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि विट्कृमिश्च भवेत्ततः॥ १२५
ततो भवेद्धमिहीनो दरिद्रश्च ततः शुचिः।
ततः स्वयोनिं सम्प्राप्य शुभं कर्माचरेत्पुनः॥ १२६
नवम स्कन्ध
४९५
दिन-रात उसी तरह संतप्त होता रहता है, जैसे कोई
जीव तप्त तेलमें निरन्तर दग्ध होता रहता है। जलाये
जानेपर भी कर्मभोगके कारण उसका देह न तो
भस्मसात् होता है और न तो उसका नाश ही होता
है, अपितु वह पापी सात मन्वन्तरतक वहाँ सन्तप्त
होता रहता है। वह सदा चिल्लाता रहता है, भूखा
रहता है और यमदूत उसे पीटते रहते हैं। उसके बाद
वह साठ हजार वर्षोतक विष्ठाका कीड़ा होता है।
तत्पश्चात् वह मानवयोनिमें उत्पन्न होकर भूमिहीन
और दरिद्र होता है। उसके बाद वह शुद्ध हो जाता
है और अपनी योनिमें जन्म प्राप्तकर पुनः शुभ
आचरण करने लगता है॥ १२२-१२६॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां नवमस्कन्धे
नानाकर्मविपाकफलकथनं नाम त्रयस्त्रिशोऽध्यायः ॥ ३३॥
AAO
gad
अथ चतुस्त्रशोऽध्यायः
विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होनेवाले नरकोंका वर्णन
यय उवाच
छिनत्ति जीवं खड्गेन दयाहीनः सुदारुणः।
नरघाती हन्ति नरमर्थलोभेन भारते॥ १
असिपत्रे वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश।
तेषु यो ब्राह्मणान् हन्ति शतमन्वन्तरं वसेत्॥ २
छिन्नाङ्गः संवसेत् सोऽपि खड्गधारेण सन्ततम्।
अनाहारः शब्दमुच्चैर्यमदूतेन ताडितः॥ ३
मन्थानः शतजन्मानि शतजन्मानि सूकरः।
कुक्कुटः सप्त जन्मानि शृगालः सप्तजन्मसु॥ ४
व्याघ्रश्च सप्त जन्मानि वृकश्चैव त्रिजन्मसु।
सप्तजन्मसु मण्डूको यमदूतेन ताडितः॥ ५
स भवेद्भारते वर्षे महिषश्च ततः शुचिः।
ग्रामाणां नगराणां वा दहनं य: करोति च॥ ६
यमराज बोले—[हे सावित्रि!] भारतवर्षमें
जो कोई निर्दयी तथा क्रूर व्यक्ति खड्गसे किसी
जीवको काटता है या कोई नरघाती धनके लोभसे
किसी मनुष्यकी हत्या करता है, वह चौदहों इन्द्रोंकी
स्थितिपर्यन्त असिपत्रवन नामक नरकमें वास करता
है। उनमें भी जो ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, वह सौ
मन्वन्तरतक वहाँ रहता है। तलवारकी धारसे उसके
शरीरके अंग निरन्तर कटते रहते हैं। आहार न मिलने
और यमदूतोंसे पीटे जानेके कारण वह जोर-जोरसे
चिल्लाता रहता है। तत्पश्चात् वह सौ जन्मोंतक
मन्थान नामक कोड़ा, सौ जन्मोंतक सूअर, सात
जन्मोंतक मुर्गा, सात जन्मोंतक सियार, सात जन्मोंतक
बाघ, तीन जन्मोंतक भेड़िया और सात जन्मोंतक
मेंढक होता है, साथ ही वह यमदूतसे निरन्तर पीटा
भी जाता है। इसके बाद वह भारतवर्षमें महिष होता
है, फिर उसको शुद्धि हो जाती है॥ १-५६॥
हे सति! जो मनुष्य गाँवों और नगरोंको जलाता
है, बह क्षुरधार नामक नरकमें क्षत-विक्षत अंगोंवाला
होकर तीन युगोंतक रहता है। तत्पश्चात् वह शीघ्र
४९६
श्रीमद्देवीभागवत
[ अ० ३४
क्षुधारे वसेत्सोऽपि छिन्नाङ्गस्त्रियुगं सति।
ततः प्रेतो भवेत्सद्यो वह्विवक्त्रो भ्रमन्महीम्॥ ७
सप्तजन्मामेध्यभोजी कपोतः सप्तजन्मसु।
ततो भवेन्महाशूली मानवः सप्तजन्मनि॥ ८
सप्तजन्म गलत्कुष्ठी ततः शुद्धो भवेन्नरः ।
परकर्णे मुखं दत्त्वा परनिन्दा करोति य:॥ ९
परदोषे महाश्लाघी देवब्राह्मणनिन्दकः।
सूचीमुखे वसेत्सोऽपि सूचीविद्धो युगत्रयम्॥ १०
ततो भवेद् वृश्चिकश्च सर्पश्च सप्तजन्मसु ।
वज़कीट: सप्तजन्म भस्मकीटस्ततः परम्॥ ११
ततो भवेन्मानवश्च महाव्याधिस्ततः शुचिः।
गृहिणां हि गृहं भित्त्वा वस्तुस्तेयं करोति य:॥ १२
गाश्च छागांश्च मेषांश्च याति गोकामुखे च स: ।
ताडितो यमदूतेन वसेत्तत्र युगत्रयम्॥ १३
ततो भवेत्सप्तजन्म गोजातिर्व्याधिसंयुतः।
त्रिजन्मनि मेषजातिश्छागजातिस्त्रिजन्मनि॥ १४
ततो भवेन्मानवश्च नित्यरोगी दरिद्रकः।
भार्याहीनो बन्धुहीनः सन्तापी च ततः शुचि: ॥ १५
सामान्यद्रव्यचौरश्च याति नक्रमुखं च सः।
ताडितो यमदूतेन वसेत्तत्राब्दकत्रयम्॥ १६
ततो भवेत्सप्तजन्म गोपतिर्व्यांधिसंयुतः।
ततो भवेन्मानवश्च महारोगी ततः शुचिः॥ १७
ही प्रेत होता है और मुँहसे आग उगलते हुए पृथ्वीपर
घूमता रहता है। फिर वह सात जन्मोंतक अपवित्र
मल-मूत्र आदि पदार्थोंको खाता रहता है और सात
जन्मोंतक कपोत होता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक
मानवयोनिमें उत्पन्न होता है और महान् शूलरोगसे
पीड़ित रहता है। पुनः वह सात जन्मोंतक गलित
कृष्ठरोगसे ग्रस्त रहता है और तत्पश्चात् वह मनुष्य
शुद्ध हो जाता है॥ ६-८६ ॥
जो मनुष्य दूसरेके कानमें अपना मुख लगाकर
परायी निन्दा करता है, परदोष निकालकर बड़ी-
बड़ी डींग हाँकता है और देवता तथा ब्राह्मणकी
निन्दा करता है, वह सूचीमुख नामक नरकमें
तीन युगोंतक वास करता है। वहाँ उसके शरीरमें
निरन्तर सूई चुभायी जाती है। तत्पश्चात् वह सात
जन्मोंतक बिच्छू, सात जन्मोंतक सर्प, सात जन्मोंतक
वज्रकीट और सात जन्मोंतक भस्मकीटकी योनिमें
रहता है। तदनन्तर मानवयोनिमें जन्म लेकर वह
महाव्याधिसे ग्रस्त रहता है, पुनः शुद्ध हो जाता
है॥ ९-११ ॥
जो व्यक्ति गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर वस्तुओंकी
चोरी करता है और गौओं, बकरों तथा भेड़ोंको चुरा
लेता है; बह गोकामुख नामक नरकमें जाता है।
वहाँपर यमदूतके द्वारा पीटा जाता हुआ वह तीन
युगोंतक वास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक
रोगग्रस्त गौकी योनिमें, तीन जन्मोंतक भेड़की योनिमें
और तीन जन्मोंतक बकरेकी योनिमें जन्म पाता है।
तत्पश्चात् वह मानवयोनिमें उत्पन्न होता है, उस
समय वह नित्य रोगी, दरिद्र, भार्याहीन, बन्धु-
बान्धवरहित और दुःखी रहता है, उसके बाद वह
शुद्ध हो जाता है॥ १२—१५॥
सामान्य द्रव्योंको चोरी करनेवाला नक्रमुख
नामक नरकमें जाता है। वहाँपर वह यमदूतके द्वारा
पीटा जाता हुआ तीन वर्षांतक निवास करता है,
तदनन्तर वह सात जन्मोंतक रोगसे पीडित रहनेवाला
बैल होता है। उसके बाद वह मानवयोनिमें जन्म
लेकर महान् रोगोंसे ग्रस्त रहता है और फिर शुद्ध हो
जाता है॥ १६-१७॥
अ० ३४]
हन्ति गाश्च गजांश्चैव तुरगांश्च नगांस्तथा।
स याति गजदंशं च महापापी युगत्रयम् ॥ १८
ताडितो यमदूतेन नागदन्तेन सन्ततम्।
स भवेद्गजजातिश्च तुरगश्च त्रिजन्मनि॥ १९
गोजातिर्म्लेच्छजातिश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः।
जलं पिबन्तीं तृषितां गां वारयति यः पुमान्॥ २०
नरकं गोमुखाकारं कृमितप्तोदकान्वितम्।
तत्र तिष्ठति सन्तप्तो यावन्मन्वन्तरावधि॥ २९
ततो नरोऽपि गोहीनो महारोगी दरिद्रकः।
सप्तजन्मान्त्यजातिश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः॥ २२
गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम्।
यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च॥ २३
भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते।
कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ २४
ताडितो यमदूतेन चूण्यमानश्च सन्ततम्।
क्षणं पतति वह्वौ च क्षणं पतति कण्टके॥ २५
क्षणं पतेत्तप्ततैले तप्तो येन क्षणं क्षणम्।
क्षणं च तप्तलोहे च क्षणं च तप्तताम्रके॥ २६
गृध्रो जन्मसहस्त्राणि शतजन्मानि सूकरः।
काकश्च सप्त जन्मानि सर्पश्च सप्तजन्मसु॥ २७
षष्टिवर्षसहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमिः।
नानाजन्मसु स वृषस्ततः कुष्ठी दरिद्रकः॥ २८
सावित्युवाच
विप्रहत्या च गोहत्या किंविधा चातिदैशिकी।
का वा नृणामगम्या च को वा संध्याविहीनकः ॥ २९
अदीक्षितः पुमान्को वा को वा तीर्थप्रतिग्रही ।
द्विजः को वा ग्रामयाजी को वा विप्रोऽथ देवल: ॥ ३०
नवम स्कन्ध
४९७
जो मनुष्य गायों, हाथियों, घोड़ों और सर्पोंका
वध करता है; वह महापापी गजदंश नामक नरकमें
जाता है और तीन युगोंतक वहाँ वास करता है।
यमदूत उसे हाथी-दाँतसे निरन्तर पीटते रहते हैं।
तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक हाथी, तीन जन्मोंतक
घोड़े, तीन जन्मोंतक गाय और तीन जन्मोंतक
म्लेच्छको योनिमें पैदा होता है, तदनन्तर वह मनुष्य
शुद्ध हो जाता है॥ १८-१९६ ॥
जो मनुष्य पानी पीती हुई प्यासी गायको
वहाँसे हटा देता है, वह कीड़ोंसे भरे तथा तप्त
जलसे युक्त गोमुख नामक नरकमें जाता है। वहाँपर
वह एक मन्वन्तरकी अवधितक सन्तप्त रहता है।
तदनन्तर वह सात जन्मोंतक अन्त्य जातिमें उत्पन्न
होकर गोहीन, महान् रोगी तथा दरिद्र मनुष्यके रूपमें
रहता है। उसके बाद वह व्यक्ति शुद्ध हो जाता
है॥ २०-२२॥
जो भारतवर्षमें शास्त्र-चचनकी आड लेकर
गोहत्या, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भिक्षुहत्या तथा भ्रूणहत्या
करता है और जो अगम्या स्त्रीक साथ समागम करता
है, वह महापापी व्यक्ति चौदह इन्द्रोंके स्थितिपर्यन्त
कुम्भीपाक नरकमें वास करता है । यमदूतके द्वारा वह
निरन्तर पीटा जाता है, जिससे उसके शरीरके अंग
चूर-चूर हो जाते हैं। उसे कभी आगमें गिराया जाता
है और कभी काँटोंपर लिटाया जाता है। उसे कभी
तप्त तेलमें, कभी प्रतप्त लोहेमें और ताँबेमें डाला
जाता है, जिससे वह प्रत्येक क्षण तपता रहता है।
उसके बाद वह हजार जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक
सूअर, सात जन्मोंतक कौवा और सातं जन्मोंतक सर्प
होता है। उसके बाद वह साठ हजार वर्षोतक
विष्ठाका कीड़ा और अनेक जन्मोंतक बैल होता है।
तत्पश्चात् मानवयोनिमें जन्म लेकर कोढ़ी तथा दरिद्र
होता है॥ २३-२८॥
सावित्री बोली —आतिदेशिको ब्रह्महत्या तथा
गोहत्या कितने प्रकारको होती है? मनुष्योंके लिये
कौन स्त्री अगम्य होती है और कौन मनुष्य सन्ध्यासे
विहीन है, कौन अदीक्षित है, तीर्थ-प्रतिग्रही कौन है ?
कौन ग्रामयाजी द्विज है तथा कौन देवल ब्राह्मण है?
४९८
शूद्राणां सूपकारश्च प्रमत्तो वृषलीपतिः।
एतेषां लक्षणं सर्व वद् वेदविदां वर॥ १
धर्मराज उवाच
श्रीकृष्णे च तदर्चायामन्येषां प्रकृतौ सति।
शिवे च शिवलिङ्गे च सूर्ये सूर्यमणौ तथा॥ ३२
गणेशे वाथ दुर्गायामेवं सर्वत्र सुन्दरि।
यः करोति भेदबुद्धिं ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३३
स्वगुरौ स्वेष्टदेवे च जन्मदातरि मातरि।
करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३४
वैष्णवेषु च भक्तेषु ब्राह्मणेष्वितरेषु च।
करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३५
विप्रपादोदके चैव शालग्रामोदके तथा।
करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३६
शिवनैवेद्ये चैव हरिनैवेद्यके तथा।
करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३७
सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे सर्वकारणकारणे।
सर्वाद्ये सर्वदेवानां सेव्ये सर्वान्तरात्मनि॥ ३८
माययानेकरूपे वाप्येक एव हि निर्गुणे।
करोतीशेन भेदं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ३९
शक्तिभक्ते द्वेषबुद्धिं शक्तिशास्त्रे तथैव च।
द्वेषं यः कुरूते मर्त्यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ४०
पितृदेवार्चनं यो वा त्यजेद्वेदनिरूपितम्।
यः करोति निषिद्धं च ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ४१
यो निन्दति हृषीकेशं तन्मन्त्रोपासकं तथा।
पवित्राणां पवित्रं च ज्ञानानन्दं सनातनम्॥ ४२
श्रीमहेवीभागवत
RR 5, अ० ३४
हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जो ब्राह्मण शूद्रोंक यहाँ रसोइयाका
काम करता है, प्रमत्त है और शूद्रापति है-इन सभीके
समस्त लक्षणोंको आप मुझे बतलाइये॥ २९—३१॥
धर्मराज बोले—हे साध्वि! हे सुन्दरि! श्रीकृष्णमें
तथा उनकी मूर्तिमें, अन्य देवताओंमें तथा उनकी
प्रतिमामें, शिवमें तथा शिवलिंगमें, सूर्यमें तथा
सूर्यकान्तमणिमें, गणेशमें तथा उनकी मूर्तिमें और
दुर्गामें तथा उनकी प्रतिमामें जो भेदबुद्धि रखता है,
उसे [आतिदेशिकी] ब्रह्महत्या लगती है॥ ३२-३३॥
जो व्यक्ति अपने गुरु, अपने इष्टदेव तथा जन्म
देनेवाली मातामें भेद मानता है; वह ब्रह्महत्याके
पापका भागी होता है॥ ३४॥
जो भगवान् विष्णुके भक्तों तथा दूसरे देवताओंकी
पूजा करनेवाले ब्राह्मणोंमें भेदबुद्धि करता है, उसे
ब्रह्महत्याका पाप लगता है॥ ३५ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मणके चरणोदक तथा शालग्रामके
जलमें भेदबुद्धि करता है, वह ब्रह्महत्याके पापका
भागी होता है॥ ३६॥
जो मनुष्य शिवके नैवेद्य तथा भगवान् विष्णुके
नैवेद्यमें भेदबुद्धि रखता है, वह ब्रह्महत्याके पापका
भागी होता है॥ ३७॥
जो व्यक्ति सर्वेश्वरोंके भी ईश्वर, सभी कारणोंके
कारण, सबके आदिस्वरूप, सभी देवताओंके आराध्य,
सबको अन्तरात्मा, एक होते हुए भी अपनी योगमायाके
प्रभावसे अनेक रूप धारण करनेमें सक्षम तथा निर्गुण
श्रीकृष्णमे और ईशान शिवजीमें भेद करता है; उसे
ब्रह्महत्याका पाप लगता है॥ ३८-३९ ॥
जो मनुष्य भगवती शक्तिकी उपासना करनेवालेके
प्रति द्रेषभाव रखता है तथा शक्ति-शास्त्रोंकी निन्दा
करता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४०॥
जो मनुष्य वेदोंमें प्रतिपादित रीतिसे पितृपूजन
तथा देवार्चनका त्याग कर देता है और निषिद्ध
विधिसे कर्म सम्पन्न करता है, वह ब्रह्महत्याके
पापका भागी होता है॥ ४१॥
जो भगवान् हृषीकेश और उनके मन्त्रोंकी
उपासना करनेवालोंकी निन्दा करता है और जो
पवित्रोके भी पवित्र, ज्ञानानन्द, सनातन, वैष्णवोंके
३० ३४]
प्रधानं वैष्णवानां च देवानां सेव्यमीश्वरम्।
ये नार्चयन्ति निन्दन्ति ब्रह्महत्यां लभन्ति ते॥ ४३
ये निन्दन्ति महादेवीं कारणब्रह्मरूपिणीम्।
सर्वशक्तिस्वरूपां च प्रकृतिं सर्वमातरम्॥ ४४
सर्वदेवस्वरूपां च सर्वेषां वन्दितां सदा।
सर्वकारणरूपां च ब्रह्माहत्यां लभन्ति ते॥ ४५
कृष्णजन्माष्टमी रामनवमी च सुपुण्यदाम्।
शिवरात्रि तथा चैकादशीं वारे रवेस्तथा॥ ४६
पञ्च पर्वाणि पुण्यानि ये न कुर्वन्ति मानवा: ।
लभन्ति ब्रह्महत्यां ते चाण्डालाधिकपापिनः॥ ४७
अम्बुवाच्यां भूखननं जलशौचादिकं च ये।
कुर्वन्ति भारते वर्ष ब्रह्महत्यां लभन्ति ते॥ ४८
गुरुञ्च मातरं तातं साध्वीं भार्या सुतं सुताम्।
अनिन््यां यो न पुष्णाति ब्रह्महत्यां लभेत्तु स: ॥ ४९
विवाहो यस्य न भवेन्न पश्यति सुतं तु यः।
हरिभक्तिविहीनो यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः॥ ५०
हरेरनैवेद्यभोजी नित्यं विष्णुं न पूजयेत्।
पुण्यं पार्थिवलिङ्गं च ब्रह्महासौ प्रकीर्तितः ॥ ५१
गोप्रहारं प्रकुर्वन्तं दृष्ट्या यो न निवारयेत्।
याति गोविप्रयोर्मध्ये गोहत्यां तु लभेत्तु सः॥ ५२
दण्डैर्गोस्ताडयेन्मूढो यो विप्रो वृषवाहनः।
दिने दिने गोवधं च लभते नात्र संशयः॥ ५३
ददाति गोभ्य उच्छिष्टं भोजयेद् वृषवाहकम् ।
भुनक्ति वृषवाहान्नं स गोहत्यां लभेद् ध्ुवम्॥ ५४
नवम स्कन्ध
४९९
परम आराध्य तथा देवताओंके सेव्य परमेश्वरको पूजा
नहीं करते; अपितु निन्दा करते हैं, वे ब्रह्महत्याके
पापके भागी होते हैं ॥ ४२-४३॥
जो कारणनब्रह्मरूपिणी, सर्वशक्तिस्वरूपा, सर्वजननी,
सर्वदेवस्वरूपिणी, सबके द्वारा वन्दित तथा सर्वकारण-
रूपिणी मूलप्रकृति महादेवीकी सदा निन्दा करते हैं;
उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४४-४५ ॥
जो मनुष्य पुण्यदायिनी कृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी,
शिवरात्रि, एकादशी और रविवार-इन पाँच पुण्य पर्वोके
अवसरपर व्रत नहीं करते, वे चाण्डालसे भी बढ़कर पापी
हैं और उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है॥ ४६-४७॥
जो इस भारतवर्षमें अम्बुवाचीयोग ( आर्द्रा नक्षत्रके
प्रथम चरण)-में पृथ्वी खोदते हैं या जलमें शौच
आदि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४८॥
जो मनुष्य अपने गुरु, माता, पिता, साध्वी भार्या,
पुत्र तथा अनिन्दनीय आचरण करनेवाली पुत्रीका
भरण-पोषण नहीं करता; उसे ब्रह्महत्याका पाप
लगता है॥ ४९॥
जिसका विवाह न हुआ हो, जिसने पुत्र न देखा
हो, अर्थात् पुत्रवान् न हो तथा जो भगवान् श्रीहरिको
भक्तिसे विमुख हो, वह ब्रह्महत्याके पापका भागी
होता है॥ ५०॥
जो मनुष्य भगवान् श्रीहरिको नैवेद्य अर्पण किये
बिना भोजन करता है, विष्णुका नित्य पूजन नहीं
करता और पवित्र पार्थिव लिंगका पूजन नहीं करता;
उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है॥ ५१॥
जो किसी मनुष्यको गायपर प्रहार करते हुए
देखकर उसे नहीं रोकता और जो गाय तथा ब्राह्मणके
बीचसे निकलता है, वह गोहत्याके पापका भागी
होता है॥ ५२॥
जो मूर्ख ब्राह्मण गायोंको डंडोंसे पीटता है और
बैलपर सवारी करता है, उसे प्रतिदिन गोहत्याका पाप
लगता है॥५३॥
जो व्यक्ति गायोंको जूठा अन्न खिलाता है,
बैलकी सवारी करनेवालेको भोजन कराता है और
बैलकी सवारी करनेवालेका’ अन्न खाता है; उसे
निश्चितरूपसे गोहत्याका पाप लगता है॥ ५४॥
७००
वृषलीपतिं याजयेद्यो भुङ्केऽन्नं तस्य यो नर: ।
गोहत्याशतकं सोऽपि लभते नात्र संशय: ॥ ५५
पादं ददाति वह्लौ यो गाश्च पादेन ताडयेत्।
गेहं विशेदधौताङ्घ्रिः स्नात्वा गोवधमाप्नुयात्॥ ५६
यो भुङ्के स्निग्धपादेन शेते स्निग्धाङ्घ्रिरेव च।
सूर्योदये च यो भुङ्के स गोहत्यां लभेद् ्रुवम्॥ ५७
अवीरान्नं च यो भुङ्के योनिजीव्यस्य च द्विजः ।
यस्त्रिसन्ध्याविहीनश्च गोहत्यां लभते च स: ॥ ५८
स्वभर्तरि च देवे वा भेदबुद्धिं करोति या।
कटूकत्या ताडयेत् कान्तं सा गोहत्या लभेद् ध्रुवम्॥ ५९
गोमार्गवर्जनं कृत्वा ददाति सस्यमेव वा।
तडागे वा तु दुर्गे वा स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम्॥ ६०
प्रायश्चित्ते गोवधस्य यः करोति व्यतिक्रमम्।
पुत्रलोभादथाज्ञानात्स गोहत्यां लभेद् श्रुवम्॥ ६१
राजके दैवके यत्नाद् गोस्वामी गां न रक्षति।
दुःखं ददाति यो मूढो गोहत्यां स लभेद् ध्रुवम्॥ ६२
प्राणिनो लङ्कयेद्यो हि देवार्चामनलं जलम्।
नैवेद्यं पुष्पमन्नं च स गोहत्यां लभेद् श्रुवम्॥ ६३
शश्वन्नास्तीति यो वादी मिथ्यावादी प्रतारकः ।
देवद्वेषी गुरुद्वेषी स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम्॥ ६४
देवताप्रतिमां दृष्ट्वा गुरुं वा ब्राह्मणं सति।
सम्भ्रमान्न नमेद्यो हि स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम्॥ ६५
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३४
जो ब्राह्मण शूद्रापतिके यहाँ यज्ञ कराता है और
उसका अन्न ग्रहण करता है, वह एक सौ गोहत्याके
पापका भागी होता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५५ ॥
जो मनुष्य पैरसे अग्निका स्पर्श करता है,
गायोंको पैरसे मारता है और स्नान करके बिना पैर
धोये देवालयमें प्रवेश करता है; उसे गोहत्याका पाप
लगता है॥ ५६॥
जो व्यक्ति गीले पैर भोजन करता है, गीले पैर
सोता है और सूर्योदयके समय भोजन करता है; उसे
अवश्य ही गोहत्याका पाप लगता है॥ ५७॥
जो द्विज पति-पुत्रहीन स्त्रीका तथा योनिजीवी
व्यक्तिका अन्न खाता है और जो त्रिकाल सम्ध्यासे
विहीन है, उसे भी गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५८ ॥
जो स्त्री अपने पति तथा देवतामें भेदबुद्धि रखती
है तथा कटु वचनोंसे अपने पतिको पीडित करती है,
उसे निश्चितरूपसे गोहत्याका पाप लगता है॥ ५९॥
जो मनुष्य गोचरभूमिको जोतकर उसमें अनाज
बोता है या तालाब अथवा दुर्गमें फसल उगाता है,
उसे निश्चय ही गोहत्याका पाप लगता है॥ ६०॥
जो व्यक्ति पुत्रके मोहसे अथवा अज्ञानके कारण
गोवधके प्रायश्चित्तमें व्यतिक्रम करता है, उसे निश्चित-
रूपसे गोहत्याका पाप लगता है॥ ६१॥
जो गायका स्वामी अराजकता तथा दैवोपद्रवके
अवसरपर गायको रक्षा नहीं करता तथा जो गायको
पीड़ा पहुँचाता है, उस मूर्खको निश्चय ही गोहत्याका
पाप लगता है॥ ६२॥
जो मनुष्य प्राणियों, देवमूर्ति, अग्नि, जल, नैवेद्य,
पुष्प तथा अन्नको लाँघता है; वह निश्चितरूपसे
गोहत्याके पापका भागी होता है॥ ६३॥
मेरे पास कुछ नहीं है-एऐसा जो सदा कहता
है, झूठ बोलता है, दूसरोंको ठगता है और देवता तथा
गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप अवश्य
लगता है॥ ६४॥
हे साध्वि! जो मनुष्य देवप्रतिमा, गुरु तथा
ब्राह्मणको देखकर आदरपूर्वक प्रणाम नहीं करता,
उसे निश्चित-रूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥ ६५॥
अ० ३४ ]
न ददात्याशिषं कोपात्प्रणताय च यो द्विजः।
विद्यार्थिने च विद्यां च स गोहत्यां लभेद् श्रुवम्॥ ६६
गोहत्या विप्रहत्या च कथिता चातिदेशिकी।
गम्यां स्त्रियं नृणामेव निबोध कथयामि ते॥ ६७
स्वस्त्री गम्या च सर्वेषामिति वेदानुशासनम्।
अगम्या च तदन्या या चेति वेदविदो विदुः॥ ६८
सामान्यं कथितं सर्व विशेषं शृणु सुन्दरि।
अत्यगम्या हि या याश्च निबोध कथयामि ता: ॥ ६९
शूद्राणां विप्रपत्नी च विप्राणां शूद्रकामिनी।
अत्यगम्या च निन्द्या च लोके वेदे पतिव्रते॥ ७०
शूद्रश्च ब्राह्मणीं गत्वा ब्रह्महत्याशतं लभेत्।
तत्समं ब्राह्मणी चापि कुम्भीपाकं लभेद् श्रुवम्॥ ७१
शूद्राणां विप्रपत्नी च विप्राणां शूद्रकामिनी।
यदि शूद्रां व्रजेद्विप्रो वृषलीपतिरेव सः॥ ७२
स भ्रष्टो विप्रजातेश्च चाण्डालात्सोऽधमः स्मृतः।
विष्ठासमश्च तत्पिण्डो मूत्रं तस्य च तर्षणम्॥ ७३
न पितृणां सुराणां च तददत्तमुपतिष्ठति।
कोटिजन्मार्जितं पुण्यं तस्यार्चात्तपसार्जितम्॥ ७४
द्विजस्य वृषलीलोभान्नश्यत्येव न संशयः।
ब्राह्मणश्च सुरापीतिर्विड्भोजी वृषलीपतिः ॥ ७५
तप्तमुद्रादग्धदेहस्तप्तशूलाङ्कितस्तथा ।
हरिवासरभोजी च कुम्भीपाकं व्रजेद् द्विज:॥ ७६
नवम स्कन्ध
५०९
जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवालेको क्रोधबश आशीर्वाद
नहीं देता और विद्यार्थीको विद्या प्रदान नहीं करता,
उसे अवश्य ही गोहत्याका पाप लगता है॥ ६६॥
[हे साध्वि!] यह मैंने आतिदेशिकी ब्रह्महत्या
और गोहत्याका वर्णन कर दिया, अब मैं मनुष्योंके
लिये गम्य स्त्रीकै विषयमें तुमसे कह रहा हूँ,
ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६७॥
सभी मनुष्योंको केवल अपनी भार्याके साथ गमन
करना चाहिये—यह वेदोंका आदेश है । उसके अतिरिक्त
अन्य स्त्री अगम्य है—ऐसा वेदवेत्ताओने कहा है ॥ ६८ ॥
हे सुन्दरि! यह सब सामान्य नियम कहा गया,
अब कुछ विशेष नियमोंको सुनो । जो स्त्रियाँ विशेषरूपसे
गमन करनेयोग्य नहीं हैं, उनके विषयमें बता रहा हूँ;
ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६९ ॥
हे पतिव्रते! ! शूद्रोके लिये ब्राह्मणकी पत्नी और
ब्राह्मणोंके लिये शूद्रकी पत्नी अति अगम्य तथा निन्द्य
है —ऐसा लोक और वेदमें प्रसिद्ध है॥ ७० ॥
ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे शूद्र एक सौ
गोहत्याके पापका भागी होता है और वह निश्चितरूपसे
कुम्भीपाक नरक प्राप्त करता है तथा उस शूद्रके साथ
ब्राह्मणी भी कुम्भीपाक नरकमें जाती है। अत: शूद्रोंके
लिये ब्राह्मणकी स्त्री तथा ब्राह्मणोंके लिये शूद्रकी स्त्री
सर्वथा अगम्य है॥ ७१३ ॥
यदि कोई विप्र शूद्रा नारीका सेवन करता है तो
वह वृषलीपति कहा जाता है । वह विप्रजातिसे च्युत
हो जाता है और वह चाण्डालसे भी बढ्कर अधम
कहा गया है । उसके द्वारा दिया गया पिण्ड विष्ठातुल्य
तथा तर्पण मूत्रके समान हो जाता है। उसके द्वारा
प्रदत्त पिण्ड आदि पितरों तथा देवताओंको प्राप्त नहीं
होता। करोड़ों जन्मोंमें पूजन तथा तप करके उस
ब्राह्मणके द्वारा अर्जित किया गया पुण्य शूद्रा नारीके
साथ गमन करनेसे नष्ट हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं
है। सुरापान करनेवाला, वेश्याओंका अन्न खानेवाला,
शूद्रा नारीका सेवन करनेवाला, तप्त मुद्रा तथा तप्त
त्रिशूल आदिसे दागे गये शरीरवाला तथा एकादशीको
अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण कुम्भीपाक नरकमें
जाता है॥ ७२—७६॥
५०२
गुरुपत्नी राजपत्नीं सपत्नीं मातरं ध्ुवम्।
सुतां पुत्रवधूं श्वश्रूं सगर्भा भगिनीं सतीम्॥ ७७
सहोदरभ्रातृजायां मातुलानीं पितुः प्रसूम्।
मातुः प्रसूं तत्स्वसारं भगिनीं भ्रातृकन्यकाम् ॥ ७८
शिष्यां शिष्यस्य पलीं च भागिनेयस्य कामिनीम्।
भ्रातुः पुत्रप्रियां चैवात्यगम्या आह पदाज: ॥ ७९
एताः कामेन कान्ता यो व्रजेद्वै मानवाधमः। .
स मातृगामी वेदेषु ब्रह्महत्याशतं ब्रजेत्॥ ८०
अकर्मार्होऽप्यसंस्पृश्यो लोके वेदे च निन्दितः ।
स याति कुम्भीपाके च महापापी सुदुष्करे॥ ८१
करोत्यशुद्धां सन्ध्यां वा न सन्ध्यां वा करोति च।
त्रिसन्ध्यं वर्जयेद्यो वा सन्ध्याहीनश्च स द्विजः॥ ८२
वैष्णवं च तथा शैवं शाक्तं सौरं च गाणपम्।
योऽहङ्कारान्न गृह्णाति मन्त्रं सोऽदीक्षितः स्मृतः॥ ८३
प्रवाहमवधिं कृत्वा यावद्धस्तचतुष्टयम्।
तत्र नारायणः स्वामी गङ्घागर्भान्तरे वसेत्॥ ८४
तत्र नारायणक्षेत्रे मृतो याति हरेः पदम्।
वाराणस्यां बदर्या च गङ्घासागरसङ्गमे॥ ८५
पुष्करे हरिहरक्षेत्रे प्रभासे कामरूस्थले।
हरिद्वारे च केदारे तथा मातृपुरेऽपि च॥ ८६
सरस्वतीनदीतीरे पुण्ये वृन्दावने वने।
गोदावर्या च कौशिक्यां त्रिवेण्यां च हिमाचले॥ ८७
एषु तीर्थेषु यो दानं प्रतिगृह्णाति कामतः।
स च तीर्थप्रतिग्राही कुम्भीपाके प्रयाति सः ॥ ८८
शूद्रसेवी शूद्रयाजी ग्रामयाजीति कीर्तितः।
तथा देवोपजीवी च देवलः परिकीर्तितः॥ ८९
शूद्रपाकोपजीवी यः सूपकार इति स्मृतः।
सन्ध्यापूजनहीनश्च प्रमत्तः पतितः स्मृतः॥ ९०
श्रीमहेवी भागवत
[ अ०:३४
ब्रह्माजीने गुरुको पत्नी, राजाकी पत्नी, सौतेली
माँ, पुत्री, पुत्रवधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहन, पतिव्रता
स्त्री, सहोदर भाईको पत्नी, मामी, दादी, नानी, मौसी,
भतीजी, शिष्या, शिष्यको पत्नी, भाँजेकी स्त्री और
भाईके पुत्रकी पत्नीको अति अगम्या कहा है। जो
नराधम काममोहित होकर इनके साथ गमन करता है,
उसे वेदोमें मातृगामी कहा गया है और उसे सौ
ब्रह्महत्याका पाप लगता है। वह कोई भी कर्म
करनेका पात्र नहीं रह जाता, वह अस्पृश्य है और
लोकमें तथा वेदमें सब जगह उसकी निन्दा होती है।
वह महापापी अत्यन्त क्लेशदायक कुम्भीपाक नरकमें
जाता है॥ ७७—८१॥
जो शास्त्रोक्त विधानसे सन्ध्या नहीं करता
अथवा सन्ध्या करता ही नहीं और जो तीनों कालोंकी
सन्ध्यासे रहित है, वह द्विज सन्ध्याहीन द्विज कहा
गया है॥ ८२॥
जो अहंकारके कारण विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य
तथा गणेश-इन देवोंके मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण नहीं
करता, उसे ’ अदीक्षित’ कहा गया है॥८३॥
गंगाके प्रवाहके दोनों ओरको चार हाथकी चौड़ी
भूमिको गंगागर्भ कहते हैं; वहींपर भगवान् नारायण
निवास करते हैं। उस नारायपक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होनेवाला
व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके धाममें पहुँच जाता है ॥ ८४॥
वाराणसी, बदरिकाश्रम, गंगासागरसंगम, पुष्करक्षेत्र,
हरिहरक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कामाख्यापीठ, हरिद्वार, केदारक्षेत्र,
मातृपुर, सरस्वती नदीके तट, पवित्र वृन्दावन, गोदावरीनदी,
कौशिकीनदी, त्रिवेणीसंगम और हिमालय—इन तीर्थोमें
जो मनुष्य कामनापूर्वक दान लेता है; वह तीर्थप्रतिग्राही
है और इस दानग्रहणके कारण वह कुम्भीपाक
नरकमें जाता है॥ ८५—८८ ॥
जो ब्राह्मण शूट्रोंको सेवा करता है तथा उनके
यहाँ यज्ञ आदि कराता है, उसे ग्रामयाजी कहा गया
है। देवताकी पूजा करके अपनी आजीविका चलानेवाला
ब्राह्मण देवल कहा गया है। शूद्रके यहाँ रसोई
बनाकर आजीविका चलानेवाले विप्रको सूपकार कहा
गया है। सन्ध्या तथा पूजनकर्मसे विमुख विप्रको
प्रमत्त तथा पतित कहा गया है॥ ८९-९०॥
अ० ३५]
उक्त सर्व मया भद्रे लक्षणं वृषलीपतेः।
एते महापातकिनः कुम्भीपाकं प्रयान्ति ते।
कुण्डान्यन्यानि ये यान्ति निबोध कथयामि ते॥ ९१
नवम स्कन्ध
५०३
हे कल्याणि! वृषलीपतिके समस्त लक्षणोंका
वर्णन मैंने कर दिया है। ये सब महापापी हैं और वे
कुम्भीपाक नामक नरकमें जाते हैं । [हे साध्वि!] जो
पापी दूसरे कुण्डोंमें जाते हैं, उनके विषयमें अब मैं
तुम्हें बता रहा हुँ; ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ९१॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरयां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे
सावित्युपाख्याने नानाकर्माविपाकफलवर्णनं नाम चतुस्त्रिशोऽध्यायः ॥ ३४॥
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