Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
देवीगीताके प्रसंगमें भगवतीका हिमालयसे माया तथा अपने स्वरूपका वर्णन
देव्युवाच
शृण्वन्तु निर्जराः सर्वे व्याहरन्त्या वचो मम।
यस्य श्रवणमात्रेण मत्रूपत्वं प्रपद्यते॥ १
अहमेवास पूर्व तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप।
तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम्॥ २
अप्रतर्क्यमनिर्देश्यमनौपम्यमनामयम्
तस्य काचित्स्वतः सिद्धा शक्तिर्मायेति विश्रुता॥ ३
न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधत:।
एतद्विलक्षणा काचिद्टस्तुभूतास्ति सर्वदा॥ ४
देवी बोलीं—सभी देवता मेरे द्वारा कहे जानेवाले
वचनको सुनें, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य मेरे स्वरूपको
प्राप्त हो जाता है॥ १॥
हे पर्वतराज! पूर्वमें केवल मैं ही थी और कुछ
भी नहीं था। उस समय मेरा रूप चित्, संवित्
(ज्ञानस्वरूप) और परब्रह्म नामवाला था। उसके
सम्बन्धमें कोई तर्क नहीं किया जा सकता, इदमित्थं
रूपसे उसका निर्देश नहीं किया जा सकता, उसकी
कोई उपमा नहीं है तथा बह विकाररहित है॥ २६ ॥
भगवतीकी कोई स्वत:सिद्ध शक्ति है, जो माया
नामसे प्रसिद्ध है। वह शक्ति न सत् है, न असत् है
और दोनोंमें विरोध होनेके कारण वह सत्-असत्-
उभयरूप भी नहीं है। सत्-असत् इन दोनोंसे विलक्षण
वह माया कोई अन्य ही वस्तु है॥ ३-४॥
आ० ३२]
पावकस्योष्णतेवेयमुष्णांशोरिव दीधितिः।
चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं ममेयं सहजा श्रुवा॥ ५
तस्यां कर्माणि जीवानां जीवाः कालाश्च सञ्चरे।
अभेदेन विलीनाः स्युः सुषुप्तौ व्यवहारवत्॥ ६
स्वशक्तेशच समायोगादहं बीजात्मतां गता।
स्वाधारावरणात्तस्या दोषत्वं च समागतम् ॥ ७
चैतन्यस्य समायोगान्निमित्तत्वं च कथ्यते।
प्रपञ्चपरिणामाच्चय समवायित्वमुच्यते॥ ८
केचित्तां तप इत्याहुस्तमः केचिज्ञडं परे।
ज्ञानं मायां प्रधानं च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम्॥ ९
विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः।
अविद्यामितरे प््राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः॥ १०
एवं नानाविधानि स्युर्नामानि निगमादिषु।
तस्या जडत्वं दृश्यत्वाऱ्जाननाशात्ततोऽसती॥ ११
चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत्।
स्वप्रकाशं च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम्॥ १२
अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम्।
कर्मकत्रीविरोधः स्यात्तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम्॥ १३
प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत।
अतएव च नित्यत्वं सिद्धसंवित्तनोर्मम॥ १४
सप्तम स्कन्ध
१७३
जैसे अग्निमें उसकी उष्णता सदा रहती है,
सूर्यमें प्रकाशकी किरण रहती है और चन्द्रमामें
उसकी चन्द्रिका विद्यमान रहती है, उसी प्रकार यह
माया निश्चितरूपसे सदा मेरी सहचरी है॥ ५॥
जैसे सुषुप्ति-अवस्थामें व्यवहार समाप्त
हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमें समस्त
जीव, काल तथा जीवोंके कर्म उन्हीं भगवतीमें
अभेदरूपसे विलीन हो जाते हें ॥६॥
मैं अपनी उसी शक्तिके समायोगसे बीजरूपको
प्राप्त हुई अर्थात् मुझमें सृष्टिके कर्तृत्वका उदय
हुआ। उस मायाके अपने आधाररूपी आवरणके
कारण मुझमें उसका कुछ दोष आ गया अर्थात्
चैतन्यादिका तिरोधान हो गया॥ ७॥
चैतन्यके सम्बन्धसे मुझे संसारका निमित्तकारण
कहा जाता है और मेरा परिणामरूप यह सृष्टिप्रपंच
मुझसे ही उत्पन्न होता है तथा मुझमें ही विलीन होता
है, अतः मुझे समवायिकारण कहा जाता है॥ ८॥
कुछ लोग उस शक्तिको तप, कुछ लोग तम
तथा दूसरे लोग उसे जड—ऐसा कहते हैं । इसी प्रकार
कुछ लोग उसे ज्ञान, माया, प्रधान, प्रकृति, शक्ति तथा
अजा कहते हैं और शैवशास्त्रके मनीषी उसे विमर्श
भी कहते हैं। वेदतत्त्वार्थको जाननेवाले अन्य पुरुष
उसे अविद्या कहते हैं। इस प्रकार वेद आदिमें उस
शक्तिके नानाविध नाम प्रतिपादित हैं ॥ ९-१०६ ॥
केवल दिखायी देनेके कारण वह जड है
और ज्ञानप्राप्तिसे नष्ट होनेके कारण वह असत्
है। चैतन्य दिखायी नहीं पड़ता और जो दिखायी
पड़ता है, वह जड ही है। चैतन्य स्वयं प्रकाशस्वरूप
है, वह दूसरेसे प्रकाशित नहीं होता। वह अपने
द्वारा भी प्रकाशित नहीं है; क्योंकि इससे अनवस्थाका
दोष आ जायगा। कर्मत्व और कर्तृत्व-ये दोनों
विरुद्ध धर्म एक अधिकरणमें नहीं रह सकते, अतः
यह नहीं कहा जा सकता कि वह चैतन्य अपने
द्वारा प्रकाशित होता है। प्रत्युत हे पर्वत! दीपककी
भाँति प्रकाशमान उसे सूर्य आदि दूसरोंका प्रकाशक
समझिये। अतएव मेरे ज्ञानरूप शरीरका नित्यत्व
स्पष्टतः सिद्ध है॥ ११—१४॥
९७४
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादौ दृश्यस्य व्यभिचारतः।
संविदो व्यभिचारश्च नानुभूतोऽस्ति कर्हिचित्॥ १५
यदि तस्याप्यनुभवस्तरह्णयं येन साक्षिणा।
अनुभूतः स एवात्र शिष्टः संविद्वपुः पुरा॥ १६
अतएव च नित्यत्वं प्रोक्तं सच्छास्त्रकोविदैः ।
आनन्दरूपता चास्याः परप्रेमास्पदत्वतः॥ १७
मा न भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनि स्थितम्।
सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वादसङ्गत्वं स्फुटं मम॥ १८
अपरिच्छिन्नताप्येवमत एव मता मम।
तच्च ज्ञानं नात्मधर्मो धर्मत्वे जडतात्मनः॥ १९
ज्ञानस्य जडशेषत्वं न दृष्टं न च सम्भवि।
चिद्धर्मत्वं तथा नास्ति चितश्चिन्न हि भिद्यते॥ २०
तस्मादात्मा ज्ञानरूपः सुखरूपश्च सर्वदा।
सत्यः पूर्णोऽप्यसङ्गश्च द्वैतजालविवर्जितः॥ २१
स पुनः कामकर्मादियुक्तया स्वीयमायया।
पूर्वानुभूतसंस्कारात् कालकर्मविपाकतः॥ २२
अविवेकाच्च तत्त्वस्य सिसुक्षावान्प्रजायते।
अबुद्धिपूर्वः सर्गोऽयं कथितस्ते नगाधिप॥ २३
एतद्धि यन्मया प्रोक्तं मम रूपमलौकिकम्।
अव्याकृतं तदव्यक्तं मायाशबलमित्यपि॥ २४
श्रीमहेवीभागवत
[ अ० ३२
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें
संवित् (ज्ञानस्वरूप स्वयं)-का अभाव प्रतीत न होकर
प्रत्युत तीनों अवस्थाओंका अभाव अनुभवमें आता है,
इस प्रकार कभी भी संवितूका अभाव अनुभवमें नहीं
आता है। अत: संवित्के अभावका अनुभव न होनेके
कारण उसका नित्यत्व स्वतः सिद्ध है। यदि किसीको
संवितृके अभावका अनुभव होता है तो जिस साक्षीके
द्वारा उस संविद्रूपके अभावका अनुभव होता है,
वही संबितूका स्वरूप होगा। अतः उत्तम शास्त्रोंके
ज्ञाता विद्वानोंने उसे नित्य कहा है। वह परम प्रेमास्पद
है, अतः उसमें आनन्दरूपता भी है॥ १५-१७॥
पूर्वमें मेरा अभाव था, ऐसा नहीं; मैं तब भी
थी और प्रेमरूपमें सबकी आत्मामें स्थित थी। अन्य
सभी वस्तुओंके मिथ्या होनेके कारण मेरा उन
वस्तुओंसे सम्बन्ध न रहना स्वयं स्पष्ट है; अतः यह
मेरे रूपकी अपरिच्छिन्नता (व्यापकता) भी कही
गयी है। वह ज्ञान आत्माका धर्म नहीं है, अन्यथा
धर्मत्व होनेसे उसमें जडता आ सकती है। ज्ञानके
किसी भी अंशमें जडता और अनित्यताको न कभी
देखा गया और न देखा जा सकता है । ज्ञानरूप चित्
आत्मरूप चित्का धर्म नहीं है; क्योंकि आत्मरूप चित्
और ज्ञानरूप चित् एक ही हैं और धर्मिधर्मीभाव
एकत्र सम्भव नहीं है। अतः आत्मा सर्वदा ज्ञानरूप
तथा सुखरूप है; वह सत्य, पूर्ण और असंग है तथा
द्वैत-जालसे रहित है॥ १८—२१॥
वही आत्मा काम अर्थात् इच्छा तथा कर्म अर्थात्
अदृष्ट आदिके साथ युक्त होकर अपनी मायासे पूर्वमें
किये गये अनुभवोंके संस्कार, कालके द्वारा किये गये
कर्मके परिपाक और तत्त्वोंके अविवेकसे सृष्टि करनेकी
इच्छावाला हो जाता है। हे पर्वतराज हिमालय! मैंने
आपसे अबुद्धिपूर्वक (शयनके अनन्तर परमात्माको
जो जागरणरूप अवस्था है वह बुद्धिपूर्वक नहीं है)
हुए इस सृष्टिक्रमका वर्णन किया है॥ २२-२३॥
यह मैंने आपसे अपने जिस रूपके विषयमें कहा
है; वह अलौकिक, अव्याकृत (प्रारम्भिक), अव्यक्त
(सृष्टिका आदिकारण) तथा मायाशबल (मायासे
आवृत) भी है॥ २४॥
अ० ३२]
प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु सर्वकारणकारणम्।
तत्त्वानामादिभूत॑ च सच्चिदानन्दविग्रहम्॥ २५
सर्वकर्मघनीभूतमिच्छाज्ञानक्रियाश्रयम् ।
ह्लींकारमन्त्रवाच्य॑ तदादितत्त्वं तदुच्यते॥ २६
तस्मादाकाश उत्पन्नः शब्दतन्मात्ररूपकः ।
भवेत्स्पर्शात्मको वायुस्तेजोरूपात्मक पुनः ॥ २७
जलं रसात्मकं पश्चात्ततो गन्धात्मिका धरा।
शब्दैकगुण आकाशो वायु: स्पर्शरवान्वितः ॥ २८
शब्दस्पर्शरूपगुणं तेज इत्युच्यते बुधैः।
शब्दस्पर्शरूपरसैरापो वेदगुणाः स्मृताः ॥ २९
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धैः पञ्चगुणा धरा।
तेभ्योऽभवन्महत्सूत्रं यल्लिङ्गं परिचक्षते॥ ३०
सर्वात्मकं तत्सम्प्रोक्तं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः।
अव्यक्तं कारणो देहः स चोक्तः पूर्वमेव हि॥ ३१
यस्मिञ्जगद्बीजरूपं स्थितं लिङ्गोद्भवो यत: ।
ततः स्थूलानि भूतानि पञ्चीकरणमार्गतः ॥ ३२
पञ्चसंख्यानि जायन्ते तत्प्रकारस्त्वथोच्यते।
पूर्वोक्तानि च भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा॥ ३३
एकैकं भागमेकस्य चतुर्धा विभजेद् गिरे।
स्वस्वेतरद्वितीयांशे योजनात्पञ्च पञ्च ते॥ ३४
तत्कार्य च विराइदेहः स्थूलदेहोऽयमात्मनः।
पञ्चभूतस्थसत्त्वांशैः श्रोत्रादीनां समुद्धवः ॥ ३५
सप्तम स्कन्ध
१७५
समस्त शास्त्रोंमें इसे सभी कारणोंका कारण;
महत्, अहंकार आदि तत्त्वोंका आदिकारण तथा सत्-
चित्-आनन्दमय विग्रहवाला बताया गया है॥ २५॥
उस रूपको सम्पूर्ण कर्मोका साक्षी, इच्छा-ज्ञान
तथा क्रियाशक्तिका अधिष्ठान, हंकार मन्त्रका वाच्य
(अर्थ) और आदितत्त्व कहा गया है॥ २६॥
उसीसे शब्दतन्मात्रावाला आकाश,
स्पर्शतन्मात्रावाला वायु और पुन: रूपतन्मात्रावाला
तेज उत्पन्न हुआ। इसके बाद रसात्मक जल तथा
पुनः गन्धात्मक पृथ्वीको [क्रमशः] उत्पत्ति हुई।
आकाश शब्द नामक एक गुणसे; वायु शब्द तथा
स्पर्श-इन दो गुणोंसे और तेज शब्द, स्पर्श, रूप—
इन तीन गुणोंसे युक्त हुए-एऐसा विद्वान् लोग कहते
हैं । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस-ये चार
गुण जलके कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा
गन्ध-इन पाँच गुणोंसे युक्त पृथ्वी है॥ २७-२९६ ॥
उन्हीं पृथ्वी आदि सूक्ष्म भूतोंसे महान् व्यापक
सूत्र उत्पन्न हुआ, जिसे लिंग शब्दसे कहा जाता है;
वह सर्वात्मक कहा गया है। यही परमात्माका सूक्ष्म
शरीर है । जिसमें यह जगत् बीजरूपमें स्थित है और
जिससे लिंगदेहकी उत्पत्ति हुई है, वह अव्यक्त कहा
जाता है और वह परब्रह्मका कारणशरीर है; उसके
विषयमें पहले ही कहा जा चुका है॥ ३०-३१६ ॥
तदनन्तर उसी अव्यक्तशरीर (लिंगशरीर)-से
पंचीकरणप्रक्रियाके द्वारा पाँच स्थूल भूत उत्पन्न होते
हैं। अब उस पंचीकरणप्रक्रियाका वर्णन किया जा
रहा है । पूर्वमें कहे गये पाँच भूतो (पृथ्वी, जल, तेज,
वायु तथा आकाश)-में प्रत्येक भूतके दो बराबर-
बराबर भाग करके प्रत्येक भूतके प्रथम आधे भागको
पुनः चार भागोंमें विभक्त कर दे। इस प्रकार प्रथम
भागके विभक्त चतुर्थांशको अन्य चार भूतोंके अवशिष्ट
अर्धांशमें संयोजित कर दे। इस प्रकार प्रत्येक भूतके
अर्धांशमें तदतिरिक्त चार भूतोंके अंशका योग होनेसे
पाँचों स्थूल भूतोंका निर्माण हो जाता है। इस प्रकार
पंचीकृतभूतरूपी कारणके द्वारा जो कार्य (सृष्टिप्रपंच)
उत्पन्न हुआ, वही विराट् शरीर है और वही
परमात्माका स्थूल देह है। हे राजेन्द्र! पंचभूतोंमें
१७६
ज्ञानेन्द्रियाणां राजेन्द्र प्रत्येकं मिलितैस्तु तैः।
अन्तःकरणमेकं स्याद् वृत्तिभेदाच्चतुर्विधम्॥ ३६
संकल्पविकल्पकृत्यं
भवेत्तन्मन
यदा तु
तदा इत्यभिख्यम्।
स्याद् बुद्धिसंज्ञं च यदा प्रवेत्ति
सुनिश्चितं संशयहीनरूपम्॥ ३७
अनुसन्धानरूपं तच्चित्तं च परिकीर्तितम्।
अहङ्कृत्यात्मवृत्त्या तु तदहङ्कारतां गतम्॥ ३८
तेषां रजोंशैर्जातानि क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि च।
प्रत्येकं मिलितैस्तैस्तु प्राणो भवति पञ्चधा॥ ३९
हृदि प्राणो गुदेऽपानो नाभिस्थस्तु समानकः।
कण्ठदेशेऽप्युदानः स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः॥ ४०
ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च।
प्राणादिपञ्चकं चैव धिया च सहितं मन: ॥ ४९
एतत्सूक्ष्मं शरीरं स्यान्मम लिङ्गं यदुच्यते।
तत्र या प्रकृतिः प्रोक्ता सा राजन्द्रिविधा स्मृता॥ ४२
सत्त्वात्मिका तु माया स्यादविद्या गुणमिश्रिता ।
स्वाश्रयं या तु संरक्षेत्सा मायेति निगद्यते॥ ४३
तस्यां यत्प्रतिबिम्बं स्याद् बिम्बभूतस्य चेशितुः ।
स ईश्वरः समाख्यातः स्वाश्रयज्ञानवान्परः॥ ४४
सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहकारकः।
अविद्यायां तु यत्किञ्चित्प्रतिबरिम्बं नगाधिप॥ ४५
तदेव जीवसंज्ञं स्यात्सर्वदुःखाश्रयं पुनः।
द्वयोरपीह सम्ग्रोक्तं देहत्रयमविद्यया॥ ४६
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३२
स्थित सत्त्वांशोंके परस्पर मिलनेसे श्रोत्र आदि पाँच
ज्ञानेन्द्रियो तथा एक अन्तःकरणको उत्पत्ति हुई, जो
वृत्तिभेदसे चार प्रकार (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)-
का हो जाता है॥ ३२-३६॥
जब उसमें संकल्प-विकल्पवृत्तिका उदय होता
है, तब उस अन्तःकरणको मन कहा जाता है। जब
वह अन्तःकरण संशयरहित निश्चयात्मक वृत्तिसे युक्त
होता है, तब उसको बुद्धि संज्ञा होती है। अनुसन्धान
(चिन्तन) -वृत्तिके आनेपर वही अन्तःकरण चित्त
कहा जाता है और अहंकृतिवृत्तिसे संयुक्त होनेपर वह
अन्तःकरण अहंकारसंज्ञक हो जाता है॥ ३७-३८॥
तदनन्तर उन पाँच भूतोंके राजस अंशोंसे
क्रमशः पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। प्रत्येक राजस
अंशोंके मिलनेसे पाँच प्रकारके प्राण उत्पन्न हुए।
प्राण हृदयमें, अपान गुदामे, समान नाभिमें, उदान
कंठमें तथा व्यान सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त हुआ।
इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, प्राण
आदि पाँच वायु और बुद्धिसहित मन—इन्हीं सत्रह
अवयवोंवाला मेरा सूक्ष्म शरीर है, जिसे लिंग शब्दसे
भी कहा जाता है॥ ३९-४१३ ॥
हे राजन्! जो प्रकृति कही गयी है, बह भी
दो भेदोंबाली बतायी गयी है। शुद्धसत्त्वप्रधान
प्रकृति माया है तथा मलिनसत्त्वप्रधान प्रकृति
अविद्या है। जो प्रकृति अपने आश्रित रहनेवालेकी
रक्षा करती है अर्थात् आवरण या व्यामोह नहीं करती,
उसे माया कहा जाता है। उस शुद्ध-सत्त्वप्रधान
मायामें बिम्बरूप परमात्माका जो प्रतिबिम्ब होता है,
वही ईश्वर कहा गया है। वह ईश्वर अपने आश्रय
अर्थात् व्यापक ब्रह्मको जाननेवाला, परात्पर, सर्वज्ञ,
सब कुछ करनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके ऊपर
कृपा करनेवाला है॥ ४२-४४६ ॥
हे पर्वतराज हिमालय! [मलिनसत्त्वप्रधान]
अविद्यामें जो परमात्माका प्रतिबिम्ब है, वही जीव
कहा जाता है और वही जीव अविद्याके द्वारा
आनन्दांशका आवरण कर देनेके कारण सभी दु:खोंका
आश्रय हो जाता है। माया-अविद्याके कारण ईश्वर
आ० ३३]
देहत्रयाभिमानाच्चाप्यभून्नामत्रयं पुनः।
प्राज्ञस्तु कारणात्मा स्यात्सूक्ष्मदेही तु तैजसः ॥ ४७
स्थूलदेही तु विश्वाख्यस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
एवमीशोऽपि सम्प्रोक्त ईशसूत्रविराट्पदैः ॥ ४८
प्रथमो व्यष्टिरूपस्तु समष्ट्यात्मा परः स्मृतः ।
स हि सर्वेश्वरः साक्षाज्जीवानुग्रहकाम्यया॥ ४९
करोति विविधं विश्वं नानाभोगाश्रयं पुनः।
मच्छक्तिप्रेरितो नित्यं मयि राजन् प्रकल्पितः॥ ५०
सप्तम स्कन्ध
१७७
और जीव—इन दोनोंके तीन देह तथा देहत्रयके
अभिमानके कारण तीन नाम कहे जाते हैं।
कारणदेहाभिमानी जीवको प्राज्ञ, सूक्ष्मदेहाभिमानीको
तैजस तथा स्थूलदेहाभिमानीको विश्व-इन तीन
प्रकारवाला कहा गया है । इसी प्रकार ईश्वर भी ईश,
सूत्र तथा विराट् नामोंसे कहा गया है। जीवको
व्यष्टिरूप तथा परमेश्वरको समष्टिरूप कहा गया है।
वे सर्वेश्वर मेरी मायाशक्तिसे प्रेरित होकर जीवोंपर
कृपा करनेकी कामनासे विविध भोगोंसे युक्त विश्वोंकी
सृष्टि करते हैं। हे राजन्! मेरी शक्तिके अधीन होकर
वे ईश्वर रज्जुमें सर्पकी भाँति मुझ ब्रह्मरूपिणीमें नित्य
कल्पित हैं ॥ ४५—५० ॥
इति श्रीमद्देवीभायवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रथा संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां
देव्या व्यव्टिसमष्टिलपवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्याय:ः ॥ ३२॥
De ®) ८ अस्स
अथ त्रयस्त्रिशो5ध्याय:
भगवतीका अपनी सर्वव्यापकता बताते हुए विराट्रूप प्रकट करना, भयभीत
देवताओंकी स्तुतिसे प्रसन्न भगवतीका पुनः सौम्यरूप धारण करना
देव्युवाच
मन्मायाशक्तिसंक्लुप्तै जगत्सर्वं चराचरम्।
सापि मत्तः पृथङ्माया नास्त्येव परमार्थतः ॥ १
व्यवहारदूशा सेयं विद्या मायेति विश्रुता।
तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ॥ २
साहं सर्व जगत्सृष्ट्वा तदन्तः प्रविशाम्यहम्।
मायाकर्मादिसहिता गिरे प्राणपुरःसरा॥ ३
लोकान्तरगतिर्नोचेत्कथं स्यादिति हेतुना।
यथा यथा भवन्त्येव मायाभेदास्तथा तथा॥ ४
उपाधिभेदाद्भिन्नाहं घटाकाशादयो यथा।
उच्चनीचादिवस्तूनि भासयन्भास्करः सदा॥ ५
न दुष्यति तथैवाहं दोषैर्लिप्ता कदापि न।
देबी बोलीं [हे हिमालय!] यह सम्पूर्ण
चराचर जगत् मेरी मायाशक्तिसे ही उत्पन्न हुआ है।
परमार्थदूष्टिसे विचार करनेपर वह माया भी मुझसे
पृथक् नहीं है । व्यवहारदृष्टिसे वह विद्या ही ’ माया’
इस नामसे प्रसिद्ध है । तत्त्वदृष्टिसे भेदसम्बन्ध नहीं है,
दोनों एक ही तत्त्व हैं ॥ १-२॥
हे गिरे! मैं सम्पूर्ण जगतका सृजनकर माया और
कर्म आदिके साथ प्राणोंको आगे करके उस जगत्के
भीतर प्रवेश करती हूँ, अन्यथा संसारके सभी क्रिया-
कलाप कैसे हो पाते? इसी कारणसे मैं ऐसा करती
हुँ। मायाके भेदानुसार मेरे विभिन्न कार्य होते हैं।
जिस प्रकार आकाश एक होते हुए भी घटाकाश
आदि अनेक नामोंसे व्यवहृत है, उसी प्रकार मैं एक
होती हुई भी उपाधिभेदसे भिन्न हँ ॥ ३-४३ ॥
जिस प्रकार उत्तम और निकृष्ट-सभी वस्तुओंको
सदा प्रकाशित करता हुआ सूर्य कभी भी दूषित नहीं
होता, उसी प्रकार मैं कभी उपाधियोंके दोषोंसे लिप्त
नहीं होती हूँ॥ ५३ ॥
१७८
मयि बुद्धयादिकर्तृत्वमध्यस्यैवापरे जनाः॥ ६
वदन्ति चात्मा कर्मेति विमूढा न सुबुद्धय: ।
अज्ञानभेदतस्तद्ुन्मायाया भेदतस्तथा॥ ७
जीवेश्वरविभागश्च कल्पितो माययैव तु।
घटाकाशमहाकाशविभागः कल्पितो यथा॥ ८
तथैव कल्पितो भेदो जीवात्मपरमात्मनोः।
यथा जीवबहुत्वं च माययैव न च स्वतः॥ ९
तथेश्वरबहुत्वं च मायया न स्वभावतः।
देहेन्द्रियादिसङ्घातवासनाभेदभेदिता ॥ १०
अविद्या जीवभेदस्य हेतुर्नान्यः प्रकीर्तितः।
गुणानां वासनाभेदभेदिता या धराधर॥ १९
माया सा परभेदस्य हेतुर्नान्यः कदाचन।
मयि सर्वमिदं प्रोतमोतं -च धरणीधर॥ १२
ईश्वरोऽहं च सूत्रात्मा विराडात्माऽहमस्मि च।
ब्रह्माहं विष्णुरुद्रौ च गौरी ब्राह्मी च वैष्णवी॥ १३
सूर्योऽहं तारकाश्चाहं तारकेशस्तथास्म्यहम्।
पशुपक्षिस्वरूपाहं चाण्डालोऽहं च तस्करः॥ १४
व्याधोऽहं क्रूरकर्माहं सत्कर्माहं महाजनः।
स्त्रीपुन्नपुंसकाकारोऽप्यहमेव न संशयः॥ १५
यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्व व्याप्याहं सर्वदा स्थिता॥ १६
न तदस्ति मया त्यक्तं वस्तु किञ्चिच्चराचरम्।
यद्यस्ति चेत्तच्छून्यं स्याद्ठन्ध्यापुत्रोपमं हि तत्॥ १७
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३३
कुछ अज्ञानी मुझमें बुद्धि इत्यादिके कर्तृत्वका
आरोपकर मुझे आत्मा तथा कर्मकी संज्ञा देते हैं,
किंतु विज्ञजन ऐसा नहीं करते। जिस प्रकार
घटरूप उपाधिके द्वारा महाकाशका घटाकाशसे भेद
कल्पित होता है, उसी प्रकार [ईश्वर तथा
जीवमें वास्तविक भेद न होनेपर भी] अआज्ञानरूप
उपाधिके द्वारा ही जीवका ईश्वरसे भेद मायाके द्वारा
कल्पित है॥ ६-८३ ॥
जैसे मायाके प्रभावसे ही जीव अनेक प्रतीत होते
हैं; जो वास्तवमें अनेक नहीं हैं, वैसे ही मायाके
प्रभावसे ईश्वरकी भी विविधताका भान होता है न कि
अपने स्वभाववश॥ ९६ ॥
विभिन्न जीवोंके देह तथा इन्द्रियके समूहमें जैसे
भेदकी प्रतीति अविद्याके कारण है (वास्तविक नहीं
है), उसी प्रकार जीवोंमें भेद अविद्याके कारण है,
इसमें दूसरेको हेतु नहीं बताया गया है। हे धराधर!
गुणों (सत्त्व, रज तथा तम)-में उन गुणोंके कार्यरूप
वासनाके भेदसे जो भिन्नताकी प्रतीति करनेवाली है,
वही माया एक पदार्थसे दूसरे पदार्थमें भेदका हेतु है,
कोई अन्य कभी नहीं॥ १०-११६ ॥
हे धरणीधर! यह समग्र जगत् मुझमें ओतप्रोत
है। मैं ईश्वर हुँ, मैं सूत्रात्मा हूँ तथा मैं ही विराट्
आत्मा हूँ। मैं ही ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र हूँ। गौरी,
ब्राह्मी और वैष्णवी भी मैं ही हुँ॥ १२-१३॥
मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही चन्द्रमा हूँ. और तारे भी
मैं ही हूँ। पशु-पक्षी आदि भी मेरे ही स्वरूप हैं।
चाण्डाल, तस्कर, व्याध, क्रूर कर्म करनेवाला, सत्कर्म
करनेवाला तथा महान् पुरुष-ये सब मैं ही हूँ । स्त्री,
पुरुष तथा नपुंसकके रूपमें मैं ही हूँ; इसमें कोई संशय
नहीं है॥ १४-१५॥
जो कुछ भी वस्तु जहाँ कहीं भी देखने या
सुननेमें आती है-वह चाहे भीतर अथवा बाहर कहीं
भी विद्यमान हो, उन सबको व्याप्तकर उनमें सर्वदा
मैं ही स्थित रहती हूँ॥ १६॥
चराचर कोई भी वस्तु मुझसे रहित नहीं है।
यदि मुझसे शून्य कोई वस्तु मान ली जाय तो वह
वन्ध्यापुत्रके समान असम्भव ही है॥ १७॥
अ० ३३]
रज्जुर्यथा सर्पमालाभेदैरेका विभाति हि।
तथैवेशादिरूपेण भाम्यहं नात्र संशयः॥ १८
अधिष्ठानातिरिकेण कल्पितं तन्न भासते।
तस्मान्मत्सत्तयैवैतत्सत्तावान्नान्यथा भवेत्॥ १९
हिमालय उवाच
यथा वदसि देवेशि समष्टयात्मवपुस्त्विदम्।
तथैव द्रष्टुमिच्छामि यदि देवि कृपा मयि॥ २०
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा सर्वे देवाः सविष्णवः।
ननन्दुर्मुदितात्मानः पूजयन्तश्च तद्वचः॥ २१
अथ देवमतं ज्ञात्वा भक्तकामदुघा शिवा।
अदर्शयन्निजं रूपं भक्तकामप्रपूरणी॥ २२
अपश्यंस्ते महादेव्या विराङ्रूपं परात्परम्।
द्यौर्मस्तकं भवेद्यस्य चन्द्रसूयौ च चक्षुषी॥ २३
दिशः श्रोत्रे वचो वेदाः प्राणो वायुः प्रकीर्तितः ।
विश्वं हृदयमित्याहुः पृथिवी जघनं स्मृतम्॥ २४
नभस्तलं नाभिसरो ज्योतिश्चक्रमुरःस्थलम्।
महर्लोकस्तु ग्रीवा स्याज्ननोलोको मुखं स्मृतम्॥ २५
तपोलोको रराटिस्तु सत्यलोकादधः स्थितः।
इन्द्रादयो बाहवः स्युः शब्दः श्रोत्रं महेशितुः ॥ २६
नासत्यदस्त्रौ नासे स्तो गन्धो घ्राणं स्मृतो बुधैः ।
मुखमग्निः समाख्यातो दिवारात्री च पक्ष्मणी ॥ २७
ब्रह्मस्थानं भ्रूविजुम्भोऽप्यापस्तालुः प्रकीर्तिताः ।
रसो जिह्वा समाख्याता यमो दंष्ट्रः प्रकीर्तिताः॥ २८
सप्तम स्कन्ध
१७९
जिस प्रकार एक रस्सी भ्रमवश सर्प अथवा
मालाके रूपमें प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं ही ब्रह्मा,
विष्णु, महेश आदि रूपसे प्रतीत होती हूँ; इसमें कोई
संशय नहीं है। अधिष्ठानकी सत्ताके अतिरिक्त कल्पित
वस्तुको सत्ता नहीं होती। [उसकी प्रतीति अधिष्ठानकी
सत्ताके कारण होती है।] अतः मेरी सत्तासे ही वह
जगत् सत्तावान् है, इसके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं
हो सकती ॥ १८-१९ ॥
हिमालयने कहा—हे देवेश्वरि ! हे देवि! यदि
मुझपर आपको कृपा हो तो आपने अपने इस
समष्ट्यात्मक विराट् रूपका जैसा वर्णन किया है,
आपके उसी रूपको मैं देखना चाहता हूँ॥ २०॥
व्यासजी बोले-उन हिमालयकी यह बात
सुनकर विष्णुसहित सभी देवता प्रसन्नचित्त हो गये
और उनकी बातका अनुमोदन करते हुए आनन्दित हो
गये॥ २१॥
तदनन्तर देवताओंकी इच्छा जानकर भक्तोंकी
कामना पूर्ण करनेवाली तथा भक्तोके लिये कामधेनुतुल्य
भगवती शिवाने अपना रूप दिखा दिया। वे देवता
महादेवीके उस परात्पर विराट्रूपका दर्शन करने लगे;
जिसका मस्तक आकाश है, चन्द्रमा और सूर्य जिसके
नेत्र हैं, दिशाएँ कान हैं और वेद वाणी है। वायुको
उस रूपका प्राण कहा गया है। विश्व ही उसका
हृदय कहा गया है और पृथ्वी उस रूपकी जंघा कही
गयी है॥ २२—२४॥
पाताल उस रूपको नाभि, ज्योतिश्चक्र वक्षःस्थल
और महर्लोक ग्रीवा है। जनलोकको उसका मुख
कहा गया है। सत्यलोकसे नीचे रहनेवाला तपोलोक
उसका ललाट है। इन्द्र आदि उन महेश्वरीके बाहु हैं
और शब्द श्रोत्र हैं॥ २५-२६॥
नासत्य और दस्र (दोनों अश्विनीकुमार)
उनको नासिका हैं। विद्वान् लोगोंने गन्धको उनको
घ्राणेन्द्रिय कहा है । अग्निको मुख कहा गया है । दिन
और रात उनके पक्ष्म (बरौनी ) हैं । ब्रह्मस्थान भौंहोंका
विस्तार है। जलको भगवतीका तालु कहा गया है।
रस जिह्वा कही गयी है और यमको उनको दाढ़ें
बताया गया है॥ २७-२८॥
१८०
श्रीमद्देवी भागवत
[ अ० ३३
दन्ताः स्नेहकला यस्य हासो माया प्रकीर्तिता।
सर्गस्त्वपाङ्गमोक्षः स्याद् व्रीडोध्वोष्ठो महेशितुः ॥ २९
लोभः स्यादधरोष्ठोऽस्याधर्ममार्गस्तु पृष्ठभूः ।
प्रजापतिश्च मेढुं स्याद्यः स्त्रष्टा जगतीतले॥ ३०
कुक्षिः समुद्रा गिरयोऽस्थीनि देव्या महेशितुः ।
नद्यो नाड्यः समाख्याता वृक्षाः केशाः प्रकीर्तिताः ॥ ३१
कौमारयौवनजरा वयोऽस्य गतिरुत्तमा।
बलाहकास्तु केशाः स्युः सन्ध्ये ते वाससी विभोः॥ ३२
राजञ्छीजगदम्बायाश्चन्द्रमास्तु मनः स्मृतः।
विज्ञानशक्तिस्तु हरी रुद्रोऽन्तःकरणं स्मृतम्॥ ३३
अश्वादिजातयः सर्वाः श्रोणिदेशे स्थिता विभोः।
अतलादिमहालोकाः कट्यधोभागतां गता: ॥ ३४
एतादूशं महारूपं ददूशुः सुरपुङ्गवाः।
ज्वालामालासहस्त्राढ्यं लेलिहानं च जिह्णया॥ ३५
दंष्टाकटकटारावं वमन्तं वह्विमक्षिभिः।
नानायुधधरं वीरं ब्रह्मक्षत्रौदनं च यत्॥ ३६
सहस्त्रचरणं तथा।
विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ३७
सहस्त्रशीर्षनयनं
कोटिसूर्यप्रतीकाशं
भयङ्करं महाघोरं हृदक्ष्णोस्त्रासकारकम्।
ददूशुस्ते सुराः सर्वे हाहाकारं च चक्रिरे॥ ३८
विकम्पमानहृदया मूर्च्छामापुर्द्रत्ययाम्।
स्मरणं च गतं तेषां जगदम्बेयमित्यपि॥ ३९
अथ ते ये स्थिता वेदाश्चतुर्दिक्षु महाविभोः।
बोधयामासुर॒त्युग्रं मूर्च्छातो मूच्छितान्सुरान्॥ ४०
अथ ते धैर्यमालम्ब्य लब्ध्वा च श्रुतिमुत्तमाम्।
प्रेमाश्रुपूर्णनयना रूद्धकण्ठास्तु निर्जराः॥ ४१
स्नेहकी कलाएँ उस रूपके दाँत हैं, मायाको
उसका हास कहा गया है। सृष्टि उन महेश्वरीका
कटाक्षपात और लज्जा उनका ऊपरी ओष्ठ है। लोभ
उनका नीचेका ओष्ठ और अधर्ममार्ग उनका पृष्ठभाग
है। जो पृथ्वीलोकमें स्रष्टा कहे जाते हैं, वे प्रजापति
ब्रह्मा उस विराट्रूपकी जननेर्द्रिय हैं ॥ २९-३०॥
समुद्र उन देवी महेश्वरीकी कुक्षि और पर्वत
उनकी अस्थियाँ हैं। नदियाँ उनकी नाडियाँ कही गयी
हैं और वृक्ष उनके केश बताये गये हैं। कुमार, यौवन
और बुढ़ापा-ये अवस्थाएँ उनकी उत्तम गति हैं। मेघ
उनके सिरके केश हैं। [ प्रात: और सायं] दोनों सन्ध्याएँ
उन ऐश्वर्यमयी देवीके दो वस्त्र हैं ॥ ३१-३२॥
हे राजन्! चन्द्रमाको श्रीजगदम्बाका मन कहा
गया है। विष्णुको उनकी विज्ञानशक्ति और रुद्रको उनका
अन्तःकरण बताया गया है। अश्व आदि जातियाँ उन
ऐश्वर्यशालिनी भगवतीके कटिप्रदेशमें स्थित हैं और
अतलसे लेकर पातालतकके सभी महान् लोक उनके
कटिप्रदेशके नीचेके भाग हैं॥ ३३-३४॥
श्रेष्ठ देवताओंने हजारों प्रकारकी ज्वालाओंसे
युक्त, जीभसे बार-बार ओठ चाटते हुए, दाँत कट-
कटाकर चीखनेकी ध्वनि करते हुए, आँखोंसे अग्नि
उगलते हुए, अनेक प्रकारके आयुध धारण किये हुए,
पराक्रमी, ब्राह्मण-क्षत्रिय ओदनरूप, हजार मस्तक,
हजार नेत्र और हजार चरणोंसे सम्पन्न, करोड़ों
सूर्योके समान तेजयुक्त तथा करोड़ों बिजलियोंके
समान प्रभासे प्रदीप्त, भयंकर, महाभीषण तथा हृदय
और नेत्रोंके लिये सन्त्रासकारक ऐसे विराट्रूपका
दर्शन किया। जब उन देवताओंने इसे देखा तब वे
हाहाकार करने लगे, उनके हृदय काँप उठे, उन्हें घोर
मूर्च्छां आ गयी और उनकी यह स्मृति भी समाप्त हो
गयी कि यही भगवती जगदम्बा हैं ॥ ३५-३९ ॥
उन महाविभुको चारों दिशाओंमें जो वेद विराजमान
थे, उन्होंने मूच्छित देवताओंको अत्यन्त घोर मूर्च्छासे
चेतना प्रदान को। इसके बाद धैर्य धारणकर वे
देवताश्रेष्ठ श्रुति प्राप्त करके प्रेमाश्रुओंसे परिपूर्ण नेत्रं
तथा रुँधे हुए कंठसे गद्गद वाणीमें उनकी स्तुति
करने लगे॥ ४०-४१॥
आ० ३३]
सप्तम स्कन्ध
१८१
बाष्पगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रिरे।
देवा ऊचुः
अपराधं क्षमस्वाम्ब पाहि दीनांस्त्वदुद्भवान्॥ ४२
कोपं संहर देवेशि सभया रूपदर्शनात्।
का ते स्तुतिः प्रकर्तव्या पामरैर्निर्जरैरिह॥ ४३
स्वस्याप्यज्ञेय एवासौ यावान्यश्च स्वविक्रमः ।
तदर्वाग्जायमानानां कथं स विषयो भवेत्॥ ४४
नमस्ते भुवनेशानि नमस्ते प्रणवात्मिके।
सर्ववेदान्तसंसिद्धे नमो ह्हींकारमूर्तये॥ ४५
यस्मादग्निः समुत्पन्नो यस्मात्सूर्यश्च चन्द्रमाः ।
यस्मादोषधयः सर्वास्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ४६
यस्माच्च देवाः सम्भूताः साध्याः पक्षिण एव च।
पशवश्च मनुष्याश्च तस्मै सर्वात्मने नमः॥ ४७
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपः श्रद्धा ऋतं तथा।
ब्रह्मचर्यं विधिश्चैव यस्मात्तस्मै नमो नमः ॥ ४८
सप्तप्राणाचिषो यस्मात्समिधः सप्त एव च।
होमाः सप्त तथा लोकास्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ४९
यस्मात्समुद्रा गिरयः सिन्धवः प्रचरन्ति च।
यस्मादोषधयः सर्वा रसास्तस्मै नमो नमः॥ ५०
यस्माद्यज्ञः समुद्भूतो दीक्षा यूपश्च दक्षिणाः।
ऋचो यजूंषि सामानि तस्मै सर्वात्मने नमः॥ ५१
नमः पुरस्तात्पृष्ठे च नमस्ते पार्श्वयोईयोः।
अध ऊर्ध्व चतुर्दिक्षु मातर्भूयो नमो नमः॥ ५२
उपसंहर देवेशि रूपमेतदलौकिकम्।
तदेव दर्शयास्माकं रूपं सुन्दरसुन्दरम्॥ ५३
देवता बोले-हे अम्ब! हमारे अपराधोंको
क्षमा कीजिये और अपने दीन सन्तानोंकी रक्षा
कोजिये। हे देवेशवरि! आप अपना क्रोध शान्त कर
लीजिये; क्योंकि हमलोग यह रूप देखकर भयभीत
हो गये हैं । हम मन्दबुद्धि देवता यहाँ आपकी कौन-
सी स्तुति कर सकते हैं ? आपका अपना जितना तथा
जैसा पराक्रम है, उसे आप स्वयं भी नहीं जानतीं, तो
फिर वह बादमें प्रादुर्भूत होनेवाले हम देवताओंके
ज्ञानका विषय कैसे हो सकता है ?॥ ४२—४४॥
हे भुवनेश्वरि! आपको नमस्कार है। हे प्रणवात्मिके!
आपको नमस्कार है । समस्त वेदान्तोंसे प्रमाणित तथा
हींकाररूप धारण करनेवाली हे भगवति! आपको
नमस्कार है॥ ४५॥
जिनसे अग्नि उत्पन्न हुआ है, जिनसे सूर्य तथा
चन्द्र आविर्भूत हुए हैं और जिनसे समस्त औषधियाँ
उत्पन्न हुई हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है॥ ४६॥
जिनसे सभी देवता, साध्यगण, पक्षी, पशु तथा
मनुष्य उत्पन्न हुए हैं; उन सर्वात्माको नमस्कार
है ॥ ४७॥
` जिनसे प्राण, अपान, व्रीहि (धान), यव, तप,
श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधिका आविर्भाव हुआ
है; उन सर्वात्माको बार-बार नमस्कार है ॥ ४८ ॥
जिनसे सातौं प्राण, सात अग्नियाँ, सात समिधाएँ,
सात होम तथा सात लोक उत्पन्न हुए हैं; उन
सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ४९ ॥
जिनसे समुद्र, पर्वत तथा सभी सिन्धु निकलते
हैं और जिनसे सभी औषधियाँ तथा रस उद्भूत होते
हैं, उन सर्वात्माको बार-बार नमस्कार है॥५०॥
जिनसे यज्ञ, दीक्षा, यूप, दक्षिणाएँ, ऋचाएँ,
यजुर्वेद तथा सामवेदके मन्त्र उत्पन्न हुए हैं; उन
सर्वात्माको नमस्कार है॥५१॥
हे माता! आपको आगे, पीछे, दोनों पार्श्वभाग,
ऊपर, नीचे तथा चारों दिशाओंसे बार-बार नमस्कार
है ॥ ५२॥
हे देवेश्वरि! अब इस अलौकिक रूपको छिपा
लीजिये और हमें उसी परम सुन्दर रूपका दर्शन
कराइये ॥ ५३ ॥ |
१८२
व्यास उवाच
इति भीतान्सुरान्दृष्ट्या जगदम्बा कृपार्णवा।
संहत्य रूपं घोरं तद्दर्शयामास सुन्दरम्॥ ५४
पाशाङ्कुशवराभीतिधरं
करुणापूर्णनयनं
सर्वाङ्गकोमलम्।
मन्दस्मितमुखाम्बुजम्॥ ५५
दृष्ट्वा तत्सुन्दरं रूपं तदा भीतिविवर्जिताः।
शान्तचित्ताः प्रणेमुस्ते हर्षगदगदनिःस्वनाः॥ ५६
श्रीमद्देबी भागवत
[ अ० ३४
व्यासजी बोले—देवताओंको भयभीत
देखकर कृपासिन्धु जगदम्बाने उस घोर रूपको
छिपाकर और पाश, अंकुश, वर तथा अभय
मुद्रासे युक्त, समस्त कोमल अंगोंवाले, करुणासे
परिपूर्ण नेत्रोंबाले एवं मन्द-मन्द मुसकान-
युक्त मुखकमलवाले मनोहर रूपका दर्शन करा
दिया॥ ५४-५५॥
तब भगवतीका वह सुन्दर रूप देखकर वे देवता
भयरहित हो गये और शान्तचित्त होकर हर्षयुक्त
गद्गद वाणीसे देवीको प्रणाम करने लगे॥ ५६॥
इति श्रीमहेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रथा संहितायां सप्तमस्कन्धे श्रीदेबीविराङ्रूपदर्शनसाहितं
देवकृततत्स्तववर्णनं नाम त्रयस्त्रिशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
SIO moe
अथ चतुस्त्रिशोऽध्यायः
भगवतीका हिमालय तथा देवताओंसे परमपदकी प्राप्तिका उपाय बताना
देव्युवाच
क्व यूयं मन्दभाग्या वै क्वेदं रूपं महाद्भुतम्।
तथापि भक्तवात्सल्यादीदूशं दर्शितं मया॥ १
न वेदाध्ययनैर्योगैर्न दानैस्तपसेज्यया।
रूपं द्रष्टुमिदं शक्यं केवलं मत्कृपां विना॥ २
प्रकृतं शृणु राजेन्द्र परमात्मात्र जीवताम्।
उपाधियोगात्सम्प्राप्तः कर्तृत्वादिकमप्युत॥ ३
क्रियाः करोति विविधा धर्माधर्मैंकहेतवः।
नानायोनीस्ततः प्राप्य सुखदुःखैश्च युज्यते॥ ४
पुनस्तत्संस्कृतिवशान्नानाकर्मरतः सदा।
नानादेहान्समाप्नोति सुखदुःखैश्च युज्यते॥ ५
घटीयन्त्रवदेतस्य न विरामः कदापि हि।
अज्ञानमेव मूलं स्यात्ततः कामः क्रियास्ततः॥ ६
देबी बोलीं-कहाँ तुम सब मन्दभाग्य
देवता और कहाँ मेरा यह अद्भुत रूप, तथापि
भक्तवत्सलताके कारण मैंने आपलोगोंको ऐसे
रूपका दर्शन कराया है। केवल मेरी कृपाको छोड़कर
वेदाध्ययन, योग, दान, तपस्या और यज्ञ आदि किन्ही
भी साधनसे मेरे उस रूपका दर्शन नहीं किया जा
सकता॥ १-२॥
हे राजेन्द्र! अब ब्रह्मविद्याविषयक पूर्व
प्रसंग सुनिये। परमात्मा ही उपाधिभेदसे जीवसंज्ञा
प्राप्त करता है और उसमें कर्तृत्व आदि आ जाता
है। वह धर्म-अधर्महेतुभूत विविध प्रकारके कर्म
करने लगता है। फिर कर्मोके अनुसार अनेक योनियोंमें
जन्म प्राप्त करके वह सुख-दुःखका भोग करता
है॥ ३-४॥
पुनः अपने उन संस्कारोंके प्रभावसे वह
सदा नानाविध कर्मोमें प्रवृत्त रहता है, अनेक प्रकारके
शरीर धारण करता है और सुखों तथा दुःखोंका भोग
करता है। घटीयन्त्रकी भाँति इस जीवको कभी भी
विश्राम नहीं मिलता। अज्ञान ही उसका कारण है;
उसी अज्ञानसे कामना और पुनः क्रियाओंका प्रादुर्भाव
होता है॥ ५-६॥
अ० ३४]
सप्तम स्कन्ध
१८३
तस्मादज्ञाननाशाय यतेत नियतं नरः।
एतद्धि जन्मसाफल्यं यदज्ञानस्य नाशनम्॥ ७
पुरुषार्थसमाप्तिश्च जीवन्मुक्तदशापि च।
अज्ञाननाशने शक्ता विद्यैव तु पटीयसी॥ ८
न कर्म तज्जं नोपास्तिर्विरोधाभावतो गिरे।
प्रत्युताशाज्ञाननाशे कर्मणा नैव भाव्यताम्॥ ९
अनर्थदानि कर्माणि पुनः पुनरुशन्ति हि।
ततो रागस्ततो द्रेषस्ततोऽनर्थो महान्भवेत्॥ १०
तस्मात्सर्वप्रयलेन ज्ञानं सम्पादयेन्नरः।
कुर्वन्नेवेह कर्माणीत्यतः कर्माप्यवश्यकम्॥ ११
ज्ञानादेव हि कैवल्यमतः स्यात्तत्समुच्ययः।
सहायतां व्रजेत्कर्म ज्ञानस्य हितकारि च॥ १२
इति केचिद्वदन्त्यत्र तद्विरोधान्न सम्भवेत्।
ज्ञानादधुद्ग्रन्थिभेदः स्यादधुदग्रन्थौ कर्मसम्भवः॥ १३
यौगपद्यं न सम्भाव्यं विरोधात्तु ततस्तयोः।
तमःप्रकाशयोर्यद्वद्यौगपद्यं न सम्भवि॥ १४
तस्मात्सर्वाणि कर्माणि वैदिकानि महामते।
चित्तशुद्धयन्तमेव स्युस्तानि कुर्यात्प्रयत्तः॥ १५
शमो दमस्तितिक्षा च वैराग्यं सत्त्वसम्भवः।
तावत्पर्यन्तमेव स्युः कर्माणि न ततः परम्॥ १६
तदन्ते चैव संन्यस्य संश्रयेद् गुरुमात्मवान्।
श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं च भक्त्या निर्व्याजया पुन: ॥ १७
वेदान्तश्रवणं कुर्यान्नित्यमेवमतन्द्रितः।
तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य नित्यमर्थं विचारयेत्॥ १८
तत््वमस्यादिवाक्यं तु जीवब्रहौक्यबोधकम्।
ऐक्ये ज्ञाते निर्भयस्तु मद्रूपो हि प्रजायते॥ १९
अत: अज्ञानके नाशके लिये मनुष्यको निश््चितरूपसे
प्रयत्न करना चाहिये । ज्ञानका नष्ट हो जाना ही जीवनकी
सफलता है । आज्ञानके नष्ट हो जानेपर पुरुषार्थकी समाप्ति
तथा जीवन्मुक्त दशाकी उपलब्धि हो जाती है । विद्या
ही आज्ञानका नाश करनेमें पूर्ण समर्थ है ॥ ७-८॥
हे गिरे! आज्ञानसे ही कर्म होता है, इसलिये
कर्मका आज्ञानसे विरोध नहीं है। अज्ञानके नाश हो
जानेसे कर्म और उपासना आदिका अभाव हो जायगा,
प्रत्युत आशारूपी आज्ञानके नाश हो जानेपर कर्मका
अभाव हो जायगा। अनर्थकारी कर्म बार-बार होते
रहते हैं। उसीसे राग, उसीसे द्वेष और फिर उसीसे
महान् अनर्थको उत्पत्ति होती है। अतः मनुष्यको पूर्ण
प्रयलके साथ ज्ञानका अर्जन करना चाहिये। ‘कुर्वन्नेबेह
कर्माणि ’ इस श्रुतिवचनके अनुसार कर्म भी आवश्यक
है। साथ ही ज्ञानसे ही कैवल्यपदकी प्राप्ति सम्भव
है, अतः मोक्षके लिये कर्म और ज्ञान-दोनोंका समुच्चय
आवश्यक है, साथ ही हितकारक कर्म ज्ञानकी
सहायता करता है-एऐसा कुछ लोग कहते हैं, किंतु
उन दोनों (ज्ञान तथा कर्म)-के परस्पर विरोधी होनेसे
वैसा सम्भव नहीं है॥ ९-१२६ ॥
ज्ञानसे हृदय-ग्रन्थिका भेदन होता है और हृदय-
ग्रन्थिमें कर्म उत्पन्न होता है। फिर उन दोनों (ज्ञान
और कर्म) -में परस्पर विरोधभाव होनेसे वे एक स्थानपर
उसी तरह नहीं रह सकते, जैसे अन्धकार और प्रकाशका
एक साथ रहना सम्भव नहीं है ॥ १३-१४॥
हे महामते! इसलिये समस्त वैदिक कर्म जो
चित्तको शुद्धिके लिये होते हैं, उन्हें प्रयत्नपूर्वक
करना चाहिये। शम, दम, तितिक्षा, वैराग्य और
सत्त्वका प्रादुर्भाव-इनको प्राप्तितक ही कर्म आवश्यक
हैं, इसके बाद नहीं॥ १५-१६॥
तदनन्तर ज्ञानी मनुष्यको चाहिये कि वह संन्यासी
होकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरुका आश्रय ग्रहण करे
और पुनः सावधान होकर निष्कपट भक्तिके साथ
प्रतिदिन वेदान्तका श्रवण करे। साथ ही ’ तत्त्वमसि’
आदि वाक्यके अर्थका वह नित्य चिन्तन करे; क्योंकि
तत्त्वमसि आदि वाक्य जीव और ब्रह्मकी एकताके
बोधक हें । ऐक्यका बोध हो जानेपर मनुष्य निर्भय
होकर मेरा रूप बन जाता है॥ १७-१९॥
१८४
पदार्थावगतिः पूर्व वाक्यार्थावगतिस्ततः ।
तत्पदस्य च वाक्यार्थो गिरे$हं परिकीर्तितः ॥ २०
त्वंपदस्य च वाच्यार्थो जीव एव न संशय: ।
उभयोरैक्यमसिना पदेन प्रोच्यते बुधैः॥ २१
वाच्यार्थयोर्विरुद्धत्वादैक्यं नैव घटेत ह।
लक्षणातः प्रकर्तव्या तत्त्वमोः श्रुतिसंस्थयोः॥ २२
चिन्मात्रं तु तयोर्लक्ष्यं तयोरैक्यस्य सम्भवः ।
तयोरैक्यं तथा ज्ञात्वा स्वाभेदेनाद्वयो भवेत्॥ २३
देवदत्तः स एवायमितिवल्लक्षणा स्मृता।
स्थूलादिदेहरहितो ब्रह्म सम्पद्यते नरः॥ २४
पञ्चीकृतमहाभूतसम्भूतः स्थूलदेहकः।
भोगालयो जराव्याधिसंयुतः सर्वकर्मणाम्॥ २५
मिथ्याभूतोऽयमाभाति स्फुटं मायामयत्वतः।
सोऽयं स्थूल उपाधिः स्यादात्मनो मे नगेश्वर॥ २६
ज्ञानकर्मेन्द्रिययुतं प्राणपञ्चकसंयुतम्।
मनोबुद्धियुतं चैतत्सूक्ष्मं तत्कवयो विदुः॥ २७
अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः।
द्वितीयोऽयमुपाधिः स्यात्सुखादेरवबोधकः॥ २८
अनाझ्यनिर्वाच्यमिदमञ्चानं तु तृतीयकः।
देहोऽयमात्मनो भाति कारणात्मा नगेशवर॥ २९
उपाधिविलये जाते केवलात्मावशिष्यते।
देहत्रये पञ्चकोशा अन्तःस्थाः सन्ति सर्वदा॥ ३०
श्रीमहेबीभागवत
[ अ० ३४
हे पर्वत! वाक्यार्थमें पदार्थज्ञान कारण होता है,
अतः पहले पदार्थका ज्ञान होता है, उसके बाद
वाक्यार्थको प्रतीति होती है। हे पर्वत! “तत्’ पदके
वाच्यार्थके रूपमें मैं ही कही गयी हूँ । ‘त्वम्’ पदका
वाच्यार्थ जीव ही है, इसमें कोई संशय नहीं है।
विद्वान् पुरुष ’ असि’ पदसे “तत्’ और ’ त्वम् ‘—इन
दोनों पदोंकी एकता बतलाते हैं ॥ २०-२१॥
इन दोनों पदोंके वाच्यार्थ परस्पर विरोधी होनेसे
इन पदार्थीकी एकता सम्भव नहीं है, अत: श्रुतिप्रतिपादित
इन “तत्’ और ‘त्वम्‘-दोनों पदोंके वाच्यार्थमें विशेषण-
रूपसे सन्निविष्ट सर्वज्ञत्व और अल्पज्ञत्व धर्मका
भागत्यागलक्षणाके द्वारा त्याग करके केवल चैतन्यांशको
ग्रहण करनेसे उनकी एकता सम्भव होती है। उनके
ऐक्यका इस प्रकार बोध हो जानेपर स्वगत भेद समाप्त
होकर अद्वैत बुद्धिका उदय हो जाता है॥ २२-२३॥
“वह यही देवदत्त है ‘—इस वाक्यार्थमें देवदत्त
और तत् पदके अभेद-बोधके लिये जैसे लक्षणा आवश्यक
है, वैसी ही लक्षणा यहाँ समझनी चाहिये। स्थूलादि
देहमें जीवका जो स्वरूपाध्यास है, उसकी निवृत्ति हो
जानेपर वह जीव ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २४॥
पंचीकरणसे युक्त पाँच महाभूतोंसे रचित यह
स्थूल शरीर सभी कर्मोके भोगोंका आश्रय है। यह
देह वृद्धत्व एवं रोगसे संयुक्त होनेवाला है। हे
पर्वतराज! मायामय होनेके कारण ही यह मिथ्याभूत
देह सत्य प्रतीत होता है। यह स्थूल शरीर भी मेरी
आत्माकी ही उपाधि है॥ २५-२६॥
यह जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच
प्राण, मन तथा बुद्धिसे युक्त है तथा अपंचीकृत भूतोंसे
उत्पन्न है, उसे विद्वानोंने सूक्ष्म शरीर कहा है । सुख-
दुःखका बोध करनेवाला यह सूक्ष्म शरीर आत्माको
दूसरी उपाधि है॥ २७-२८॥
हे पर्वतराज! अनादि, अनिर्वचनीय और अज्ञानमूलक
जो यह कारण शरीर है, वही आत्माके तीसरे शरीरके
रूपमें प्रतीत होता है । तीनों उपाधियों (स्थूल, सूक्ष्म
तथा कारण शरीर) -का विलय हो जानेपर केवल परमात्मा
ही शेष रह जाता है । इन तीनों देहोंके भीतर पंचकोश
सदा स्थित रहते हैं । पंचकोशका परित्याग कर देनेपर
अ० ३४]
सप्तम स्कन्ध
१८५
पञ्चकोशपरित्यागे ब्रह्मपुच्छं हि लभ्यते।
नेतिनेतीत्यादिवाक्यैर्मम रूपं यदुच्यते॥ ३१
न जायते प्रियते तत्कदाचि-
न्नायं भूत्वा न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥३२
हतं चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ ३३
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुः प्रसादान्महिमानमस्य॥ ३४
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ ३५
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ ३६
यस्त्वविद्वान्भवति चामनस्कश्च सदाशुचिः।
न तत्पदमवाप्नोति संसारं चाधिगच्छति॥ ३७
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते॥ ३८
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति मदीयं यत्परं पदम्॥ ३९
ब्रह्ममें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जो ‘नेति-नेति’ आदि
श्रुतिवाक्योंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जिसे
मेरा ही रूप कहा जाता है ॥ २९-३१ ॥
यह आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न
कभी मरता है। यह होकर फिर कभी हुआ भी नहीं।
यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन है।
शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता
है॥ ३२॥
यदि कोई मारनेवाला आत्माको मारनेमें समर्थ
मानता है और यदि कोई मारा जानेवाला व्यक्ति
अपनेको मरा हुआ मानता है तो वे दोनों ही
आत्मस्वरूपको नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो
मारता है और न तो मारा जाता है॥ ३३॥
यह आत्मा अणुसे भी सूक्ष्म है और महानसे भी
महान् है। यह आत्मा (परमात्मा) इस जीवात्माके
हृदयरूप गुफा (बुद्धि) -में निहित रहनेवाला है!
संकल्प-विकल्परहित और चिन्तामुक्त साधक ही
परमात्माकी उस महिमाको परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे
देख पाता है॥ ३४॥
जीवात्माको रथका स्वामी और शरीरको रथ
समझिये। बुद्धिको सारथि और मनको ही लगाम
समझिये ॥ ३५॥
विद्वानूलोग इन्द्रियोंको घोड़े, विषयोंको उन
घोड़ोंके विचरनेका मार्ग बतलाते हैं और शरीर,
इन्द्रिय तथा मन-इनके साथ रहनेवाले जीवात्माको
भोक्ता कहते हैं ॥ ३६॥
जो मनुष्य सदा अज्ञानी, असंयतचित्त और
अपवित्र रहता है; वह उस परम पदको नहीं प्राप्त
कर पाता और बार-बार संसारमें जन्म लेता रहता
है। किंतु जो सदा ज्ञानशील, संयतचित्त और पवित्र
रहता है; बह तो उस परम पदको प्राप्त कर लेता
है, जहाँसे लौटकर पुन: जन्म धारण नहीं करना
पड्ता॥ ३७-३८ ॥
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न
और मनरूप लगामको वशमें रखनेवाला है, वह
संसारमार्गसे पार जो मेरा परम पद है; उसे प्राप्त कर
लेता है॥ ३९॥
१८६
इत्थं श्रुत्या च मत्या च निश्चित्यात्मानमात्मना ।
भावयेन्मामात्मरूपां निदिध्यासनतोऽपि च॥ ४०
योगवृत्तेः पुरा स्वस्मिन्भावयेदक्षरत्रयम्।
देवीप्रणवसंज्ञस्य ध्यानार्थं मन्त्रवाच्ययोः ॥ ४१
हकारः स्थूलदेहः स्याद्रकारः सूक्ष्मदेहकः ।
ईकारः कारणात्मासौ हींकारो5हं तुरीयकम्॥ ४२
एवं समष्टिदेहे$पि ज्ञात्वा बीजत्रयं क्रमात्।
समष्टिव्यष्ट्योरेकत्वं भावयेन्मतिमान्नरः ॥ ४३
समाधिकालात्पूर्व तु भावयित्वैवमादृतः ।
ततो ध्यायेन्निलीनाक्षो देवीं मां जगदीश्वरम्॥ ४४
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।
निवृत्तविषयाकाङ्क्षो वीतदोषो विमत्सरः ॥ ४५
भक्त्या निर्व्याजया युक्तो गुहायां निःस्वने स्थले।
हकारं विश्वमात्मानं रकारे प्रविलापयेत्॥ ४६
रकारं तैजसं देवमीकारे प्रविलापयेत्।
ईकारं प्राज्ञमात्मानं होंकारे प्रविलापयेत्॥ ४७
वाच्यवाचकताहीनं द्वैतभावविवर्जितम्।
अखण्डं सच्चिदानन्दं भावयेत्तच्छिखान्तरे॥ ४८
इति ध्यानेन मां राजन् साक्षात्कृत्य नरोत्तमः।
मद्रूप एव भवति द्वयोरप्येकता यतः ॥ ४९
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ३४
इस प्रकार [वेदान्त-] श्रवण तथा मननके द्वारा
अपने यथार्थ स्वरूपका निश्चय करके बार-बार
गम्भीर चिन्तन-मननके द्वारा मुझ परमात्मस्वरूपिणी
भगवतीकी भावना करनी चाहिये ॥ ४०॥
मन्त्र और अर्थके स्वरूपके सम्यक् ध्यानके
लिये सर्वप्रथम योगाभ्यासमें प्रतिष्ठित होकर देवीप्रणव
नामक मन्त्रके तीनों अक्षरोंकी अपने भीतर भावना
करनी चाहिये ॥ ४१॥
“हकार’ स्थूलदेह, ‘रकार’ सूक्ष्मदेह और
ईकार कारणदेह है । ‘हीं’ यह चतुर्थरूप स्वयं मैं हूँ।
इस प्रकार बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि समष्टि
शरीरमें भी क्रमशः तीनों बीजोंको समझकर समष्टि
और व्यष्टि-इन दोनों रूपोंकी एकताका चिन्तन
करे॥ ४२-४३॥
समाधिकालके पूर्व ही आदरपूर्वक इस
प्रकारकी भावना करके पुनः उसके बाद दोनों नेत्र
बन्दकर मुझ भगवती जगदीश्वरीका ध्यान करना
चाहिये ॥ ४४॥
उस समय साधकको चाहिये कि वह
किसी गुफा अथवा शब्दरहित एकान्त स्थानमें
आसीन होकर विषयभोगोंकी कामनासे रहित,
दोषमुक्त तथा ईर्ष्याशून्य रहते हुए और नासिकाके
भीतर विचरणशील प्राण तथा अपान वायुको समान
स्थितिमें करके निष्कपट भक्तिसे सम्पन्न होकर
विश्वात्मारूप हकारको रकारमें समाविष्ट करे
अर्थात् हकारवाच्य स्थूलदेहको रकारवाच्य सूक्ष्म-
देहमे लीन करे, तैजस देवस्वरूप रकारको
ईकारमें समाविष्ट करे अर्थात् रकारवाच्य तैजस—
सूक्ष्मदेहको ईकारवाच्य कारणदेहमें लीन करे
और प्राज्ञस्वरूप ईकारको हींकारमें समाविष्ट करे
अर्थात् ईकारवाच्य कारणदेहको हींकारवाच्य ब्रह्ममें
लीन करे॥ ४५—४७॥
तब वाच्य-वाचकसे रहित, समस्त द्वैतभावसे
परे अखण्ड सच्तिदानन्दकी भावना अपने शिखास्थान
(सहस्त्रार)-में करे। हे राजन्! इस प्रकारके ध्यानसे
श्रेष्ठ पुरुष मेरा साक्षात्कार करके मेरे ही रूपवाला
हो जाता है; क्योंकि दोनोंमें सदा एकता सिद्ध है। इस
अ० ३५]
सप्तम स्कन्ध
१८७
योगयुक्त्यानया दृष्ट्या मामात्मानं परात्परम्।
योगरीतिसे मुझ परमात्मरूप परात्पर भगवतीका दर्शन
करके साधक तत्क्षण कर्मसहित अपने अज्ञानका नाश
अज्ञानस्य सकार्यस्य तत्क्षणे नाशको भवेत्॥ ५० | करनेवाला हो जाता है॥ ४८—५०॥
इति श्रीमद्देवीभायवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां
ज्ञानस्य मोक्षहेतुत्ववर्णनं नाम चतुस््िशोऽध्यायः ॥ ३४॥
ASCO लत ला