Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथाष्टादशोऽध्यायः
पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक
जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी
स्तुति करना, विष्णुद्वारा अपनेको भगवतीके अधीन बताना
व्यास उवाच
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कृष्णस्य चरितं महत्।
अवतारकारणं चैव देव्याश्चरितमद्भुतम्॥ १
धैकदा भाराक्रान्ता रुदती चातिकर्शिता।
गोरूपधारिणी दीना भीतागच्छत्त्रिविष्टपम्॥ २
पृष्टा शक्रेण किं तेऽद्य वर्तते भयमित्यथ।
केन वै पीडितासि त्वं किं ते दुःखं वसुन्धरे॥ ३
तच्छुत्वेला तदोवाच श्रृणु देवेश मेऽखिलम्।
दुःखं पृच्छसि यत्त्वं मे भाराक्रान्तोऽस्मि मानद्॥ ४
व्यासजी बोले-हे राजन्! सुनिये, अब मैं
श्रीकृष्णके महान् चरित्र, उनके अवतारके कारण और
भगवतीके अद्भुत चरित्रका वर्णन करूँगा॥ १॥
एक समयकी बात है-[पापियोंके] भारसे
व्यथित, अत्यधिक कृश, दीन तथा भयभीत पृथ्वी
गौका रूप धारण करके रोती हुई स्वर्गलोक गयी ॥ २॥
वहाँ इन्द्रने पूछा-हे वसुन्धरे! इस समय तुम्हें
कौन-सा भय है, तुम्हें किसने पीड़ा पहुँचायी है और
तुम्हें क्या दु:ख है ?॥ ३॥
यह सुनकर पृथ्वीने कहा-हे देवेश! यदि आप
पूछ ही रहे हैं तो मेरा सारा दुःख सुन लीजिये। हे
मानद! मैं भारसे दबी हुई हूँ॥ ४॥
४८६
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० १८
जरासन्धो महापापी मागधेषु पतिर्मम।
शिशुपालस्तथा चैद्यः काशिराजः प्रतापवान्॥ ५
रुक्मी च बलवान्कंसो नरकश्च महाबल: ।
शाल्वः सौभपतिः क्रूरः केशी धेनुकवत्सकौ॥ ६
सर्वे धर्मविहीनाशच परस्परविरोधिनः।
पापाचारा मदोन्मत्ताः कालरूपाएच पार्थिवा:॥ ७
तैरहं पीडिता शक्र भाराक्रान्ताक्षमा विभो।
किं करोमि कव गच्छामि चिन्ता मे महती स्थिता॥ ८
पीडिताहं वराहेण विष्णुना प्रभविष्णुना।
शक्र जानीहि हरिणा दु:खाहुःखतरं गता॥ ९
यतोऽहं दुष्टदैत्येन कश्यपस्यात्मजेन वै।
हृताहं हिरण्याक्षेण मग्ना तस्मिन्महार्णवे॥ ९०
तदा सूकररूपेण विष्णुना निहतोऽप्यसौ।
उदधृताहं वराहेण स्थापिता हि स्थिरा कृता॥ ११
नोचेद्रसातले स्वस्था स्थिता स्यां सुखशायिनी।
न शक्तास्म्यद्य देवेश भारं वोढुं दुरात्मनाम्॥ १२
अग्रे दुष्टः समायाति ह्याष्टाविंशस्तथा कलिः।
तदाहं पीडिता शक्र गन्तास्म्याशु रसातलम्॥ ९३
तस्मात्त्वं देवदेवेश दुःखरूपार्णवस्य च।
पारदो भव भारं मे हर पादौ नमामि ते॥ १४
ड्र उवाच
इले किं ते करोम्यद्य ब्रह्माणं शरणं व्रज।
अहं तत्रागमिष्यामि स ते दुःखं हरिष्यति॥ १५
तच्छुत्वा त्वरिता पृथ्वी ब्रह्मलोकं गता तदा।
शक्रोऽपि पृष्ठतः प्राप्तः सर्वदेवपुरःसरः॥ १६
मगधदेशका राजा महापापी जरासन्ध, चेदिनरेश
शिशुपाल, प्रतापी काशिराज, रुक्मी, बलवान् कंस,
महाबली नरकासुर, सौभनरेश शाल्व, क्रूर केशी,
धेनुकासुर और वत्सासुर-ये सभी राजागण धर्महीन,
परस्पर विरोध रखनेवाले, पापाचारी, मदोन्मत्त और
साक्षात् कालस्वरूप हो गये हैं ॥ ५-७॥
हे इन्द्र! उनसे मुझे बहुत व्यथा हो रही है। में
उनके भारसे दबी हुई हूँ और अब [उनका भार
सहनेमें] मैं असमर्थ हो गयी हूँ। हे विभो! मैं क्या
करूँ और कहाँ जाऊँ ? मुझे यही महान् चिन्ता है ॥ ८ ॥
हे इन्द्र ! पूर्वमें मैं [दानव हिरण्याक्षसे] पीडित
थी। उस समय परम ऐश्वर्यशाली वराहरूपधारी
भगवान् विष्णुने मेरा उद्धार किया था। यदि वे
वराहरूप धारण करके मेरा उद्धार न किये होते तो
उससे भी अधिक दु:खको स्थितिमें मैं न पहुँचती—
आप ऐसा जानिये॥ ९॥
कश्यपके पुत्र दुष्ट दैत्य हिरण्याक्षने मुझे
चुरा लिया था और उस महासमुद्रमें डुबो दिया था |
उस समय भगवान् विष्णुने सूकरका रूप धारणकर
उसका संहार किया और मेरा उद्धार किया। तदनन्तर
उन वराहरूपधारी विष्णुने मुझे स्थापित करके
स्थिर कर दिया अन्यथा मैं इस समय पातालमें
स्वस्थचित्त रहकर सुखपूर्वक सोयी रहती। हे देवेश!
अब मैं दुष्टात्मा राजाओंका भार वहन करनेमें
समर्थ नहीं हूँ॥ १०-१२॥
हे इन्द्र! अब आगे अट्ठाईसबाँ दुष्ट कलियुग
आ रहा है। उस समय मैं और भी पीड़ित हो जाऊँगी
तब तो मैं शीघ्र ही रसातलमें चली जाऊँगी। अतएव
हे देवदेवेश ! इस दु:खरूपी महासागरसे मुझे पार कर
दीजिये; मेरा बोझ उतार दीजिये, मैं आपके चरणोंमें
नमन करती हूँ॥ १३-१४॥
इन्द्र बोले—हे वसुन्धरे! मैं इस समय तुम्हारे
लिये क्या कर सकता हुँ! तुम ब्रह्माकी शरणमें जाओ,
वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे, मैं भी वहाँ आ
जाऊँगा॥ १५॥
यह सुनकर पृथ्वीने तत्काल ब्रह्मलोकके लिये
प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे-पीछे इन्द्र भी सभी
देवताओंके साथ वहाँ पहुँच गये॥ १६॥
अ० १८]
सुरभीमागतां तत्र दृष्ट्वोवाच प्रजापति: ।
महाँ ज्ञात्वा महाराज ध्यानेन समुपस्थिताम्॥ १७
कस्माद्रुदसि कल्याणि किं ते दुःखं वदाधुना ।
पीडितासि च केन त्वं पापाचारेण भूर्वद॥ १८
धरोवाच
कलिरायाति दुष्टोऽयं बिभेमि तद्धयादहम्।
पापाचारा: प्रजास्तत्र भविष्यन्ति जगत्पते॥ ९९
राजानश्च दुराचाराः परस्परविरोधिनः।
चौरकर्मरताः सर्वे राक्षसाः पूर्णवैरिणः॥ २०
तान्हत्वा नृपतीन्भारं हर मेऽद्य पितामह।
पीडितास्मि महाराज सैन्यभारेण भूभृताम्॥ २९
ब्रह्मोवाच
नाहं शक्तस्तथा देवि भारावतरणे तब।
गच्छावः सदनं विष्णोर्देबदेवस्य चक्रिणः॥ २२
स ते भारापनोदं वै करिष्यति जनार्दनः ।
पूर्व मयापि ते कार्य चिन्तितं सुविचार्य च॥ २३
तत्र गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्र देवो जनार्दनः।
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा वेदकर्तासौ पुरस्कृत्य सुरांश्च गाम्॥ २४
जगाम विष्णुसदनं हंसारूढश्चतुर्मुखः।
तुष्टाव वेदवाक्यैश्च भक्तिप्रवणमानसः॥ २५
ब्रह्मोवाच
सहस्त्रशीर्षास्त्वमसि सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
त्वं वेदपुरुषः पूर्वं देवदेवः सनातनः॥ २६
भूतपूर्वं भविष्यच्च वर्तमानं च यद्विभो।
अमरत्वं त्वया दत्तमस्माकं च रमापते॥ २७
एतावान्महिमा तेऽस्ति को न वेत्ति जगत्रये।
त्वं कर्ताप्यवरिता हन्ता त्वं सर्वगतिरीश्वरः॥ २८
चतुर्थ स्कन्ध
RA
हे महाराज! उस आयी हुई धेनुको अपने
सम्मुख उपस्थित देखकर तथा ध्यान-दूष्टिद्वारा उसे
पृथ्वी जान करके ब्रह्माजीने कहा-हे कल्याणि ! तुम
किसलिये रो रही हो और तुम्हें कौन-सा दुःख है;
मुझे अभी बताओ। हे पृथ्वि! किस पापाचारीने तुम्हें
पीड़ा पहुँचायी है, मुझे बताओ॥ १७-१८॥
धरा बोली हे जगत्पते! यह दुष्ट कलि अब
आनेवाला है। मैं उसीके आतंकसे डर रही हूँ; क्योंकि
उस समय सभी लोग पापाचारी हो जायँगे। सभी
राजालोग दुराचारी हो जायँगे, आपसमें विरोध करनेवाले
होंगे और चोरीके कर्ममें संलग्न रहेंगे। वे राक्षसके
रूपमें एक-दूसरेके पूर्णरूपसे शत्रु बन जायेँगे। हे
पितामह! उन राजाओंका वध करके मेरा भार उतार
दीजिये। हे महाराज! मैं राजाओंको सेनाके भारसे
दबी हुई हूँ॥ १९-२१॥
ब्रह्माजी बोले—हे देवि! तुम्हारा भार उतारनेमें
मैं सर्वथा समर्थ नहीं हूँ। अब हम दोनों चक्रधारी
देवाधिदेव भगवान् विष्णुके धाम चलते हैं । वे जनार्दन
तुम्हारा भार अवश्य उतार देंगे। मैंने पहलेसे ही
भलीभाँति विचार करके तुम्हारा कार्य करनेकी योजना
बनायी है। [उन्होंने इन्द्रसे कहा-] हे सुरश्रेष्ठ!
जहाँपर भगवान् जनार्दन विद्यमान हैं, अब आप
वहाँपर चलें ॥ २२-२३३ ॥
व्यासजी बोले-एऐसा कहकर वे वेदकर्ता
चतुर्मुख ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हुए और देवताओं
तथा गोरूपधारिणी पृथ्वीको साथमें लेकर विष्णुलोकके
लिये प्रस्थित हो गये। [वहाँ पहुँचकर] भक्तिसे
परिपूर्ण हृदयवाले ब्रह्माजी वेदवाक्योंसे उनको स्तुति
करने लगे॥ २४-२५॥
ब्रह्माजी बोले आप हजार मस्तकोंवाले, हजार
| नेत्रोंबाले और हजार पैरोंवाले हैं। आप देवताओंके भी
आदिदेव तथा सनातन वेदपुरुष हैं। हे विभो! हे
रमापते! भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकालका
। जो भी हमारा अमरत्व है, उसे आपने ही हमें प्रदान
| किया है। आपकी इतनी बड़ी महिमा है कि उसे
त्रिलोकीमें कौन नहीं जानता ? आप ही सृष्टि करनेवाले,
पालन करनेवाले और संहार करनेवाले हैं। आप
सर्वव्यापी और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं॥ २६-२८॥
४८८
श्रीमहेवीभागवत
[ अठ १८
व्यास उवाच
इतीडितः प्रभुर्विष्णुः प्रसन्नो गरुडध्वजः।
दर्शनञ्च ददौ तेभ्यो ब्रह्मादिभ्योऽमलाशयः॥ २९
पप्रच्छ स्वागतं देवान्प्रसन्नवदनो हरिः।
ततस्त्वागमने तेषां कारणञ्च सविस्तरम्॥ ३०
तमुवाचाब्जजो नत्वा धरादुःखञ्च संस्मरन्।
भारावतरणं विष्णो कर्तव्यं ते जनार्दन॥ ३९
भुवि धृत्वावतारं त्वं द्वापरान्ते समागते।
हत्वा दुष्टान्नुपानुर्व्या हर भारं दयानिधे॥ ३२
विष्णुरुवाच
नाहं स्वतन्त्र एवात्र न ब्रह्मा न शिवस्तथा।
नेन्द्रोऽग्निर्न यमस्त्वष्टा न सूर्यो वरुणस्तथा॥ ३३
योगमायाबशे सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ग्रथितं गुणसूत्रतः॥ ३४
यथा सा स्वेच्छया पूर्व कर्तुमिच्छति सुव्रत।
तथा करोति सुहिता वयं सर्वेऽपि तद्ृशाः॥ ३५
यह्यहं स्यां स्वतन्त्रो वै चिन्तयन्तु धिया किल।
कुतोऽभवं मत्स्यवपुः कच्छपो वा महार्णवे॥ ३६
तिर्यग्योनिषु को भोगः का कीर्तिः किं सुखं पुनः ।
किं पुण्यं किं फलं तत्र क्षुद्रयोनिगतस्य मे॥ ३७
कोलो वाथ नूसिंहो बा वामनो वाभवं कुतः।
जमदरिनसुतः कस्मात्सम्भवेयं पितामह ॥ ३८
नृशंसं वा कथं कर्म कृतवानस्मि भूतले।
क्षतजैस्तु हृदान्सर्वान्पूरयेयं कथं पुनः॥ ३९
तत्कथं जमदग्नेश्च पुत्रो भूत्वा द्विजोत्तमः।
क्षत्रियान्हतवानाजौ निर्दयो गर्भगानपि॥ ४०
व्यासजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेपर
पवित्र हृदयवाले वे गरुडध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न
हो गये और उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओंको अपने
दर्शन दिये। प्रसन्न मुखमण्डलवाले भगवान् विष्णुने
देवताओंका स्वागत किया और विस्तारपूर्वक उनके
आगमनका कारण पूछा॥ २९-३०॥
तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम करनेके
उपरान्त पृथ्वीके दुःखका स्मरण करते हुए उनसे
कहा-हे विष्णो! हे जनार्दन! अब पृथ्वीका भार दूर
कर देना आपका कर्तव्य है। अत: हे दयानिधे!
द्वापरका अन्तिम समय उपस्थित होनेपर आप पृथ्वीपर
अवतार लेकर दुष्ट राजाओंको मारकर पृथ्वीका भार
उतार दीजिये॥ ३१-३२ ॥
विष्णु बोले इस विषयमें मैं (विष्णु), ब्रह्मा.
शंकर, इन्द्र, अग्नि, यम, त्वष्टा, सूर्य और वरुण
कोई भी स्वतन्त्र नहीं है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत्
योगमायाके अधीन रहता है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त
सब कुछ [ सात्त्विक, राजस, तामस] गुणोंके सूत्रोंद्वारा
उन्हींमें गुँथा हुआ है॥ ३३-३४॥
हे सुव्रत! वे हितकारिणी भगवती सर्वप्रथम
स्वेच्छापूर्वक जैसा करना चाहती हैं, वैसा ही करती
हैं। हमलोग भी सदा उनके ही अधीन रहते हैं ॥ ३५ ॥
अब आपलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार
करें कि यदि मैं स्वतन्त्र होता तो महासमुद्रमें मत्स्य
और कच्छपरूपधारी क्यों बनता ? तिर्यक्-योनियोंमें
कौन-सा भोग प्राप्त होता है, क्या यश मिलता है,
कौन-सा सुख होता है और कौन-सा पुण्य प्राप्त
होता है ? [इस प्रकार] क्षुद्रयोनियोंमें जन्म लेनेवाले
| मुझ विष्णुको क्या फल मिला ?॥ ३६-३७॥
यदि मैं स्वतन्त्र होता तो सूकर, नृसिंह और
वामन क्यों बनता ? इसी प्रकार हे पितामह ! मैं जमदग्निपुत्र
(परशुराम)-के रूपमें उत्पन्न क्यों होता इस भूतलपर
मैं [ क्षत्रियोंके संहार जैसा] नृशंस कर्म क्यों करता और
उनके रुधिरसे समस्त सरोवरोंको क्यों भर डालता ?
उस समय मैं जमदरिनिपुत्र परशुरामके रूपमें जन्म
लेकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी युद्धमें क्षत्रियोंका
संहार क्यों करता और घोर निर्दयी बनकर गर्भस्थ
शिशुओंतकको भला क्यों मारता ?॥ ३८—४०॥
अ० १८]
चतुर्थ स्कन्ध
४८९
रामो भूत्वाथ देवेन्द्र प्राविशद्ण्डकं वनम्।
पदातिश्चीरवासाश्च जटावल्कलवान्पुनः ॥ ४१
असहायो ह्यपाथेयो भीषणे निर्जने वने।
कुर्वनाखेटकं तत्र व्यचरं विगतत्रपः॥ ४२
न ज्ञातवान्मृगं हैमं मायया पिहितस्तदा।
उटजे जानकीं त्यकत्वा निर्गतस्तत्पदानुगः॥ ४३
लक्ष्मणोऽपि च तां त्यक्त्वा निर्गतो मत्पदानुगः।
बारितोऽपि मयात्यर्थं मोहितः प्राकृतैर्गुणैः ॥ ४४
भिक्षुरूपं ततः कृत्वा रावणः कपटाकृतिः।
जहार तरसा रक्षो जानकीं शोककर्शिताम्॥ ४५
दुःखार्तेन मया तत्र रुदितञ्च वने वने।
सुग्रीवेण च मित्रत्वं कृतं कार्यवशान्मया॥ ४६
अन्यायेन हतो वाली शापाच्चैव निवारितः ।
सहायान्वानरान् कृत्वा लङ्कायां चलितः पुनः॥ ४७
बद्धोऽहं नागपाशैश्च लक्ष्मणश्च ममानुजः।
विसंज्ञौ पतितौ दृष्ट्वा वानरा विस्मयं गताः॥ ४८
गरूडेन तदागत्य मोचितौ भ्रातरौ किल।
चिन्ता मे महती जाता दैवं किं वा करिष्यति॥ ४९
हृतं राज्यं बने वासो मृतस्तातः प्रिया हृता।
युद्धं कष्टं ददात्येवमग्रे किं वा करिष्यति॥ ५०
प्रथमं तु महहुःखमराज्यस्य वनाश्रयम्।
राजपुत्र्यान्वितस्यैव धनहीनस्य मे सुराः॥ ५१
वराटिकापि पित्रा मे न दत्ता बननिर्गमे।
पदातिरसहायोऽहं धनहीनश्च निर्गतः॥ ५२
चतुर्दशैव वर्षाणि नीतानि च तदा मया।
क्षात्रं धर्म परित्यज्य व्याधवृत्त्या महावने॥ ५३
हे देवेन्द्र! रामका अवतार लेकर मुझे दण्डकवनमें
पैदल विचरण करना पड़ा, गेरुआ वस्त्र धारण करना
पड़ा और जटा-वल्कलधारी बनना पड़ा। उस निर्जन
बनमें असहाय रहते हुए तथा पासमें बिना किसी
भोज्य-सामग्रीके ही निर्लज्ज होकर आखेट करते हुए
मैं इधर-उधर भटकता रहा॥ ४१-४२॥
उस समय मायासे आच्छादित रहनेके कारण
मैं उस मायावी स्वर्ण-मृगको नहीं पहचान सका और
जानकीको पर्णकुटीमें छोड़कर उस मृगके पीछे-
पीछे निकल पड़ा॥ ४३॥
मेरे बहुत मना करनेपर भी प्राकृत गुणोंसे
व्यामुग्ध होनेके कारण लक्ष्मण भी उस सीताको
छोड़कर मेरे पदचिहनोंका अनुसरण करते हुए वहाँसे
निकल पड़े॥ ४४॥
तदनन्तर कपटस्वभाव राक्षस रावणने भिक्षुकका
रूप धारण करके शोकसे व्याकुल जानकोका
तत्काल हरण कर लिया॥ ४५॥
तब दु:खसे व्याकुल होकर मैं बन-वन भटकता
हुआ रोता रहा और अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये
मैंने सुग्रीवसे मित्रता की। मैंने अन्यायपूर्वक
वालीका वध किया तथा उसे शापसे मुक्ति दिलायी
और इसके बाद वानरोंको अपना सहायक बनाकर
लंकाकी ओर प्रस्थान किया॥ ४६-४७ ॥
[वहाँ युद्धमें] मैं तथा मेरा छोटा भाई लक्ष्मण
| दोनों ही नागपाशोंसे बाँध दिये गये हम दोनोंको अचेत
| पड़ा देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गये। तब
| गरुड़ने आकर हम दोनों भाइयोंको छुड़ाया। उस समय मुझे
महान् चिन्ता होने लगी कि दैव अब न जाने क्या करेगा ?
राज्य छिन गया, वनमें वास करना पड़ा, पिताकी मृत्यु हो
गयी और प्रिय सीता हर ली गयी । युद्ध कष्ट दे ही रहा
है, अब आगे दैव न जाने क्या करेगा !॥ ४८-५० ॥
हे देवतागण! सर्वप्रथम दुःख तो मुझ
राज्यविहीनका वनवास हुआ; बनके लिये चलते
समय राजकुमारी सीता मेरे साथ थीं और मेरे पास
धन भी नहीं था। वन जाते समय पिताजीने मुझे एक
वराटिका (कौड़ी) भी नहीं दी; असहाय तथा
धनविहीन मैं पैदल ही निकल पड़ा। उस समय
क्षत्रियधर्मका त्याग करके व्याधवृत्तिके द्वारा मैंने उस
महावनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये॥ ५१—५३ ॥
४९०
दैवाद्युद्धे जयः प्राप्तो निहतोऽसौ महासुर: ।
आनीता च पुन: सीता प्राप्तायोध्या मया तथा ॥ ५४
वर्षाणि कतिचित्तत्र सुखं संसारसम्भवम्।
प्राप्तं राज्यञ्च सम्पूर्ण कोसलानधितिष्ठता ॥ ५५
पुरैवं वर्तमानेन प्राप्तराज्येन वै तदा ।
लोकापवादभीतेन त्यक्ता सीता वने मया ॥ ५६
कान्ताविरहजं दुःखं पुनः प्राप्तं दुरासदम्।
पातालं सा गता पश्चाद्धरां भित्त्वा धरात्मजा ॥ ५७
एवं रामावतारेऽपि दुःखं प्राप्तं निरन्तरम्।
परतन्त्रेण मे नूनं स्वतन्त्रः को भवेत्तदा॥ ५८
पश्चात्कालवशात्पराप्तः स्वर्गो मे भ्रातृभिः सह।
परतन्त्रस्य का वार्ता वक्तव्या विबुधेन वै॥ ५९
परतन्त्रोऽस्म्यहं नूनं पद्मयोने निशामय।
तथा त्वमपि रुद्रश्च सर्वे चान्ये सुरोत्तमाः ॥ ६०
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १९
तदनन्तर भाग्यवश युद्धमें मुझे विजय प्राप्त हुई
और वह महान् असुर रावण मारा गया। इसके बाद
मैं सीताको ले आया और मुझे अयोध्या फिरसे प्राप्त
हो गयी। इस प्रकार जब मुझे सम्पूर्ण राज्य मिल
गया, तब कोसलदेशपर अधिष्ठित रहते हुए मैंने
वहाँपर कुछ वर्षोतक सांसारिक सुखका भोग
किया॥ ५४-५५॥
इस प्रकार पूर्वकालमें जब मुझे राज्य प्राप्त हो
गया तब मैंने लोकनिन्दाके भयसे वनमें सीताका
परित्याग कर दिया। इसके बाद मुझे पुनः पत्नी-
वियोगसे होनेवाला भयंकर दु:ख प्राप्त हुआ। बह
धरानन्दिनी सीता पृथ्वीको भेदकर पातालमें चली
गयी ॥ ५६-५७॥
इस प्रकार रामावतारमें भी मैं परतन्त्र होकर
निरन्तर दुःख पाता रहा। तब भला दूसरा कौन
स्वतन्त्र हो सकता है? तत्पश्चात् कालके वशीभूत
होकर मुझे अपने भाइयोंके साथ स्वर्ग जाना
पड़ा। अतः कोई भी विद्वान् पराधीन व्यक्तिकी
क्या बात करेगा? हे कमलोद्भव! आप यह जान
लीजिये कि जैसे मैं परतन्त्र हूँ वैसे ही आप, शंकर
तथा अन्य सभी बड़े-बड़े देवता भी निश््चितरूपसे
परतन्त्र हैं ॥ ५८-६०॥
इति श्रीमहदेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रचां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ब्रह्माणं
प्रति विष्णुवाक्यं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८॥
AOD का
अधैकोनविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त
बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका आश्वासन देना
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह प्रजापतिम्।
यन्मायामोहितः सर्वस्तत्त्वं जानाति नो जनः॥ १
वयं मायावृताः कामं न स्मरामो जगद्गुरुम्।
परमं पुरुषं शान्तं सच्चिदानन्दमव्ययम्॥ २
व्यासजी बोले—[हे राजन्!] ऐसा कहनेके
उपरान्त भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे फिर कहा—
जिन भगवतीको मायासे मोहित रहनेके कारण सभी
लोग परमतत्त्वको नहीं जान पाते, उन्हींकी मायासे
आच्छादित रहनेके कारण हम लोग भी जगद्गुरु,
शान्तस्वरूप, सच्चिदानन्द तथा अविनाशी परमपुरुषका
स्मरण नहीं कर पाते॥ १-२॥
अ० १९ ]
चतुर्थ स्कन्ध
४९१
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शिवोऽहमिति मोहिताः ।
न जानीमो वयं धातः परं वस्तु सनातनम्॥ ३
यन्मायामोहितश्चाहं सदा वर्ते परात्मनः।
परवान्दारुपाञ्चाली मायिकस्य यथा बशे॥ ४
भवतापि तथा दृष्टा विभूतिस्तस्य चाद्भुता।
कल्पादौ भवयुक्तेन मयापि च सुधार्णवे॥ ५
मणिट्वीपेऽथ मन्दारविटपे रासमण्डले।
समाजे तत्र सा दृष्टा श्रुता न वचसापि च॥ ६
तस्मात्तां परमां शक्तिं स्मरन्त्वद्य सुराः शिवाम्।
सर्वकामप्रदां मायामाद्यां शक्ति परात्मनः॥ ७
व्यास उवाच
इत्युक्ता हरिणा देवा ब्रह्माद्या भुवनेश्वरीम्।
सस्मरुर्मनसा देवीं योगमायां सनातनीम्॥ ८
स्मृतमात्रा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।
पाशाङ्कुशवराभीतिधरा देवी जपारुणा।
दुष्ट्वा प्रमुदिता देवास्तुष्टुवुस्तां सुदर्शनाम्॥ ९
देवा ऊचुः
ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिङ्गा विभावसोः।
तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम्॥ १०
यन्मायाशक्तिसंक्लूप्तं जगत्सर्वं चराचरम्।
तां चितं भुबनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम्॥ ११
यदज्ञानाद्भवोत्पत्तिर्यऱ्ज्ञानाद्भवनाशनम् ।
संविद्रूपा च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात् ॥ १२
हे ब्रह्मन्! मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, में शिव हूँ—
इसी [अभिमानसे] मोहित हमलोग उस सनातन
परम-तत्त्वको नहीं जान पाते॥ ३॥
उस परमात्माकी मायासे मोहित मैं उसी प्रकार
सदा उसके अधीन रहता हूँ, जैसे कठपुतली बाजीगरके
अधीन रहती है ॥ ४॥
कल्पके आरम्भमें आप (ब्रह्मा)-ने, शिवने
तथा मैंने भी सुधासागरमें उस परमात्माको अद्भुत
विभूतिका दर्शन किया था। मणिद्वीपमें मन्दारवृक्षके
नीचे चल रहे रासमण्डलमें एकत्रित सभामें भी वह
विभूति साक्षात् देखी गयी थी; न कि वह केवल
कही-सुनी गयी बात है ॥ ५-६॥
अतएव इस अवसरपर सभी देवता उसी परमा
शक्ति, कल्याणकारिणी, सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली,
माया-स्वरूपिणी तथा परमात्माको आद्याशक्ति
भगवतीका स्मरण करें॥ ७॥
व्यासजी बोले- भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर
ब्रह्मा आदि देवता सदा विराजमान रहनेवाली भगवती
योगमायाका एकाग्र मनसे ध्यान करने लगे॥ ८॥
उनके स्मरण करते ही भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष
दर्शन प्रदान किया। उस समय वे देवी जपाकुसुमके
| समान रक्तवर्णसे सुशोभित थीं और उन्होंने पाश,
| अंकुश, वर तथा अभय मुद्रा धारण कर रखी थी। उन
परम सुन्दर भगवतीको देखकर सभी देवता अत्यन्त
प्रसन्न हुए और उनकी स्तुति करने लगे॥ ९॥
देवता बोले—जिस प्रकार मकड़ीको नाभिसे
तन्तु तथा अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी
प्रकार यह जगत् जिनसे प्रकट हुआ है, उन भगवतीको
हम नमस्कार करते हैं ॥ १०॥
जिनकी मायाशक्तिसे सम्पूर्ण चराचर जगत्
पूर्णतः ओत-प्रोत है, उन चित्स्वरूपिणी करुणासिन्थु
भुवनेश्वरीका हम स्मरण करते हैं॥ ११॥
जिन्हें न जाननेसे संसारमें बार-बार जन्म होता
रहता है और जिनका ज्ञान हो जानेसे भव-बन्धनका
नाश हो जाता है, उन ज्ञानस्वरूपिणी भगवतीका हम
स्मरण करते हैं। वे हमें [सन्मार्गपर चलनेके लिये]
४९२ श्रीमहेवीभागवत [ अ० १९
महालक्ष्म्यै च विदाहे सर्वशक्त्यै च धीमहि। प्रेरित करें। हम उन महालक्ष्मीको जानें। हम सर्वशक्तिमयी
तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ १३ | भगवतीका ध्यान करते हैं । वे भगवती हमें [ सत्कर्ममें
मातर्नताः स्म॒ भुवनार्तिहरे प्रसीद
शन्नो विधेहि कुरु कार्यमिदं दयार्द्र ।
भारं हरस्व विनिहत्य सुरारिवर्ग
मह्या महेश्वरि सतां कुरु शं भवानि॥ १४
यद्यम्बुजाक्षि दयसे न सुरान्कदाचित्
किं ते क्षमा रणमुखेऽसिशरैः प्रहर्तुम्।
एतत्त्वयैव गदितं ननु यक्षरूपं
धृत्वा तृणं दह हुताश पदाभिलाषैः॥ १५
कंसः कुजोऽथ यवनेन्द्रसुतश्च केशी
बाईद्रथो बकबकीखरशाल्वमुख्याः।
येऽन्ये तथा नृपतयो भुवि सन्ति तांस्त्वं
हत्वा हरस्व जगतो भरमाशु मातः॥ १६
ये विष्णुना न निहताः किल शङ्करेण
ये वा विगृह्य जलजाक्षि पुरन्दरेण।
ते ते मुखं सुखकरं सुसमीक्षमाणाः
संख्ये शरैर्विनिहता निजलीलया ते॥ १७
शक्तिं विना हरिहरप्रमुखाः सुराश्च
नैवेश्वरा विचलितुं तव देवदेवि।
किं धारणाविरहितः प्रभुरप्यनन्तो
धर्तु धराञ्च रजनीशकलावतंसे॥ १८
इनद्र उवाच
वाचा विना विधिरलं भवतीह विश्वं
कर्तुं हरिः किमु रमारहितोऽथ पातुम्।
संहर्तुमीश उमयोज्झित ईश्वरः किं
ते ताभिरेव सहिताः प्रभवः प्रजेशाः॥ १९
प्रवृत्त होनेको ] प्रेरणा प्रदान करें॥ १२-१३॥
संसारका कष्ट हरनेवाली हे माता! हम आपको
प्रणाम करते हैं, आप प्रसन्न होइये। हे दयासे आद्र
हृदयवाली ! हमारा कल्याण कीजिये; हमारा यह कार्य
सम्पन्न कर दीजिये। हे महेश्वरि! असुर-समुदायका
संहार करके पृथ्वीका भार उतार दीजिये। हे भवानि !
आप सञ्जनोंका कल्याण करें॥ १४॥
हे कमलनयने! यदि आप देवताओंपर दया
नहीं करेंगी तो वे समरांगणमें तलवारों तथा बाणोंसे
[दैत्योंपर] प्रहार करनेमें समर्थ कैसे हो सकेंगे?
इस बातको आपने स्वयं [ यक्षोपाख्यान- प्रसंगमें ]
यक्षरूप धारण करके ’ हे हुताशन! आप इस तिनकेको
जला दें’ इत्यादि पद-कथनोंके द्वारा व्यक्त कर
दिया है॥ १५॥
हे माता! कंस, भौमासुर, कालयवन, केशी,
बृहद्रथ-पुत्र जरासन्ध, बकासुर, पूतना, खर और
शाल्व आदि तथा इनके अतिरिक्त और भी जो दुष्ट
राजागण पृथ्वीपर हैं, उन्हें मारकर आप शीघ्र ही
पृथ्वीका भार उतार दीजिये॥ १६॥
हे कमलनयने! जिन दैत्योंको भगवान् विष्णु,
शिव और इन्द्र भी [कई बार] युद्ध करके नहीं मार
सके, वे दैत्य युद्धभूमिमें आपका सुखदायक
मुखमण्डल देखते हुए आपकी लीलासे आपके
बाणोंके द्वारा मार डाले गये॥ १७॥
चन्द्रकलाको मस्तकपर धारण करनेवाली हे
देवदेवि | विष्णु, शिव आदि प्रमुख देवता भी आपकी
शक्तिके बिना हिलने-डुलनेतकमें समर्थ नहीं हैं। इसी
प्रकार क्या शेषनाग भी आपकी शक्तिके बिना
पृथ्वीको धारण कर सकनेमें समर्थ हैं ?॥ १८॥
इन्द्र बोले [हे माता!] क्या सरस्वतीके
बिना ब्रह्मा इस विश्वकी सृष्टि करनेमें, लक्ष्मीके बिना
विष्णु पालन करनेमें और पार्वतीके बिना शिवजी
संहार करनेमें समर्थ हो सकते हैं ? बे महान् देवगण
उन्हीं [तीनों महाशक्तियों]-के साथ अपना-अपना
कार्य कर सकनेमें समर्थ होते हैं ॥ १९॥
अ० १९]
विष्णुरुवाच
कर्तु प्रभुर्न द्रुहिणो न कदाचनाहं
नापीश्वरस्तव कलारहितस्त्रिलोक्या: ।
कर्तु प्रभुत्वमनघेऽत्र तथा विहर्तु
त्वं बै समस्तविभवेश्वरि भासि नूनम्॥ २०
व्यास उवाच
एवं स्तुता तदा देवी तानाह विबुधेशवरान्।
किं तत्कार्य वदन्त्वद्य करोमि विगतज्चराः॥ २१
असाध्यमपि लोकेऽस्मिंस्तत्करोमि सुरेप्सितम् ।
शंसन्तु भवतां दुःखं धरायाश्च सुरोत्तमाः॥ २२
देवा ऊचुः
वसुधेयं भराक्रान्ता सम्प्राप्ता विबुधान्प्रति ।
रुदती वेपमाना च पीडिता दुष्टभूभुजैः॥ २३
भारापहरणं चास्याः कर्तव्यं भुवनेश्वरि।
देवानामीप्सितं कार्यमेतदेवाधुना शिवे॥ २४
घातितस्तु पुरा मातस्त्वया महिषरूपभृत्।
दानवोऽतिबलाक्रान्तस्तत्सहायाश्च कोटिशः ॥ २५ ’ हे
दानव महिषासुरका वध कर चुकी हैं । इसके अतिरिक्त
तथा शुम्भो निशुम्भश्च रक्तबीजस्तथापरः।
चण्डमुण्डौ महावीर्यौ तथैव धूम्रलोचनः॥ २६
दुर्मुखो दुःसहश्चैव करालश्चाति वीर्यवान्।
अन्ये च बहवः क्ूरास्त्वयैव च निपातिताः॥ २७
तथैव च सुरारींशच जहि सर्वान्महीश्वरान्।
( भारं हर धरायाश्च दुर्धरं दुष्टभूभुजाम्। )
व्यास उवाच
इत्युक्ता सा तदा देवी देवानाहाम्बिका शिवा॥ २८
सम्प्रहस्यासितापाङ्गी मेघगम्भीरया गिरा।
श्रीदेव्युवाच
मयेदं चिन्तितं पूर्वमंशावतरणं सुरा: ॥ २९
भारावतरणं चैव यथा स्याहुष्टभूभुजाम्।
मया सर्वे निहन्तव्या दैत्येशा ये महीभुजः॥ ३०
चतुर्थ स्कन्ध
४९३
विष्णु बोले-हे अनघे! आपको कलासे
रहित होकर न तो ब्रह्मा इस त्रिलोकीको रचना कर
सकनेमें, न तो मैं इसका पालन कर सकनेमें और न
तो शिव इसका संहार कर सकनेमें समर्थ हैं। हे
समस्त विभवोंकी स्वामिनि! इसका सृजन, पालन
तथा संहार करनेमें समर्थ निश््चितरूपसे आप ही
प्रतीत होती हैं ॥ २०॥
व्यासजी बोले इस प्रकार उन देवताओंने
जब देवीकी स्तुति की, तब उन्होंने उन देवेश्वरोंसे
कहा—वह कौन-सा कार्य है? आपलोग सन्तापरहित
होकर बतायें, मैं अभी करूँगी। इस संसारमें देवताओंके
द्वारा अभिलषित जो असाध्य कार्य भी होगा, उसे मैं
करूँगी। हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग अपना तथा
पृथ्वीका दुःख मुझे बताइये॥ २१-२२॥
देवता बोले—दुष्ट राजाओंसे पीड़ित यह
पृथ्वी उनके भारसे व्याकुल होकर रोती तथा थर-थर
काँपती हुई हम देवताओंके पास आयी। हे भुवनेश्वरि !
आप इसका भार उतार दें। हे शिवे! इस समय हम
देवताओंका यही अभीष्ट कार्य है॥ २३-२४॥
हे माता! पूर्वकालमें आप अत्यधिक बलसम्पन्न
आप उसके करोड़ों सहायकों, शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज,
महाबली चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, दुमुंख, दुःसह,
अतिशय बलवान् कराल तथा दूसरे भी अनेक क्रूर
दानवोंको मार चुकी हैं। उसी प्रकार आप हम
देवताओंके शत्रुरूप सभी दुष्ट राजाओंका वध कोजिये।
(दुष्ट राजाओंका वध करके पृथ्वीका दुःसह भार
उतार दीजिये) ॥ २५-२७३ ॥
व्यासजी बोले—[हे राजन्!] देवताओंके
ऐसा कहनेपर नीले नेत्रप्रान्तवाली कल्याणमयी भगवती
हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे कहने
लगीं-॥ २८३ ॥
श्रीदेवी बोलीं हे देवताओ! मैंने यह पहलेसे
ही सोच रखा है कि मैं अंशावतार धारण करू,
जिससे पृथ्वीपरसे दुष्ट राजाओंका भार उतर जाय।
हे महाभाग देवताओ! मन्द तेजवाले जरासन्ध आदि
जो बड़े-बड़े दैत्य राजागण हैं, उन सबको मैं अपनी
४९४
श्रीमददेवी भागवत
[ अ० ९९
मागधाद्या महाभागा: स्वशक्त्या मन्दतेजसः।
भवद्भिरपि स्वैरंशैरवती्यं धरातले॥ ३१
मच्छक्तियुक्तैः कर्तव्यं भारावतरणं सुराः।
कश्यपो भार्यया सार्ध दिविजानां प्रजापतिः ॥ ३२
यादवानां कुले पूर्वं भवितानकदुन्दुभि: ।
तथैव भृगुशापाद्दे भगवान्विष्णुरव्ययः॥ ३३
अंशेन भविता तत्र वसुदेवसुतो हरिः।
तदाहं प्रभविष्यामि यशोदायां च गोकुले॥ ३४
कार्य सर्व करिष्यामि सुराणां सुरसत्तमाः।
कारागारे गतं विष्णुं प्रापयिष्यामि गोकुले॥ ३५
शेषं च देवकोगर्भात्प्रापयिष्यामि रोहिणीम्।
मच्छक्त्योपचितौ तौ च कर्तारौ दुष्टसंक्षयम्॥ ३६
दुष्टानां भूभुजां कामं द्वापरान्ते सुनिश्चितम्।
इनद्रांशोऽप्यर्जुनः साक्षात्करिष्यति बलक्षयम्॥ ३७
धर्माशोऽपि महाराजो भविष्यति युधिष्ठिरः।
वाख्बंशो भीमसेनश्चाश््चिन्यंशो च यमावपि॥ ३८
बसोरंशोऽथ गाङ्गेयः करिष्यति बलक्षयम्।
व्रजन्तु च भवन्तोऽद्य धरा भवतु सुस्थिरा॥ ३९
भारावतरणं नूनं करिष्यामि सुरोत्तमाः।
कृत्वा निमित्तमात्रांस्तान्स्वशक्त्याहं न संशय: ॥ ४०
कुरुक्षेत्रे करिष्यामि क्षत्रियाणां च संक्षयम्।
असूयेर्ष्या मतिस्तृष्णा ममताभिमता स्पृहा॥ ४१
जिगीषा मदनो मोहो दोषैर्नक्ष्यन्ति यादवा:।
ब्राह्मणस्य च शापेन वंशनाशो भविष्यति॥ ४२
भगवानपि शापेन त्यक्ष्यत्येतत्कलेवरम्।
भवन्तोऽपि निजाङ्कैश्च सहायाः शार्डुधन्बन: ॥ ४३
प्रभवन्तु सनारीका मथुरायां च गोकुले।
शक्तिसे मार डालूँगी। हे देवतागण! आपलोग भ
अपने-अपने अंशोंसे पृथ्वीपर अवतार लेकर मेर
शक्तिसे युक्त होकर भार उतारें॥ २९-३१ ॥
मेरे अवतार लेनेसे पूर्व देवताओंके प्रजापति
कश्यप अपनी पत्नीके साथ यदुकुलमें वसुदेव नाममे
अवतीर्ण होंगे। उसी प्रकार भृगुके शापसे अविनाशी
भगवान् विष्णु अपने अंशसे वहींपर वसुदेवके पुत्रक
रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ३२-३३३ ॥
हे श्रेष्ठ देवताओ! उस समय मैं भी गोकुलमें
यशोदाके गर्भसे उत्पन्न होऊँगी और देवताओंका
सारा कार्य सिद्ध करूँगी। कारागारमें अवतीर्ण हुए
[कृष्णरूपधारी] विष्णुको मैं गोकुलमें पहुँचा दूँगी
और देवकीके गर्भसे शेषभगवानूको खींचकर रोहिणीके
गर्भमें स्थापित कर दूँगी । मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर
वे दोनों ही दुष्टोंका विनाश करेंगे । द्वापरके व्यतीत
होते ही दुष्ट राजाओंका पूर्णरूपसे संहार बिलकुल
निश्चित है॥ ३४-३६३ ॥
साक्षात् इन्द्रके अंशस्वरूप अर्जुन भी [उन दुष्ट
राजाओंके] बलका नाश करेंगे। धर्मके अंशरूप
महाराज युधिष्ठिर, वायुके अंशरूप भीमसेन तथा
दोनों अश्विनीकुमारोंके अंशरूप नकुल-सहदेव भी
उत्पन्न होंगे। [उसी समय] वसुके अंशसे अवतीर्ण
गंगापुत्र भीष्म उन दुष्ट राजाओंकी शक्ति नष्ट
करेंगे॥ ३७-३८ ३ ॥
हे श्रेष्ठ देवतागण! अब आपलोग जायँ और
पृथ्वी भी निश्चिन्त होकर रहे। मैं उन अंशावतारी
लोगोंको निमित्तमात्र बनाकर अपनी शक्तिसे इस
| पृथ्वीका भार दूर करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है। मैं
| क्षत्रियोंका यह संहार कुरुक्षेत्रमें करूँगी ॥ ३९-४०३ ॥
असूया, ईर्ष्या, बुद्धि, तृष्णा, ममता, अपनी प्रिय
वस्तुकौ इच्छा, स्पृहा, विजयकी अभिलाषा, काम
और मोह—इन दोषोंके कारण सभी यादव नष्ट हो
जायँगे। ब्राह्मणके शापसे उनके वंशका नाश हो
जायगा और उसी शापवश भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने
शरीरका त्याग कर देंगे। अब आपलोग भी अपनी
शक्तिस्वरूपा भायांओंसहित अपने-अपने अंशोंसे मथुरा
तथा गोकुलमें अवतरित हों और शाङ्गपाणि भगवान्
विष्णुके सहायक बनें ॥ ४१-४३ ॥
अ० २० ]
व्यास उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी योगमाया परात्मनः॥ ४४
सधरा वै सुराः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि च।
धरापि सुस्थिरा जाता तस्या वाक्येन तोषिता॥ ४५
ओषधीवीरुधोपेता बभूव जनमेजय।
प्रजाश्च सुखिनो जाता द्विजाश्चापुर्महोदयम्।
सन्तुष्टा मुनयः सर्वे बभूवुर्धर्मतत्परा: ॥ ४६
चतुर्थ स्कन्ध
४९५
व्यासजी बोले—ऐसा कहकर परमात्माको
योगमाया भगवती अन्तर्धान हो गयीं । तदनन्तर पृथ्वीसहित
सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। पृथ्वी भी
उन भगवतीकी वाणीसे सन्तुष्ट होकर शान्तचित्त हो
गयी। हे जनमेजय! वह औषधियों और लताओंसे
सम्पन्न हो गयी। प्रजाएँ सुखी हो गयीं, द्विजगणोंकी
महान् उन्नति होने लगी और सभी मुनिगण सन्तुष्ट
होकर धर्मपरायण हो गये ॥ ४४—४६॥
इति श्रीमद्देवीभायवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रथां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
देवान् प्रति देवीवाक्यवर्णनं नामैकोनविंशोउथ्याय: ॥ १९॥
तस्स
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