Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ चत्वारिंशोऽध्यायः
दुर्वासाके शापसे इन्द्रका श्रीहीन हो जाना
नारद उवाच
नारायणप्रिया सा च परा वैकुण्ठवासिनी।
वैकुण्ठाधिष्ठातृदेवी महालक्ष्मीः सनातनी॥ १
कथं बभूव सा देवी पृथिव्यां सिन्धुकन्यका।
पुरा केन स्तुतादौ सा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २
श्रीनारायण उवाच
पुरा दुर्वाससः शापाद् भ्रष्टश्रीश्च पुरन्दरः।
बभूव देवसङ्घशच मर्त्यलोके हि नारद॥ ३
लक्ष्मीः स्वर्गादिकं त्यक्त्वा रुष्टा परमदु:खिता।
गत्वा लीना तु वैकुण्ठे महालक्ष्मीश्च नारद॥ ४
तदा शोकाद्ययुः सर्वे दुःखिता ब्रह्मणः सभाम्।
ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य ययुर्वैकुण्ठमेव च॥५
वैकुण्ठे शरणापन्ना देवा नारायणे परे।
अतीव दैन्ययुक्ताश्च शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ॥ ६
तदा लक्ष्मीश्च कलया पुराणपुरुषाज्ञया।
बभूव सिन्धुकन्या सा सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥ ७
तथा मथित्वा क्षीरोदं देवा दैत्यगणैः सह।
सम्प्राप्ताश्च महालक्ष्मीं विष्णुस्तां च ददर्श ह॥ ८
सुरादिभ्यो वरं दत्त्वा वनमालां च विष्णवे।
ददौ प्रसन्नवदना तुष्टा क्षीरोदशायिने॥ ९
नारदजी बोले—[ हे भगवन्!) वे श्रेष्ठ महालक्ष्मी
भगवान् नारायणको प्रिया होकर वैकुण्ठमें निवास
करती हैं। वे सनातनी भगवती वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री
देवी हैं। वे महालक्ष्मी पूर्व कालमें पृथ्वीलोकमें
सिन्धुको पुत्री कैसे बनीं और सर्वप्रथम किसके द्वारा
उनको स्तुति को गयी, वह सब मुझे बताइये ॥ १-२॥
श्रीनारायण बोले—हे नारद! पूर्व कालमें
दुर्वासाके शापके कारण इन्द्र श्रीविहीन हो गये थे
और सम्पूर्ण देवसमुदाय मृत्युलोकमें भटकने लगा। हे
नारद! तब कुपित लक्ष्मीने स्वर्गका परित्याग करके
अत्यन्त दुःखित हो वैकुण्ठलोक पहुँचकर वहाँ
महालक्ष्मीमें अपनेको विलीन कर दिया॥ ३-४॥
उस समय शोकसे संतप्त सभी देवता ब्रह्माकी
सभामें गये और वहाँसे ब्रह्माजीको आगे करके
वैकुण्ठलोकको गये । वहाँपर सभी देवताओंने भगवान्
नारायण श्रीविष्णुको शरण ग्रहण की। उस समय
अत्यन्त दीनतायुक्त सभी देवताओंके कण्ठ, ओठ और
तालु सूख गये थे॥ ५-६॥
तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे वे
सर्वसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कलासे सिन्धुकी
कन्या हुई थीं। उस समय सभी देवताओंने दैत्योंके
साथ मिलकर समुद्रमन्थन करके महालक्ष्मीकी प्राप्ति
की थी। भगवान् विष्णुने महालक्ष्मीको प्रेमपूर्वक
देखा। तब प्रसन्नतायुक्त मुखमण्डलवाली परम सन्तुष्ट
भगवती महालक्ष्मीने देवता आदिको वर प्रदान करके
क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् श्रीविष्णुको
वनमाला अर्पित कर दी॥ ७-९॥
अ० ४० |
नवम स्कन्ध
५३५
देवाश्चाप्यसुरग्रस्तं राज्यं प्रापुशच नारद ।
तां सम्पूज्य च सम्भूय सर्वत्र च निरापदः॥ १०
नारद उवाच
कथं शशाप दुर्वासा मुनिश्रेष्ठः कदाचन।
केन दोषेण वा ब्रह्मन् ब्रह्मिष्ठस्तत्त्ववित्पुरा॥ ११
ममन्थुः केनरूपेण जलधिं ते सुरादयः।
केन स्तोत्रेण वा देवी शक्रं साक्षाद्वभूव सा॥ १२
को वा तयोश्च संवादो बभूव तद्वद प्रभो।
श्रीनारायण उवाच
मधुपानप्रमत्तशच त्रैलोक्याधिपतिः पुरा॥ १३
क्रीडां चकार रहसि रम्भया सह कामुकः।
कृत्वा क्रीडां तया सार्ध कामुक्या हतमानसः ॥ १४
तस्थौ तत्र महारण्ये कामोन्मथितमानसः।
कैलासशिखरे यान्तं वैकुण्ठादूषिसत्तमम्॥ १५
दुर्वाससं ददर्शन्द्रो ज्वलन्त ब्रह्मतेजसा।
ग्रीष्ममध्याहमार्तण्डसहस्त्रप्रभमीश्वरम् ॥ १६
प्रतप्तकाञ्चनाकारं जटाभारमहोज्ज्वलम्।
शुक्लयज्ञोपवीतं च चीरदण्डौ कमण्डलुम्॥ १७
महोज्ज्वलं च तिलकं बिश्रन्तं चेन्दुसन्निभम्।
समन्वितं शिष्यलक्षेर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ १८
दृष्ट्या ननाम शिरसा सम्प्रमत्तः पुरन्दरः।
शिष्यवर्ग तदा भक्त्या तुष्टाव च मुदान्वितम् ॥ १९
मुनिना च सशिष्येण दत्तास्तस्मै शुभाशिषः।
विष्णुदत्तं पारिजातपुष्पं च सुमनोहरम्॥ २०
हे नारद! देवताओंने असुरोंके द्वारा अपहृत किया
गया अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात्
उन भगवती महालक्ष्मीकी भलीभाँति पूजा करके वे
देवता सब प्रकारसे विपत्तिरहित हो गये॥ १०॥
नारदजी बोले-हे ब्रह्मन्! पूर्वकालमें
ब्रह्मनिष्ठ तथा तत्त्वज्ञानी मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने कब,
क्यों और किस अपराधके कारण इन्द्रको शाप
दिया था? उन देवता आदिने किस रूपसे समुद्रका
मन्थन किया, किस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर भगवती
लक्ष्मी इन्द्रके समक्ष प्रकट हुई और उन दोनोंके बीच
क्या संवाद हुआ? हे प्रभो! यह सब आप मुझे
बताइये ॥ ११-१२६ ॥
श्रीनारायण बोले—[ हे नारद!] प्राचीन कालकी
बात है-तीनों लोकोंके अधिपति इन्द्र मधुपानसे प्रमत्त
और कामासक्त होकर रम्भाके साथ एकान्तमें विहार
कर रहे थे। उस कामुकी अप्सराके साथ क्रीडा
करनेसे उनका मन मोहित हो गया था। इस प्रकार
कामदेवसे मथित मनवाले वे इन्द्र उसी महावनमें
स्थित हो गये॥ १३-१४॥
उसी समय इन्द्रने वैकुण्ठधामसे कैलासपर्वतकी
ओर जाते हुए महर्षि दुर्वासाको देखा। उनका शरीर
ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान था, ऐश्वर्यसम्पन्न वे ग्रीष्मऋतुके
मध्याहकालीन हजारों सूर्योको प्रभासे युक्त थे, उनका
अत्यन्त स्वच्छ जटाजूट प्रतप्त सुवर्णके समान प्रकाशमान
था, वे श्वेतवर्णका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे,
उन्होंने अपने हाथोंमें चीर, दण्ड तथा कमण्डलु
धारण कर रखा था, वे अपने ललाटपर चन्द्रमाके
समान प्रतीत होनेवाला अत्यन्त उज्ज्वल तिलक
धारण किये हुए थे। वेदवेदांगके पारगामी लाखों
शिष्य उनके साथ विद्यमान थे॥ १५-१८॥
उन्हें देखकर अति प्रमत्त इन्द्रने सिर झुकाकर
मुनि तथा शिष्यवर्गको प्रणाम किया और प्रसन्न
होकर उनकी स्तुति की। तब शिष्योंसहित मुनि
दुर्वासाने इन्द्रको शुभाशीर्वाद दिया, साथ ही उन्होंने
भगवान् विष्णुद्वारा प्रदत्त परम मनोहर पारिजात पुष्प
भी उन्हें समर्पित किया॥ १९-२०॥
५३६
तज्जरारोगमृत्युघ्नं शोकध्नं मोक्षकारकम्।
शक्रः पुष्पं गृहीत्वा च प्रमत्तो राज्यसम्पदा ॥ २१
पुष्पं स॒ न्यस्तयामास तदैव करिमस्तके।
हस्ती तत्स्पर्शमात्रेण रूपेण च गुणेन च॥ २२
तेजसा वयसाकस्माद्रिष्णुतुल्यो बभूव ह।
त्यक्त्वा शक्रं गजेन्द्रश्च जगाम घोरकाननम्॥ २३
न शशाक महेन्द्रस्तं रक्षितुं तेजसा मुने।
तत्पुष्पं त्यक्तवन्तं च दृष्ट्वा शक्रं मुनीश्वरः ॥ २४
तमुवाच महारुष्टः शशाप च रुषान्वितः।
मुनिरुवाच
अरे श्रिया प्रमत्तस्त्वं कथं मामवमन्यसे॥ २५
मददत्तपुष्पं दत्तं च गर्वेण करिमस्तके।
बिष्णोर्निवेदितं चैव नैवेद्यं वा फलं जलम्॥ २६
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं त्यागेन ब्रह्महा भवेत्।
भ्रष्टश्रीरभ्रष्टबुद्धिश्च पुरभ्रष्टो भवेत्तु सः॥ २७
यस्त्यजेद्विष्णुनैवेद्यं भाग्येनोपस्थितं शुभम्।
प्राप्तिमात्रेण यो भुङ्के भक्तो विष्णुनिवेदितम्॥ २८
पुंसां शतं समुद्धृत्य जीवन्मुक्तः स्वयं भवेत्।
नैवेद्यं भोजनं कृत्वा नित्यं यः प्रणमेद्धरिम्॥ २९
पूजयेत्स्तौति वा भक्त्या स विष्णुसदूशो भवेत्।
तत्स्पर्शवायुना सद्यस्तीर्थौघश्च विशुध्यति॥ ३०
तत्पादरजसा मूढ सद्यः पूता वसुन्धरा।
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ४०
तब बुढ़ापा, रोग, मृत्यु तथा शोकका नाश
करनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले उस पुष्पको
लेकर राज्यसम्पदासे मदोन्मत्त इन्द्रने उसे ऐरावत
हाथीके मस्तकपर फेंक दिया॥ २१६ ॥
उस पुष्पका स्पर्श होते ही वह ऐरावत हाथी
रूप, गुण, तेज तथा आयुमें अकस्मात् भगवान्
विष्णुके तुल्य हो गया। तब इन्द्रको छोड़कर वह
गजराज घोर वनमें चला गया। हे मुने! अपने
तेजोबलसे सम्पन्न इन्द्र उस ऐरावतको रोक पानेमें
समर्थ नहीं हो सके॥ २२-२३३ ॥
इन्द्रने उस पुष्पका तिरस्कार किया है-
ऐसा जानकर मुनीश्वर दुर्वासा अत्यन्त कुपित हो
उठे और रोषमें आकर उन्हें शाप देते हुए कहने
लगे॥ २४३६ ॥
मुनि बोले—अरे ! राज्यश्रीके अभिमानसे प्रमत्त
होकर तुम मेरा अपमान क्यों कर रहे हो ? मेरे द्वारा
दिये गये पुष्पको तुमने गर्वित होकर हाथीके मस्तकपर
फेंक दिया? श्रीविष्णुको समर्पित किये हुए नैवेद्य,
फल अथवा जलके प्राप्त होते ही उनका उपभोग कर
लेना चाहिये, उनका त्याग करनेसे वह ब्रह्महत्याके
पापका भागी होता है॥ २५-२६६ ॥
जो मनुष्य सौभाग्यसे प्राप्त हुए भगवान् विष्णुके
पावन नैवेद्यका त्याग करता है; वह श्री, बुद्धि तथा
राज्य-इन सबसे वंचित हो जाता है॥ २७६ ॥
जो भक्त श्रीविष्णुके लिये अर्पित किये गये
नैवेद्यको पाते ही उसे ग्रहण कर लेता है, वह अपने
सौ पूर्वजोंका उद्धार करके स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता
है॥ २८३ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन भगवान् श्रीहरिके नैवेद्यको
ग्रहण करके उन्हें प्रणाम करता है तथा भक्तिपूर्वक
उनका पूजन एवं स्तवन करता है, वह भगवान्
विष्णुके समान हो जाता है। हे मूर्ख! उसका
स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर
तीर्थसमुदाय शीघ्र ही शुद्ध हो जाता है और
उसकी चरणरजसे पृथ्वी शीघ्र ही पवित्र हो जाती
है॥ २९-३० ३ ॥
अ० ४० ]
नवम स्कन्ध
५३७
पुंश्चल्यन्नमवीरान्नं शूद्रश्राद्धानमेव च॥ ३१
यद्धरेरनिवेद्यं च वृथा मांसस्य भक्षणम्।
शिवलिङ्कप्रदानं च यदत्तं शूद्रयाजिना॥ ३२
चिकित्सकद्विजान्नं च देवलान्नं तथैव च।
कन्याविक्रयिणामन्नं यदन्नं योनिजीविनाम्॥ ३३
उच्छिष्टान्नं पर्युषितं सर्वभक्षावशेषितम्।
शूद्रापतिद्विजानां च वृषवाहद्विजान्नकम्॥ ३४
अदीक्षितद्विजानां च यदन्नं शवदाहिनाम्।
अगम्यागामिनां चैव द्विजानामन्नमेव च॥ ३५
मित्रद्रुहां कृतघ्नानामन्नं विश्वासघातिनाम् ।
मिथ्यासाक्ष्यप्रदान्नं च ब्राह्मणान्नं तथैव च॥ ३६
एते सर्वे विशुध्यन्ति विष्णोनैवेद्यभक्षणात्।
श्वपचश्चेद्विष्णुसेबी वंशानां कोटिमुद्धरेत्॥ ३७
हरेरभक्तो मनुजः स्वं च रक्षितुमक्षमः।
अज्ञानाद्यदि गृह्णाति विष्णोनिर्माल्यमेव च॥ ३८
सप्तजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः।
ज्ञात्वा भक्त्या च गृह्णाति विष्णोनैवेद्यमेव च॥ ३९
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते निश्चितं हरे।
यस्मात्संस्थापितं पुष्पं गर्वेण करिमस्तके॥ ४०
तस्माद्युष्मान्परित्यज्य यातु लक्ष्मीर्हरेः पदम्।
नारायणस्य भक्तोऽहं न बिभेमि सुराद्विधेः॥ ४१
कालागम्मृत्योर्जरातश्च कानन्यान् गणयामि च।
किं करिष्यति ते तात कश्यपश्च प्रजापति: ॥ ४२
बृहस्पतिर्गुरुश्चैव निःशङ्कस्य च मे हरे।
इदं पुष्पं यस्य मूर्ध्नि तस्यैव पूजनं परम्॥ ४३
भगवान् श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न
व्यभिचारिणी स्त्री, पतिपुत्रहीन स्त्री तथा शूद्रके
शराद्धान्नके समान व्यर्थ होता है और वह मांस-
भक्षणके समान है॥ ३१३ ॥
शिवलिंगके लिये अर्पण किया हुआ अन्न,
शूट्रोंके यहाँ यजन करानेवाले ब्राह्मणके द्वारा
प्रदत्त अन्न, चिकित्सावृत्तिमें लगे ब्राह्मणका अन्न;
देवल, कन्याविक्रयी तथा वेश्याओंको वृत्तिपर
आश्रित रहनेवाले पुरुषोंका अन्न; उच्छिष्ट, बासी
तथा सबके भोजन कर लेनेपर बचा हुआ अन्न;
शूद्रापति द्विज, वृषवाही द्विज, दीक्षाहीन द्विज, शवदाही,
अगम्या स्त्रीक साथ गमन करनेवाले द्विज, मित्रद्रोही,
विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले और
तीर्थप्रतिग्राही ब्राह्मणोंका अन्न ग्रहण करनेवाले-ये
सभी भगवान् विष्णुका नैवेद्य भक्षण करनेसे शुद्ध हो
जाते हैं॥ ३२-३६६ ॥
यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुको उपासना
करता है, तो वह अपनी करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार
कर देता है। भगवान् श्रीहरिको भक्ति न करनेवाला
मनुष्य स्वयं अपनी भी रक्षा करनेमें असमर्थ रहता
है ॥ ३७३ ॥
यदि कोई मनुष्य अनजानमें भी श्रीविष्णुका
नैवेद्य ग्रहण कर लेता है, वह अपने सात जन्मोंके
अर्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं
है। जो ज्ञानपूर्वक भक्तिके साथ भगवान् विष्णुका
नैवेद्य ग्रहण करता है, बह तो करोड़ों जन्मोंके अर्जित
पापोंसे मुक्त हो जाता है-यह निश्चित है। हे इन्द्र!
तुमने जो अभिमानवश इस पारिजात पुष्पको हाथीके
मस्तकपर फेंक दिया है, इस अपराधके कारण
लक्ष्मीजी तुमलोगोंका परित्याग करके भगवान् श्रीहरिके
लोकमें चली जायँ॥ ३८-४० ॥
मैं नारायणका भक्त हूँ। मैं देवता, ब्रह्मा, काल,
मृत्यु तथा जरासे भी भयभीत नहीं होता तो फिर अन्य
किन लोगोंकी गिनती करूँ। हे इन्द्र! तुम्हारे पिता प्रजापति
कश्यप और गुरु बृहस्पति मुझ निःशंकका क्या कर
लेंगे? यह पारिजात पुष्प जिसके सिरपर रहता है,
उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है॥ ४१-४३॥
५३८
इति श्रुत्वा महेन्द्रश्च धृत्वा स चरणं मुनेः।
उच्चै रुरोद शोकार्तस्तमुवाच भयाकुलः॥ ४४
महेन्द्र उवाच
दत्तः समुचितः शापो मह्यं मायापहः प्रभो।
हृतां न याचे सम्पत्तिं किञ्चिज्ज्ञानं च देहि मे॥ ४५
ऐश्वर्य विपदां बीजं ज्ञानप्रच्छन्नकारणम्।
मुक्तिमार्गकुठारश्च भक्तेश्च व्यवधायकम्॥ ४६
मुनिरुवाच
जन्ममृत्युजराशोकरोगबीजाड्करं परम्।
सम्पत्तितिमिरान्धश्च मुक्तिमार्ग न पश्यति॥ ४७
सम्पन्मत्तो विमूढश्च सुरामत्तः स एव च।
बान्धवैर्वेष्टितः सोऽपि बन्धुत्वेनैव हे हरे॥ ४८
सम्पत्तिमदमत्तश्च विषयान्धश्च विह्वलः।
महाकामी राजसिकः सत्त्वमार्ग न पश्यति॥ ४९
द्विविधो विषयान्धश्च राजसस्तामसः स्मृतः।
अशास्त्रज्ञस्तामसश्च शास्त्रज्ञो राजसः स्मृत: ॥ ५०
शास्त्रं च द्विविधं मार्ग दर्शयेत्सुरपुङ्गव।
प्रवृत्तिबीजमेकं च निवृत्तेः कारणं परम्॥ ५९
चरन्ति जीविनश्चादौ प्रवृत्तेर्दु: खवर्त्मनि।
स्वच्छन्दं च प्रसन्नं च निर्विरोधं च सन्ततम्॥ ५२
आयाति मधुनो लोभात्क्लेशेन सुखमानितः।
परिणामे नाशबीजे जन्ममृत्युजराकरे॥ ५३
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ४०
यह सुनकर देवराज इन्द्र मुनि दुर्वासाके चरण
पकड़कर शोकसन्तप्त तथा भयसे व्याकुल हो उच्च
स्वरसे रोने लगे और उनसे कहने लगे— ॥ ४४॥
महेन्द्र बोले-हे प्रभो! आपने मुझे अत्यन्त
उचित शाप दिया है; क्योंकि यह मायाका नाश कर
देनेवाला है। मैं अपनी अपहत सम्पत्तिकी याचना
नहीं कर रहा हूँ, आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश दीजिये ।
[क्योंकि यह लौकिक] ऐश्वर्य समस्त विपत्तियोंका
बीजस्वरूप है, ज्ञानका आच्छादन कर देनेवाला है,
मुक्तिमार्गका कुठार है तथा भक्तिमें व्यवधान उत्पन्न
करनेवाला है ॥ ४५-४६ ॥
मुनि बोलेयह ऐश्वर्य जन्म, मृत्यु, जरा,
शोक और रोगके बीजका महान् अंकुर है। सम्पत्तिके
घोर अन्धकारसे अन्धा बना हुआ मानव मुक्तिका मार्ग
नहीं देख पाता है॥ ४७॥
हे इन्द्र! जो मूर्ख सम्पत्तिसे उन्मत्त है,
उसको वास्तवमें मदिरापानसे भी प्रमत्त समझना
चाहिये। बन्धु-बान्धव उसे बन्धु समझकर सदा
घेरे रहते हैं ॥ ४८॥
सम्पत्तिके मदमें उन्मत्त वह व्यक्ति विषयान्ध,
विहृल, महाकामी और राजसिक होकर सात्त्विक
मार्गका अवलोकन नहीं कर पाता है॥ ४९॥
विषयान्ध भी राजस तथा तामस भेदसे
दो प्रकारका बताया गया है। शास्त्रज्ञानसे हीन
व्यक्तिको तामस तथा शास्त्रज्ञको राजस कहा गया
है ॥ ५०॥
हे सुरश्रेष्ठ! शास्त्र भी दो प्रकारके मार्ग
दिखलाता है। एक संसृतिका हेतु है तथा दूसरा
निवृत्तिका कारण कहा गया है॥५१॥
पहले प्रवृत्तिबीजरूपी दुःखमय मार्गपर सभी
प्राणी स्वच्छन्द तथा प्रसन्न होकर निर्विरोधभावसे
निरन्तर चलते रहते हैं। जैसे मधुके लोभसे भौरा
अत्यन्त सुख मानकर क्लेशके साथ पुष्पोंपर आता है,
वैसे ही मनुष्य परिणाममें विनाशके बीजस्वरूप तथा
जन्म-मृत्यु-जराके आश्रयस्वरूप इस प्रवृत्तिमार्गपर
अग्रसर होता है ॥ ५२-५३॥
अ० ४० ]
अनेकजन्मपर्यन्तं कृत्वा च भ्रमणं मुदा।
स्वकर्मविहितायां च नानायोन्यां क्रमेण च॥ ५४
ततश्चेशानुग्रहाच्च सत्सङ्गं लभते च सः।
सहस्त्रेषु शतेष्वेको भवाब्धिपारकारणम्॥ ५५
साधुस्तत्त्वप्रदीपेन मुक्तिमार्ग प्रदर्शयेत्।
तदा करोति यत्नं च जीवो बन्धनखण्डने॥ ५६
अनेकजन्मयोगेन तपसानशनेन च।
तदा लभेन्पुक्तिमार्ग निर्विघ्नं सुखदं परम्॥ ५७
इदं श्रुतं गुरोर्वक्त्राद्यत् पृच्छसि पुरन्दर।
मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा वीतरागो बभूव सः॥ ५८
वैराग्यं वर्धयामास तस्य ब्रह्मन् दिने दिने।
मुनेः स्थानाद् गृहं गत्वा स ददर्शामरावतीम्॥ ५९
दैत्यैरसुरसङ्केशच समाकीर्णा भयाकुलाम्।
विषमोपप्लवां पुत्रबन्धुहीनां च कुत्रचित्॥ ६०
पितृमातृकलत्रादिविहीनामतिचञ्चलाम् ।
शत्रुग्रस्तां च तां दृष्ट्वा जगाम वाक्पति प्रति॥ ६१
शक्रो मन्दाकिनीतीरे ददर्श गुरुमीश्वरम्।
ध्यायमानं परं ब्रह्म गङ्कातोये स्थितं परम्॥ ६२
सूर्याभिसम्मुखं पूर्वमुखं च विश्वतोमुखम्।
साश्रुनेत्रं पुलकिनं परमानन्दसंयुतम्॥ ६३
वरिष्ठं च गरिष्ठं च धर्मिष्ठं श्रेष्ठसेवितम्।
प्रेष्ठं च बन्धुवर्गाणामतिश्रेष्ठं च ज्ञानिनाम्॥ ६४
ज्येष्ठं च श्रातृवर्गाणामनिष्टं सुरवैरिणाम्।
दुष्ट्वा गुरुं जपन्तं च तत्र तस्थौ सुरेश्वरः ॥ ६५
नवम स्कन्ध
५३९
प्रसन्नतापूर्वक अनेक जन्मोंतक अपने किये
कर्मके परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें
क्रमशः भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान्को कृपासे
ही सैकड़ों तथा हजारों प्राणियोंमेंसे कोई बिरला ही
संसारसागरसे पार करनेवाले सत्संगको प्राप्त कर
पाता है॥ ५४-५५॥
जब कोई साधु तत्चज्ञानरूपी दीपकसे
उसे मुक्तिमार्ग दिखा देता है, तब संसारबन्धनको
तोड्नेके लिये जीव प्रयत्न करने लगता है। अनेक
जन्मोंमें किये गये तप तथा उपवाससे जब मानवका
पुण्योदय होता है, तब वह निर्विघ्न तथा परम
सुखप्रद मुक्तिमार्गको प्राप्त कर पाता है । हे इन्द्र! तुम
जो बात पूछ रहे हो, उसे मैंने गुरुके मुखसे सुना
है ॥ ५६-५७६ ॥
हे ब्रह्मन्! मुनि दुर्वासाका यह वचन सुनकर
देवराज इन्द्र रागरहित हो गये और उनके हृदयमें
दिनोंदिन बैराग्यकी भावना बढ़ने लगी॥ ५८३ ॥
तत्पश्चात् मुनिके स्थानसे अपने भवन पहुँचकर
इन्द्रने देखा कि अमरावतीपुरी दैत्यों तथा असुरोंसे
भरी हुई है, चारों ओर भय व्याप्त है, सर्वत्र विषमता
तथा उपद्रवकी स्थिति है, कहीं किसीके पुत्र
तथा बन्धु-बान्धव नहीँ थे, कहीं किसीके माता-पिता
और स्त्री आदिने उसका साथ छोड़ दिया है,
चारों ओर हलचल मची हुई है तथा सम्पूर्ण नगरी
शत्रुओंसे पूर्णतया आक्रान्त है। उस अमरावतीको
इस स्थितिमें देखकर इन्द्र देवगुरु बृहस्पतिके पास
गये॥ ५९-६१॥
मन्दाकिनीनदीके तटपर पहुँचकर देवराज इन्द्रने
देखा कि गुरुदेव बृहस्पति पूरबको ओर सूर्यके
अभिमुख हो गंगाजलमें खड़े होकर सर्वतोमुख
परब्रह्म परमात्माका ध्यान कर रहे हैं और पुलकित
तथा प्रसन्नतायुक्त उनके नेत्रोंसे अश्रु गिर रहे हैं। परम
श्रेष्ठ, आदरणीय, धर्मनिष्ठ, श्रेष्ठ जनोंद्वारा सेवित,
बन्धुवर्गोमें अति महान्, ज्ञानियोंमे श्रेष्ठ, भाई-बन्धुओंमें
ज्येष्ठ तथा देवशत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरु
बृहस्पतिको जप करते हुए देखकर सुरेश्वर इन्द्र
वहींपर स्थित हो गये॥ ६२-६५ ॥
७५४०
प्रहरान्ते गुरुं दृष्ट्वा चोत्थितं प्रणनाम सः ।
प्रणम्य चरणाम्भोजे रुरोदोच्चैर्मुहुर्मुहु: ॥ ६६
वृत्तान्तं कथयामास ब्रह्मशापादिकं तथा।
पुनर्वरोपलब्धिं च ज्ञानप्राप्तिं सुदुर्लभाम्॥ ६७
वैरिग्रस्तां च स्वपुरीं क्रमेणैव सुरेश्वरः।
शिष्यस्य वचनं श्रुत्वा सुबुद्धिर्वदतां वरः॥ ६८
कोपसंरक्तलोचनः।
गुरुरुवाच
श्रुतं सर्व सुरश्रेष्ठ मा रोदीर्वचनं शृणु॥ ६९
बृहस्पतिरुवाचेदं
न कातरो हि नीतिज्ञो विपत्तौ च कदाचन।
सम्पत्तिर्वा विपत्तिर्वा नश्वरा श्रमरूपिणी॥ ७०
पूर्वस्य कर्मायत्ता च स्वयं कर्ता तयोरपि।
सर्वेषां च भवत्येव शश्वज्जन्मनि जन्मनि॥ ७१
चक्रनेमिक्रमेणैव तत्र का परिदेवना।
उक्तं हि स्वकृतं कर्म भुज्यतेऽखिलभारते॥ ७२
शुभाशुभं च यत्किञ्चित्स्वकर्मफलभुक् पुमान्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि॥ ७३
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
इत्येवमुक्तं वेदे च कृष्णेन परमात्मना॥ ७४
सामवेदोक्तशाखायां सम्बोध्य कमलोद्भवम्।
जन्मभोगावशेषे च सर्वेषां कृतकर्मणाम्॥ ७५
अनुरूपं हि तेषां च भारतेऽन्यत्र चैव हि।
कर्मणा ब्रह्मशापं च कर्मणा च शुभाशिषम्॥ ७६
कर्मणा च महालक्ष्मी लभेद्वन्यं च कर्मणा।
कोटिजन्मार्जितं कर्म जीविनामनुगच्छति॥ ७७
न हि त्यजेद्विना भोगं तच्छायेव पुरन्दर।
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ४०
एक प्रहरके बाद गुरुको ध्यानसे उपरत देखकर
इन्द्रने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनके चरणकमलमें
मस्तक झुकाकर इन्द्र उच्च स्वरसे बार-बार विलाप
करने लगे। देवराज इन्द्रने गुरु बृहस्पतिसे दुर्वासाके
द्वारा प्रदत्त शाप आदिसे सम्बन्धित सारा वृत्तान्त,
वरकी उपलब्धि, दुर्वासासे अत्यन्त दुर्लभ ज्ञानकी
प्राप्ति और शत्रुओंसे आक्रान्त अपनी नगरीके विषयमें
सभी बातें क्रमसे कहीं॥ ६६-६७ ६ ॥
अपने शिष्य इन्द्रकी बात सुनकर क्रोधसे लाल
ेत्रोंवाले परम बुद्धिमान् तथा वक्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पति
इस प्रकार कहने लगे-॥ ६८६ ॥
गुरु बोले—हे सुरश्रेष्ठ! मैंने सब कुछ सुन
लिया, मत रोओ, मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष
विपत्तिकालमें कभी भी घबराता नहीं; क्योंकि सम्पत्ति
अथवा विपत्ति नश्वर हैं। ये दोनों ही श्रमसाध्य हैं।
सम्पत्ति अथवा विपत्ति अपने पूर्व जन्ममें किये गये
कर्मका फल है और उन्हींके अधीन होकर कर्ताको
स्वयं फल भोगना पड़ता है । सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये
प्रत्येक जन्ममें यही स्थिति है, जो चक्रमण्डलकी
भाँति निरन्तर आती-जाती रहती है, अत: इस विषयमे
चिन्ताको क्या आवश्यकता है ?॥ ६९-७१% ॥
ऐसा कहा गया है कि सम्पूर्ण भारतमें अपने द्वारा
किये गये कर्मका फल भोगना ही पड़ता है । शुभ अथवा
अशुभ जो कुछ भी कर्म मनुष्य करता है, वह उसे
भोगता ही है। सैकड़ों करोड़ों कल्प बीत जानेके बाद
भी बिना भोगे हुए कर्मोका क्षय नहीं होता ॥ ७२-७३॥
अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य
भोगना पड़ता है—ऐसा परमात्मा श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको
सम्बोधित करके सामवेदकी शाखामें कहा है। किये
हुए सम्पूर्ण कर्मोका भोग शेष रह जानेपर उन
प्राणियोंका कर्मानुसार भारतवर्षमें अथवा अन्यत्र जन्म
होता है ॥ ७४-७५ ६ ॥
प्राणी कर्मसे ही ब्रह्मशाप, कर्मसे ही शुभाशीर्वाद,
कर्मसे ही महालक्ष्मी और कर्मसे ही दरिद्रता प्राप्त
करता है। हे पुरन्दर! करोड़ों जन्मोंके संचित कर्म
प्राणीके पीछे उसकी छायाकी भाँति लगे रहते हैं और
बिना भोगे उस प्राणीको नहीं छोड़ते॥ ७६-७७६ ॥
अ० ४०]
कालभेदे देशभेदे पात्रभेदे च कर्मणाम्॥ ७८
न्यूनताधिकभावोऽपि भवेदेव हि कर्मणा।
वस्तुदानेन वस्तूनां समं पुण्यं दिने दिने॥ ७९
दिनभेदे कोटिगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम्।
समे देशे च वस्तूनां दाने पुण्यं समं सुर॥ ८०
देशभेदे कोटिगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम्।
समे पात्रे समं पुण्यं वस्तूनां कर्त्रेव च॥ ८१
पात्रभेदे शतगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम्।
यथा फलन्ति सस्यानि न्यूनान्यप्यधिकानि च॥ ८२
कर्षकाणां क्षेत्रभेदे पात्रभेदे फलं तथा।
सामान्यदिवसे विप्रदानं समफलं भवेत्॥ ८३
अमायां रविसंक्रान्त्यां फलं शतगुणं भवेत्।
चातुर्मास्यां पौर्णमास्यामनन्तं फलमेव च॥ ८४
ग्रहणे शशिनः कोटिगुणं च फलमेव च।
सूर्यस्य ग्रहणे वापि ततो दशगुणं भवेत्॥ ८५
अक्षयायामक्षयं तदसंख्यं फलमुच्यते।
एवमन्यत्र पुण्याहे फलाधिक्यं भवेदिति॥ ८६
यथा दाने तथा स्नाने जपेऽन्यपुण्यकर्मसु।
एवं सर्वत्र बोद्धव्यं नराणां कर्मणां फलम्॥ ८७
यथा दण्डेन चक्रेण शरावेण भ्रमेण च।
कुम्भं निर्माति निर्माता कुम्भकारो मृदा भुवि॥ ८८
नवम स्कन्ध
५४१
काल, देश और पात्रके भेदसे कर्मोका न्यूनाधिक
भाव हुआ ही करता है। साधारण समयमें दानमें दी
गयी वस्तुओंका साधारण फल होता है। यदि किसी
विशेष पुण्य दिनमें कोई वस्तु दानमें दी जाती है तो
उसका फल साधारण दिनकी अपेक्षा करोड़ों गुना उससे
भी अधिक या असंख्य गुना प्राप्त होता है ॥ ७८-७९ ३ ॥
उसी प्रकार हे इन्द्रदेव! साधारण स्थानमें
दानमें दी गयी वस्तुका साधारण पुण्य होता है, किंतु
देशभेदके अनुसार किसी विशेष स्थानमें दानका
फल करोड़ गुना या उससे भी अधिक असंख्य गुना
होता है॥ ८०३ ॥
साधारण पात्रको दान करनेपर उन वस्तुओंका दान
करनेवालेको उसका साधारण पुण्य मिलता है, किंतु
किसी विशेष पात्रको दान देनेसे उसकी अपेक्षा सौ गुना
या उससे अधिक असंख्य गुना पुण्य होता है ॥ ८१ ई ॥
जैसे क्षेत्रभेदसे भिन्न-भिन्न खेतोंमें बीज बोनेपर
किसानोंके लिये कम या अधिक धान्य उत्पन्न होते
हैं, बैसे ही पात्रभेदसे दान देनेपर दाता न्यूनाधिक फल
प्राप्त करता है॥ ८२३ ॥
सामान्य दिनमें ब्राह्मणको दिये गये दानका
सामान्य फल होता है, किंतु अमावास्या तथा
सूर्यसंक्रान्तिको दान देनेसे सौ गुना फल होता है और
चातुर्मास्यमें तथा पूर्णिमा तिथिको दिये गये दानका
अनन्त फल होता है। चन्द्रग्रहणके अवसरपर दान
देनेसे करोड़ गुना फल प्राप्त होता है तथा सूर्यग्रहणके
समयपर दिये गये दानका फल उससे भी दस गुना
अधिक होता है। अक्षय तृतीयाको दिया गया दान
अक्षय होता है और उसका अनन्त फल कहा गया
है। इसी प्रकार अन्य पर्वदिनोंमें भी फलोंकी अधिकता
हो जाती है। जिस प्रकार दानके फलमें आधिक्य हो
जाता है, उसी प्रकार स्नान, जप तथा अन्य पुण्यकायोमें
भी होता है। मनुष्योंके लिये कर्मफलके विषयमें इसी
प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये॥ ८३—८७॥
जिस प्रकार पृथ्वीलोकमें कुम्भकार दण्ड, चक्र,
शराव और भ्रमणके द्वारा मिट्टीसे कुम्भका निर्माण
करता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे प्राणियोंको
फल प्रदान करते हैं ॥ ८८॥
५४२
तथैव कर्मसूत्रेण फलं धाता ददाति च।
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० ४१
[अतः हे देवराज!] जिनकी आज्ञासे इस
यस्याज्ञया सृष्टमिदं तं च नारायणं भज॥ ८९ | जगत्को सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायणकी आप
स विधाता विधातुश्च पातुः पाता जगत्त्रये।
स्रष्टु: स्त्रष्टा च संहर्तुः संहर्ता कालकालकः॥ ९०
महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम्।
विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः॥ ९१
इत्येवमुक्त्वा तत्त्वज्ञः समालिङ्ग्य सुरेश्वरम्।
दत्त्वा शुभाशिषं चेष्टं बोधयामास नारद॥ ९२
आराधना कोजिये। वे भगवान् नारायण त्रिलोकीमें
विधाताके भी विधाता, पालन करनेवालेके भी पालक,
सृष्टि करनेवालेके भी स्रष्टा, संहार करनेवालेके भी
संहारक और कालके भी काल हैं ॥ ८९-९०॥
जो मनुष्य इस संसारमें घोर विपत्तिके समयमें
भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये
उस विपत्तिमें भी सम्पत्ति उत्पन्न हो जाती है—ऐसा
भगवान् शंकरने कहा है।॥ ९१॥
हे नारद! ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिने
देवराज इन्द्रको हृदयसे लगाकर और शुभाशीर्वाद
देकर उन्हें अभीष्ट बात समझा दी॥ ९२॥
इति श्रीमह्ेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रघां संहितायां नवमस्कन्धे
लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनं नाम चत्वारिशोऽध्यायः ॥ ४०॥
“नट धस्स
अधेकचत्वारिंशो$ध्याय:
ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका
उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको बताना, समुद्रमन्थन
तथा उससे लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
श्रीनारायण उवाच
हरिं ध्यात्वा हरिर्ब्रह्मन् जगाम ब्रह्मणः सभाम्।
बृहस्पतिं पुरस्कृत्य सर्वैः सुरगणैः सह॥ १
शीघ्रं गत्वा ब्रह्मलोकं दृष्ट्वा च कमलोद्भवम्।
प्रणेमुर्देबताः सर्वाः सहेन्द्रा गुरुणा सह॥ २
वृत्तान्तं कथयामास सुराचार्यो विधिं प्रति।
प्रहस्योवाच तच्छुत्वा महेन्द्र कमलासनः॥ ३
ब्रह्मोवाच
वत्स मद्ंशजातोऽसि प्रपौत्रो मे विचक्षणः।
बृहस्पतेश्च शिष्यस्त्वं सुराणामधिपः स्वयम्॥ ४
मातामहश्च दक्षस्ते विष्णुभक्तः प्रतापवान्।
कुलत्रयं यस्य शुद्धं कथं सोऽहङ्कतो भवेत्॥ ५
माता पतिव्रता यस्य पिता शुद्धो जितेन्द्रियः ।
मातामहो मातुलश्च कथं सोऽहङ्कृतो भवेत्॥ ६
श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! भगवान् श्रीहरिका
ध्यान करके देवराज इन्द्र बृहस्पतिको आगे करके
सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभामें गये॥ १॥
इन्द्रसमेत सभी देवताओंने गुरु बृहस्पतिके साथ
शीघ्र ही ब्रह्मलोक जाकर पद्मयोनि ब्रह्माजीका दर्शन
करके उन्हें प्रणाम किया॥ २॥
तत्पश्चात् देवगुरु बुहस्पतिने ब्रह्माजीसे सारा
वृत्तान्त कहा । उसे सुनकर ब्रह्माजी हँस करके देवराज
इन्द्रसे कहने लगे॥ ३॥
ब्रह्माजी बोले-हे वत्स! तुम मेरे वंशमें उत्पन्न
हुए हो और मेरे बुद्धिमान् प्रपौत्र हो, इसके अतिरिक्त
बृहस्पतिके शिष्य हो और स्वयं देवताओंके स्वामी
हो। परम प्रतापी तथा विष्णुभक्त दक्षप्रजापति तुम्हारे
नाना हैं। जिसके तीनों कुल पवित्र हों, वह पुरुष
अहंकारी कैसे हो सकता है ? जिसकी माता पतिव्रता,
पिता शुद्धस्वरूप और नाना तथा मामा जितेन्द्रिय हों,
अ० ४९]
जनः पैतृकदोषेण दोषान्मातामहस्य च।
गुरुदोषात्रिभिर्दोषैहरिदोषी भवेद् श्रुवम्॥ ७
सर्वान्तरात्मा भगवान् सर्वदेहेष्ववस्थितः ।
यस्य देहात्स प्रयाति स शवस्तत्क्षणं भवेत्॥ ८
मनो5हमिन्द्रियेशं च ज्ञानरूपो हि शङ्करः।
विष्णुप्राणा च प्रकृतिर्बुद्धि्भगवती सती॥ ९
निद्रादयः शक्तयश्च ताः सर्वाः प्रकृतेः कलाः।
आत्मनः प्रतिबिम्बश्च जीवो भोगशरीरभृत्॥ १०
आत्मनीशे गते देहात्सर्वे यान्ति ससम्भ्रमाः ।
यथा वर्त्मनि गच्छन्तं नरदेवमिवानुगाः॥ ११
अहं शिवश्च शेषश्च विष्णुर्धर्मो महाविराट्।
यूयं यदंशा भक्ताश्च तत्पुष्पं न्यक्कृतं त्वया॥ १२
शिवेन पूजितं पादपदां पुष्पेण येन च।
तत्र दुर्वाससा दत्तं दैवेन न्यक्कृतं त्वया॥ १३
तत्पुष्पं मस्तके यस्य कृष्णपादान्जप्रच्युतम्।
सर्वेषां च सुराणां च तत्पूजापुरतो भवेत्॥ १४
दैवेन वञ्चितस्त्वं हि दैवं च बलवत्तरम्।
भाग्यहीनं जनं मूढं को वा रक्षितुमीश्वरः॥ १५
सा श्रीर्गताधुना कोपात्कृष्णनिर्माल्यवर्जनात्।
अधुना गच्छ वैकुण्ठं मया च गुरुणा सह॥ १६
निषेव्य तत्र श्रीनाथं श्रियं प्राप्स्यति मद्दरात्।
नवम स्कन्ध
५४३
वह अहंकारयुक्त कैसे हो सकता है? पिताके दोष,
नानाके दोष और गुरुके दोष-इन्हीं तीन दोषॉसे ही
मनुष्य भगवान् श्रीहरिका द्रोही हो जाता है ॥ ४—७॥
सभीकी अन्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सभी प्राणियोंके
शरीरमें विराजमान रहते हैं। वे भगवान् जिसके
शरीरसे निकल जाते हैं, बह प्राणी उसी क्षण शव हो
जाता है॥ ८॥
मैं प्राणियोंके शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन बनकर
रहता हूँ, शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं और
विष्णुकी प्राणस्वरूपा भगवती श्रीराधा मूलप्रकृतिके रूपमें
और साध्वी भगवती दुर्गा बुद्धिरूपमें विराजमान हैं ।
निद्रा आदि सभी शक्तियाँ भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं ।
आत्माका प्रतिबिम्ब भोगशरीर धारण करके जीवरूपमें
प्रतिष्ठित है शरीरके स्वामीरूप आत्माके देहसे निकल
जानेपर ये सब उसीके साथ तुरंत उसी प्रकार चले जाते
हैं, जैसे मार्गमें चलते हुए राजाके पीछे-पीछे उसके
अनुचर आदि चलते हैं ॥ ९-११॥
मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म, महाविराट् तथा
तुम सब लोग जिनके अंश तथा भक्त हैं; उन्हीं
भगवान् श्रीकृष्णके पवित्र पुष्पका तुमने अपमान कर
दिया है॥ १२॥
शंकरजीने जिस पुष्पसे भगवान् श्रीहरिके
चरणकमलकी पूजा की थी, बही पुष्प मुनि दुर्वासाके
द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया था; किंतु तुमने दैववश
उसका तिरस्कार कर दिया॥ १३॥
भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत वह पुष्प
जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, उसको पूजा सभी
देवताओंमें सबसे पहले होती है॥ १४॥
तुम तो दैवके द्वारा ठग लिये गये हो। प्रारब्ध
सबसे अधिक बलशाली होता है। भाग्यहीन तथा
मूर्ख व्यक्तिकी रक्षा करनेमें कौन समर्थ है ?॥ १५॥
भगवान् श्रीकृष्णको अर्पित किये जानेवाले
पुष्पका तुम्हारे द्वारा त्याग किये जानेके कारण वे
भगवती श्रीदेवी कोप करके इस समय तुम्हारे पाससे
चली गयी हैं। अतः तुम इसी समय मेरे तथा गुरु
बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठ चलो। मेरे वरके प्रभावसे
वहाँपर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके
तुम लक्ष्मीको पुनः प्राप्त कर लोगे॥ १६३ ॥
५४४
एवमुक्त्वा च स ब्रह्मा सर्वे: सुरगणैः सह॥ १७
तत्र गत्वा परब्रह्म भगवन्तं सनातनम्।
दृष्ट्वा तेजःस्वरूपं तं प्रज्वलन्तं स्वतेजसा॥ १८
ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डशतकोटिसमप्रभम् ।
शान्तमनादिमध्यान्तं लक्ष्मीकान्तमनन्तकम्॥ १९
चतुर्भुजैः पार्षदैश्च सरस्वत्या युतं प्रभुम्।
भक्त्या चतुर्भि्वेदेश्च गङ्गया परिवेष्टितम्॥ २०
तं प्रणेमुः सुराः सर्वे मूर्ध्ना ब्रह्मपुरोगमाः ।
भक्तिनम्राः साश्रुनेत्रास्तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ २१
वृत्तान्तं कथयामास स्वयं ब्रह्मा कृताञ्जलिः ।
रुरुदुर्देवताः सर्वाः स्वाधिकाराच्च्युताश्च ता: ॥ २२
स ददर्श सुरगणं विपदग्रस्तं भयाकुलम्।
रत्नभूषणशून्यं च वाहनादिविवर्जितम्॥ २३
शोभाशून्यं हतश्रीकं निष्प्रभं सभयं परम्।
उवाच कातरं दृष्ट्वा भयभीतिविभञ्जनः॥ २४
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्ब्रह्मन् हे सुराश्च भयं किं वो मयि स्थिते।
दास्यामि लक्ष्मीमचलां परमैश्वर्यवर्धिनीम्॥ २५
किञ्च मद्गचनं किञ्चिच्छूयतां समयोचितम्।
हितं सत्यं सारभूतं परिणामसुखावहम्॥ २६
जनाश्चासंख्यविश्वस्था मदधीनाश्च सन्ततम्।
यथा तथाहं मद्भक्तपराधीनोऽस्वतन्त्रकः॥ २७
यं यं रुष्टो हि मद्भक्तो मत्परो हि निरङ्कुशः ।
तदगृहेऽहं न तिष्ठामि पदाया सह निश्चितम्॥ २८
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ४१
[हे नारद!] ऐसा कहकर ब्रह्माजीने सभी
देवताओंके साथ वैकुण्ठलोक पहुँचकर परब्रह्म
सनातन भगवान् श्रीहरिको देखा। वे तेजस्वरूप
प्रभु अपने ही तेजसे देदीप्यमान हो रहे थे, वे ग्रीष्म
ऋतुके मध्याहकालीन सौ करोड़ सूर्योकी प्रभासे युक्त
थे, आदि-अन्त-मध्यसे रहित अनन्तरूप लक्ष्मीकान्त
भगवान् श्रीहरि शान्तभावसे विराजमान थे, वे प्रभु
चार भुजाओंवाले पार्षदों तथा भगवती सरस्वतीके
साथ सुशोभित हो रहे थे और चारों वेदोंसहित
देवी गंगा भक्तिभावसे युक्त होकर उनके पास
विराजमान थीं। उन प्रभुको देखकर ब्रह्माके
अनुगामी सभी देवताओंने सिर झुकाकर उन्हें
प्रणाम किया। भक्ति तथा विनयसे युक्त होकर
देवताओंने नेत्रॉमें आँसू भरकर उन परमेश्वरकी स्तुति
को ॥ १७—२१॥
तत्पश्चात् स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान्
श्रीहरिसे सारा वृत्तान्त कहा। अपने अधिकारसे बंचित
सभी देवता उस समय रो रहे थे॥ २२॥
उन भगवान् श्रीहरिने देखा कि सभी देवगण
विपत्तिसे ग्रस्त, भयसे व्याकुल, रत्न तथा आभूषणसे
विहीन, वाहन आदिसे रहित, शोभाशून्य, श्रीहीन,
निस्तेज तथा अत्यन्त भयग्रस्त हैं । उन्हें इस प्रकार
कष्टसे व्याकुल देखकर संसारका भय दूर करनेवाले
प्रभु कहने लगे॥ २३-२४॥
श्रीभगवान् बोले—हे ब्रह्मन्! हे देवगण!
आप लोग मत डरिये। मेरे रहते आपलोगोंको किस
बातका भय है। मैं आपलोगोंको परम ऐश्वर्यकी वृद्धि
करनेवाली स्थिर लक्ष्मी प्रदान करूँगा । किंतु मेरी कुछ
समयोचित बात सुनिये; जो हितकर, सत्य, सारभूत
तथा परिणाममें सुखकारी है॥ २५-२६॥
जैसे अनन्त ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले सभी प्राणी
निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने
भक्तोंके अधीन रहता हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे प्रति
समर्पित मेरा निरंकुश भक्त जिस-जिसके ऊपर रुष्ट
होता है, उसके घर मैं लक्ष्मीक साथ कभी नहीं
ठहरता-यह निश्चित है॥ २७-२८॥
अ० ४९]
नवम स्कन्ध
५४५
दुर्वासाः शङ्करांशश्च वैष्णवो मत्परायणः।
तच्छापादागतोऽहं च सलक्ष्मीको हि वो गृहात्॥ २९
यत्र शङ्खुध्वनिर्नास्ति तुलसी न शिवार्चनम्।
न भोजनं च विप्राणां न पद्या तत्र तिष्ठति॥ ३०
मद्भक्तानां च मे निन्दा यत्र ब्रह्मन् भवेत्सुराः ।
महारुष्टा महालक्ष्मीस्ततो याति पराभवम्॥ ३१
मद्भक्तिहीनो यो मूढो भुङ्के यो हरिवासरे।
मम जन्मदिने वापि याति श्रीस्तदगृहादपि॥ ३२
मन्नामविक्रयी यश्च विक्रीणाति स्वकन्यकाम्।
यत्रातिथिर्न भुङ्के च मत्प्रिया याति तदगृहात्॥ ३३
यो विप्रः पुंश्चलीपुत्रो महापापी च तत्पतिः ।
पापिनो यो गृहं याति शूद्रश्राद्धान्नभोजकः॥ ३४
महारुष्टा ततो याति मन्दिरात्कमलालया।
शूद्राणां शवदाही च भाग्यहीनो द्विजाधमः ॥ ३५
याति रुष्टा तदगृहाच्च देवा: कमलवासिनी।
शूद्राणां सूपकारी यो ब्राह्मणो वृषवाहकः॥ ३६
तत्तोयपानभीता च कमला याति तदगृहात्।
अशुद्धहृदयः क्रूरो हिंसको निन्दको द्विजः॥ ३७
ब्राह्मणः शूद्रयाजी च याति देवी च तदगृहात्।
अवीरान्नं च यो भुङ्के तस्माद्याति जगत्प्रसूः ॥ ३८
898 श्रीमदेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-8 ^
भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न ऋषि दुर्वासा
महान् वैष्णव हैं तथा मेरे प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं।
उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है, अतः मैं आपलोगोंके
घरसे लक्ष्मीसहित चला आया हूँ॥ २९॥
जहाँ शंखध्वनि नहीं होती, तुलसी नहीं रहती,
शिवको पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं
कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं॥ ३०॥
हे ब्रह्मन्! हे देवगण! जहाँ मेरी तथा मेरे
भक्तोंको निन्दा होती है, वहाँसे महालक्ष्मी अत्यन्त
रुष्ट होकर चली जाती हैं और उसका पराभव हो
जाता है॥ ३१॥
जो मूर्ख मनुष्य मेरी भक्तिसे रहित है तथा
एकादशी और मेरे जन्मके दिन (जन्माष्टमी आदि)-
को भोजन करता है, उसके भी घरसे लक्ष्मी चली
जाती हैं ॥ ३२॥
जो व्यक्ति मेरे नामका तथा अपनी कन्याका
विक्रय करता है और जिसके यहाँ अतिथि भोजन
नहीं करता, उसके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती
हैं ॥ ३३॥
जो ब्राह्मण वेश्याका पुत्र है अथवा उसका पति
है, वह महापापी है। जो विप्र ऐसे पापीके घर जाता
है तथा शूद्रका श्राद्धान्न खाता है, उसके घरसे
कमलासना महालक्ष्मी अत्यन्त रुष्ट होकर चली जाती
हैं॥ ३४६ ॥
हे देवगण! जो द्विजाधम शूद्रोंका शव जलाता
है, बह भाग्यहीन हो जाता है। उससे रुष्ट होकर
कमलवासिनी लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं॥ ३५६ ॥
जो ब्राह्मण शूद्रोंक यहाँ भोजन पकानेका काम
करता है तथा जो बैल हाँकता है, उसका जल पीनेसे
लक्ष्मी डरती हैं और उसके घरसे चली जाती
हैं॥ ३६६ ॥
जो ब्राह्मण अशुद्ध हृदयवाला, क्रूर, हिंसक,
दूसरोंको निन्दा करनेवाला तथा शूद्रोंका यज्ञ कराने-
वाला होता है, उसके घरसे भगवती लक्ष्मी चली
जाती हैं। जो ब्राह्मण पति-पुत्रहीन स्त्रीका अन्न
खाता है, उसके घरसे भी जगज्जननी लक्ष्मी चली
जाती हैं ॥ ३७-३८॥
५४६
तृणं छिनत्ति नखरैस्तैर्वा यो विलिखेन्महीम्।
निराशो ब्राह्मणो यत्र तदगृहाद्याति मत्प्रिया॥ ३९
सूर्योदये द्विजो भुङ्के दिवास्वापी च ब्राह्मण: ।
दिवा मैथुनकारी च यस्तस्माद्याति मत्प्रिया ॥ ४०
आचारहीनो विप्रो यो यश्च शूद्रप्रतिग्रही ।
अदीक्षितो हि यो मूढस्तस्माद्वै याति मत्प्रिया॥ ४१
स्निग्धपादश्च नग्नो हि यः शेते ज्ञानदुर्बलः ।
शश्वद्वदति वाचालो याति सा तद्गृहात्सती॥ ४२
शिरःस्नातस्तु तैलेन योऽन्याङ्गं समुपस्पृशेत्।
स्वाङ्गं च वादयेद्वाद्यं रुष्टा सा याति तदगृहात्॥ ४३
ब्रतोपवासहीनो यः सन्ध्याहीनो 5शुचिर्द्धिजः ।
विष्णुभक्तिविहीनस्तु तस्माद्याति च मत्तप्रिया॥ ४४
ब्राह्मणं निन्दयेद्यो हि तं च यो द्वेष्टि सन्ततम्।
जीवहिँस्त्रो दयाहीनो याति सर्वप्रसूस्ततः॥ ४५
यत्र यत्र हरेरर्चा हरेरुत्कीर्तनं तथा।
तत्र तिष्ठति सा देवी सर्वमङ्गलमङ्गला॥ ४६
यत्र प्रशंसा कृष्णस्य तद्भक्तस्य पितामह।
सा च कृष्णप्रिया देवी तत्र तिष्ठति सन्ततम्॥ ४७
यत्र शङ्खध्वनिः शङ्खः शिला च तुलसीदलम्।
तत्सेवा वन्दनं ध्यानं तत्र सा परितिष्ठति॥ ४८
7898 श्रीमददेवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]-8 8
श्रीमदेवीभागवत
[ अ० ४९
जो नखोंसे निष्प्रयोजन तृण तोडता है अथवा
नखोंसे भूमिको कुरेदता रहता है तथा जिसके यहाँसे
ब्राह्मण निराश होकर चला जाता है, उसके घरसे मेरी
प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं॥ ३९॥
जो ब्राह्मण सूर्योदयके समय भोजन करता है,
दिनमें शयन करता है तथा दिनमें मैथुन करता है,
उसके यहाँसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४०॥
जो ब्राह्मण आचारहीन, शूद्रोंसे दान ग्रहण
करनेवाला, दीक्षासे विहीन तथा मूर्ख है; उसके भी
घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं॥ ४१ ॥
जो अल्पज्ञ भींगे पैर अथवा नग्न होकर सोता
है तथा वाचालकी भाँति निरन्तर बोलता रहता है,
उसके घरसे वे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं॥ ४२॥
जो व्यक्ति अपने सिरपर तेल लगाकर उसी
हाथसे दूसरेके अंगका स्पर्श करता है और अपने
किसी अंगको बाजेको तरह बजाता है, उससे रुष्ट
होकर वे लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं॥ ४३॥
जो ब्राह्मण व्रत-उपवास नहीं करता, सन्ध्या-
वन्दन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है तथा
भगवान् विष्णुकी भक्तिसे रहित है, उसके यहाँसे मेरी
प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं॥ ४४॥
जो व्यक्ति ब्राह्मणकी निन्दा करता है और उससे
सदा द्वेषभाव रखता है, जीवोंकी हिंसा करता है तथा
प्राणियोंके प्रति दयाभाव नहीं रखता है; सबकी जननी
लक्ष्मी उस व्यक्तिसे दूर चली जाती हैं ॥ ४५॥
जिस-जिस जगह भगवान् विष्णुको पूजा होती
है तथा उनका गुणगान होता है, वहाँ सम्पूर्ण
मंगलोंको भी मंगल प्रदान करनेवाली वे भगवती
लक्ष्मी निवास करती हैं ॥ ४६॥
हे पितामह! जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके
भक्तोंका यशोगान किया जाता है, वहाँ उन श्रीकृष्णकी
प्रिया भगवती लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं ॥ ४७॥
जहाँ शंखध्वनि होती है और शंख, शालग्रामशिला
तथा तुलसीदल—ये रहते हैं एवं उनकी सेवा, वन्दना
तथा ध्यान किया जाता है; वहाँ बे लक्ष्मी सर्वदा
निवास करती हैं ॥ ४८ ॥
अ० ४९ ]
नवम स्कन्ध
५४७
शिवलिङ्कार्चनं यत्र तस्य चोत्कीर्तनं शुभम्।
दुर्गार्चनं तद्गुणाश्च तत्र पद्मनिवासिनी॥ ४९
विप्राणां सेवनं यत्र तेषां च भोजनं शुभम्।
अर्चनं सर्वदेवानां तत्र पद्ममुखी सती॥ ५०
इत्युक्त्वा च सुरान्सर्वान् रमामाह रमापतिः।
क्षीरोदसागरे जन्म कलयाकलयेति च॥ ५१
इत्युक्त्वा तां जगन्नाथो ब्रह्माणं पुनराह च।
मथित्वा सागरं लक्ष्मीं देवेभ्यो देहि पदाज॥ ५२
इत्युक्त्वा कमलाकान्तो जगामान्तःपुरं मुने।
देवाश््चिरेण कालेन ययुः क्षीरोदसागरम्॥ ५३
मन्थानं मन्दरं कृत्वा कूर्म कृत्वा च भाजनम्।
कृत्वा शेषं मन्थपाशं ममन्थुरसुराः सुरा: ॥ ५४
धन्वन्तरि च पीयूषमुच्चैः श्रवसमीप्सितम्।
नानारत्नं हस्तिरत्नं प्रापुर्लक्ष्मीं सुदर्शनम्॥ ५५
वनमालां ददौ सा च क्षीरोदशायिने मुने।
सर्वेश्वराय रम्याय विष्णवे वैष्णवी सती॥ ५६
देवैः स्तुता पूजिता च ब्रह्मणा शङ्करेण च।
ददौ दृष्टि सुरगृहे ब्रह्मशापविमोचनात्॥ ५७
प्रापुर्देवाः स्वविषयं दैत्यग्रस्तं भयङ्करम्।
महालक्ष्मीप्रसादेन वरदानेन नारद॥५८
3898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]—8 0
जहाँ शिवलिंगकी पूजा तथा उनके गुणोंका शुभ
कीर्तन और भगवती दुर्गाका पूजन तथा उनका
गुणगान किया जाता है, वहाँ पद्मनिवासिनी देवी
लक्ष्मी वास करती हैं ॥ ४९ ॥
जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम
भोजन कराया जाता है और सभी देवताओंकी पूजा
होती है, वहाँ कमलके समान मुखवाली साध्वी लक्ष्मी
विराजमान रहती हैं ॥ ५०॥
[हे नारद!] समस्त देवताओंसे ऐसा कहकर
लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिने लक्ष्मीजीसे कहा—
क्षीरसागरके यहाँ तुम अपनी एक कलासे जन्म ग्रहण
करो॥ ५१॥
लक्ष्मौजीसे ऐसा कहकर जगत्प्रभु श्रीहरिने
ब्रह्माजीसे पुनः कहा-हे कमलोद्भव! आप समुद्रमन्थन
करके उससे प्रकट होनेवाली लक्ष्मी देवताओंको सौंप
दीजिये ॥ ५२॥
हे मुने! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि
अन्तःपुरमें चले गये और देवताओंने भी कुछ कालके
अनन्तर क्षीरसागरको ओर प्रस्थान किया॥ ५३ ॥
समस्त देवताओं तथा राक्षसोंने मन्दराचल-
पर्वतको मथानी, कच्छपको आधार और शेषनागको
मथानीको रस्सी बनाकर समुद्रमन्थन किया। उसके
परिणामस्वरूप उन्हें धन्वन्तरि, अमृत, इच्छित उच्चैः श्रवा
नामक अश्व, अनेकविध रत्न, हाथियोंमें रत्नस्वरूप
ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शन चक्र और वनमाला आदि
प्राप्त हुए। हे मुने! तब विष्णुपरायणा साध्वी लक्ष्मीने
वह वनमाला क्षीरसागरमें शयन करनेवाले मनोहर
सर्वेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित कर दी॥ ५४—५६॥
तत्पश्चात् ब्रह्मा, शिव तथा देवताओंके द्वारा
पूजा तथा स्तुति किये जानेपर भगवती लक्ष्मीने
देवताओंके भवनपर अपनी कृपादृष्टि डाली, फलस्वरूप
वे देवगण मुनि दुर्वासाके शापसे मुक्त हो गये। हे
नारद! इस प्रकार महालक्ष्मीके अनुग्रह तथा वरदानसे
उन देवताओंने दैत्योंके द्वारा अधिकृत किये गये तथा
भयंकर बना दिये गये अपने राज्यको पुन: प्राप्त कर
लिया॥ ५७-५८ ॥
५४८ श्रीमद्देवीभागवत
इत्येवं कथितं सर्व लक्ष्म्युपाख्यानमुत्तमम्।
[ अ० ४२
इस प्रकार मैंने लक्ष्मीका अत्यन्त उत्तम, सुखप्रद
तथा सारभूत सम्पूर्ण उपाख्यान आपसे कह दिया,
सुखदं सारभूतं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ५९ | अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं ?॥ ५९ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेउष्टादशसाहर्रयां संहितायां नवमस्कन्धे
श्रीलक्ष्म्युपाख्यानवर्णनं नामैक चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१॥
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