Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ सप्तमोऽध्यायः
श्ृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र,
गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा
माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका
महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना,
देवीको कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारत-युद्धमें मरे
कौरवों-पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना
सूत उवाच
पञ्चानां द्रौपदी भार्या सा मान्या सा पतिव्रता।
पञ्च पुत्रास्तु तस्याः स्युभर्तृभ्योऽतीव सुन्दराः ॥
अर्जुनस्य तथा भार्या कृष्णस्य भगिनी शुभा।
सुभद्रा या हता पूर्व जिष्णुना हरिसम्मते॥
तस्यां जातो महावीरो निहतोऽसौ रणाजिरे।
अभिमन्युर्हतास्तत्र द्रौपद्याश्च सुताः किल॥
अभिमन्योर्वरा भार्या वैराटी चातिसुन्दरी।
कुलान्ते सुषुवे पुत्रं मृतो बाणाग्निना शिशुः ॥
जीवितः स तु कृष्णेन भागिनेयसुतः स्वयम्।
ब्रौणिबाणाग्निनिर्दग्धः प्रतापेनाद्भुतेन च॥
परिक्षीणेषु वंशेषु जातो यस्माद्वर:ः सुतः।
तस्मात्परीक्षितो नाम विख्यातः पृथिवीतले ॥
निहतेषु च पुत्रेषु धृतराष्ट्रोऽतिदुःखितः।
तस्थौ पाण्डवराज्ये च भीमवाग्बाणपीडित: ॥
गान्धारी च तथातिष्ठत् पुत्रशोकातुरा भृशम्।
सेवां तयोर्दिवारात्रं चकारार्तो युधिष्ठिरः ॥
विदुरोऽप्यतिधर्मात्मा प्रज्ञानेत्रमबोधयत्।
युधिष्ठिरस्यानुमते भ्रातृपार्श्वे व्यतिष्ठत॥
५
सूतजी बोले [हे मुनिगण !] माननीया द्रौपदी
उन पाँचों पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी थी । उन द्रौपदीको
अत्यन्त सुन्दर पाँच पुत्र उन पतियोंसे उत्पन्न हुए ॥ १॥
अर्जुनको एक दूसरी सुन्दर पत्नी श्रीकृष्णकी
| बहन सुभद्रा थीं, जिन्हें अर्जुने पूर्वकालमें भगवान्
श्रीकृष्णको अनुमतिसे हर लिया था॥ २॥
उन्हीं सुभद्राके गर्भसे महान् वीर अभिमन्युका
जन्म हुआ। वह संग्राम-भूमिमें मारा गया था। उसी
युद्धमें द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी मारे गये थे॥ ३॥
वीर अभिमन्युको श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुन्दर
पत्नी महाराज विराटकी पुत्री उत्तरा थी। [महाभारतके
युद्धमें] कुरुकुलका नाश हो जानेपर उसने एक पुत्र
उत्पन्न किया था; वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी
बाणाग्निसे [पहले गर्भमें ही] मर गया था, किंतु
बादमें भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे
निर्दग्ध अपने भांजेके पुत्रको अपने अद्भुत प्रतापसे
पुनः जीवित कर दिया था॥ ४-५॥
कुरुवंशके समाप्त होनेपर वह श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न
हुआ था; इसलिये वह बालक “परीक्षित् नामसे
पृथ्वीतलपर प्रसिद्ध हुआ॥ ६॥
अपने सौ पुत्रोके मारे जानेपर अत्यन्त दुःखित
राजा धृतराष्ट्र भीमके वागबाणोंसे सन्तप्त रहते हुए
अब पाण्डवोंके राज्यमें रहने लगे। वैसे ही गान्धारी
भी अत्यन्त दुःखी होकर जीवन-यापन करने लगी।
दुःखित युधिष्ठिर दिन-रात उन दोनोंकी सेवा
करने लगे ॥ ७-८॥
महान् धर्मात्मा विदुर युधिष्ठिरकी अनुमतिसे
अपने भाई धृतराष्ट्रके पासमें ही रहते थे और वे उन
प्रज्ञाचक्षुको समझाते-बुझाते रहते थे॥ ९॥
अ० ७]
धर्मपुत्रो$पि धर्मात्मा चकार सेवनं पितुः।
पुत्रशोकोद्भवं दुःखं तस्य विस्मारयन्निव॥ १०
यथा श्रृणोति वृद्धोऽसौ तथा भीमोऽतिरोषितः।
वाग्बाणेनाहनत्तं तु श्रावयन्संस्थिताञ्जनान्॥ १९
मया पुत्रा हताः सर्वे दुष्टस्यान्धस्य ते रणे।
दुःशासनस्य रुधिरं पीतं हृद्यं तथा भृशम्॥ १२
भुनक्ति पिण्डमन्धोऽयं मया दत्तं गतत्रपः।
ध्वांक्षवद्वा शववच्चापि वृथा जीवत्यसौ जन: ॥ १३
एवंविधानि रूक्षाणि श्रावयत्यनुवासरम्।
आश्वासयति धर्मात्मा मूर्खोऽयमिति च ब्रुवन्॥ १४
अष्टादशैव वर्षाणि स्थित्वा तत्रैव दुःखितः।
धृतराष्ट्रो वने यानं प्रार्थयामास धर्मजम्॥ १५
अयाचत धर्मपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः।
पुत्रेभ्योऽहं ददाम्यद्य निर्वापं विधिपूर्वकम्॥ १६
वृकोदरेण सर्वेषां कृतमत्रौर्ध्वदैहिकम्।
न कृतं मम पुत्राणां पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ १७
ददासि चेद्धनं मह्यं कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।
गमिष्येऽहं वनं तप्तुं तपः स्वर्गफलप्रदम्॥ १८
एकान्ते विदुरेणोक्तो राजा धर्मसुतः शुचि: ।
धनं दातुं मनश्चक्रे धृतराष्ट्राय चार्थिने॥ १९
समाहूय निजान्सर्वानुवाच पृथिवीपतिः।
धनं दास्ये महाभागाः पित्रे निर्वापकामिने॥ २०
तच्छुत्वा वचनं श्रातुर्ज्येष्ठस्यामिततेजसः ।
संग्रहेऽस्य महाबाहुर्मारुतिः कुपितोऽब्रवीत्॥ २१
धनं देयं महाभाग दुर्याधनहिताय किम्।
अन्धोऽपि सुखमाप्नोति मूर्खत्वं किमतः परम्॥ २२
द्वितीय स्कन्ध
२०९
धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने पितातुल्य
धृतराष्ट्रके पुत्रशोकजनित दुःखको विस्मारित कराते
हुए उनकी सेवा करने लगे॥ १०॥
जिस किसी भी प्रकार यह वृद्ध धृतराष्ट्र सुन ले
[यह ध्यानमें रखकर] भीम अत्यन्त क्रोधित होकर अपने
वचनरूपी बाणोंसे उनपर सर्वदा प्रहार किया करते थे।
वहाँ उपस्थित लोगोंको सुना-सुनाकर भीम कहा करते
थे कि मैंने इस दुष्ट अन्धेके सभी पुत्रोंको रणभूमिमें मार
डाला और दु:शासनके हृदयका रक्त जी-भरके पी लिया
है । अब यह अन्धा निर्लज्ज होकर मेरे दिये हुए पिण्डको
कौओं एवं कुत्तोंकी भाँति खाता है। अब तो यह व्यर्थ
ही जीवन बिता रहा है॥ ११-१३॥
भीम इस प्रकारकी कठोर बातें प्रतिदिन उन्हें सुनाते
थे; परंतु धर्मात्मा युधिष्ठिर यह कहते हुए धृतराष्ट्रको
धैर्य प्रदान करते थे कि यह भीम मूर्ख है ॥ १४॥
इस प्रकार उस दु:खी धृतराष्ट्रने अठारह वर्षतक
वहाँ रहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे वनमें जानेकी इच्छा
प्रकट को | महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यह
भी प्रार्थना को कि अब में अपने पुत्रोंके लिये विधि-
पूर्वक पिण्डदान करूँगा। यद्यपि भीमने सभीका
और्ध्वदैहिककर्म कर दिया था, किंतु पूर्व वैरका
स्मरण करते हुए उन्होंने मेरे पुत्रोंका नहीं किया।
अतः यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं अपने पुत्रोंका
और्ध्वदैहिककर्म करके स्वर्गफल देनेवाला तप करनेके
लिये वनमें चला जाऊँगा॥ १५-१८॥
विदुरने भी एकान्तमें पवित्रात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे
जब ऐसा कहा तब उन्होंने धनार्थी धृतराष्ट्रको धन
देनेका निश्चय कर लिया। राजा युधिष्ठिरने परिवारके
सभी जनोंको बुलाकर कहा-हे महाभाग! मैं कोरवोंका
श्राद्ध करनेके इच्छुक ज्येष्ठ पिताको धन प्रदान
करूँगा॥ १९-२०॥
महातेजस्वी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरका वचन
सुनकर वायुपुत्र महाबली भीमने अत्यन्त क्रोधित
होकर कहा-हे महाभाग! दुर्योधनके कल्याणके
लिये राजकोषका धन क्यों दिया जाय? इससे अन्धे
धृतराष्ट्रको भी सुख मिलेगा; इससे बड़ी मूर्खता और
कया होगी ?॥ २१-२२॥
२९०
श्रीमहेवी भागवत
[ अठ ७
एॅऑॅारिॉकारशारशारशाशिशिशिशिशिशिशॉलसि”?0ि”र्॑॑ूः?णॉरॉ््?रॉरपपफ्क्क्त्ू—:::क्क्व्वननवननवववंनबुंं॑नर:॑नखूेवूळरळलू—ू
तव दुर्मन्त्रितेनाथ दुःखं प्राप्ता बने बयम्।
द्रौपदी च महाभागा समानीता दुरात्मना॥ २३
विराटभवने वासः प्रसादात्तव सुत्रत।
दासत्वं च कृतं सर्वैर्मत्स्यस्यामितविक्रमैः॥ २४
देविता त्वं न चेज्ज्येष्ठः प्रभवेत्संक्षयः कथम्।
सूपकारो विराटस्य हत्वाभूवं तु मागधम्॥ २५
बृहन्नला कथं जिष्णुर्भवेद् बालस्य नर्तकः।
कृत्वा वेषं महाबाहुर्योषाया वासवात्मजः ॥ २६
गाण्डीवशोभितौ हस्तौ कृतौ कङ्कणशोभितौ।
मानुषं च वपुः प्राप्य किं दुःखं स्यादतः परम् ॥ २७
दृष्ट्वा वेणीं कृतां मूर्धिन कजलं लोचने तथा।
असिं गृहीत्वा तरसा छेदाचहं नान्यथा सुखम्॥ २८
अपृष्ट्वा च महीपालं निक्षिप्तोऽग्निर्मया गृहे।
दग्धुकामश्च पापात्मा निर्द्ग्धोऽसौ पुरोचनः ॥ २९
कीचका निहताः सर्वे त्वामपृष्ट्वा जनाधिप।
न तथा निहताः सर्वे सभार्या धृतराष्ट्रजाः ॥ ३०
मूर्खत्वं तव राजेन्द्र गन्धर्वेभ्यश्च मोचिताः।
दुर्योधनादयः कामं शत्रवो निगडीकृताः॥ ३१
दुर्योधनहितायाद्य धनं दातुं त्वमिच्छसि।
नाहं ददे महीपाल सर्वथा प्रेरितस्त्वया॥ ३२
इत्युक्त्वा निर्गते भीमे त्रिभिः परिवृतो नृपः।
ददौ वित्तं सुबहुलं धृतराष्ट्राय धर्मजः॥ ३३
आपको दूषित मन्त्रणाके फलस्वरूप ही
हमलोगोंने वनवासका कठोर कष्ट सहा। दुरात्मा
दुःशासन महारानी द्रौपदीको अपमानपूर्वक सभामें
खींच लाया॥ २३॥
हे सुव्रत! आपकी कृपासे ही हमलोगोंको विराट
राजाके घर रहना पड़ा तथा हम अमित पराक्रमवालोंको
मत्स्यदेशके राजाको दासता करनी पड़ी थी॥ २४॥
हम सबमें ज्येष्ठ आप यदि जुआ न खेलते तो
हम लोगोंकी दुर्गति क्यों होती ? मगधनरेश जरासंधका
वध करनेवाले मुझको राजा विराटके यहाँ रसोइया
बनना पड़ा॥ २५ ॥
आपके ही कारण इन्द्रपुत्र महाबाहु अर्जुनको विराट
राजाके यहाँ स्त्रीका रूप धारण करके उनके बच्चोंको
नृत्यकी शिक्षा देनेके लिये बृहन्नला बनना पड़ा | गाण्डीव
धनुषके स्थानपर अर्जुनको अपने हाथोंमें कंकण
धारण करना पड़ा। मनुष्यका शरीर पाकर भला इससे
बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है ? अर्जुनके सिरपर
। चोटी और आँखोंमें काजलकी बातका स्मरण करके
तो मनमें यही आता है कि मैं अभी तलवार लेकर
शीघ्र ही धृतराष्ट्रका सिर काट दूँ; इसके अतिरिक्त
मुझे शान्ति नहीं मिल सकती ॥ २६-२८॥
आप महाराजसे बिना पूछे ही मैंने लाक्षागृहमें
अग्नि लगा दी थी, जिससे हमलोगोंको जलानेकी
इच्छावाला वह पापी पुरोचन स्वयं जल गया॥ २९॥
हे राजन्! मैंने आपसे परामर्श किये बिना ही
जैसे सभी कीचकोंका वध कर डाला, वैसे ही
स्त्रियोंसमेत धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका भी वध मैं नहीं
कर पाया॥ ३०॥
हे राजेन्द्र! यह आपकी नासमझी ही थी कि
जब गन्धर्वोने दुर्योधन आदि हमारे शत्रुओंको बन्दी
बना लिया था, तब आपने ही उन्हें छुड़ा दिया॥ ३१॥
हे राजन्! आज पुनः उसी दुष्ट दुर्योधनके
कल्याणके लिये आप धन देनेकी इच्छा कर रहे हैं।
आपके कहनेपर भी मैं उन्हें धन नहीं देने दूँगा ॥ ३२॥
ऐसा कहकर भीमके चले जानेपर धर्मपुत्र
युधिष्ठिरने [ अर्जुन, नकुल तथा सहदेव-इन] तीनोंकी
सम्मति लेकर धृतराष्ट्रको बहुत-सा धन दे दिया॥ ३३ ॥
अ० ७]
कारयामास विधिवत्पुत्राणां चौर्ध्वदैहिकम्।
ददौ दानानि विप्रेभ्यो धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः॥ ३४
कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्व गान्धारीसहितो नृपः।
प्रविवेश वनं तूर्ण कुन्त्या च विदुरेण च॥ ३५
सञ्जयेन परिज्ञातो निर्गतोऽसौ महामतिः।
ुत्रर्निवार्यमाणापि शूरसेनसुता गता॥ ३६
विलपन्थीमसेनोऽपि तथान्ये चापि कौरवाः ।
गङ्कातीरात्परावृत्य ययुः सर्वे गजाह्वयम्॥ ३७
ते गत्वा जाह्वीतीरे शतयूपाश्रमं शुभम्।
कृत्वा तृणैः कुटीं तत्र तपस्तेपुः समाहिताः॥ ३८
गतान्यब्दानि षट् तेषां यदा याता हि तापसाः ।
युधिष्ठिरस्तु विरहादनुजानिदमन्रवीत्॥ ३९
स्वप्ने दृष्टा मया कुन्ती दुर्बला वनसंस्थिता।
मनो मे जायते द्रष्टुं मातरं पितरौ तथा॥ ४०
विदुरं च महात्मानं सञ्जयं च महामतिम्।
रोचते यदि वः सर्वान् व्रजाम इति मे मतिः ॥ ४१
ततस्ते भ्रातरः सर्वे सुभद्रा द्रौपदी तथा।
बैराटी च महाभागा तथा नागरिको जन:॥ ४२
प्राप्ताः सर्वजनैः सार्ध पाण्डवा दर्शनोत्सुकाः।
शतयूपाश्रमं प्राप्य ददूशुः सर्व एव ते॥ ४३
विदुरो न यदा दृष्टो धर्मस्तं पृष्टवांस्तदा।
क्वास्ते स विदुरो धीमांस्तमुवाचाम्बिकासुतः ॥ ४४
विरक्तश्चरते क्षत्ता निरीहो निष्परिग्रहः।
कुतोऽप्येकान्तसंवासी ध्यायतेऽन्तः सनातनम्॥ ४५
द्वितीय स्कन्ध
२१९
तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने धन लेकर अपने
पुत्रोंका विधिवत् श्राद्धकर्म कराया और ब्राह्मणोंको
विविध दान दिये॥ ३४॥
इस प्रकार अपने पुत्रोंका श्राद्धकर्म करके
गान्धारीसहित महाराज धृतराष्ट्र कुन्ती तथा विदुरके
साथ शीघ्र ही वनमें चले गये॥ ३५॥
संजयद्वारा सबको यह समाचार मिला कि
महामति धृतराष्ट्र बनमें जा रहे हैं, उस समय अपने
पुत्रोंके मना करनेपर भी शूरसेनकी पुत्री कुन्ती उनके
साथ चली गयी॥ ३६॥
यह देखकर भीम भी रोने लगे। वे तथा
अन्यान्य सभी कौरव उन लोगोंको गंगातटतक पहुँचाकर
पुनः हस्तिनापुरको लौट आये॥ ३७॥
तत्पश्चात् धृतराष्ट्र आदि गंगातटपर स्थित शुभ
शतयूप-आश्रममें पहुँचे और वहाँ पर्णकुटी बनाकर
एकचित्त हो तपस्या करने लगे॥ ३८॥
जब वे तपस्वी चले गये और इस प्रकार छः
वर्ष बीत गये, तब उनके विरहसे सन्तप्त युधिष्ठिर
अपने भाइयोंसे कहने लगे—मैंने स्वप्न देखा है कि
वनमें रहती हुई माता कुन्ती अत्यन्त दुर्बल हो गयी
हैं, अत: माता तथा पितृजनोंको देखनेकी मनमें इच्छा
हो रही है। साथ ही महात्मा विदुर तथा महाबुद्धिमान्
संजयसे भी मिलनेकी मेरी इच्छा है। यदि आप
लोगोंको भी यह उचित प्रतीत होता हो तो हमलोग
वहाँ चलें-ऐसा मेरा विचार है॥ ३९-४१ ॥
तब वे सभी भाई, सुभद्रा, द्रौपदी, महाभागा
उत्तरा तथा अन्यान्य नागरिकजन वहाँ एकत्र हुए।
दर्शनके लिये उत्सुक उन पाण्डवोंने सभी लोगोंके
साथ शतयूप-आश्रममें जाकर धृतराष्ट्र आदिको
देखा॥ ४२-४३॥
वहाँ जब विदुरजी दिखायी नहीं दिये, तब
धर्मराज युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे पूछा-वे बुद्धिमान्
विदुरजी कहाँ हैं ? तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने उनसे
कहा—विदुर तो विरक्त एवं निष्काम होकर तथा सब
कुछ त्यागकर कहीं एकान्तमें रहते हुए अन्तःकरणे
परमात्माका ध्यान कर रहे होंगे ॥ ४४-४५॥
२१२
श्रीमहेबीभागवत
[ अ० ७
गङ्गां गच्छन्द्वितीये5ह्वि वने राजा युधिष्ठिर: ।
ददर्श विदुरं क्षामं तपसा संशितव्रतम्॥ ४६
दृष्ट्बोवाच महीपालो वन्देऽहं त्वां युधिष्ठिरः ।
तस्थौ श्रुत्वा च विदुरः स्थाणुभूत इवानघः ॥ ४७
क्षणेन विदुरस्यास्यान्निःसृतं तेज अद्भुतम्।
लीनं युधिष्ठिरस्यास्ये धर्माशत्वात्परस्परम्॥ ४८
क्षत्ता जहौ तदा प्राणाञ्छुशोचाति युधिष्ठिर: ।
दाहार्थं तस्य देहस्य कृतवानुद्यमं नृपः॥ ४९
शृण्वतस्तु तदा राज्ञो वागुवाचाशरीरिणी।
विरक्तोऽयं न दाहाहों यथेष्टं गच्छ भूपते॥ ५०
श्रुत्वा ते भ्रातरः सर्वे सस्नुर्गङ्लाजलेऽमले।
गत्वा निवेदयामासुर्धृतराष्ट्राय विस्तरात्॥ ५१
स्थितास्तत्राश्रमे सर्वे पाण्डवा नागरैः सह।
तत्र सत्यवतीसूनुर्नारदश्च समागतः॥ ५२
मुनयोऽन्ये महात्मानश्चागता धर्मनन्दनम्।
कुन्ती प्राह तदा व्यासं संस्थितं शुभदर्शनम्॥ ५३
कृष्ण कर्णस्तु पुत्रो मे जातमात्रस्तु वीक्षितः।
मनो मे तप्यतेऽत्यर्थं दर्शयस्व तपोधन॥ ५४
समर्थोऽसि महाभाग कुरु मे वाञ्छितं प्रभो।
गान्धार्युवाच
दुर्योधनो रणेऽगच्छद्वीक्षितो न मया मुने॥ ५५
तं दर्शय मुनिश्रेष्ठ पुत्रं मे त्वं सहानुजम्।
सुभद्रोवाच
अभिमन्युं महावीरं प्राणादप्यधिकं प्रियम्॥ ५६
दरष्टुकामास्मि सर्वज्ञ दर्शयाद्य तपोधन।
दूसरे दिन गंगाजीकी ओर जाते हुए युधिष्ठिरने
वनमें तपस्याके कारण क्षीण देहवाले ब्रतधारी विदुरजीको
देखा। उन्हें देखकर महाराज युधिष्ठिरने कहा-मैं
आपको प्रणाम करता हूँ । यह सुनकर भी निष्पाप विदुरजी
दूँठवृक्षके समान अचल स्थित रहे ॥ ४६-४७॥
उसी क्षण विदुरजीके मुखसे एक अद्भुत तेज
निकला और वह तत्काल युधिष्ठिरके मुखमें समा
गया; क्योंकि वे दोनों ही धर्मके अंश थे॥ ४८॥
इस प्रकार विदुरजीने प्राणत्याग कर दिया और
युधिष्ठिर अत्यन्त शोकाकुल हो गये। वे राजा
युधिष्ठिर उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेका प्रबन्ध
करने लगे॥ ४९॥
उसी समय राजाको सुनाते हुए आकाशवाणी
हुई-हे राजन्! ये विदुरजी विरक्त हैं, अत: ये दाह-
संस्कारके योग्य नहीं हैं। अब आप इच्छानुसार यहाँसे
प्रस्थान करें ॥ ५०॥
यह सुनकर उन सभी भाइयोंने गंगाके निर्मल
जलमें स्नान किया और वहाँ जाकर धृतराष्ट्रसे [सभी
वृत्तान्त] विस्तारपूर्वक बताया ॥ ५१॥
तत्पश्चात् सब पाण्डव नागरिकोंके साथ
उस आश्रममें बैठ गये। उसी समय सत्यवतीपुत्र
व्यासजी तथा नारदजी भी वहाँ पहुँच गये। अन्य
| मुनिगण भी वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरे पास आ
गये। उस समय कुन्तीने वहाँ विराजमान शुभदर्शन
। व्यासजीसे कहा— ॥ ५२-५३ ॥
हे कृष्णद्वैपायन ! मैंने अपने पुत्र कर्णको जन्मके
समय ही देखा था। [उसे देखनेके लिये] मेरा मन
बहुत तड़प रहा है, अतः हे तपोधन! मुझे उसको
दिखा दीजिये । हे महाभाग! आप समर्थ हैं, अत: मेरी
यह इच्छा पूर्ण कीजिये ॥ ५४३ ॥
गान्धारी बोली—हे मुने! दुर्योधन समरभूमिमें चला
गया था और मैं उसे देख नहीं पायी। अतः हे
मुनिश्रेष्ठ! छोटे भाइयोंसहित उस दुर्योधनको आप
मुझे दिखा दीजिये॥ ५५३ ॥
सुभद्रा बोली हे सर्वज्ञ! मैं प्राणोंसे भी अधिक
प्रिय अपने महान् वीर पुत्र अभिमन्युको देखना चाहती
हूँ। अतः हे तपोधन ! उसे अभी दिखा दीजिये।॥ ५६३ ॥
अ० ७]
सूत उवाच
एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा सत्यवतीसुतः ॥ ५७
प्राणायामं ततः कृत्वा दध्यौ देवीं सनातनीम् ।
सन्ध्याकालेऽथ सम्प्राप्ते गङ्गायां मुनिसत्तमः॥ ५८
सर्वांस्तांशच समाहूय युधिष्ठिरपुरोगमान्।
तुष्टाव विश्वजननीं स्नात्वा पुण्यसरिजले॥ ५९
प्रकृतिं पुरुषारामां सगुणां निर्गुणां तथा।
देवदेवीं ब्रह्मरूषां मणिद्वीपाधिवासिनीम्॥ ६०
यदा न वेधा न च विष्णुरीश्वरो
न वासवो नैव जलाधिपस्तथा।
न वित्तपो नैव यमश्च पावक-
स्तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम्॥ ६९
जलं न वायुर्न धरा न चाम्बरं
गुणा न तेषां च न चेन्द्रियाण्यहम्।
मनो न बुद्धिर्न च तिग्मगुः शशी
तदासि देवि त्वमहं नमामि ताम्॥ ६२
इमं जीवलोकं समाधाय चित्ते
गुणैर्लिङ्ककोशं च नीत्वा समाधौ।
स्थिता कल्पकालं नयस्यात्मतन्त्रा
न कोऽप्यस्ति वेत्ता विवेकं गतोऽपि॥ ६३
प्रार्थयत्येष मां लोको मृतानां दर्शनं पुनः।
नाहं क्षमोऽस्मि मातस्त्वं दर्शयाशु जनान्मृतान्॥ ६४
सूत उवाच
एवं स्तुता तदा देवी माया श्रीभुबनेशवरी।
स्वर्गादाहूय सर्वान्वै दर्शयामास पार्थिवान्॥ ६५
दृष्ट्वा कुन्ती च गान्धारी सुभद्रा च विराटजा।
पाण्डवा मुमुदुः सर्वे वीक्ष्य प्रत्यागतान्स्वकान्॥ ६६
पुनर्विसर्जितास्तेन व्यासेनामिततेजसा।
स्मृत्वा देवीं महामायामिन्द्रजालमिवोद्यतम्॥ ६७
द्वितीय स्कन्ध
२१३
सूतजी बोले-इस प्रकारके वचन सुनकर
सत्यवतीपुत्र व्यासजीने प्राणायाम करके सनातनी
देवी भगवतीका ध्यान किया। तब सायंकाल
आनेपर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी युधिष्ठिर आदि सभी
जनोंको गंगाजीके तटपर बुलाकर पुण्यनदी गंगाके
पवित्र जलमें स्नान करके प्रकृतिस्वरूपिणी, परम
पुरुषको प्रसन्न करनेवाली, सगुण-निर्गुणरूपा, देवताओंकी
भी देवी, ब्रह्मस्वरूपिणी उन मणिट्वीपनिवासिनी
भगवतीको स्तुति करने लगे॥ ५७-६०॥
हे देवि! जब ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, इन्द्र, वरुण,
कुबेर, यम तथा अग्नि—ये कोई भी नहीं थे, उस
समय भी आपको सत्ता थी; ऐसी उन आपको मैं
नमस्कार करता हूँ॥ ६१॥
जिस समय जल, वायु, पृथ्वी, आकाश तथा
उनके रस आदि गुण, समस्त इन्द्रियाँ, अहंकार, मन,
बुद्धि, सूर्य तथा चन्द्रमा-ये कोई भी नहीं थे, तब भी
आप विद्यमान थीं; ऐसी उन आपको मैं प्रणाम
करता हूँ॥ ६२॥
इस जीवलोकको अपने चित्तमें समाहित
करके सत्व-रज-तम आदि गुणोंसहित लिंग-
कोशको समाधिकी अवस्थामें पहुँचाकर जब आप
कल्पपर्यन्त स्वतन्त्र होकर विहार करती हैं, तब
विवेकप्राप्त पुरुष भी आपको जाननेमें समर्थ नहीं
होता ॥ ६३॥
हे माता! ये लोग मृत व्यक्तियोंके पुन: दर्शनके
लिये मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं, किंतु मैं ऐसा कर
पानेमें समर्थ नहीं हूँ। अतएव आप इन्हें मृत
व्यक्तियोंको शीघ्र ही दिखा दें॥ ६४॥
सूतजी बोले-व्यासजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति
किये जानेपर महामाया श्रीभुवनेशवरी देवीने समस्त
मृत राजाओंको स्वर्गसे बुलाकर दिखा दिया॥ ६५॥
कुन्ती, गान्धारी, सुभद्रा, विराटपुत्री उत्तरा एवं
सभी पाण्डव वापस आये हुए स्वजनोंको देखकर
प्रसन्न हो गये॥ ६६॥
तदनन्तर अपरिमित तेजवाले व्यासजीने महामाया
देवीका स्मरण करके इन्द्रजालकी भाँति प्रकट हुए
उन सबको पुनः लौटा दिया॥ ६७॥
२१४
श्रीमहेवी भागवत
[अ० ८
तदा पृष्ट्वा ययुः सर्वे पाण्डवा मुनयस्तथा।
तत्पश्चात् [ धृतराष्ट्र आदि तापसोंसे] आज्ञा
लेकर सभी पाण्डव तथा मुनिजन वहाँसे चल दिये!
राजा युधिष्ठिर भी मार्गमें व्यासजीकी चर्चा करते हुए
राजा नागपुरं प्राप्तः कुर्वन्व्यासकथां पथि॥ ६८ हस्तिनापुर आ गये॥ ६८॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पाण्डवानां
कथानकं मृतानां दर्शनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
A
अथाष्टमोऽध्याचः
धृतराष्ट्र आदिका दावार्निमें जल जाना, प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार,
कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षितृको राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालय-
पर्वतपर जाना, परीक्षितृको शापकी प्राप्ति, प्रमदरा और रुरुका वृत्तान्त
सूत उवाच
ततो दिने तृतीये च धृतराष्ट्रः स भूपतिः।
दावाग्निना वने दग्धः सभार्यः कुन्तिसंयुतः॥ ९
सञ्जयस्तीर्थयात्रायां गतस्त्यक्त्वा महीपतिम्।
शरुत्वा युधिष्ठिरो राजा नारदाहुःखमाप्तवान्॥ २
षट्त्रिंशेऽथ गते वर्ष कौरवाणां क्षयात्पुनः।
प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापातक्षयं गता: ॥ ३
ते पीत्वा मदिरां मत्ता: कृत्वा युद्धं परस्परम्।
क्षयं प्राप्ता महात्मानः पश्यतो रामकुष्णयोः॥ ४
देहं तत्याज रामस्तु कृष्णः कमललोचनः।
व्याधबाणहतः शापं पालयन्भगवान्हरिः॥ ५
वसुदेवस्तु तच्छुत्वा देहत्यागं हरेरथ।
जही प्राणाञ्छुचीन्कृत्वा चित्ते श्रीभुवनेशवरीम्॥ ६
अर्जुनस्तु ततो गत्वा प्रभासे चातिदुःखितः।
संस्कारं तत्र सर्वेषां यथायोग्यं चकार ह॥ ७
समीक्ष्याथ हरे्देहं कृत्वा काष्ठस्य सञ्चयम्।
अष्टाभिः सह पत्नीभिर्दाहयामास पार्थिवः॥ ८
सूतजी बोले-वहाँसे पाण्डवोंके प्रस्थित होनेके
तीसरे दिन उस वनमें लगी दावाग्निमें कुन्ती एवं
गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र दग्ध हो गये॥ १॥
संजय पहले ही धृतराष्ट्रको छोड़कर तीर्थयात्राके
लिये चले गये थे। नारदजीसे यह वृत्तान्त सुनकर
राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हुए॥ २॥
कौरवोंके विनाशके छत्तीस वर्ष बीतनेपर विप्र-
शापके प्रभावसे सभी यादव प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये ।
वे सभी यादव मदिरा पीकर मतवाले हो गये और
आपसमें लड़कर बलराम तथा श्रीकृष्णके देखते-
देखते मृत्युको प्राप्त हो गये॥ ३-४॥
तदनन्तर बलरामजीने योगक्रियाद्वारा शरीरका
त्याग किया और कमलके समान नेत्रवाले भगवान्
श्रीकृष्णने शापकी मर्यादा रखते हुए एक बहेलियेके
बाणसे आहत होकर महाप्रयाण किया॥५॥
इसके पश्चात् जब वसुदेवजीने श्रीकृष्णके
शरीर-त्यागका समाचार सुना तो उन्होंने अपने चित्तमें
श्रीभुवनेश्वरी देवीका ध्यान करके अपने पवित्र प्राणोंका
परित्याग कर दिया॥ ६॥
तत्पश्चात् अत्यन्त शोक-संतप्त अर्जुने प्रभास-
क्षत्रमें पहुँचकर सभीका यथोचित अन्तिम संस्कार
सम्पन्न किया॥ ७॥
भगवान् श्रीकृष्णका शरीर खोजकर और लकड़ी
जुराकर अर्जुनने आठ पटरानियोंके साथ उनका दाह-
संस्कार किया॥ ८॥
अ० ८]
द्वितीय स्कन्ध
२१५
देहं रामस्य रेवत्या सह दग्ध्वा विभावसौ।
अर्जुनो द्वारकामेत्य पुरान्निष्क्रामयज्जनम्॥ ९
पुरी सा वासुदेवस्य प्लावितोदधिना ततः।
अर्जुनः सर्वलोकान्वै गृहीत्वा निर्गतस्तदा॥ १०
कृष्णपत््यस्तदा मार्गे चौराभीरेश्च लुण्ठिता: ।
धनं सर्व गृहीतं च निस्तेजश्चार्जुनोऽभवत्॥ ९९
इन्द्रप्रस्थे समागत्य वज्रो राजा कृतस्तदा।
अनिरुद्धसुतो नाम्ना पार्थेनामिततेजसा॥ १२
व्यासाय कथितं दुःखं तेनोक्तोऽसौ महारथः।
पुनर्यदा हरिस्त्वञ्च भवितासि महामते॥ १३
तदा तेजस्तवात्युग्रं भविष्यति पुनर्युगे।
तच्छुत्वा वचनं पार्थो गत्वा नागपुरेऽ्जुनः॥ १४
दुःखितो धर्मराजानं वृत्तान्तं सर्वमब्रवीत्।
देहत्यागं हरेः श्रुत्वा यादवानां क्षयं तथा॥ १५
गमनाय मतिं चक्रे राजा हैमाचलं प्रति।
षट्त्रिंशद्वार्षिकं राज्ये स्थापयित्वोत्तरासुतम्॥ ९६
निर्जगाम वनं राजा द्रौपद्या भ्रातृभिः सह।
षट्त्रिंशच्चैव वर्षाणि कृत्वा राज्यं गजाह्वये॥ ९७
गत्वा हिमाचले षट् ते जहुः प्राणान्पृथासुताः।
परीक्षिदपि राजर्षिः प्रजाः सर्वाः सुधार्मिकः ॥ १८
अपालयच्च राजेन्द्रः षष्टिवर्षाण्यतन्द्रितः।
बभूव मृगयाशीलो जगाम च वनं महत्॥ १९
विद्धं मृगं विचिन्वानो मध्याह्ने भूपतिः स्वयम्।
तृषितश्च परिश्रान्तः क्षुधितश्चोत्तरासुतः॥ २०
तदनन्तर रेवतीके साथ बलरामजीके मृतशरीरका
दाह-संस्कार करके अर्जुनने द्वारकापुरी पहुँचकर उस
नगरीसे नागरिकोंको बाहर निकाला॥ ९॥
तत्पश्चात् कुछ ही क्षणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी
वह द्वारकापुरी समुद्रमें डूब गयी, किंतु अर्जुन सभी
लोगोंको साथ लेकर बाहर निकल गये थे॥ १०॥
मार्गमें चोरों और भीलोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको
लूट लिया और समस्त धन छीन लिया; उस समय
अर्जुन तेजहीन हो गये॥ ११॥
तदनन्तर अपरिमित तेजसे सम्पन्न अर्जुने
इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर अनिरुद्धके वञ्र नामक पुत्रको
राजा बनाया॥ १२॥
अर्जुनने अपने तेजहीन होनेका दु:ख व्यासजीसे
निवेदित किया, जिसपर व्यासजीने उस महारथी
अर्जुनसे कहा-हे महामते! जब भगवान् श्रीकृष्ण
और आपका पुनः अवतार होगा, तब उस युगमें
आपका तेज पुन: अत्यन्त उग्र हो जायगा। उनका
यह वचन सुनकर अर्जुन वहाँसे हस्तिनापुर चले गये।
बहाँपर अत्यन्त दुःखी होकर अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरसे
समस्त वृत्तान्त कहा॥ १३-१४३ ॥
श्रीकृष्णके देहत्याग एवं यादवोंके विनाशका
समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरने हिमालयकी ओर
जानेका निश्चय कर लिया। इसके बाद छत्तीसवर्षीय
उत्तरापुत्र परीक्षितको राजसिंहासनपर प्रतिष्ठित
` करके वे राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ
वनकी ओर निकल गये। इस प्रकार छत्तीस वर्षकी
अवधितक हस्तिनापुरमें राज्य करके द्रौपदी तथा
| कुन्तीपुत्रों-इन छहोंने हिमालयपर्वतपर जाकर प्राण
त्याग दिये ॥ १५-१७३ ॥
इधर धर्मनिष्ठ राजर्षि परीक्षितने भी आलस्यरहित
भावसे साठ वर्षोतक सम्पूर्ण प्रजाका पालन
किया। वे एक बार आखेटहेतु एक विशाल जंगलमें
गये ॥ १८-१९॥
अपने बाणसे विद्ध एक मृगको खोजते-खोजते
मध्याहकालमें उत्तरापुत्र राजा परीक्षित् भूख-प्यास
तथा थकानसे व्याकुल हो गये॥ २०॥
२१६
राजा घर्मेण सन्तप्तो ददर्श मुनिमन्तिके ।
ध्याने स्थितं मुनिं राजा जलं पप्रच्छ चातुरः॥ २१
नोवाच किञ्चिन्मौनस्थश्चुकोप नृपतिस्तदा।
मृतं सर्प तदादाय धनुष्कोट्या तृषातुरः॥ २२
कलिनाविष्टचित्तस्तु कण्ठे तस्य न्यवेशयत्।
आरोपिते तथा सर्पे नोवाच मुनिसत्तमः॥ २३
न चचाल समाधिस्थो राजापि स्वगृहं गत: ।
तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी गविजातो महातपाः॥ २४
महाशक्तोऽथ शुश्राव क्रीडमानो वनान्तिके।
मित्राण्याहुश्च तत्पुत्रं पितुः कण्ठे तवाधुना॥ २५
लम्भितोऽस्ति मृतः सर्पः केनापीति मुनीश्वर।
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चुकोपातिशयं तदा॥ २६
शशाप नृपतिं क्रुद्धो गृहीत्वाशु करे जलम्।
पितुः कण्ठेऽद्य मे येन विनिक्षिप्तो मृतोरगः ॥ २७
तक्षकः सप्तरात्रेण तं दशेत्पापपूरुषम्।
मुनेः शिष्योऽथ राजानं समुपेत्य गृहे स्थितम्॥ २८
शापं निवेदयामास मुनिपुत्रेण चार्पितम्।
अभिमन्युसुतः श्रुत्वा शापं दत्तं द्विजेन वै॥ २९
अनिवार्य च विज्ञाय मन्त्रिवृद्धानुवाच ह।
शप्तोऽहं द्विजरूपेण मम द्वेषादसंशयम्॥ ३०
किं विधेयं मयामात्या उपायश्चिन्त्यतामिह।
मृत्युः किलानिवार्योऽसौ वदन्ति वेदवादिनः ॥ ३९
यत्नस्तथापि शास्त्रोक्तः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ।
उपायवादिनः केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ३२
विज्ञोपायेन सिध्यन्ति कार्याणि नेतरस्य च।
मणिमन्त्रौषधीनां वै प्रभावाः खलु दुर्विदः॥ ३३
न भवेदिति किं तैस्तु मणिमद्धिः सुसाधितैः।
सर्पदष्टा पुरा भार्या मुनेः सञ्जीविता मृता॥ ३४
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ८
धूपसे पीडित राजाने समीपमें ही एक ध्यानमग्न
मुनिको विराजमान देखा और प्याससे व्याकुल उन्होंने
मुनिसे जल माँगा॥ २१॥
मौन ब्रतमें स्थित वे मुनि कुछ भी नहीं बोले,
जिससे राजा कुपित हो गये और प्याससे आकुल तथा
कलिसे प्रभावित चित्तवाले राजाने अपने धनुषको
नोकसे एक मृत साँप उठाकर उनके गलेमें डाल
दिया। गलेमें सर्प डाल दिये जानेके बाद भी वे
मुनिश्रेष्ठ कुछ भी नहीं बोले॥ २२-२३॥
वे थोड़ा भी विचलित नहीं हुए और समाधिमें
स्थित रहे । राजा भी अपने घर चले गये । उन मुनिका पुत्र
गविजात अत्यन्त तेजस्वी तथा महातपस्वी था॥ २४॥
पराशक्तिके आराधक उस गविजातने पासके
वनमें खेलते हुए अपने मित्रोंको ऐसा कहते हुए सुना
कि हे मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे पिताके गलेमें किसीने मृत
सर्प डाल दिया है। उनको यह बात सुनकर वह
अत्यन्त कुपित हुआ और शीघ्र ही हाथमें जल लेकर
उसने कुपित होकर राजाको शाप दे दिया-जिस
व्यक्तिने मेरे पिताजीके कण्ठमें मृत सर्प
डाला है, उस पापी पुरुषको एक सप्ताहमें तक्षक डस
लेगा। मुनिके शिष्यने महलमें स्थित राजा परीक्षितूके
समीप जाकर मुनिपुत्रके द्वारा दिये गये शापकी बात
कही। ब्राह्मणके द्वारा दिये गये शापको सुनकर
अभिमन्युपुत्र परीक्षितने उसे अनिवार्य समझकर वृद्ध
मन्त्रियोँसे कहा-अपने अपराधके कारण मैं मुनिपुत्रसे
शापित हुआ हूँ॥ २५-३०॥
हे मन्त्रियो! अब मुझे क्या करना चाहिये ? आप
लोग कोई उपाय सोचें। मृत्यु तो अनिवार्य है—ऐसा
वेदवादी लोग कहते हैं, तथापि बुद्धिमान् पुरुषोंको
शास्त्रोक्त रीतिसे सर्वथा प्रयत्न करना ही चाहिये। कुछ
पुरुषार्थवादी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि बुद्धिमानीके
साथ उपाय करनेपर कार्य सिद्ध हो जाते हैं; न करनेपर
नहीं । मणि, मन्त्र और औषधोंके प्रभाव अत्यन्त ही
दुर्शेय होते हैं। मणि धारण करनेवाले सिद्धजनोंके
द्वारा क्या नहीं सम्भव हो जाता? पूर्वकालमें किसी
ऋषिपत्नीको सर्पने काट लिया था, जिससे बह मर
गयी थी; उस समय उस मुनिने अपनी आयुका आधा
अ० ८ ]
दत्त्वार्धमायुषस्तेन मुनिना सा वराप्सरा:।
भवितव्ये न विश्वास: कर्तव्य: सर्वथा बुधेः ॥ ३५
प्रत्यक्षं तत्र दृष्टान्तं पश्यन्तु सचिवाः किल।
दिवि कोऽपि पृथिव्यां वा दृश्यते पुरुषः क्वचित् ॥ ३६
दैवे मतिं समाधाय यस्तिष्ठेत्तु निरुद्यमः ।
बिरक्तस्तु यतिर्भूत्वा भिक्षार्थं याति सर्वथा॥ ३७
गृहस्थानां गृहे काममाहूतो वाथवान्यथा।
यदूच्छयोपपन्नं च क्षिप्तं केनापि वा मुखे॥ ३८
उद्यमेन विना चास्यादुदरे संविशेत्कथम्।
प्रयत्नश्चोद्यमे कार्यो यदा सिद्धिं न याति चेत्॥ ३९
तदा दैवं स्थितं चेति चित्तमालम्बयेद् बुधः।
मन्त्रिण ऊचुः
को मुनिर्येन दत्त्वार्धमायुषो जीविता प्रिया॥ ४०
कथं मृता महाराज तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्।
राजोवाच
भृगोर्भार्या वरारोहा पुलोमा नाम सुन्दरी॥ ४९
तस्यां तु च्यवनो नाम मुनिर्जातोऽतिविश्रुतः।
च्यवनस्य च शर्यातेः सुकन्या नाम सुन्दरी ॥ ४२
तस्यां जज्ञे सुतः श्रीमान्प्रमतिर्नाम विश्रुतः।
प्रमतेस्तु प्रिया भार्या प्रतापी नाम विश्रुता॥ ४३
रुरुर्नाम सुतो जातस्तथा परमतापसः।
तस्मिंश्च समये कश्चित्स्थूलकेशश्च विश्रुतः ॥ ४४
बभूब तपसा युक्तो धर्मात्मा सत्यसम्मतः।
एतस्मिन्नन्तरे मान्या मेनका च वराप्सराः॥ ४५
क्रीडां चक्रे नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरी।
गर्भ विश्वावसोः प्राप्य निर्गता वरवर्णिनी॥ ४६
स्थूलकेशाश्रमे गत्वा विससर्ज वराप्सराः।
कन्यकां च नदीतीरे त्रिषु लोकेषु सुन्दरीम्॥ ४७
द्वितीय स्कन्ध
२९७
भाग देकर उस श्रेष्ठ अप्सराको जीवित कर दिया था।
अतः बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे भवितव्यतापर
विश्वास न करें, उपाय भी करें॥ ३१-३५॥
हे सचिवो! आपलोग यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष देख
लें। इस लोक या परलोकमें ऐसा कोई भी मनुष्य
नहीं दिखायी देता, जो केवल भाग्यके भरोसे रहकर
उद्यम न करता हो। गृहस्थीसे विरक्त मनुष्य संन्यासी
होकर जगह-जगह भिक्षाटनके लिये बुलानेपर अथवा
बिना बुलाये भी गृहस्थोंके घर जाता ही है।
दैवात्प्राप्त उस भोजनको भी क्या कोई मुखमें डाल
देता है ? उद्यमके बिना वह भोजन मुखसे उदरमें कैसे
प्रवेश कर सकता है? अतः प्रयत्नपूर्वक उद्यम तो
करना ही चाहिये, यदि सफलतान मिले तो
बुद्धिमान् मनुष्य मनमें विश्वास कर ले कि दैव यहाँ
प्रबल है॥ ३६-३९३ ॥
मन्त्रियोंने कहा—हे महाराज! वे कौन मुनि थे,
जिन्होंने अपनी आधी आयु देकर अपनी प्रिय पत्नीको
जीवित किया था? वह कैसे मरी थी? यह कथा
विस्तारसे हमसे कहिये॥ ४० इ ॥
राजा बोले-महर्षि भृगुकी एक सुन्दर स्त्री
थी, जिसका नाम पुलोमा था। उससे परम विख्यात
च्यवनमुनिका जन्म हुआ। च्यवनको पत्नीका नाम
सुकन्या था, वह महाराज शर्यातिको रूपवती
कन्या थी॥ ४१-४२ ॥
उस सुकन्यासे श्रीमान् प्रमतिने जन्म लिया, जो
बड़े यशस्वी थे। उस प्रमतिको प्रिय पत्नीका नाम
प्रतापी था। उन्हीं राजा प्रमतिके पुत्र परम तपस्वी
‘रुरु’ हुए॥ ४३३ ॥
उन्हीं दिनों स्थूलकेश नामक एक विख्यात
ऋषि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मात्मा एवं सत्यनिष्ठ
थे। इसी बीच त्रिलोकसुन्दरी मेनका नामकी श्रेष्ठ
अप्सरा नदीके किनारे जलक्रोडा कर रही थी। वह
अप्सरा विश्वावसुके द्वारा गर्भवती होकर वहाँसे
निकल पड़ी॥ ४४-४६ ॥
उस श्रेष्ठ अप्सराने स्थूलकेशके आश्रममें जाकर
नदीतटपर एक त्रैलोक्यसुन्दरी कन्याको जन्म दिया और
वह उसे छोड़कर चली गयी। तब उस नवजात शिशु
२१८
दृष्ट्वानाथां तदा कन्यां जग्राह मुनिसत्तम:।
पुपोष स्थूलकेशस्तु नाम्ना चक्रे प्रमद्ठराम्॥ ४८
सा काले यौवनं प्राप्ता सर्वलक्षणसंयुता।
रुरुूष्ट्वाथ तां बालां कामबाणार्दितो ह्ाभूत्॥ ४९
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ९
कन्याको अनाथ जानकर मुनिवर स्थूलकेश अपने
आश्रममें ले गये और उसका पालन-पोषण करने
लगे। उन्होंने उसका नाम प्रमद्वरा रखा ॥ ४७-४८ ॥
वह सर्वलक्षणसम्पन्न कन्या यथासमय यौवनको
प्राप्त हुई। उस सुन्दरीको देखकर रुरु काममोहित
हो गये॥ ४९॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रचा संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचारित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः eZ
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