Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा
जनमेजय उवाच
महिमा वर्णितः सम्यक्चणिडकायास्त्वया मुने।
केन चाराधिता पूर्व चरित्रत्रययोगतः॥ ९
प्रसन्ना कस्य वरदा केन प्राप्तं फलं महत्।
आराध्य कामदां देवीं कथयस्व कृपानिधे॥ २
उपासनाविधिं ब्रह्मास्तथा पूजाविधिं वद।
विस्तरेण महाभाग होमस्य च विधिं पुनः॥ ३
जनमेजय बोले-हे मुने! आपने भगवती
चण्डिकाको महिमाका भलीभाँति वर्णन किया।
अब आप यह बतानेको कृपा करें कि तीन
चरित्रोंका प्रयोग करके पहले किसने भगवतीकी
आराधना को थी ?॥ १॥
वे वरदायिनी भगवती किसके ऊपर प्रसन्न
हुई ? सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवीकी
उपासना करके किसने महान् फल प्राप्त किया? हे
कुपानिधान! यह सब बताइये ॥ २॥
हे ब्रह्मन! हे महाभाग! जगदम्बाकी
उपासनाविधि, पूजाविधि तथा हवनविधिका भी
विस्तारपूर्वक वर्णन कोजिये॥ ३॥
श्रीमद्देवीभागवत
[ अ० ३२
सूत उवाच
इति भूपवचः श्रुत्वा प्रीतः सत्यवतीसुतः ।
प्रत्युवाच नृपं कृष्णो महामायाप्रपूजनम्॥ ४
व्यास उवाच
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्व सुरथो नाम पार्थिबः।
बभूव परमोदारः प्रजापालनतत्परः॥ ५
सत्यवादी कर्मपरो ब्राह्ाणानाञ्च पूजकः।
गुरुभक्तिरतो नित्यं स्वदारगमने रतः॥ ६
दानशीलोऽविरोधी च नुर्वेदैकपारगः।
एवं पालयतो राज्यं म्लेच्छाः पर्वतवासिनः॥ ७
बलाच्छन्रुत्वमापन्नाः सैन्यं कृत्वा चतुर्विधम्।
हस्त्यश्वरथपादातिसहितास्ते मदोत्कटाः॥ ८
कोलाविध्वंसिनः प्राप्ताः पृथ्वीग्रहणतत्पराः।
सुरथः सैन्यमादाय सम्मुखः समपद्यत॥ ९
युद्धं समभवद् घोरं तस्य तैरतिदारुणैः।
म्लेच्छानां तु बलं स्वल्पं राज्ञस्तद्ठलमद्भुतम्॥ १०
तथापि तैर्जितो युद्धे दैवाद्राजा पराजितः।
भग्नश्च स्वपुरं प्राप्तः सुरक्षं दुर्गमण्डितम्॥ ११
चिन्तयामास मेधावी राजा नीतिविचक्षण: ।
प्रधानान्विमना दृष्ट्वा शत्रुपक्षसमाश्रितान्॥ १२
स्थानं गृहीत्वा विपुलं परिखादुर्गमणिडतम्।
कालप्रतीक्षा कर्तव्या किं वा युद्धं वरं मतम्॥ १३
मन्त्रिणः शत्रुवशगा मन्त्रयोग्या न ते किल।
किं करोमीति मनसा भूपतिः समचिन्तयत्॥ १४
कदाचित्ते गृहीत्वा मां पापाचाराः पराश्रिताः ।
शत्रुभ्योऽथ प्रदास्यन्ति तदा किं वा भविष्यति॥ १५
पापबुद्द्विषु विश्वासो न कर्तव्यः कदाचन।
किन ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा नराः॥ १६
भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा।
सूतजी बोले-राजाको यह बात सुनकर
सत्यवतीनन्दन कृष्णद्वैपायन प्रसन्न होकर उन्हें महामाया
भगवतीका पूजन-विधान बताने लगे॥ ४॥
व्यासजी बोले पूर्वकालमें स्वारोचिष-मन्वन्तरमें
सुरथ नामक एक राजा हुए; जो परम उदार,
प्रजापालनमें तत्पर, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ, ब्राह्मणोंके
उपासक, गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सदा
अपनी ही भार्यामें अनुरक्त, दानशील, किसीके
साथ विरोधभाव न रखनेवाले तथा धनुर्विद्यामें पूर्ण
पारंगत थे॥ ५-६३ ॥
इस प्रकार प्रजापालनमें तत्पर रहनेवाले राजा
सुरथसे कुछ पर्वतवासी म्लेच्छोंने अनायास ही शत्रुता
ठान ली। हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे
सुसञ्जित चतुरंगिणी सेना लेकर अभिमानमें चूर वे
कोलाविध्वंसी सुरथके राज्यपर अधिकार करनेकी
लालसासे वहाँ आ पहुँचे । सुरथ भी अपनी सेना लेकर
सामने डट गये। उन महाभयंकर म्लेच्छोंके साथ
राजा सुरथका भीषण युद्ध होने लगा॥ ७-९ ३॥
यद्यपि म्लेच्छोंकी सेना बहुत थोड़ी थी तथा
राजाको सेना अत्यन्त विशाल थी, फिर भी दैवयोगसे
उन्होंने राजा सुरथको युद्धमें जीत लिया। इस प्रकार
उनसे पराजित हुए राजा सुरथ हताश होकर अपने
दुर्गवेष्टित सुरक्षित नगरमें आ गये॥ १०-११॥
तत्पश्चात् प्रतिभासम्पन्न तथा नीतिविशारद राजा
सुरथ अपने मन्त्रियोंको शत्रुपक्षके अधीन देखकर
अत्यन्त खिन्नमनस्क होकर विचार करने लगे कि मैं
खाई तथा किलेसे सुरक्षित किसी बड़े स्थानपर रहकर
समयकी प्रतीक्षा करूँ अथवा मेरे लिये युद्ध करना
उचित होगा। मेरे मन्त्री शत्रुके वशीभूत हो गये हैं,
इसलिये वे अब परामर्श करनेयोग्य नहीं रह गये हैं,
तो अब मैं क्या करूँ ? वे राजा सुरथ पुन: मन-ही-
मन विचार करने लगे। कदाचित् वे पापी तथा शत्रुके
साथ मिले हुए मन्त्री मुझे पकड़कर शत्रुओंको सौंप
| देंगे, तब क्या होगा? पापबुद्धि पुरुषॉपर कभी भी
विशवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो मनुष्य
लोभके वशीभूत होते हैं वे क्या-क्या नहीं कर बैठते ?
| लोभपरायण मनुष्य अपने भाई, पिता, मित्र, सुहृद्,
अ० ३२]
पञ्चम स्कन्ध
७०५
——्———्—oo््््््
गुरु पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्टः सदा नरः॥ ९७
तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वासः सर्वथाधुना।
मन्त्रिवर्गेऽतिपापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्चिते॥ १८
इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा परमदुर्मनाः ।
एकाकी हयमारुह्य निर्जगाम पुरात्ततः॥ १९
असहायोऽथ निर्गत्य गहनं वनमाश्रितः।
चिन्तयामास मेधावी क्व गन्तव्यं मया पुनः॥ २०
योजनत्रयमात्रे तु मुनेराश्रममुत्तमम्।
ज्ञात्वा जगाम भूपालस्तापसस्य सुमेधसः॥ २१
बहुवृक्षसमायुक्तं नदीपुलिनसंश्रितम्।
निर्वैरशवापदाकीर्ण कोकिलारावमण्डितम्॥ २२
शिष्याध्ययनशब्दाढ्यं मृगयूथशतावृतम्।
नीवारान्नसुपक्वाढ्यं सुपुष्पफलपादपम्॥ २३
होमधूमसुगन्धेन प्रीतिदं प्राणिनां सदा।
वेदध्वनिसमाक्रान्तं स्वर्गादपि मनोहरम्॥ २४
दृष्ट्वा तमाश्रमं राजा बभूवासौ मुदान्वितः।
भयं त्यक्त्वा मतिं चक्रे विश्रामाय द्विजाश्रमे॥ २५
आसज्य पादपेऽश्वं तु जगाम विनयान्वितः।
दृष्ट्वा तं मुनिमासीनं सालच्छायासु संश्रितम्॥ २६
मृगाजिनासनं शान्तं तपसातिकृशं ऋजुम्।
अध्यापयन्तं शिष्यांश्च वेदशास्त्रार्थदर्िनम्॥ २७
रहितं क्रोधलोभाद्यैनद्वातीतं विमत्सरम्।
आत्मज्ञानरतं सत्यवादिनं शमसंयुतम्॥ २८
तं वीक्ष्य भूपतिर्भूमौ पपात दण्डवत्तदा।
तदग्रेऽश्रुजलापूर्णनयनः प्रेमसंयुतः॥ २९
1897 श्रीमद्देवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड 1---23 ^
बन्धु-बान्धव, पूजनीय गुरु तथा ब्राह्मणसे भी सदा
द्वेष करता है। अतएव इस समय शत्रुपक्षके आश्रयको
प्राप्त अत्यन्त पापपरायण अपने मन्त्रिसमुदायपर मुझे
बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिये॥ १२—१८॥
इस प्रकार अपने मनमें भलीभाँति विचार करके
अत्यन्त दुःखीचित्त राजा सुरथ घोड़ेपर आरूढ होकर
अकेले ही उस नगरसे निकल पड़े॥ १९॥
वे बिना किसी सहायकको साथ लिये ही नगरसे
बाहर निकलकर एक घने जंगलमें चले गये।
प्रतिभासम्पन्न राजा सुरथ सोचने लगे कि अब मुझे
कहाँ चलना चाहिये ?॥ २०॥
तपस्वी सुमेधाका पवित्र आश्रम यहाँसे मात्र
तीन योजनकौ दूरीपर है-यह जानकर राजा सुरथ
वहाँ चले गये॥ २१॥
बहुत प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, नदीके तटपर
विराजमान, वैरभावसे रहित होकर विचरण करनेवाले
पशुओंसे समन्वित, कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे मण्डित,
अध्ययनरत शिष्योंके स्वरसे निनादित, सैकड़ों मृगसमूहोंसे
घिरे हुए, भलीभाँति पके हुए नीवारान्नसे परिपूर्ण,
सुन्दर फल-फूलसे लदे हुए पादपोंसे सुशोभित,
होमके सुगन्धित धूमसे प्राणियोंको सदा आनन्दित
करनेवाले, निरन्तर वेदध्वनिसे परिव्याप्त तथा स्वर्गसे
भी मनोहर उस आश्रमको देखकर वे राजा अत्यन्त
आनन्दित हुए और उन्होंने भय त्यागकर मुनिके आश्रममें
विश्राम करनेका निश्चय कर लिया॥ २२-२५ ॥
तत्पश्चात् अपने घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर
उन्होंने विनम्रतापूर्वक आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ
उन्होंने देखा कि मुनि एक सालवुक्षकी छायामें
मृगचर्मके आसनपर बैठे हुए हैं, उनकी आकृति शान्त
है, तपस्या करनेके कारण उनका शरीर क्षीण हो गया
है, उनका स्वभाव अति कोमल है, वे शिष्योंको पढ़ा
रहे हैं, वे वेद-शास्त्रोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, क्रोध-
लोभ आदि विकारोंसे मुक्त हैं, सुख-दुःख आदि
इन्द्दोंसे परे हैं, ईर्ष्यारहित हैं, आत्मज्ञानके चिन्तनमें
संलग्न हैं, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय हैं । उन्हें देखकर
अश्रुपूरित नयनोंवाले राजा सुरथ प्रेमपूर्वक उनके आगे
दण्डकी भाँति भूतलपर गिर पड़े॥ २६-२९ ॥
७०६
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनि: ।
शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा॥ ३०
उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया।
अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम्॥ ३१
पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम्।
कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह॥ ३२
किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम्।
करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव॥ ३३
राजोवाच
सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः।
त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः॥ ३४
यदाज्ञापयसे ब्रहाांस्तदहं भक्तितत्परः ।
करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले ॥ ३५
शत्रुभ्यो मे भयं घोरे प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम् ।
त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल॥ ३६
ऋषिरुवाच
निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल।
आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात्॥ ३७
नात्र हिंसा प्रकर्तव्या बनवृत्त्या नृपोत्तम।
कर्तव्यं जीवनं शस्तैनीवारफलमूलकैः॥ ३८
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा।
उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचि: ॥ ३९
कदाचित्स नुपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्चितः।
चिन्तयामास चिन्तातो गृह एव गताशयः॥ ४०
राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा।
सम्पीडिता: स्युर्लोकास्तै्दुरा चारैर्गतत्रपैः ॥ ४९
1897 श्रीमद्देवी… महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 8
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३२
तब मुनिने उनसे कहा-उठिये-उठिये, आपका
कल्याण हो। तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक
शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया॥ ३०॥
तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर
बैठ गये। इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य-पाद्य आदिसे
उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। मुनिने उनसे पूछा
कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा
चिन्तित क्यों हैं ? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे
आप यथारुचि बतायें। आपके आगमनका प्रयोजन
क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य
बताइये। आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे
भी मैं पूर्ण करूँगा॥ ३१-३३॥
राजा बोले—में सुरथ नामवाला राजा हूँ । शत्रुओंसे
पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री-सब कुछ
छोड़कर आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ३४॥
हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे,
मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा। इस पृथ्वीतलपर आपके
अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है॥ ३५॥
हे मुनिराज ! हे शरणागतवत्सल ! शत्रुओंसे मुझे
महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया
हूँ; अब आप मेरी रक्षा कोजिये॥ ३६॥
ऋषि बोले—हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ
रहिये। यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे
आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे॥ ३७॥
हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं
करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार
तथा ‘फल-मूल आदिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना
चाहिये ॥ ३८ ॥
व्यासजी बोले तब मुनिको यह बात सुनकर राजा
सुरथ निर्भय हो गये । अब वे फल-मूलका आहार करते
हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे ॥ ३९ ॥
किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षको छायामें
बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरको ओर
चला गया और वे सोचने लगे ॥ ४०॥
निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने
मेरा राज्य छीन लिया है। उन दुराचारी तथा निर्लज्ज
म्लेच्छौंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी ॥ ४१॥
आ० ३२]
पञ्चम स्कन्ध
So
गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः।
जाताः स्युर्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः॥ ४२
सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां बशवर्तिनः।
दुःखिता एव जाता: स्युः पालिता ये मया पुरा॥ ४३
धनं मे सुदुराचारैरसद्ठ्ययपरैः परे: ।
द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल॥ ४४
कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः ।
न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे ॥ ४५
इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा।
तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा॥ ४६
नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः।
पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम्॥ ४७
कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः ।
ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता॥ ४८
व्यास उवाच
तच्छुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः।
उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम् ॥ ४९
वैश्य उवाच
मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः।
धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः ॥ ५०
पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्यैरसाधुभिः ।
( कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम्। )
स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै॥ ५९
कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना।
1897 श्रीमहेवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 ©
मेरे सभी हाथी तथा घोडे आहार न पाने तथा
शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो
गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है॥ ४२॥
अपने जिन सेवकोंका मैंने पहले पालन-पोषण
किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण
कष्टका अनुभव करते होंगे॥ ४३॥
उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके
स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं
वेश्यालयोंमें निश््चित-रूपसे खर्च कर दिया होगा ॥ ४४॥
वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट
कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन
म्लेच्छौंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें
रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे॥ ४५ ॥
महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें
पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ
आ पहुँचा ॥ ४६॥
राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया। उन्होंने
उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुन: उससे
पूछा-आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं ?
आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त
रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे
महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री
समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-
सच बता दीजिये॥ ४७-४८॥
व्यासजी बोले-राजाका वचन सुनकर वह
वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम
समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा॥ ४९॥
वैश्य बोला—हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें
उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं
धनवान्, धर्मकार्योमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे
रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल
स्त्री-पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया (उन्होंने मुझे
कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेबाला माया-बन्धन
भी तोड़ दिया), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त
होकर मैं अभी-अभी इस वनमें आया हूँ। हे प्रिय!
आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत
होते हैं ॥ ५०-५१३ ॥
राजोवाच
सुरथो नाम राजाहं दस्युभिः पीडितोऽभवम्॥ ५२
प्राप्तोऽस्मि गतराज्योऽत्र मन्त्रिभिः परिवञ्चितः ।
दिष्ट्या त्वमत्र मित्रं मे मिलितोऽसि विशोत्तम॥ ५३
सुखेन विहरिष्यावो वनेऽत्र शुभपादपे।
शोकं त्यज महाबुद्धे स्वस्थो भव विशोत्तम॥ ५४
( अत्रैव च यथाकामं सुखं तिष्ठ मया सह। )
वैश्य उवाच
कुटुम्बं मे निरालम्बं मया हीनं सुदु:खितम्।
भविष्यति च चिन्तार्त व्याधिशोकोपतापितम्॥ ५५
भायदिहे सुखं नो वा पुत्रदेहे न वा सुखम्।
इति चिन्तातुरं चेतो न मे शाम्यति भूमिप॥ ५६
कदा द्रक्ष्ये सुतं भार्या गृहं स्वजनमेव च।
स्वस्थं न मन्मनो राजन् गृहचिन्ताकुलं भृशम्॥ ५७
राजोवाच
यैर्निरस्तोऽसि पुत्राद्यैरसदवृत्तैः सुबालिशैः ।
तान्दृष्ट्वा किं सुखं तेऽद्य भविष्यति महामते॥ ५८
हितकारी वरः शत्रुर्दःखदाः सुहृदः कुतः।
तस्मात्स्थिरं मनः कृत्वा विहरस्व मया सह॥ ५९
वैश्य उवाच
मनो मे न स्थिरं राजन् भवत्यद्य सुदुःखितम्।
चिन्तयात्र कुटुम्बस्य दुस्त्यजस्य दुरात्मभिः ॥ ६०
राजोवाच
ममापि राज्यजं दुःखं दुनोति किल मानसम्।
पृच्छाबोऽद्य मुनिं शान्तं शोकनाशनमौषधम्॥ ६९
व्यास उवाच
इति कृत्वा मतिं तौ तु राजा वैश्यश्च जग्मतुः ।
मुनिं तौ विनयोपेतौ प्रष्टुं शोकस्य कारणम्॥ ६२
1897 श्रीमद्देवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 0
श्रीमहेबी भागवत
[अ० ३२
राजा बोले—मैं सुरथ नामका राजा हूँ, मैं
दस्युओंसे पीडित हूँ। मन्त्रियोंके द्वारा ठगे जानेके
कारण राज्यविहीन होकर मैं यहाँ आया हूँ। हे
वैश्यश्रेष्ठ! भाग्यवश आप मुझे यहाँ मित्रके रूपमें
मिल गये हैं। अब हम दोनों सुन्दर वृक्षोंसे
युक्त इस वनमें विहार करेंगे। हे महाबुद्धिमान्
वैश्यश्रेष्ठ! चिन्ता छोडिये और प्रसन्नचित्त होइये
(अब आप मेरे साथ यहींपर इच्छानुसार सुखपूर्वक
रहिये) ॥ ५२-५४॥
वैश्य बोला—मेरा परिवार आश्रयरहित है,
मेरे बिना परिवारके लोग अत्यन्त दुःखी होंगे।
मेरे बारेमें चिन्ता करते हुए वे रोग तथा शोकसे
व्याकुल हो जायँगे॥ ५५ ॥
हे राजन्! मेरी पत्नी तथा पुत्र शारीरिक सुख
पा रहे होंगे अथवा नहीं, इसी चिन्तासे व्याकुल
रहनेके कारण मेरा मन शान्त नहीं रह पाता॥ ५६॥
हे राजन्! मैं पुत्र, पत्नी, घर और स्वजनोंको
कब देख सकूँगा ? गृहकी चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल
मेरा मन स्वस्थ नहीं हो पाता है ॥ ५७॥
राजा बोले—हे महामते! जिन दुराचारी तथा
महामूर्ख पुत्र आदिके द्वारा आप घरसे निकाल दिये
गये, उन्हें देखकर अब आपको कौन-सा सुख
मिलेगा ? दुःख देनेवाले सुहृदोंको अपेक्षा सुख देनेवाला
शत्रु श्रेष्ठ है; अतः अपने मनको स्थिर करके आप
मेरे साथ आनन्द कोजिये॥ ५८-५९॥
वैश्य बोला-हे राजन्! दुर्जनोंके द्वारा भी
अत्यन्त कठिनतासे त्यागे जानेवाले कुटुम्बकी चिन्तासे
अत्यन्त दुःखित मेरा मन इस समय स्थिर नहीं हो पा
रहा है॥ ६०॥
राजा बोले-राज्यसम्बन्धी चिन्ता मेरे मनको
भी दुःखी करती रहती है। अतः अब हम दोनों
शान्त प्रकृतिवाले मुनिसे शोकके नाशको औषधि
पूछें ॥ ६१॥
व्यासजी बोले एसा विचार करके राजा और
वैश्य-दोनों ही अत्यन्त विनम्र होकर शोकका कारण
पूछनेके लिये मुनिके पास गये॥ ६२॥
अ० ३३]
पञ्चम स्कन्ध ७०९
गत्वा तं प्रणिपत्याह राजा ऋषिमनुत्तमम्।
वहाँ जाकर राजा सुरथ आसन लगाकर
शान्त बैठे हुए मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके स्वयं
भी सम्यक् रूपसे आसनपर बैठकर शान्तिपूर्वक
आसीनं सम्यगासीनः शान्तं शान्तिमुपागतः॥ ६३ | उनसे कहने लगे॥ ६३॥
इति श्रीमहदेवी भागवते महाषुराणेऽष्टादशसाहस्त्रथां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधि-
वैश्ययोर्मुनिसमीपे गमनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥
“AD 1 शिटापत
अथ त्रयस्त्रिशो 5 ध्याय:
मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना
राजोवाच
मुने वैश्योड्यमधुना वने मे मित्रतां गत: ।
पुत्रदारैर्निरस्तोऽयं प्राप्तोऽत्र मम सडुमम्॥
( कुटुम्बविरहेणासौ दुःखितोऽतीव दुर्मना: ।
न शान्तिमुपयात्येष तथापि मम साम्प्रतम्।
गतराज्यस्य दुःखेन शोकार्तोऽस्मि महामते। )
निष्कारणञ्च मे चिन्ता हृदयान्न निवर्तते।
हया मे दुर्बलाः स्युः किं गजाः शत्रुवशं गता: ॥
भृत्यवर्गस्तथा दुःखी जातः स्यात्तु मया विना।
कोशक्षयं करिष्यन्ति रिपबोऽतिबलात्क्षणात्॥
इत्येवं चिन्तयानस्य न मे निद्रा तनौ सुखम्।
जानामीदं जगन्मिथ्या स्वप्नवत्सर्वमेव हि॥
जानतोऽपि मनो भ्रान्तं न स्थिरं भवति प्रभो ।
कोऽहं केऽश्वा गजाः केऽमी न ते मे च सहोदरा: ॥
न पुत्रा न च मित्राणि येषां दुःखं दुनोति माम्।
भ्रमोऽयमिति जानामि तथापि मम मानसः॥
मोहो नैवापसरति किं तत्कारणमद्भुतम्।
स्वामिंस्त्वमसि सर्वज्ञः सर्वसंशयनाशकृत्॥
कारणं ब्रूहि मोहस्य ममास्य च दयानिधे।
व्यास उवाच
इति पृष्टस्तदा राज्ञा सुमेधा मुनिसत्तमः॥
तमुवाच परं ज्ञानं शोकमोहविनाशनम्।
राजा बोले-हे मुने! ये वैश्य हैं, आज ही
वनमें इनसे मेरी मित्रता हुई है। पत्नी और पुत्रोंने इन्हें
निकाल दिया है और अब यहाँ इन्हें मेरा साथ प्राप्त
हुआ है॥ १॥
(परिवारके वियोगसे ये अत्यन्त दु:खी और
विक्षुन्ध हैं; इन्हें शान्ति नहीं मिल पा रही है और इस
समय मेरी भी ऐसी ही स्थिति है। हे महामते! राज्य
चले जानेके दु:खसे मैं शोकसन्तप्त हूँ।) व्यर्थकी यह
चिन्ता मेरे हृदयसे निकल नहीं रही है-मेरे घोड़े
दुर्बल हो गये होंगे और हाथी शत्रुओंके अधीन हो
गये होंगे। उसी प्रकार सेवकगण भी मेरे बिना दु:खी
रहते होंगे। शत्रुगण राजकोशको क्षणभरमें बलपूर्वक
रिक्त कर देंगे॥ २-३॥
इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे न निद्रा आती
है और न मेरे शरीरको सुख मिलता है। मैं जानता
हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी भाँति मिथ्या है,
किंतु हे प्रभो! यह जानते हुए भी मेरा भ्रमित मन
स्थिर नहीं होता। में कौन हूँ? ये हाथी-घोड़े कौन
हैं ? ये मेरे कोई सगे-सम्बन्धी भी नहीं हैं। न ये मेरे
पत्र हैं, और न मेरे मित्र हैं, जिनका दु:ख मुझे पीडित
कर रहा है। मैं जानता हूँ कि यह भ्रम है, फिर भी
मेरे मनसे सम्बन्ध रखनेवाला मोह दूर नहीं होता, यह
बड़ा ही अद्भुत कारण है! हे स्वामिन्! आप सर्वज्ञ
और सभी संशयोंका नाश करनेवाले हैं, अतः हे
दयानिधे! मेरे इस मोहका कारण बतायें ॥ ४-७३ ॥
व्यासजी बोले-तब राजाके ऐसा पूछनेपर
मुनिश्रेष्ठ सुमेधा उनसे शोक और मोहका नाश
करनेवाले परम ज्ञानका वर्णन करने लगे॥ ८३ ॥
७१०
ऋषिरुवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कारणं बन्धमोक्षयोः॥ ९
महामायेति विख्याता सर्वेषां प्राणिनामिह।
ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानस्तुराषाड् वरुणोऽनिलः॥ १०
सर्वे देवा मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः।
बृक्षाश्च विविधा वल्ल्यः पशवो मृगपक्षिणः ॥ ९१
मायाधीनाश्च ते सर्वे भाजनं बन्धमोक्षयोः ।
तया सृष्टमिदं सर्व॑ जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ १२
तद्ृशे वर्तते नूनं मोहजालेन यन्त्रितम्।
त्वं कियान्मानुषेष्वेकः क्षत्रियो रजसाविलः॥ ९३
ज्ञानिनामपि चेतांसि मोहयत्यनिशं हि सा।
ब्रह्मोशवासुदेवाद्या ज्ञाने सत्यपि शेषतः॥ १४
तेऽपि रागवशाल्लोके भ्रमन्ति परिमोहिताः।
पुरा सत्ययुगे राजन् विष्णुर्नारायणः स्वयम्॥ १५
श्वेतद्वीपं समासाद्य चकार विपुलं तपः।
वर्षाणामयुतं यावद् ब्रह्मविद्याप्रसक्तये॥ ९६
अनश्वरसुखायासौ चिन्तयानस्ततः परम्।
एकस्मिन्निर्जने देशे ब्रह्मापि परमाद्भुते॥ १७
स्थितस्तपसि राजेन्द्र मोहस्य विनिवृत्तये।
कदाचिद्वासुदेवोऽसौ स्थलान्तरमतिर्हरिः॥ १८
तस्माह्देशात्समुत्थाय जगामान्यददिदृक्षया।
चतुर्मुखोऽपि राजेन्द्र तथैव निःसृतः स्थलात्॥ १९
मिलितौ मार्गमध्ये तु चतुर्मुखचतुर्भुजौ।
अन्योन्यं पृष्टवन्तौ तौ कस्त्वं कस्त्वमिति स्म ह॥ २०
ब्रह्मा प्रोवाच तं देवं कर्ताहं जगतः किल।
विष्णुस्तमाह भो मूर्ख जगत्कर्ताहमच्युतः॥ २९
त्वं कियान्बलहीनोऽसि रजोगुणसमाश्रितः।
सत्त्वाश्रितं हि मां विद्धि वासुदेवं सनातनम्॥ २२
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३३
ऋषि बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं बताता हूँ।
महामायाके नामसे विख्यात वे भगवती ही सभी
प्राणियोंके बन्धन और मोक्षकी कारण हैं। ब्रह्मा,
विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, पवन आदि सभी देवता,
मनुष्य, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, वृक्ष, विविध लताएँ,
पशु, मृग और पक्षी-ये सब मायाके आधीन हैं
और बन्धन तथा मोक्षके भाजन हैं । उन महामायाने
ही इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत्को सृष्टि को
है। जब यह जगत् सदा उन्हींके अधीन रहता है
और मोहजालमें जकड़ा हुआ है, तब आप किस
गणनामें हैं? आप तो मनुष्यांमें रजोगुणसे युक्त एक
क्षत्रियमात्र हैं॥ ९-१३॥
वे महामाया ज्ञानियोंको बुद्धिको भी सदा
मोहित किये रहती हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि
परम ज्ञानी होते हुए भी रागके वशीभूत होकर
व्यामोहमें पड़ जाते हैं और संसारमें चक्कर काटा
करते हैं ॥ १४३ ॥
हे राजन्! प्राचीन कालमें स्वयं उन भगवान्
नारायणने ब्रह्मविद्याको प्राप्ति तथा अविनाशी सुखके
लिये श्वेतद्वीपमें जाकर ध्यान करते हुए दस
हजार वर्षोतक घोर तपस्या की थी। हे राजेन्द्र!
इसके साथ ही मोहकी निवृत्तिके लिये एक निर्जन
प्रदेशमें ब्रह्माजी भी परम अद्भुत तपस्यामें संलग्न
हो गये॥ १५-१७३ ॥
हे राजेन्द्र! किसी समय वासुदेव भगवान् श्रीहरिने
दूसरे स्थानपर जानेका विचार किया और वे उस
स्थानसे उठकर अन्य स्थलको देखनेकी इच्छासे चल
दिये। ब्रह्माजी भी उसी प्रकार अपने स्थानसे निकल
पड़े । चतुर्मुख ब्रह्माजी और चतुर्भुज भगवान् विष्णु
मार्गमें मिल गये। तब वे दोनों एक-दूसरेसे पूछने
लगे-तुम कौन हो, तुम कौन हो ?॥ १८-२०॥
ब्रह्माजी भगवान् विष्णुसे बोले-में जगतका
स्रष्टा हूँ। तब विष्णुने उनसे कहा-हे मूर्ख! अपनी
महिमासे कभी च्युत न होनेवाला मैं विष्णु ही
जगतका कर्ता हूँ। तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम
तो रजोगुणयुक्त और बलहीन हो! मुझे सत्त्वगुणसम्पन्न
सनातन नारायण जानो॥ २१-२२ ॥
अ० ३३]
पञ्चम स्कन्ध
७११
मया त्वं रक्षितोऽद्चैव कृत्वा युद्धं सुदारुणम् ।
शरणं मे समायातो दानवाभ्यां प्रपीडितः॥ २३
मया तौ निहतौ कामं दानवौ मधुकैटभौ।
कथं गर्वायसे मन्द मोहोऽयं त्यज साम्प्रतम् ॥ २४
न मत्तोऽप्यधिकः कश्चित्संसारेऽस्मिन्प्रसारिते ।
ऋषिरुवाच
एवं प्रवदमानौ तौ ब्रह्मविष्णू परस्परम्॥ २५
स्फुरदोष्ठौ वेपमानौ लोहिताक्षौ बभूवतुः ।
प्रादुर्बभूव सहसा तयोर्विवदमानयोः॥ २६
मध्ये लिङ्गं सुधाश्वेतं विपुलं दीर्घमद्भुतम्।
आकाशे तरसा तत्र वागुवाचाशरीरिणी ॥ २७
तौ सम्बोध्य महाभागौ विवदन्तौ परस्परम्।
ब्रह्मन् विष्णो विवादं मा कुरुतां वां परस्परम्॥ २८
लिङ्गस्यास्य परं पारमधस्तादुपरि ध्ुवम्।
यो याति युवयोर्मध्ये स श्रेष्ठो वां सदैव हि॥ २९
एकः प्रयातु पातालमाकाशमपरोऽधुना।
प्रमाणं मे वचः कार्य त्यक्त्वा वादं निरर्थकम्॥ ३०
मध्यस्थः सर्वदा कार्यो विवादेऽस्मिन्द्रयोरिह।
ऋषिरुवाच
तच्छुत्वा वचनं दिव्यं सज्जीभूतौ कृतोद्यममौ॥ ३१
जग्मतुर्मातुमग्रस्थं लिङ्गमद्भतदर्शनम्।
पातालमगमद्विष्णुर्ब्रह्माप्याकाशमेव च॥ ३२
परिमातुं महालिङ्गं स्वमहत्त्वविवृद्धये।
विष्णुर्गत्वा कियददेशं श्रान्तः सर्वात्मना यतः॥ ३३
न प्रापान्तं स लिङ्गस्य परिवृत्य ययौ स्थलम्।
ब्रह्मागच्छत्ततश्चोर्ध्वं पतितं केतकीदलम्॥ ३४
शिवस्य मस्तकात्प्राप्य परावृत्तो मुदावृतः।
आगत्य तरसा ब्रह्मा विष्णवे केतकीदलम्॥ ३५
दर्शयित्वा च वितथमुवाच मदमोहितः ।
लिङ्गस्य मस्तकादेतद् गृहीतं केतकीदलम्॥ ३६
अभिज्ञानाय चानीतं तव चित्तप्रशान्तये।
दोनों दानवों (मधु-कैटभ)-के द्वारा पीड़ित
किये जानेपर तुम मेरी ही शरणमें आये थे, उस समय
अत्यन्त भीषण युद्ध करके मैंने तुम्हारी रक्षा की । मैंने
ही उन मधु-कैटभ दानवोंका वध किया है, अत: हे
मन्दबुद्धि ! तुम क्यों गर्व करते हो ? यह तुम्हारा अज्ञान
है, इसका शीघ्र त्याग कर दो; क्योंकि इस सम्पूर्ण
संसारमें मुझसे बढ़कर कोई नहीं है॥ २३-२४६ ॥
ऋषि बोले—इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए
उन दोनों—ब्रह्मा-विष्णुके ओठ फड़कने लगे, वे क्रोधमें
काँपने लगे और उनकी आँखें रक्तवर्ण हो गयीं। तभी
विवादरत उन दोनोंके मध्य अचानक एक श्वेतवर्ण,
अत्यन्त विशाल तथा अद्भुत लिंग प्रकट हो गया । तदनन्तर
विवाद करते हुए उन दोनों महानुभावोंको सम्बोधित
करके आकाशवाणी हुई-हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! तुम
दोनों परस्पर विवाद मत करो ॥ २५-२८॥
इस लिंगके ऊपरी या निचले छोरका आप
दोनोंमेंसे जो पता लगा लेगा, आप दोनोंमें बह सदैवके
लिये श्रेष्ठ हो जायगा। इसलिये मेरी वाणीको प्रमाण
मानकर तथा इस निरर्थक विवादका त्यागकर
आपलोगोंमेंसे एक आकाश और दूसरा पातालकी
ओर अभी जाय। इस विवादमें आप दोनोंको एक
मध्यस्थ भी अवश्य कर लेना चाहिये॥ २९-३०३ ॥
ऋषि बोले-उस दिव्य वाणीको सुनकर वे
दोनों चेष्टापूर्वक उद्यम करनेके लिये तैयार हो गये
और अपने समक्ष स्थित उस देखनेमें अद्भुत लिंगको
मापनेके लिये चल पड़े। अपने-अपने महत्त्वकी
वृद्धिके लिये उस महालिंगको नापनेहेतु विष्णु पातालकी
ओर और ब्रह्मा आकाशकी ओर गये॥ ३१-३२३ ॥
कुछ दूरतक जानेपर विष्णु पूर्णरूपसे थक गये।
वे लिंगका अन्त नहीं प्राप्त कर सके और तब उसी
स्थलपर वापस लौट आये । ब्रह्माजी ऊपरकी ओर गये
और शिवके मस्तकसे गिरे हुए केतकी पुष्पको लेकर
वे भी प्रसन्न हो लौट आये॥ ३३-३४३ ॥
तब अहंकारसे मोहित ब्रह्मा शीघ्रतापूर्वक आकर
विष्णुको केतकी पुष्प दिखाकर यह झूठ बोलने लगे
कि मैंने यह केतकी पुष्प इस लिंगके मस्तकसे प्राप्त
किया है। आपके चित्तकी शान्तिके लिये पहचानचिह्नके
। रूपमें मैं इसे लेता आया हँ ॥ ३५-३६३ ॥
७१२
श्रुत्वा तद् ब्रह्मणो वाक्यं दृष्ट्या च केतकीदलम्॥ ३७
हरिस्तं प्रत्युवाचेदं साक्षी कः कथयाधुना।
यथार्थवादी मेधावी सदाचारः शुचि: समः॥ ३८
साक्षी भवति सर्वत्र विवादे समुपस्थिते।
ब्रह्मोवाच
दूरदेशात्समायाति साक्षी कः समयेऽधुना॥ ३९
यत्सत्यं तद्ृचः सेयं केतकी कथयिष्यति।
इत्युक्त्वा प्रेरिता तत्र ब्रह्मणा केतकी स्फुटम्॥ ४०
वचनं प्राह तरसा शार्ङ्गिणं प्रत्यबोधयत्।
शिवमूर्ध्नि स्थितां ब्रह्मा गृहीत्वा मां समागतः ॥ ४९
सन्देहोऽत्र न कर्तव्यस्त्वया विष्णो कदाचन।
मम वाक्यं प्रमाणं हि ब्रह्मा पारङ्कतोऽस्य ह॥ ४२
गृहीत्वा मां समायातः शिवभक्तैः समर्पिताम्।
केतक्या वचनं श्रुत्वा हरिराह स्मयन्निव ४३
महादेवः प्रमाणं मे यद्यसौ वचनं वदेत्।
ऋषिरुवाच
तदाकर्ण्य हरेर्वाक्यं महादेवः सनातन: ॥ ४४
कुपितः केतकं प्राह मिथ्यावादिनि मा वद।
गच्छतो मध्यतः प्राप्ता पतिता मस्तकान्मम॥ ४५
मिथ्याभिभाषिणी त्यक्ता मया त्वं सर्वदैव हि।
ब्रह्मा लज्जापरो भूत्वा ननाम मधुसूदनम्॥ ४६
शिवेन केतकी त्यक्ता तहिनात्कुसुमेषु वै।
एवं मायाबलं विद्धि ज्ञानिनामपि मोहदम्॥ ४७
अन्येषां प्राणिनां राजन् का वार्ता विभ्रमं प्रति।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वदैव रमापतिः॥ ४८
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३३
ब्रह्माजीके उस वचनको सुनकर और केतकी
पुष्पको देखकर विष्णुने उनसे कहा-इसका साक्षी
कौन है, बताइये। किसी विवादके उपस्थित होनेपर
किसी सत्यवादी, बुद्धिमान्, सदाचारी, पवित्र और निष्पक्ष
व्यक्तिको साक्षी बनाया जाता है॥ ३७-३८३ ॥
ब्रह्माजी बोले इस समय इतने दूर देशसे कौन
साक्षी आयेगा? जो सत्य बात है, उसे यह केतकी
स्वयं कह देगी॥ ३९३ ॥
ऐसा कहकर ब्रह्माजीने केतकोको [साक्ष्यके
लिये] प्रेरित किया। तब उसने शीघ्रतापूर्वक विष्णुको
सम्बोधित करते हुए कहा कि शिव (लिंग)-के
मस्तकपर स्थित मुझे ब्रह्माजी बहाँसे लेकर आये हैं।
हे विष्णो ! इसमें आपको किसी प्रकारका सन्देह नहीं
करना चाहिये। ब्रह्माजी इस लिंगके पार गये हैं और
शिवभक्तोंके हारा समर्पित को गयी मुझको लेकर आये
हैं-यह मेरा कथन ही प्रमाण है॥ ४०-४२३ ॥
केतकोकी बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकरात
हुए बोले कि मेरे लिये तो महादेव ही प्रमाण हैं। यटि
वे ऐसी बात बोल दें तो मैं मान लूँगा॥ ४३३ ॥
ऋषि बोले—तब विष्णुकी बात सुनकर सनातन
भगवान् महादेवने क्रुद्ध होकर केतकीसे कहा-
असत्यभाषिणि! ऐसा मत बोलो। मेरे मस्तकसे गिरी
हुई तुझे ब्रह्मा बीचमें ही पा गये थे। तुमने झूठ बोल
है, इसलिये अब मैंने सदैवके लिये तुम्हारा त्याग कर
दिया। तब ब्रह्माजीने लञ्जित होकर भगवान् विष्णुको
नमस्कार किया। उसी दिनसे शिवद्वारा पुष्पॉमेंस
केतकीका त्याग कर दिया गया॥ ४४-४६३ ॥
हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मायाक
बल ज्ञानियोंको भी मोहमें डाल देता है, तब दूसो
प्राणियोंके मोहित हो जानेकी क्या बात? स्वर
देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु देवताओंके कायंळ
सिद्धिके लिये पापका भय छोड़कर दैत्योंके साथ छत
करते रहते हैं । वे ऐश्वर्यसम्मन्न भगवान् माधव अपर
सुख और आनन्दको त्यागकर विविध योनियं
अवतार लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करते हैं। देवताओळ
कार्यहेतु अंशावतार ग्रहण करनेवाले सर्वज्ञ तध
टटका
अ० ३३]
दैत्यान्वञ्चयते चाशु त्यक्त्वा पापभयं हरि: ।
अवतारकरो देवो नानायोनिषु माधव: ॥ ४९
त्यक्त्वानन्दसुखं दैत्यैर्युद्धं चैवाकरोद्विभुः।
नूनं मायाबलं चैतन्माधवेऽपि जगदगुरौ॥ ५०
सर्वज्ञे देवकार्याशे का वार्तान्यस्य भूपते।
ज्ञानिनामपि चेतांसि परमा प्रकृतिः किल॥ ५१
बलादाकृष्य मोहाय प्रयच्छति महीपते।
यया व्याप्तमिदं सर्ब भगवत्या चराचरम्॥ ५२
मोहदा ज्ञानदा सैव बन्धमोक्षप्रदा सदा।
राजोवाच
भगवन्ब्रूहि मे तस्याः स्वरूपं बलमुत्तमम्॥ ५३
उत्पत्तिकारणं वापि स्थानं परमकं च यत्।
ऋषिरुवाच
न चोत्पत्तिरनादित्वान्नृप तस्याः कदाचन॥ ५४
नित्यैब सा परा देवी कारणानां च कारणम्।
वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वात्मना नृप॥ ५५
शववच्छक्तिहीनस्तु प्राणी भवति सर्वथा।
चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रूपं तस्यास्तदेव हि॥ ५६
आविर्भावतिरोभावौ देवानां कार्यसिद्धये।
यदा स्तुवन्ति तां देवा मनुजाश्च विशाम्पते॥ ५७
प्रादुर्भवति भूतानां दुःखनाशाय चाम्बिका।
नानारूपधरा देवी नानाशक्तिसमन्विता॥ ५८
आविर्भवति कार्यार्थं स्वेच्छया परमेश्वरी ।
दैवाधीना न सा देवी यथा सर्वे सुरा नृप॥ ५९
न कालवशगा नित्यं पुरुषार्थप्रवर्तिनी।
अकर्ता पुरुषो द्रष्टा दृश्यं सर्वमिदं जगत्॥ ६०
दृश्यस्य जननी सैव देवी सदसदात्मिका।
पुरुषं रञ्जयत्येका कृत्वा ब्रह्माण्डनाटकम्॥ ६१
रञ्जिते पुरुषे सर्व॑ संहरत्यतिरंहसा।
तया निमित्तभूतास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ६२
पञ्चम स्कन्ध
७१३
जगद्गुरु भगवान् विष्णुमें भी यह मायाशक्ति अपना
प्रभाव डालती है, तब हे राजन्! अन्यकी क्या
बात! हे राजन्! वे परम प्रकृतिस्वरूपा महामाया
ज्ञानियोंके मनको भी बलपूर्वक आकृष्ट करके
मोहित कर देती हैं, जिन भगवतीके द्वारा स्थावर-
जंगमात्मक यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; वे ही
ज्ञानदायिनी, मोहदायिनी तथा बन्धन एवं मोक्ष
प्रदान करनेवाली हैं ॥ ४७-५२३ ॥
राजा बोले-हे भगवन्! मुझे उनके स्वरूप,
उत्तम बल, उनकी उत्पत्तिका कारण और उनके परम
धामके विषयमें बताइये ॥ ५३ ३ ॥
ऋषि बोले-हे राजन्! अनादि होनेके कारण
उनकी कभी उत्पत्ति नहीं होती। नित्य और सर्वोपरि
वे देवी समस्त कारणोंकी भी कारण हैं। हे नृप! वे
शक्तिस्वरूपा भगवती सभी प्राणियोंमें सर्वात्मारूपसे
विद्यमान रहती हैं । यदि प्राणी शक्तिसे रहित हो जाय
तो वह प्राणी शवतुल्य हो जाता है; क्योंकि सभी
प्राणियोंमें जो चैतन्य शक्ति है, वह इन्हींका रूप है।
देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये ही उनका प्राकट्य
और तिरोधान होता है॥ ५४-५६३ ॥
हे राजन्! जब देवता या मनुष्य उनकी
स्तुति करते हैं, तब प्राणियोंके दुःखका नाश करनेके
लिये ये भगवती जगदम्बा प्रकट होती हैं, वे देवी
परमेश्वरी अनेक रूप धारण करके अनेक प्रकारकी
शक्तियोंसे सम्पन्न होकर कार्य सिद्ध करनेके लिये
स्वेच्छापूर्वक आविर्भूत होती हैं। हे राजन्! अन्य
देवताओंकी भाँति वे भगवती दैवके अधीन नहीं हैं।
सदा पुरुषार्थका प्रवर्तन करनेवाली वे देवी कालके
वशमें नहीं हैं ॥ ५७-५९३ ॥
यह सम्पूर्ण जगत् दृश्य है, परमपुरुष इसका
द्रष्टा है, वह कर्ता नहीं है। वे सत्-असत्स्वरूपा देवी
ही इस दृश्यमान जगतकी जननी हैं, वे स्वयं अकेले
इस ब्रह्माण्डको रचना करके परमपुरुषको आनन्दित
करती हैं और उन परमपुरुषका मनोरंजन हो जानेके
बाद वे भगवती शीघ्र ही सम्पूर्ण सृष्टि-प्रपंचका
संहार भी कर देती हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश
तो निमित्तमात्र हैं। वे भगवती ही अपनी लीलासे
७९४
श्रीमहेबीभागवत
[ अ० ३४
कल्पिताः स्वस्वकार्येषु प्रेरिता लीलया त्वमी।
स्वांशं तेषु समारोप्य कृतास्ते बलवत्तराः॥ ६३
दत्ताश्च शक्तयस्तेभ्यो गीर्लक्ष्मीर्गिरिजा तथा।
ते तां ध्यायन्ति देवेशाः पूजयन्ति परां मुदा॥ ६४
ज्ञात्वा सर्वेश्वरी शक्तिं सृष्टिस्थितिविनाशिनीम्।
एतत्ते सर्वमाख्यातं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।
मम बुद्धयनुसारेण नान्तं जानामि भूपते॥ ६५
उनकी रचना करती हैं और उन्हें अपने-अपने
कार्यों (जगत्का सृजन, पालन और संहार) -में प्रवृत्त
करती हैं। वे (देबी) उनमें अपने अंश (शक्ति)-का
आरोपणकर उन्हें बलवान् बनाती हैं | उन्होंने सरस्वती,
लक्ष्मी और पार्वतीके रूपमें उन्हें अपनी शक्तियाँ दी
हैं। अतः वे त्रिदेव उन्हीं पराम्बाको सृजन, पालन
और संहार करनेवाली जानकर प्रसन्नतापूर्वक उनका
ध्यान और पूजन करते हैं॥ ६०-६४३ ॥
हे राजन्! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार
देवीका यह उत्तम माहात्म्य आपसे कह दिया, मैं
इसका अन्त नहीं जानता हँ ॥ ६५॥
इति श्रीमदेवीभायवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रथा संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देवीमाहात्प्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३॥
cD or
अथ चतुस्त्रिशोऽध्यायः
मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन
राजोवाच
भगवन्ब्रूहि मे सम्यक्तस्या आराधने विधिम्।
पूजाविधिञ्च मन्त्रांश्च तथा होमविधिं बद॥ ९
ऋषिरुवाच
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तस्याः पूजाविधिं शुभम्।
कामदं मोक्षदं नृणां ज्ञानदं दुःखनाशनम्॥ २
आदी स्नानविधिं कृत्वा शुचिः शुक्लाम्बरो नरः।
आचम्य प्रयतः कृत्वा शुभमायतनं निजम्॥ ३
ततोऽवलिप्तभूम्यां तु संस्थाप्यासनमुत्तमम्।
तत्रोपविश्य विधिवत् त्रिराचम्य मुदान्वितः॥ ४
पूजाद्रव्यं सुसंस्थाप्य यथाशक्त्यनुसारतः।
प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं विधाय च॥ ५
कुर्यात्प्राणप्रतिष्ठां तु सम्भारं प्रोक्ष्य मन्त्रतः ।
कालज्ञानं ततः कृत्वा न्यासं कुर्याद्यथाविधि॥ ६
राजा बोले—हे भगवन्! अब मुझे उन देवीकी
आराधना-विधि भलीभाँति बताइये; साथ ही पूजा-
विधि, हवनको विधि और मन्त्र भी बताइये॥ १॥
ऋषि बोले-हे राजन्! सुनिये, मैं उनके
पूजनको शुभ विधि बताता हूँ, जो मनुष्योंको काम,
मोक्ष और ज्ञानको देनेवाली तथा उनके दु:खोंका
नाश करनेवाली है॥ २॥
मनुष्यको सर्वप्रथम विधिपूर्वक स्नान करके
पवित्र हो श्वेत वस्त्र धारण कर लेना चाहिये।
तत्पश्चात् वह सावधानीपूर्वक आचमन करके पूजा-
स्थानको शुद्ध करनेके बाद लिपी हुई भूमिपर
उत्तम आसन बिछाकर उसपर बैठ जाय और प्रसन्न
होकर विधिपूर्वक तीन बार आचमन करे। अपनी
शक्तिके अनुसार पूजाद्रव्यको सुव्यवस्थित ढंगसे
रखकर प्राणायाम कर ले, उसके बाद भूतशुद्धि
करके और पुनः मन्त्र पढ़कर समस्त पूजन-
सामग्रीका प्रोक्षण करके देवीमूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा
करनी चाहिये। तत्पश्चात् देशकालका उच्चारणकर
विधिपूर्वक न्यास करना चाहिये ॥ ३—६॥
अ० ३४]
शुभे ताम्रमये पात्रे चन्दनेन सितेन च।
षट्कोणं विलिखेद्यन्त्रं चाष्टकोणं ततो बहिः ॥ ७
° नवाक्षरस्य मन्त्रस्य बीजानि विलिखेत्ततः।
कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठाञ्च वेदोक्तां संविधाय च॥ ८
अर्चा वा धातवीं कुर्यात्पूजामन्त्रैः शिवोदितैः ।
पूजनं पृथिवीपाल भगवत्याः प्रयत्नतः॥ ९
कृत्वा वा विधिवत्पूजामागमोक्तां समाहितः।
जपेन्नवाक्षरं मन्त्रं सततं ध्यानपूर्वकम्॥ १०
होमं दशांशतः कुर्याइशांशेन च तर्षणम्।
भोजनं ब्राह्मणानाञ्च तहृशांशेन कारयेत्॥ १९
चरित्रत्रयपाठञ्च नित्यं कुर्याद्विसर्जयेत्।
नवरात्रव्रतं चैव विधेयं विधिपूर्वकम्॥ १२
आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप।
नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता॥ १३
होमः सुविपुलः कार्यो जप्यमन्त्रैः सुपायसैः।
शर्कराघृतमिश्रेश्च मधुयुक्तैः सुसंस्कृतैः॥ १४
छागमांसेन वा कार्यो बिल्वपत्रैस्तथा शुभैः ।
हयारिकुसुमै रक्तैस्तिलैर्वा शर्करायुतैः॥ १५
अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः।
कर्तव्यं पूजनं देव्या ब्राह्मणानाञ्च भोजनम्॥ १६
निर्धनो धनमाप्नोति रोगी रोगात्प्रमुच्यते।
अपुत्रो लभते पुत्राञ्छुभांश्च वशवर्तिनः॥ १७
राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं प्राप्नोति सार्वभौमिकम्।
शत्रुभिः पीडितो हन्ति रिपुं मायाप्रसादतः॥ १८
विद्यार्थी पूजनं यस्तु करोति नियतेन्द्रियः।
अनवद्यां शुभां विद्यां विन्दते नात्र संशयः॥ १९
पञ्चम स्कन्ध
७१५
इसके बाद सुन्दर ताम्रपात्रपर श्वेत चन्दनसे
षट्कोण यन्त्र तथा उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र
लिखना चाहिये | तदनन्तर नवाक्षर मन्त्रके आठ बीज
अक्षर आठों कोणोंमें लिखना चाहिये और नौवाँ
अक्षर यन्त्रकी कर्णिका (बीच)-में लिखना चाहिये।
तदनन्तर वेदमें बतायी गयी विधिसे यन्त्रको
प्रतिष्ठा करके अथवा हे राजन्! भगवतीको धातुमयी
प्रतिमा बनाकर शिवतन्त्रोक्त पूजामन्त्रोंसे प्रयत्नपूर्वक
पूजन करना चाहिये। अथवा सावधान होकर
आगमशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे विधानपूर्वक
पूजन करके ध्यानपूर्वक नवाक्षरमन्त्रका सतत जप
करना चाहिये। जपका दशांश होम करना चाहिये,
होमका दशांश तर्पण करना चाहिये और तर्पणका
दशांश ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये । प्रतिदिन तीनों
चरित्रों (प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र तथा उत्तर
चरित्र)-का पाठ करना चाहिये। इसके बाद विसर्जन
करना चाहिये ॥ ७-११३ ॥
हे राजन्! कल्याण चाहनेवालेको आश्विन
और चैत्र माहके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक नवरात्रत्रत
करना चाहिये। इन नवरात्रोमें उपवास भी करना
चाहिये॥ १२-१३॥
अनुष्ठानमें जपे गये मन्त्रोंके द्वारा शर्करा, घी
और मधुमिश्रित पवित्र खीरसे विस्तारपूर्वक हवन
करना चाहिये अथवा उत्तम बिल्वपत्रों, लाल कनैलके
पुष्पों अथवा शर्करामिश्रित तिलोंसे हवन करना
चाहिये। अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशीको विशेषरूपसे
देवीपूजन करना चाहिये और इस अवसरपर ब्राह्मणभोजन
भी कराना चाहिये। ऐसा करनेसे निर्धनको धनकी
प्राप्ति होती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पुत्रहीन
व्यक्ति सुन्दर और आज्ञाकारी पुत्रोंको प्राप्त करता है
और राज्यच्युत राजाको सार्वभौम राज्य प्राप्त हो जाता
है। देवी महामायाकी कृपासे शत्रुओंसे पीड़ित मनुष्य
अपने शत्रुओंका नाश कर देता है। जो विद्यार्थी
इन्द्रियोंको वशमें करके इस पूजनको करता है, वह
शीघ्र ही पुण्यमयी उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है;
इसमें सन्देह नहीं है॥ १४—१९॥
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श्रीमहेबीभागवत
[ अ० ३४
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्य: शूद्रो वा भक्तिसंयुतः ।
पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत्॥ २०
नवरात्रब्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः।
वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः ॥ २१
आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रब्रतं शुभम्।
करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाण्नुयात्॥ २२
विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत्।
कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः॥ २३
यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि।
वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान्॥ २४
कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम्।
धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम्॥ २५
त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः।
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने॥ २६
धूपैदीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकशः।
गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा॥ २७
उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः।
कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम्॥ २८
चन्दनैभूषणै वस्त्रैर्भक्ष्यशच विविधैस्तथा।
सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः॥ २९
एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।
अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणं दशमीदिने।
कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरै्नृपैः॥ ३९
एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रब्रतं नरः।
नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता ॥ ३२
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र-जो भी
भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा
करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता
है। जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रत्रत
करता है, बह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता
है॥ २०-२१॥
जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम
नवरात्रब्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी
कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ २२॥
विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-
स्थानका निर्माण करना चाहिये और बहाँपर विधि-
विधानसे वैदिक मन्तरोंद्रारा कलशकी स्थापना करनी
चाहिये ॥ २३॥
अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे
कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये । तत्पश्चात्
कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन
करके पूजा-स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी
लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा
धूप-दीपसे सम्पन्न रखना चाहिये ॥ २४-२५॥
अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [ प्रातः, मध्याहन
तथा सायंकाल] तीनों समय पूजा करनी चाहिये।
देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये।
धूप, दीप, उत्तम नेवेद्य, अनेक प्रकारके फल-पुष्प,
गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण-इनके द्वारा
भगवतीको पूजा होनी चाहिये। नानाविध वाद्य बजाकर
उत्सव मनाना चाहिये। इस अवसरपर चन्दन, आभूषण,
वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार
मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोसे विधिपूर्वक
कन्याओंका पूजन करना चाहिये। इस प्रकार पूजन
सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक
विधिवत् हवन करना चाहिये । तत्पश्चात् ब्राह्मण-
भोजन कराना चाहिये। इसके बाद दशमीको पारण
करना चाहिये। भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान
भी करना चाहिये॥ २६-३१ ॥
इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा
या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रत्रत
करता है, बह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित
अ० ३४]
इह लोके सुखं भोगान्प्राणोति मनसेप्सितान्।
देहान्ते परमं स्थानं प्राप्नोति ब्रततत्परः॥ ३३
जन्मान्तरेऽम्बिकाभक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ।
जन्मोत्तमकुले प्राप्य सदाचारो भवेद्धि सः॥ ३४
नवरात्रव्रतं प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम्।
आराधनं शिवायास्तु सर्वसौख्यकरं परम्॥ ३५
अनेन विधिना राजन् समाराधय चण्डिकाम्।
जित्वा रिपूनस्खलितं राज्यं प्राप्स्यस्यनुत्तमम्॥ ३६
सुखञ्च परमं भूप देहेऽस्मिन्स्वगृहे पुनः।
पुत्रदारान्समासाद्य लप्स्यसे नात्र संशयः॥ ३७
बैश्योत्तम त्वमेवाद्य समाराधय कामदाम्।
देवीं विश्वेश्वरीं मायां सृष्टिसंहारकारिणीम्॥ ३८
स्वजनानां च मान्यस्त्वं भविष्यसि गृहे गतः।
सुखं सांसारिकं प्राप्य यथाभिलषितं पुनः॥ ३९
देवीलोके शुभे वासो भविता ते न संशयः।
नाराधिता भगवती यैस्ते नरकभागिनः॥ ४०
इह लोकेऽतिदुःखार्ता नानारोगैः प्रपीडिताः।
भवन्ति मानवा राजञ्छत्रुभिश्च पराजिताः ॥ ४९
निष्कलत्रा ह्यपुत्राश्च तृष्णार्ताः स्तब्धबुद्धय: ।
बिल्वीदलैः करवीरैः शतपत्रैश्च चम्पकैः॥ ४२
अर्चिता जगतां धात्री यैस्तेऽतीव विलासिनः।
भवन्ति कृतपुण्यास्ते शक्तिभक्तिपरायणाः॥ ४३
धनविभवसुखाढ्या मानवा मानवन्तः
सकलगुणगणानां भाजनं भारतीशाः।
निगमपठितमन्त्रैः पूजिता यैर्भवानी
नुपतितिलकमुख्यास्ते भवन्तीह लोके ॥ ४४
पञ्चम स्कन्ध
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भोगोंको प्राप्त करता है और वह व्रतपरायण व्यक्ति
देह-त्याग होनेपर परम दिव्य देवीलोकको प्राप्त
करता है॥ ३२-३३॥
उसे जन्मान्तरमें देवी जगदम्बाकी अविचल
भक्ति प्राप्त होती है और उत्तम कुलमें जन्म पाकर
बह स्वभावतः सदाचारी होता है॥ ३४॥
नवरात्रत्रतको व्रतोंमें उत्तम व्रत कहा गया है;
भगवती शिवाका आराधन सब प्रकारके उत्तम सुखको
देनेवाला है ॥ ३५॥
हे राजन्! इस विधिसे भगवती चण्डिकाकी
आराधना कीजिये, इससे शत्रुओंको जीतकर आप
अपना उत्तम राज्य पुनः प्राप्त कर लेंगे और हे भूप!
अपनी स्त्री-पुत्र आदि स्वजनोंको प्राप्तकर आप
अपने भवनमें परम उत्तम सुखका इसी शरीरसे
उपभोग करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३६-३७॥
हे वैश्यश्रेष्ठ ! आप भी आजसे समस्त कामनाओंको
देनेवाली, सृष्टि और संहारकी कारणभूता विश्वेश्वरी
देवी महामायाकी आराधना कीजिये । इससे आप अपने
घर जानेपर अपने लोगोंमें मान्य हो जायँगे और मनोभिलषित
सांसारिक सुख प्राप्त करके अन्तमें शुभ देवीलोकमें
वास करेंगे-इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८-३९३ ॥
हे राजन्! जो मनुष्य भगवतीकी आराधना नहीं
करते, वे नरकके भागी होते हैं। वे इस लोकमें
अत्यन्त दुःखी, विविध व्याधियोंसे पीडित, शत्रुआंद्वारा
पराजित, स्त्री-पुत्रसे हीन, तृष्णाग्रस्त और बुद्धिभ्रष्ट
होते हैं ॥ ४०-४१३ ॥
बिल्वपत्रोंसे तथा कनैल, कमल और चम्पाके
‘फूलोंसे जो जगज्जननीकी आराधना करते हैं, शक्तिस्वरूपा
भगवतीको भक्तिमें रत वे पुण्यशाली लोग विविध
प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥
[हे नृपश्रेष्ठ !] जो लोग वेदोक्त मन्त्रोंसे भवानीका
पूजन करते हैं, वे मानव इस संसारमें सब प्रकारके धन,
वैभव तथा सुखसे परिपूर्ण, समस्त गुणोंके आगार, माननीय,
विद्वान् और राजाओंके शिरोमणि होते हैं ॥ ४४॥
इति श्रीदेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रथा संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवत्याः
पूजाराधनविधिवर्णनं नाम चतुस्त्रिशोऽध्यायः ॥ ३४॥
AAD oS
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श्रीमद्देवीभागवत
[ अ० ३५