Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ दशमोऽध्यायः
पृथ्वीके प्रति शास्त्र-विपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन
नारद उवाच
भूमिदानकृतं पुण्यं पापं तद्धरणेन च।
परभूहरणात्पापं परकूपे खनने तथा॥
अम्बुवाच्यां भूखनने वीर्यस्य त्याग एव च।
दीपादिस्थापनात्पापं श्रोतुमिच्छामि यत्नतः ॥
अन्यद्वा पृथिवीजन्यं पापं यत्पृच्छते परम्।
यदस्ति तत्प्रतीकारं बद वेदविदांवर॥
श्रीनारायण उवाच
वितस्तिमात्रभूमिं च यो ददाति च भारते।
सन्ध्यापूताय विप्राय स याति शिवमन्दिरम्॥
भूमिं च सर्वसस्याढ्यां ब्राह्मणाय ददाति च।
भूमिरेणुप्रमाणाब्दमन्ते विष्णुपदे स्थितिः॥
ग्रामं भूमिं च धान्यं च ब्राह्मणाय ददाति यः।
सर्वपापाद्विनिर्मुक्तौ चोभौ देवीपुरःस्थितौ॥
भूमिदानं च तत्काले यः साधुश्चानुमोदते।
स च प्रयाति वैकुण्ठे मित्रगोत्रसमन्वितः॥
स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेत्तु यः।
स तिष्ठति कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिबाकरौ॥
तत्पुत्रपौत्रप्रभृतिर्भूमिहीनः श्रिया हतः।
पुत्रहीनो दरिद्रश्च घोरं याति च रौरवम्॥
नारदजी बोले भूमिका दान करनेसे होनेवाले
पुण्य तथा उसका हरण करनेसे होनेवाले पाप,
दूसरेको भूमि छीननेसे होनेवाले पाप, दूसरेके द्वारा
खोदे गये जलहीन कुएँको बिना उसकी आज्ञा लिये
खोदने, अम्बुवाची दिनोंमें भूखनन करने, पृथ्वीपर
वीर्य-त्याग करने तथा दीपक रखनेसे जो पाप होता
है, उसे मैं यत्नपूर्वक सुनना चाहता हूँ । हे वेदवेत्ताओंमें
श्रेष्ठ ! मेरे पूछनेके अतिरिक्त अन्य भी जो पृथ्वीसम्बन्धी
पाप हो, उसे तथा उसके निराकरणका उपाय
बतलाइये ॥ १-३॥
श्रीनारायण बोले—जो मनुष्य भारतवर्षमें
वितस्ति (बित्ता)-मात्र भूमि भी किसी सन्ध्योपासनासे
पवित्र हुए ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको
प्राप्त होता है ॥ ४॥
जो मनुष्य किसी ब्राह्मणको सब प्रकारको
फसलोंसे सम्पन्न भूमि प्रदान करता है, वह उस
भूमिमें विद्यमान धूलके कणोंकी संख्याके बराबर
वर्षोतक भगवान् विष्णुके लोकमें निवास करता
है॥ ५॥
जो व्यक्ति ब्राह्मणको ग्राम, भूमि और धान्यका
दान करता है, उसके पुण्यसे दाता और प्रतिगृहीता-
दोनों व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर जगदम्बाके
लोकमें स्थान पाते हैं॥ ६॥
जो सज्जन भूमिदानके अवसरपर दाताके
इस कर्मका अनुमोदन करता है, वह अपने मित्रों
तथा सगोत्री बन्धुओंसहित वैकुण्ठलोकको प्राप्त
होता है॥ ७॥
जो मनुष्य किसी ब्राह्मणकी अपने अथवा
दूसरेके द्वारा दी गयी आजीविकाको उससे छीनता
है, वह सूर्य तथा चन्द्रमाके स्थितिपर्यन्त कालसूत्र-
नरकमें रहता है । इस पापके प्रभावसे उस व्यक्तिके
पुत्र-पौत्र आदि भूमिसे हीन रहते हैं। वह लक्ष्मीरहित,
पुत्रविहीन तथा दरिद्र होकर भीषण रौरवनरकमें
पड़ता है ॥ ८-९॥
३५२
गवां मार्ग विनिष्कृष्य यश्च सस्यं ददाति च।
दिव्यं वर्षशतं चैव कुम्भीपाके च तिष्ठति॥ १०
गोष्ठं तडागं निष्कृष्य मार्गे सस्यं ददाति य: ।
स तिष्ठत्यसिपत्रे च यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ ११
पञ्चपिण्डाननुद्धूत्य परकूपे च स्नाति यः।
प्राप्नोति नरकं चैव स्नानं निष्फलमेव च॥ १२
कामी भूमौ च रहसि वीर्यत्यागं करोति यः।
भूमिरेणुप्रमाणं च वर्ष तिष्ठति रौरवे॥ १३
अम्बुवाच्यां भूकरणं यः करोति च मानवः।
स याति कृमिदंशं च स्थितिस्तत्र चतुर्युगम्॥ १४
परकीये लुप्तकूपे कूपं मूढः करोति यः।
पुष्करिण्यां च लुप्तायां पुष्करिणीं ददाति य:॥ १५
सर्व फलं परस्यैव तप्तकुण्डं व्रजेच्च सः।
तत्र तिष्ठति सन्तप्तो यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ १६
परकोये तडागे च पङ्कमुद्धृत्य चोन्मृजेत्।
रेणुप्रमाणवर्ष च ब्रह्मलोके वसेन्नरः॥ १७
पिण्डं पित्रे भूमिभर्तुर्न प्रदाय च मानवः।
श्राद्धं करोति यो मूढो नरकं याति निश्चितम्॥ १८
भूमौ दीपं योऽर्पयति स चान्धः सप्तजन्मसु ।
भूमौ शङ्कं च संस्थाप्य कुष्ठं जन्मान्तरे लभेत्॥ १९
मुक्तां माणिक्यहीरौ च सुवर्ण च मणिं तथा।
पञ्च संस्थापयेद्भूमौ स चान्धः सप्तजन्मसु॥ २०
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १०
जो मनुष्य गोचर भूमिको जोतकर उससे उपार्जित
धान्य ब्राह्मणको देता है, वह देवताओंके दिव्य सौ
वर्षोतक कुम्भीपाकनरकमें निवास करता है॥ १०॥
जो मनुष्य गायोंके रहनेके स्थान, तड़ाग तथा
मार्गको जोतकर वहाँसे पैदा किये हुए अन्नका दान
करता है, वह चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त असिपत्र
नामक नरकमें पड़ा रहता है॥ ११॥
जो मनुष्य किसी दूसरेके कुएँ, तड़ाग आदिमेंसे
पाँच मृत्तिका-पिण्डोंको निकाले बिना ही उसमें स्नान
करता है, वह नरक प्राप्त करता है और उसका स्नान
भी निष्फल होता है॥ १२॥
जो कामासक्त पुरुष एकान्तमें पृथ्वीपर वीर्यका
त्याग करता है, वहाँकी जमीनपर जितने धूलकण हैं,
उतने वर्षांतक वह रौरवनरकमें वास करता है ॥ १३॥
जो मनुष्य अम्बुवाचीकालमें भूमि खोदनेका कार्य
करता है, वह कृमिदंश नामक नरकमें जाता है और
वहाँपर चार युगोंतक उसकी स्थिति रहती है॥ १४॥
जो मूर्ख मनुष्य किसी दूसरेके लुप्त कुएँपर
अपना कुआँ तथा लुप्त बावलीपर अपनी बावली
बनवाता है, उस कार्यका सारा फल उस दूसरे व्यक्तिको
मिल जाता है और वह स्वयं तप्तकुण्ड नामक नरकमें
पड़ता है । बहाँपर चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त कष्ट
भोगते हुए वह पड़ा रहता है॥ १५-१६॥
जो मनुष्य दूसरेके तड़ागमें पड़ी हुई कोचड़को
साफ करके स्नान करता है, उस कीचड़में जितने
कण होते हैं, उतने वर्षोतक वह ब्रह्मलोकमें निवास
करता है॥ १७॥
जो मूर्ख मनुष्य भूमिपतिके पितरको पिण्ड
दिये बिना श्राद्ध करता है, वह अवश्य ही नरकगामी
होता है॥ १८॥
जो व्यक्ति भूमिपर दीपक रखता है, वह
सात जन्मोंतक अन्धा रहता है और जो भूमिपर
शंख रखता है, वह दूसरे जन्ममें कुष्ठरोगसे ग्रसित
होता है॥ १९॥
जो मनुष्य मोती, माणिक्य, हीरा, सुवर्ण तथा
मणि-इन पाँच रत्नोंको भूमिपर रखता है, वह सात
जन्मोंतक अन्धा रहता है॥ २०॥
अ० १०]
शिवलिङ्गं शिवामर्चा यश्चार्पयति भूतले।
शतमन्वन्तरं यावत्कृमिभक्षः स तिष्ठति॥ २१
शङ्कुं यन्त्रं शिलातोयं पुष्पं च तुलसीदलम्।
यश्चार्पयति भूमौ च स तिष्ठेन्नरके ध्रुवम्॥ २२
जपमालां पुष्पमालां कर्पूरं रोचनं तथा ।
यो मूढश्चार्पयेद्धमौ स याति नरकं श्रुवम्॥ २३
भूमौ चन्दनकाष्ठं च रुद्राक्षं कुशमूलकम्।
संस्थाप्य भूमौ नरके वसेन्मन्वन्तरावधि॥ २४
पुस्तकं यज्ञसूत्रं च भूमौ संस्थापयेन्नरः।
न भवेद्िप्रयोनौ च तस्य जन्मान्तरे जनिः॥ २५
ब्रह्महत्यासमं पापमिह वै लभते ध्रुवम्।
ग्रन्थियुक्तं यज्ञसूत्रं पूज्यं च सर्ववर्णकैः॥ २६
यज्ञं कृत्वा तु यो भूमिं क्षीरेण न हि सिञ्चति।
स याति तप्तभूमिं च सन्तप्तः सप्तजन्मसु॥ २७
भूकम्पे ग्रहणे यो हि करोति खननं भुवः।
जन्मान्तरे महापापो ह्यङ्कहीनो भवेद् श्रुवम्॥ २८
भवनं यत्र सर्वेषां भूमिस्तेन प्रकीर्तिता।
काश्यपी कश्यपस्येयमचला स्थिररूपतः॥ २९
विश्वम्भरा धारणाच्चानन्तानन्तस्वरूपतः ।
पृथिवी पृथुकन्यात्वाद्विस्तृतत्वान्महामुने॥ ३०
नवम स्कन्ध
३५३
जो मनुष्य शिवलिंग, भगवती शिवाको
प्रतिमा तथा शालग्रामशिला भूमिपर रखता है, वह
सौ मन्वन्तरतक कृमिभक्ष नामक नरकमें वास
करता है॥ २१॥
जो शंख, यन्त्र, शालग्रामशिलाका जल, पुष्प
और तुलसीदलको भूमिपर रखता है; वह निश््चितरूपसे
नरकमें वास करता है॥ २२॥
जो मन्दबुद्धि मनुष्य जपमाला, पुष्पमाला, कपूर
तथा गोरोचनको भूमिपर रखता है, वह निश्चितरूपसे
नरकगामी होता है॥ २३॥
चन्दनकाष्ठ, रुद्राक्ष और कुशकी जड़ जमीनपर
रखनेवाला मनुष्य एक मन्वन्तरपर्यन्त नरकमें वास
करता है॥ २४॥
जो मनुष्य पुस्तक तथा यज्ञोपवीत भूमिपर
रखता है, वह अगले जन्ममें विप्रयोनिमें उत्पन्न
नहीं होता है॥ २५॥
जो सभी वर्णोके द्वारा पूज्य ग्रन्थियुक्त यज्ञोपवीतको
भूमिपर रखता है, वह निश्चितरूपसे इस लोकमें
ब्रह्म-हत्याके समान पापका भागी होता है॥ २६॥
जो मनुष्य यज्ञ करके यज्ञभूमिको दूधसे नहीं
सींचता है, वह सात जन्मोंतक कष्ट भोगता हुआ
तप्तभूमि नामक नरकमें निवास करता है॥ २७॥
जो मनुष्य भूकम्प तथा ग्रहणके अवसरपर भूमि
खोदता है, वह महापापी जन्मान्तरमें निश्चितरूपसे
अंगहीन होता है॥ २८॥
हे महामुने! इस धरतीपर सभी लोगोंके भवन हैं;
इसलिये यह ’ भूमि’, कश्यपकी पुत्री होनेके कारण
“काश्यपी ’, स्थिररूपमें रहनेके कारण ‘अचला’,
विश्वको धारण करनेसे ’ विश्वम्भरा’, अनन्त रूपोंबाली
होनेके कारण ’ अनन्ता’ और पृथुकी कन्या होने
अथवा सर्वत्र फैली रहनेके कारण ‘पृथिवी’ कही
गयी है॥ २९-३०॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरथां संहितायां नवमस्कन्धे पृथिव्युपाख्याने
नरकफलप्राप्तिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥
IAC I
898 श्रीमहदेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-2 ^
३५४ श्रीमहेवी भागवत [ अ० १९
अधैकादशोऽध्यायः
गंगाकी उत्पत्ति एवं उनका माहात्म्य
नारद उवाच नारदजी बोले—हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पृथ्वीका
श्रुतं पृथिव्युपाख्यानमतीव सुमनोहरम्। यह परम मनोहर उपाख्यान मैं सुन चुका; अब आप
गङ्गोपाख्यानमधुना बद वेदविदांवर १ | गंगाका उपाख्यान कहिये। सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा और
भारते भारतीशापात्सा जगाम सुरेशवरी।
विष्णुस्वरूपा परमा स्वयं विष्णुपदीति च॥ २
कथं कुत्र युगे केन प्रार्थिता प्रेरिता पुरा।
तत्क्रमं श्रोतुमिच्छामि पापघ्नं पुण्यदं शुभम्॥ ३
श्रीनारायण उवाच
राजराजेश्वरः श्रीमान् सगरः सूर्यवंशजः।
तस्य भार्या च वैदर्भी शैव्या च द्वे मनोहरे॥ ४
तत्पत्न्यामेकपुत्रश्च बभूव सुमनोहरः।
असमञ्ज इति ख्यातः शैव्यायां कुलवर्धनः॥ ५
अन्या चाराधयामास शङ्करं पुत्रकामुकी।
बभूव गर्भस्तस्याशच हरस्य च वरेण ह॥ ६
गते शताब्दे पूर्णे च मांसपिण्डं सुषाव सा।
तद् दृष्ट्वा सा शिवं ध्यात्वा रुरोदोच्चैः पुनः पुन:॥ ७
शम्भुर्ब्राह्मणरूपेण तत्समीपं जगाम ह।
चकार संविभज्यैतत्पिण्डं षष्टिसहस्त्रधा॥ ८
सर्वे बभूवुः पुत्राश्च महाबलपराक्रमाः ।
ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डप्रभामुष्टकलेवरा: ॥ ९
कपिलस्य मुनेः शापाद् बभूवुर्भस्मसाच्च ते।
राजा रुरोद तच्छुत्वा जगाम गहने बने॥ १०
तपश्चकारासमञ्जो गङ्ानयनकारणात्।
लक्षवर्ष तपस्तप्त्वा ममार कालयोगतः॥ ११
7898 श्रीमहेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]2 8
स्वयं विष्णुपदी-इस नामसे विख्यात वे श्रेष्ठ गंगा
प्राचीनकालमें सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें किस
प्रकार, किस युगमें तथा किसके द्वारा प्रार्थित और प्रेरित
होकर गयीं। मैं इस पापनाशक, पुण्यप्रद तथा मंगलकारी
प्रसंगको क्रमसे सुनना चाहता हूँ॥ १-३॥
श्रीनारायण बोले [हे नारद!] राजराजेश्वर
श्रीमान् सगर सूर्यवंशी राजा हो चुके हैं। वैदर्भी तथा
शैव्या नामोंबाली उनकी दो मनोहर भार्याएँ थीं।
उनको शैव्या नामक पत्नीसे अत्यन्त सुन्दर तथा
कुलको वृद्धि करनेवाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो
असमंज-इस नामसे विख्यात हुआ॥ ४-५॥
उनको दूसरी पत्नी वैदर्भीने पुत्रकी कामनासे
भगवान् शंकरको आराधना की और शिवजीके
वरदानसे उसने गर्भ धारण किया ॥ ६॥
पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर उसने एक मांस-
पिण्डको जन्म दिया। उसे देखकर तथा शिवका ध्यान
करके वह बार-बार ऊँचे स्वरमें विलाप करने लगी ॥ ७॥
तब भगवान् शंकर ब्राह्मणका रूप धारणकर उसके
पास गये और उन्होंने उस मांसपिण्डको बराबर-
बराबर साठ हजार भागोंमें विभक्त कर दिया ॥ ८॥
वे सभी टुकड़े पुत्ररूपमें हो गये। वे महान्
बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके शरीरको
कान्ति ग्रीष्मऋतुके मध्याहृकालीन सूर्यकी प्रभाको भी
तिरस्कृत कर देनेवाली थी॥ ९॥
कपिलमुनिके शापसे वे सभी जलकर भस्म हो
गये। यह समाचार सुनकर राजा सगर बहुत रोये और
वे घोर जंगलमें चले गये॥ १०॥
तदनन्तर उनके पुत्र असमंज गंगाको लानेके
निमित्त तपस्या करने लगे। इस प्रकार एक लाख
वर्षतक तप करनेके पश्चात् वे कालयोगसे मर
गये॥ ११॥
आ० ११]
नवम स्कन्ध
३५५
अंशुमांस्तस्थ तनयो गङ्गानयनकारणात्।
तपः कृत्वा लक्षवर्ष ममार कालयोगतः॥ १२
भगीरथस्तस्य पुत्रो महाभागवतः सुधीः।
वैष्णवो विष्णुभक्तश्च गुणवानजरामरः॥ १३
तपः कृत्वा लक्षवर्ष गङ्कानयनकारणात्।
ददर्श कृष्णं ग्रीष्मस्थसूर्यकोटिसमप्रभम्॥ १४
द्विभुजं मुरलीहस्तं किशोरं गोपवेषिणम्।
गोपालसुन्दरीरूपं भक्तानुग्रहरूपिणम्॥ १५
स्वेच्छामयं परं ब्रह्म परिपूर्णतमं प्रभुम्।
ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैशच स्तुतं मुनिगणैर्नुतम्॥ १६
निर्लिप्तं साक्षिरूपं च निर्गुणं प्रकृतेः परम्।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यं भक्तानुग्रहकारणम्॥ १७
वह्विशुद्धांशुकाधानं रत्नभूषणभूषितम्।
तुष्टाव दृष्ट्या नृपतिः प्रणम्य च पुनः पुनः॥ १८
लीलया च वरं प्राप वाञ्छितं वंशतारणम्।
कृत्वा च स्तवनं दिव्यं पुलकाङ्कितविग्रहः॥ १९
श्रीभगवानुवाच
भारतं भारतीशापाद् गच्छ शीघ्रं सुरेश्वरि।
सगरस्य सुतान्सर्वान्पूतान्कुरु ममाज्ञया॥ २०
त्वत्स्पर्शवायुना पूता यास्यन्ति मम मन्दिरम्।
बिभ्रतो मम मूर्तीच दिव्यस्यन्दनगामिनः॥ २१
मत्पार्षदा भविष्यन्ति सर्वकालं निरामयाः।
समुच्छिद्य कर्मभोगान् कृताञ्जन्मनि जन्मनि॥ २२
898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-2 ©
उन असमंजके पुत्र अंशुमान् भी गंगाको पृथ्वीपर
ले आनेके उद्देश्यसे एक लाख वर्षतक तप करनेके
उपरान्त कालयोगसे मृत्युको प्राप्त हो गये॥ १२॥
अंशुमान्के पुत्र भगीरथ थे। वे भगवान्के
परम भक्त, विद्वान्, विष्णुके भक्त, गुणवान्, अजर-
अमर तथा वैष्णव थे। उन्होंने गंगाको ले आनेके लिये
एक लाख वर्षतक तप करके भगवान् श्रीकृष्णका
साक्षात् दर्शन किया। वे ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्योके
समान प्रभासे सम्पन्न थे, उनकी दो भुजाएँ थीं, वे
हाथमें मुरली धारण किये हुए थे, उनकी किशोर
अवस्था थी, वे गोपवेषमें थे और कभी गोपालसुन्दरीके
रूपमें हो जाते थे, भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही
उन्होंने यह रूप धारण किया था, उस समय ब्रह्मा-
विष्णु-महेश आदि देवता अपनी इच्छाके अधीन उन
परिपूर्णतम परब्रह्मस्वरूप प्रभु श्रीकृष्णका स्तवन कर
रहे थे, मुनियोंने उनके समक्ष अपने मस्तक झुका
रखे थे, सदा निर्लिप्त, सबके साक्षी, निर्गुण, प्रकृतिसे
परे तथा भक्तोंपर कृपा करनेवाले उन श्रीकृष्णका
मुखमण्डल मन्द मुसकानयुक्त तथा प्रसन्नतासे भरा
हुआ था; वे अग्निके समान विशुद्ध वस्त्र धारण किये
हुए थे और रत्नमय आभूषणोंसे सुशोभित हो रहे
थे—ऐसे स्वरूपवाले भगवान् कृष्णको देखकर राजा
भगीरथ बार-बार प्रणामकर उनकी स्तुति करने
लगे। उन्होंने लीलापूर्वक श्रीकृष्णसे अपने पूर्वजोंको
तारनेबाला अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया। उस समय
भगवान्की स्तुति करनेसे उनका रोम-रोम पुलकित हो
गया था॥ १३-१९॥
श्रीभगवान् बोले- हे सुरेश्वरि! सरस्वतीके
शापके प्रभावसे आप शीघ्र ही भारतवर्षमें जाइये और
मेरी आज्ञासे राजा सगरके सभी पुत्रोंको पवित्र
कोजिये॥ २०॥
आपसे स्पर्शित वायुका संयोग पाकर वे सब
पवित्र हो जायँगे और मेरा स्वरूप धारण करके दिव्य
रथपर आरूढ़ होकर मेरे लोकको प्राप्त होंगे। वे
जन्म-जन्मान्तरमें किये गये कर्मोके फलोंका समूल
उच्छेद करके सर्वथा निर्विकार भावसे युक्त होकर मेरे
पार्षदके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ २१-२२ ॥
३५६
कोटिजन्मार्जितं पापं भारते यत्कृतं नृभिः।
गङ्गाया वातस्पर्शन नश्यतीति श्रुतौ श्रुतम्॥ २३
स्पर्शनाददर्शनाददेव्याः पुण्यं दशगुणं ततः।
मौसलस्नानमात्रेण सामान्यदिवसे नृणाम्॥ २४
शतकोटिजन्मपापं नश्यतीति श्रुतौ श्रुतम्।
यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च॥ २५
जन्मसंख्यार्जितान्येव कामतोऽपि कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति मौसलस्नानतो नृणाम् ॥ २६
पुण्याहस्तानतः पुण्यं वेदा नैव वदन्ति च।
किञ्चिद्वदन्ति ते विप्र फलमेव यथागमम्॥ २७
ब्रह्मविष्णुशिवाद्याश्च सर्व नैव वदन्ति च।
सामान्यदिवसस्नानसङ्कल्पं शृणु सुन्दरि॥ २८
पुण्यं दशगुणं चैव मौसलस्नानतः परम्।
ततस््रिशदगुणं पुण्यं रविसंक्रमणे दिने॥ २९
अमायां चापि तत्तुल्यं द्विगुणं दक्षिणायने।
ततो दशगुणं पुण्यं नराणामुत्तरायणे॥ ३०
चातुर्मास्यां पौर्णमास्यामनन्तं पुण्यमेव च।
अक्षयायां च तत्तुल्यं चैतद्वेदे निरूपितम्॥ ३१
असंख्यपुण्यफलदमेतेषु स्नानदानकम्।
सामान्यदिवसस्नानाह्दानाच्छतगुणं फलम्॥ ३२
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ११
श्रुतिमें ऐसा कहा गया है कि भारतवर्षमें
मनुष्योंके द्वारा करोड़ों जन्मोंमें किये गये दुष्कर्मके
परिणामस्वरूप जो भी पाप संचित रहता है, वह
गंगाको वायुके स्पर्शमात्रसे नष्ट हो जाता है॥ २३॥
गंगाजीके स्पर्श और दर्शनकी अपेक्षा दस गुना
पुण्य गंगामें मौसल * स्नान करनेसे प्राप्त होता है।
सामान्य दिनोंमें भी स्नान करनेसे मनुष्योंके सैकड़ों
जन्मोंके पाप विनष्ट हो जाते हैं-ऐसा श्रुति कहती
है। इच्छापूर्वक इस जन्ममें किये गये तथा अनेक
पूर्वजन्मोंके संचित जो कुछ भी मनुष्योंके ब्रह्महत्या
आदि पाप हैं, वे सब मौसलस्नान करनेमात्रसे नष्ट हो
जाते हैं ॥ २४—२६॥
हे विप्र [नारद]! पुण्यप्रद दिनोंमें गंगास्नानसे
होनेवाले पुण्यका वर्णन तो वेद भी नहीं कर सकते।
आगमशास्त्रके जो विद्वान् हैं, वे आगमोंमें प्रतिपादित
कुछ-कुछ फल बताते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि
देवता भी पुण्यप्रद दिनोंके स्नानका सम्पूर्ण फल नहीं
बता सकते। हे सुन्दरि! अब सामान्य दिवसोंमें
संकल्पपूर्वक किये गये स्नानका फल सुनो। साधारण
दिवसके संकल्पपूर्वक स्नानका पुण्य मौसलस्नानसे दस
गुना अधिक होता है। उससे भी तीस गुना पुण्य सूर्य-
संक्रान्तिके दिन स्नान करनेसे होता है ॥ २७-२९ ॥
अमावस्यातिथिको भी स्नान करनेसे उसी
सूर्यसंक्रान्तिके स्नानके समान पुण्य होता है। किंतु
दक्षिणायनमें गंगा-स्नान करनेसे उसका दूना और
उत्तरायणमें गंगा-स्नान करनेसे मनुष्योंको उससे दस
गुना पुण्य प्राप्त होता है। चातुर्मास तथा पूर्णिमाके
अवसरपर स्नान करनेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है,
अक्षय तृतीयाके दिन स्नान करनेसे भी उसीके समान
पुण्य होता है-एऐसा वेदमें कहा गया है॥ ३०-३१॥
इन विशेष पर्वोपर किये गये स्नान तथा दान असंख्य
पुण्य-फल प्रदान करते हैं इन पर्वोपर किये गये स्नान-
दानका फल सामान्य दिवसोंमें किये गये स्नान तथा
दानको अपेक्षा सौ गुना अधिक होता है ॥ ३२॥
- गंगाको प्रणाम करके प्रवेश करे और निश्चेष्ट होकर अर्थात् बिना हाथ-पैर हिलाये शान्तभावसे स्नान कर ले।
इसे मौसलस्नान कहते हैं।
7898 श्रीमददेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-2 0
अ० ११]
नवम स्कन्ध
३५७
मन्वन्तराद्यायां तिथौ युगाद्यायां तथैव च।
माघस्य सितसप्तम्यां भीष्माष्टम्यां तथैव च॥ ३३
अथाप्यशोकाष्टम्यां च नवम्यां च तथा हरे: ।
ततोऽपि द्विगुणं पुण्यं नन्दायां तव दुर्लभम्॥ ३४
दशहरादशम्यां तु युगाद्यादिसमं फलम्।
नन्दासमं च वारुण्यां महत्पूर्वे चतुर्गुणम्॥ ३५
ततश्चतुर्गुणं पुण्यं द्विमहत्ूर्वके सति।
पुण्यं कोटिगुणं चैव सामान्यस्नानतोऽपि यत्॥ ३६
चन्द्रोपरागसमये सूर्ये दशगुणं ततः।
पुण्यमर्धोदये काले ततः शतगुणं फलम्॥ ३७
इत्येवमुक्त्वा देवेशो विरराम तयोः पुरः।
तमुवाच ततो गङ्गा भक्तिनम्रात्मकन्धरा॥ ३८
गङ्गोवाच
यामि चेद्भारतं नाथ भारतीशापतः पुरा।
तवाज्ञया च राजेन्द्र तपसा चैव साम्प्रतम्॥ ३९
दास्यन्ति पापिनो मह्यं पापानि यानि कानि च।
तानि मे केन नश्यन्ति तमुपायं बद प्रभो॥ ४०
कतिकालं परिमितं स्थितिर्मे तत्र भारते।
कदा यास्यामि देवेश तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ४१
ममान्यद्वाञ्छितं यद्यत्सर्वं जानासि सर्ववित्।
सर्वान्तरात्मन् सर्वज्ञ तदुपायं वद प्रभो॥ ४२
श्रीभगवानुवाच
जानामि वाञ्छितं गड्ढे तव सर्व सुरेश्वरि।
पतिस्ते द्रवरूपाया लवणोदो भविष्यति॥ ४३
मन्वन्तरादि^ तथा युगादि* तिथियों, माघ शुक्ल
सप्तमी, भीष्माष्टमी, अशोकाष्टमी, रामनवमी तथा
नन्दा तिथिको दुर्लभ गंगा-स्नान करनेपर उससे भी
दूना फल मिलता है॥ ३३-३४॥
गंगादशहराकी दशमीतिथिको स्नान करनेसे युगादि
तिथियोंके तुल्य और वारुणीपर्वपर स्नान करनेसे
नन्दातिथिके तुल्य फल प्राप्त होता है। महावारुणी
आदि पर्वापर स्नान करनेसे उससे चार गुना पुण्य
प्राप्त होता है । महामहावारुणी-पर्वपर स्नान करनेसे
उससे भी चार गुना और सामान्य स्नानको अपेक्षा करोड़
गुना पुण्य प्राप्त होता है । चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके
अवसरपर स्नान करनेसे उससे भी दस गुना पुण्य
मिलता है और अर्धोदयकालमें स्नान करनेसे उससे
भी सौ गुना फल प्राप्त होता है॥ ३५—३७॥
गंगा और भगीरथके समक्ष ऐसा कहकर देवेश्वर
श्रीहरि चुप हो गये। तब गंगा भक्तिभावसे अपना
मस्तक झुकाकर कहने लगीं ॥ ३८॥
गंगा बोलीं—हे नाथ! हे राजेन्द्र ! भारतीके पूर्व
शाप और साथ ही आपकी आज्ञा तथा भगीरथको
तपस्याके कारण मैं इस समय भारतवर्षमें जा रही हूँ।
किंतु हे प्रभो! वहाँ जानेपर पापीलोग मुझमें स्नान करके
अपने जो कुछ पाप मुझे दे देंगे, वे मेरे पाप किस प्रकार
नष्ट होंगे; इसका उपाय मुझे बताइये॥ ३९-४०॥
हे देवेश! मुझे भारतवर्षमें कितने समयतक
रहना होगा और पुन: भगवान् विष्णुके परम धामको
मैं कब प्राप्त होऊँगी ?॥ ४१ ॥
हे सर्ववित्! हे सर्वान्तरात्मन्! हे सर्वज्ञ! मेरा
अन्य जो कुछ भी अभिलषित है, वह सब आप
जानते ही हैं। अतः हे प्रभो! मेरे उन अभीष्टोंके पूर्ण
होनेका उपाय बतला दीजिये॥ ४२॥
श्रीभगवान् बोले—हे गंगे ! हे सुरेश्वरि ! मैं तुम्हारी
समस्त इच्छाओंको जानता हूँ। वहाँ भारतवर्षमें लवणसमुद्र
नदीस्वरूपिणी तुम्हारे पति होंगे । वे मेरे ही अंशस्वरूप
१-आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र शुक्ल तृतीया, भाद्र शुक्ल तृतीया, फाल्गुन अमावास्या, पौष शुक्ल
एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन पूर्णिमा,
चैत्र पूर्णिमा और ज्येष्ठ पूर्णिमा-ये स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरोंकी आरम्भिक तिथियाँ हैं। (मत्स्यपुराण १७। ६-८)
२-सत्ययुग-वैशाख शुक्ल तृतीया, त्रेतायुग-कार्तिक शुक्ल नवमी, द्वापर-माघ पूर्णिमा एवं कलियुग भाद्र शुक्ल
त्रयोदशी-ये सत्ययुग आदि चारों युगोंकी आरम्भिक तिथियाँ हैं (मत्स्यपुराण १७।४)।
३५८
स ममांशस्वरूपश्च त्वं च लक्ष्मीस्वरूपिणी।
विदग्धाया विदग्धेन सङ्गमो गुणवान् भुवि॥ ४४
यावत्यः सन्ति नद्यश्च भारत्याद्याशच भारते।
सौभाग्या त्वं च तास्वेव लवणोदस्य सौरते॥ ४५
अद्यप्रभृति देवेशि कलेः पञ्चसहस्त्रकम्।
वर्ष स्थितिस्ते भारत्याः शापेन भारते भुवि॥ ४६
नित्यं त्वमब्धिना सार्धं करिष्यसि रहो रतिम्।
त्वमेव रसिका देवि रसिकेन्द्रेण संयुता॥ ४७
त्वां स्तोष्यन्ति च स्तोत्रेण भगीरथकृतेन च।
भारतस्था जनाः सर्वे पूजयिष्यन्ति भक्तितः॥ ४८
कण्वशाखोक्तध्यानेन ध्यात्वा त्वां पूजयिष्यति।
यः स्तौति प्रणमेन्नित्यं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ४९
गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ ५०
सहस्त्रपापिनां स्नानाद्यत्पापं ते भविष्यति।
प्रकृतेर्भक्तसंस्पर्शादेव तद्धि विनङ्क्ष्यति॥ ५१
पापिनां तु सहस्त्राणां शवस्पर्शेन यत्त्वयि।
तन्मन्त्रोपासकस्नानात्तदघं च विनङ्क्ष्यति॥ ५२
तत्रैव त्वमधिष्ठानं करिष्यस्यघमोचनम्।
सार्ध सरिद्धिः श्रेष्ठाभिः सरस्वत्यादिभिः शुभे॥ ५३
तत्तु तीर्थ भवेत्सद्यो यत्र त्वद्गुणकीर्तनम्।
त्वद्रेणुस्पर्शमात्रेण पूतो भवति पातकी॥ ५४
रेणुप्रमाणवर्ष च देवीलोके वसेद् श्रुवम्।
श्रीमदेवी भागवत
[ अ० ११
हैं और तुम साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपिणी हो । इस प्रकार
पृथ्वीपर एक गुणवान् पुरुषके साथ एक गुणवती स्त्रीका
मेल बड़ा ही उत्तम होगा॥ ४३-४४॥
भारतवर्षमें सरस्वती आदि जो भी नदियाँ हैं,
उन सबमें क्रीडाकी दृष्टिसे लवणसमुद्रके लिये तुम्ही
सर्वाधिक सौभाग्यवती होओगी ॥ ४५॥
हे देवेशि! इस समयसे कलियुगके पाँच हजार
वर्षोतक तुम्हें सरस्वतीके शापसे भारतभूमिपर रहना
होगा॥ ४६॥
हे देवि! रसिकास्वरूपिणी तुम रसिकराज
लवणसमुद्रसे संयुक्त होकर उनके साथ एकान्तमें सदा
विहार करोगी॥ ४७॥
भारतवर्षमें रहनेवाले सभी लोग भक्तिपूर्वक
तुम्हारी पूजा करेंगे और भगीरथके द्वारा रचित स्तोत्रसे
तुम्हारी स्तुति करेंगे॥ ४८ ॥
जो कण्वशाखामें बतायी गयी ध्यान-विधिसे
तुम्हारा ध्यान करके तुम्हारी पूजा तथा स्तुति और
तुम्हें नित्य प्रणाम करेगा, उसे अश्वमेधयज्ञका फल
प्राप्त होगा॥ ४९ ॥
जो मनुष्य सौ योजन दूरसे भी “गंगा, गंगा ’—
इस प्रकार उच्चारण करता है, वह सारे पापोंसे मुक्त
हो जाता है तथा विष्णुलोकको प्राप्त करता है ॥ ५०॥
हजारों पापी व्यक्तियोंके स्नानसे जो पाप तुम्हें
प्राप्त होगा, वह मूलप्रकृति देवी भुवनेश्वरीके भक्तोंके
स्पर्शमात्रसे विनष्ट हो जायगा॥ ५१॥
हजारों पापी प्राणियोंके शवके स्पर्शसे जो पाप
तुम्हें लगेगा, वह भगवतीके मन्त्रोंकी उपासना करनेवाले
पुण्यात्मा भक्तोंके स्नानसे नष्ट हो जायगा॥ ५२॥
हे शुभे! तुम सरस्वती आदि श्रेष्ठ नदियोंके
साथ भारतवर्षमें निवास करोगी और वहाँ प्राणियोंको
पापसे मुक्त करती रहोगी॥ ५३॥
जहाँ तुम्हारे गुणोंका कीर्तन होगा, वह स्थान
तत्काल तीर्थ बन जायगा। तुम्हारे रजःकणका स्पर्शमात्र
हो जानेसे पापी भी पवित्र हो जायगा और उन
रजःकणोंकी जितनी संख्या होगी, उतने वर्षोतक वह
निश््चितरूपसे देवीलोकमें निवास करेगा॥ ५४६ ॥
आ० ११]
नवम स्कन्ध
३५९
ज्ञानेन त्वयि ये भक्त्या मन्नामस्मृतिपूर्वकम्॥ ५५
समुत्सृजन्ति प्राणांश्च ते गच्छन्ति हरेः पदम्।
पार्षदप्रवरास्ते च भविष्यन्ति हरेश्चिरम्॥ ५६
लयं प्राकृतिकं ते च द्रक्ष्यन्ति चाप्यसंख्यकम्।
मृतस्य बहुपुण्येन तच्छवं त्वयि विन्यसेत्॥ ५७
प्रयाति स च वैकुण्ठं यावदह्नः स्थितिस्त्वयि।
कायव्यूहं ततः कृत्वा भोजयित्वा स्वकर्मकम्॥ ५८
तस्मै ददामि सारूप्यं करोमि तं च पार्षदम्।
अज्ञानी त्वज्जलस्पर्शाद्यदि प्राणान्समुत्सृजेत्॥ ५९
तस्मै ददामि सालोक्यं करोमि तं च पार्षदम्।
अन्यत्र वा त्यजेत्प्राणांस्त्वन्नामस्मृतिपूर्वकम्॥ ६०
तस्मै ददामि सालोक्यं यावद्वै ब्रह्मणो वयः।
अन्यत्र वा त्यजेत्प्राणांस्त्वन्नामस्मृतिपूर्वकम्॥ ६१
तस्मै ददामि सारूप्यमसंख्यं प्राकृतं लयम्।
रत्लेन्द्रसारनिर्माणयानेन सह पार्षदैः॥ ६२
सद्यः प्रयाति गोलोकं मम तुल्यो भवेद् श्रुवम्।
तीर्थेऽप्यतीर्थं मरणे विशेषो नास्ति कश्चन॥ ६३
मन्मन्त्रोपासकानां तु नित्यं नैवेद्यभोजिनाम्।
पूतं कर्तु सशक्तो हि लीलया भुवनत्रयम्॥ ६४
रल्नेन्द्रसारयानेन गोलोकं सम्प्रयान्ति च।
मद्भक्ता बान्धवा येषां तेऽपि पश्वादयोऽपि हि॥ ६५
प्रयान्ति रत्नयानेन गोलोकं चातिदुर्लभम्।
यत्र यत्र स्मृतास्ते च ज्ञानेन ज्ञानिनः सति॥ ६६
जीवन्मुक्ताश्च ते पूता मद्भक्तेः संविधानतः ।
जो मनुष्य ज्ञान तथा भक्तिसे युक्त होकर मेरे
नामका स्मरण करते हुए तुम्हारे जलमें अपने प्राणोंका
त्याग करेंगे, वे श्रीहरिके लोकमें जायँगे और वहाँपर दीर्घ-
कालतक उनके श्रेष्ठ पार्षदोंके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे और
वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देखेंगे॥ ५५-५६३ ॥
महान् पुण्यसे किसी मृत प्राणीका शव तुम्हारे
जलमें आ सकता है। जितने दिनोंतक उसको स्थिति
तुम्हारेमें रहती है, उतने समयतक वह वैकुण्ठमें वास
करता है। तदनन्तर जब वह अनेक शरीर धारण
करके अपने कर्मोका फल भोग चुकता है, तब मैं उसे
सारूप्य मुक्ति दे देता हूँ और उसे अपना पार्षद बना
लेता हूँ॥ ५७-५८ई ॥
यदि कोई अज्ञानी मनुष्य भी तुम्हारे जलका स्पर्श
करके प्राणोंका त्याग करता है, तो मैं उसे सालोक्य
मुक्ति प्रदान कर देता हूँ और उसे अपना पार्षद बना
लेता हूँ। अथवा तुम्हारे नामका स्मरण करके कोई
व्यक्ति अन्यत्र कहीं भी यदि प्राणत्याग करता है, तो मैं
उसे सालोक्य मुक्ति प्रदान करता हूँ और वह ब्रह्माको
आयुपर्यन्त मेरे लोकमें निवास करता है ॥ ५९-६०६ ॥
इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य तुम्हारे नामका
स्मरण करके अन्यत्र किसी भी स्थानपर प्राणत्याग
करता है, तो मैं उसे सारूप्य मुक्ति प्रदान करता हूँ
और वह असंख्य प्राकृतिक प्रलय देखता है । तदनन्तर
बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित विमानमें बैठकर वह मेरे
पार्षदोंके साथ गोलोकमें जा पहुँचता है और निश्चय
ही मेरे तुल्य हो जाता है॥ ६१-६२३ ॥
प्रतिदिन मेरे मन्त्रकी उपासना तथा मेरा नैवेद्य
ग्रहण करनेवाले भक्तोंके लिये तीर्थ अथवा अतीर्थमें
मृत्युको प्राप्त होनेमें कुछ भी अन्तर नहीं है । मेरा ऐसा
भक्त तीनों लोकोंको सहजतापूर्वक पवित्र करनेमें समर्थ
है । अन्तमें मेरे वे भक्त बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित विमानपर
आरूढ़ होकर गोलोक जाते हैं। साथ ही, मेरे भक्त
जिनके बान्धव हैं; वे तथा उनके पशु आदि भी रत्मनिर्मित
विमानसे अत्यन्त दुर्लभ गोलोकमें चले जाते हैं। हे
सती ! जो ज्ञानीजन चाहे जहाँ भी ज्ञानपूर्वक मेरा स्मरण
करते हैं, वे मेरी भक्तिके प्रभावसे जीवन्मुक्त और पवित्र
हो जाते हैं॥ ६३-६६३ ॥
३६०
इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तांश्च प्रत्युवाच भगीरथम्॥ ६७
स्तुहि गङ्गामिमां भक्त्या पूजां च कुरु साम्प्रतम्।
भगीरथस्तां तुष्टाव पूजयामास भक्तितः ॥ ६८
कोथुमोक्तेन ध्यानेन स्तोत्रेणापि पुनः पुनः।
प्रणनाम च श्रीकृष्णं परमात्मानमीश्वरम्॥ ६९
भगीरथश्च गङ्गा च सोऽन्तर्धांनं चकार ह।
नारद उवाच
केन ध्यानेन स्तोत्रेण केन पूजाक्रमेण च॥ ७०
पूजां चकार नुपतिर्वद वेदविदांवर।
श्रीनारायण उवाच
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा धृत्वा धौते च वाससी॥ ७१
सम्पूज्य देवषट्कं च संयतो भक्तिपूर्वकम्।
गणेशं च दिनेशं च वहिँ विष्णुं शिवं शिवाम्॥ ७२
सम्पूज्य देवषट्कं च सोऽधिकारी च पूजने।
गणेशं विध्ननाशाय आरोग्याय दिवाकरम्॥ ७३
बह्निं शौचाय विष्णुं च लक्ष्म्यर्थं पूजयेन्नरः ।
शिवं ज्ञानाय ज्ञानेशं शिवां च मुक्तिसिद्धये॥ ७४
सम्पूज्यैताँल्लभेत्प्राज्ञो विपरीतमतोऽन्यथा।
दध्यावनेन ध्यानेन तद्ध्यानं शृणु नारद॥ ७५
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १२
[हे नारद!] गंगासे ऐसा कहकर भगवान्
श्रीहरिने उन भगीरथसे कहा-अब आप भक्तिपूर्वक
इन गंगाको स्तुति तथा पूजा कीजिये ॥ ६७६ ॥
तदनन्तर भगीरथने कौथुमशाखामें बताये गये
ध्यान तथा स्तोत्रके द्वारा भक्तिपूर्वक उन गंगाकी बार-
बार स्तुति तथा पूजा को। इसके बाद भगीरथ तथा
गंगाने परमेश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम किया तथा वे प्रभु
अन्तर्धान हो गये॥ ६८-६९६ ॥
नारदजी बोले- हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! राजा
भगीरथने किस ध्यान, स्तोत्र तथा पूजाविधिसे गंगाका
पूजन किया, यह मुझे बतलाइये ॥ ७०३ ॥
श्रीनारायण बोले राजा भगीरथने नित्य-क्रिया
तथा स्नान करके दो स्वच्छ वस्त्र धारणकर इन्द्रियोंको
नियन्त्रित करके भक्तिपूर्वक गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु,
शिव और भगवती शिवा-इन छः देवताओंकी विधिवत्
पूजा की। इन छः देवताओंकी सम्यक् पूजा करके वे
गंगापूजनके अधिकारी हुए॥ ७१-७२६ ॥
मनुष्यको चाहिये कि विघ्न दूर करनेके लिये
गणेशको, आरोग्यके लिये सूर्यकी, पवित्रताके लिये
अग्निकी, लक्ष्मी-प्राप्तिके लिये विष्णुकी, ज्ञानके लिये
ज्ञानेश्वर शिवकी तथा मुक्ति प्राप्त करनेके लिये भगवती
शिवाको पूजा करे। इन देवताओंकी पूजा कर लेनेके
बाद ही विद्वान् पुरुष अन्य पूजामें सफलता प्राप्त कर
सकता है, अन्यथा इसके विपरीत परिणाम होता है।
हे नारद! जिस ध्यानके द्वारा भगीरथने गंगाका ध्यान
किया था, उस ध्यानको सुनिये॥ ७३-७५॥
इति श्रीमद्वेवीभायवते महापुराणेऽव्टादशसाहस्तरघां संहितायां नवमस्कन्धे
गङ्गोपाख्यानवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ १९ ॥