Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना
व्यास उवाच
निशामय महाराज ब्रवीमि विशदाक्षरम्।
माहात्म्यं ख्रलु मायाया नारदात्तु मया श्रुतम्॥ ९
मया पुनर्मुनिः पृष्टो नारदः सर्ववित्तमः।
श्रुत्वा कथां मुनेस्तस्य नारीदेहसमुद्भवाम्॥ २
ब्रूहि नारद पश्चात्किं कथितं हरिणा तदा।
क्व गतश्च जगन्नाथो भवता सह माधवः॥ ३
नारद उवाच
इत्युक्त्वा भगवांस्तस्मिस्तडागेऽतिमनोहरे।
आरुह्य गरुडं गन्तुं वैकुण्ठे च मनो दधे॥ ४
मामुवाच रमाकान्तो यथेष्टं गच्छ नारद।
एहि वा मम लोकं त्वं यथारुचि तथा कुरु॥ ५
ब्रहालोक॑ गतश्चाहमापूच्छ्य मधुसूदनम्।
भगवानपि देवेशस्तत्क्षणाद् गरुडासनः॥ ६
बैकुण्ठमगमत्तूर्ण मामादिश्य यथासुखम्।
ततोऽहं पितृसदनं गतो याते जनार्दने॥ ७
चिन्तयन्सकलं दुःखं सुखं च परमाद्भुतम्।
गत्वा प्रणम्य पितरं स्थितो यावत्पुरः पितुः॥ ८
तावत्पृष्टो मुने पित्रा वीक्ष्य चिन्तातुरं तु माम्।
ब्रह्मोवाच
कव गतोऽसि महाभाग कस्माच्चिन्तातुरः सुत ॥ ९
स्वस्थं नैवाद्य पश्यामि मनस्ते मुनिसत्तम।
केनापि वञ्चितोऽसि त्वं दृष्टं वा किञ्चिदद्भुतम्॥ १०
विषण्णं गतविज्ञानं पश्यामि त्वां कथं सुत।
नारद उवाच
इति पृष्टस्तदा पित्रा ब॒स्यां समुपवेश्य च॥ ९९
तमब्रवं स्ववृत्तान्तं मायाबलसमुद्भवम्।
वञ्चितोऽहं पितः कामं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १२
व्यासजी बोले-हे महाराज! मैंने नारदजीसे
योगमायाके पवित्र अक्षरोंवाले जिस माहात्म्यको सुना
है, उसे कहता हूँ; आप सुनें॥ १॥
महर्षि नारदको नारी-देहसे सम्बन्धित कथा
सुनकर मैंने उन सर्वज्ञशिरोमणि मुनिसे पुनः पूछा—
हे नारदजी! अब आप यह बताइये कि इसके बाद
भगवान् विष्णुने आपसे क्या कहा और आपके साथ
वे जगत्पति लक्ष्मीकान्त कहाँ गये ?॥ २-३॥
नारदजी बोले उस अत्यन्त मनोहर सरोवरके
तटपर मुझसे इस प्रकार कहकर भगवान् विष्णुने
गरुडपर आरूढ़ होकर वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेका
विचार किया॥ ४॥
तदनन्तर रमापति विष्णुने मुझसे कहा-हे नारद!
अब आप जहाँ जाना चाहें, जायँ। अथवा मेरे लोक
चलिये। जैसी आपको रुचि हो वैसा कोजिये॥ ५॥
इसके बाद मैं मधुसूदन श्रीविष्णुसे आज्ञा लेकर
ब्रह्मलोक चला गया। गरुडासीन होकर वे देवेश
भगवान् विष्णु भी मुझे आदेश देकर उसी क्षण बड़े
आनन्दसे शीघ्र ही वैकुण्ठ चले गये॥ ६ ॥
तत्पश्चात् श्रीविष्णुके चले जानेपर समस्त परम
अद्भुत सुखों तथा दु:खोंके सम्बन्धमें विचार करता
हुआ मैं अपने पिता ब्रह्माजीके भवनपर जा पहुँचा।
हे मुने! वहाँ पहुँचकर पिताजीको प्रणाम करके ज्यों
ही मैं उनके सामने खड़ा हुआ, तभी उन्होंने मुझे
चिन्तासे व्यग्र देखकर पूछा॥ ७-८ ॥
ब्रह्माजी बोले-हे महाभाग! आप कहाँ गये
थे? हे सुत! आप क्यों इतने घबराये हुए हैं? हे
मुनिश्रेष्ठ! आपका चित्त इस समय स्वस्थ नहीं
दिखायी पड़ रहा है। कया किसीने आपको धोखेमें
डाल दिया है अथवा आपने कोई आश्चर्यजनक दृश्य
देखा है? हे पुत्र! आज मैं आपको उदास तथा
विवेकसे कुण्ठित क्यों देख रहा हूँ?॥ ९-१०६ ॥
नारदजी बोले-पिता ब्रह्माजीके ऐसा पूछनेपर
मैंने आसनपर बैठकर मायाके प्रभावसे उत्पन्न अपना
सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा-हे पिताजी! महान्
शक्तिशाली विष्णुने मुझे ठग लिया था। बहुत वर्षांतक
अ० ३९]
स्त्रीभावं गमितः कामं वर्षाणि सुबहून्यपि।
अनुभूतं महहुःखं पुत्रशोकसमुद्धवम्॥ १३
प्रबोधितोऽहं तेनैव मृदुवाक्यामृतेन च।
पुनः सरोवरे स्नात्वा जातोऽहं नारदः पुमान्॥ १४
किमेतत्कारणं ब्रह्मन् यन्मोहमगमं तदा।
विस्मृतं पूर्वविज्ञानं तन्मयस्तरसा कृतः॥ १५
एतन्मायाबलं ब्रह्मन्न जानेऽहं दुरत्ययम्।
ज्ञानहानिकरं जातं मूलं मोहस्य विस्फुटम्॥ १६
अनुभूतं मया सम्यरज्ञातं सर्वं शुभाशुभम्।
कथं त्वं जितवांस्तात तमुपायं वदस्व मे॥ १७
नारद उवाच
विज्ञप्तोऽसौ मया धाता प्रीतिपूर्वमतः परम्।
मामुवाच स्मितं कृत्वा पिता मे वासवीसुत॥ १८
ब्रह्मोवाच
दुर्जयैषा सुरैः सवैर्मुनिभिश्च महात्मभिः।
तापसैरज्ञानयुक्तैशच योगिभिः पवनाशनैः॥ १९
नाहं तां सर्वथा ज्ञातुं शक्तो मायां महाबलाम्।
विष्णुर्ज़ातुं न शक्तश्च तथा शम्भुरुमापतिः ॥ २०
दुर्जेया सा महामाया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी।
कालकर्मस्वभावाद्यैर्निमित्तकारणैरवृता ॥ २१
शोकं मा कुरु मेधाविंस्तत्र मायामहाबले।
न चैव विस्मयः कार्यो वयं सर्वे विमोहिताः॥ २२
नारद उवाच
पित्रेत्युक्तस्तदा व्यास तमापुच्छ्य गतस्मयः।
आगतोऽस्म्यत्र पश्यन्वै तीर्थानि च वराणि च॥ २३
तस्मात्त्वमपि सन्त्यज्य मोहं कौरवनाशजम्।
कालक्षयं सुखासीनः स्थानेऽस्मिन् कुरु सत्तम॥ २४
षष्ठ स्कन्ध
८७७
मैं स्त्रीशरीर धारण किये रहा और मैंने पुत्रशोकजनित
भीषण दुःखका अनुभव किया॥ ११—१३॥
तत्पश्चात् उन्होंने ही अपने अमृतमय मधुर
वचनसे मुझे समझाया और पुन: सरोवरमें स्नान करके
मैं पुरुषरूप नारद हो गया॥ १४॥
हे ब्रह्मन्! उस समय मुझे जो मोह हो गया था,
उसका क्या कारण है? उस समय मेरा पूर्वज्ञान
विस्मृत हो गया था और मैं शीघ्र ही उन [राजा
तालध्वज ]-में पूर्णरूपसे अनुरक्त हो गया। हे ब्रह्मन्!
मैं मायाके इस बलको दुल॑घ्य, ज्ञानकी हानि करनेवाला
तथा मोहकी विस्तृत जड़ मानता हूँ॥ १६॥
मैंने सम्पूर्ण शुभ तथा अशुभ परिस्थितियोंका
अनुभव किया तथा सम्यक् प्रकारसे उनके विषयमे
जाना। हे तात! आपने उस मायाको कैसे जीता है ?
वह उपाय मुझे भी बताइये॥ १७॥
नारदजी बोले-हे व्यासजी! पिता ब्रह्माजीसे
मेरे इस प्रकार बतानेपर वे मुसकराकर मुझसे प्रेमपूर्वक
कहने लगे॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले-सभी देवता, मुनि, महात्मा,
तपस्वी, ज्ञानी तथा वायुसेवन करनेवाले योगियोंके लिये
भी यह माया कठिनतासे जीती जानेवाली है ॥ १९॥
उस महाशक्तिशालिनी मायाको सम्यकू प्रकारसे
जाननेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। उसी प्रकार विष्णु तथा
उमापति शंकर भी उसे जाननेमें समर्थ नहीं हैं ॥ २० ॥
सृजन, पालन तथा संहार करनेवाली वह महामाया
सभीके लिये दुर्शय है। काल, कर्म तथा स्वभाव आदि
निमित्त कारणोंसे बह सदा समन्वित है॥ २१॥
हे मेधाविन्! अपरिमित बलसे सम्पन्न इस
मायाके विषयमें आप शोक न करें। इसके विषयमें
किसी प्रकारका विस्मय नहीं करना चाहिये। हमलोग
भी मायासे विमोहित हैं॥ २२॥
नारदजी बोले-हे व्यासजी! पिताजीके ऐसा
कहनेपर मेरा विस्मय दूर हो गया। इसके बाद उनसे
आज्ञा लेकर उत्तम तीर्थोका दर्शन करता हुआ मैं यहाँ
आ पहुँचा हूँ ॥ २३॥
अतएव हे श्रेष्ठ व्यासजी! कौरवोंके नाशसे
उत्पन्न मोहका परित्याग करके आप भी इस स्थानपर
सुखपूर्वक रहते हुए समय व्यतीत कोजिये॥ २४॥
८७८
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
निश्चयं हृदये कृत्वा विचरस्व यथासुखम्॥ २५
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा नारदो राजन् गतो मां प्रतिबोध्य च।
अहं तच्चिन्तयन्वाक्यं यदुक्तं मुनिना तदा ॥ २६
स्थितः सरस्वतीतीरे कल्पे सारस्वते वरे।
कालातिवाहनायैतत्कृतं भागवतं मया॥ २७
पुराणमुत्तमं भूप सर्वसंशयनाशनम्।
नानाख्यानसमायुक्तं वेदप्रामाण्यसंश्रितम्॥ २८
सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः सर्वथा नृपसत्तम।
यथेन्द्रजालिकः कश्चित्पाञ्चालीं दारवीं करे॥ २९
कृत्वा नर्तयते कामं स्वेच्छया बशवर्तिनीम्।
तथा नर्तयते माया जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३०
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं
पञ्चेन्द्रियसमायुक्तं
सदेवासुरमानुषम्।
मनश्चित्तानुवर्तनम्॥ ३९
गुणास्तु कारणं राजन् सर्वेषां सर्वथा त्रयः।
कार्य कारणसंयुक्तं भवतीति विनिश्चयः ॥ ३२
भिन्नभिन्नस्वभावास्ते गुणा मायासमुद्भवाः।
शान्तो घोरस्तथा मूढस्त्रयस्तु विविधा यतः॥ ३३
तत्समेतः पुमान्नित्यं तद्विहीनः कथं भवेत्।
न भवत्येव संसारे रहितस्तन्तुभिः पटः॥ ३४
तथा गुणैस्त्रिभिहीनो न देहीति विनिश्चयः।
देवदेहो मनुष्यो वा तिरश्चो वा नराधिप॥ ३५
गुणैर्विरहितो न स्यान्मृद्विहीनो घटो यथा।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयश्चामी गुणाश्रयाः॥ ३६
कदाचित्प्रीतियुक्तास्ते तथाप्रीतियुताः पुनः ।
तथा विषादयुक्तास्ते भवन्ति गुणयोगतः॥ ३७
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३९
किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मका फल
अवश्य भोगना पड़ता है—ऐसा मनमें निश्चय करके
आनन्दपूर्वक विचरण कोजिये॥ २५॥
व्यासजी बोले-हे राजन्! ऐसा कहकर मुझे
समझानेके पश्चात् नारदजी वहाँसे चले गये । मुनि नारदने
मुझसे जो वाक्य कहा था उसपर विचार करता हुआ
मैं उस श्रेष्ठ सारस्वतकल्पमें सरस्वतीके तटपर ठहर गया।
हे राजन्! समय व्यतीत करनेके उद्देश्यसे बहींपर मैंने
सम्पूर्ण सन्देहोंको दूर करनेवाले, नानाविध आख्यानोंसे
युक्त, वैदिक प्रमाणोंसे ओतप्रोत तथा पुराणोंमें उत्तम
इस श्रीमद्देबीभागवतको रचना को थी॥ २६-२८॥
हे राजेन्द्र! इसमें किसी तरहका संशय नहीं
करना चाहिये। जिस प्रकार कोई इन्द्रजाल करनेवाला
अपने हाथमें काठकी पुतली लेकर उसे अपने अधीन
करके अपने इच्छानुसार नचाता है, उसी प्रकार यह
माया चराचर जगतूको नचाती रहती है॥ २९-३०॥
ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितने भी पाँच इन्द्रियोंसे
सम्बन्ध रखनेवाले देवता, मानव तथा दानव हैं; वे
सभी मन तथा चित्तका अनुसरण करते हैं ॥ ३१॥
हे राजन्! सत्त्व, रज तथा तम-ये तीनों गुण
ही सभी कार्योके सर्वथा कारण होते हैं । यह निश्चित
है कि कोई भी कार्य किसी-न-किसी कारणसे
अवश्य सम्बद्ध रहता है॥ ३२॥
मायासे उत्पन्न हुए ये तीनों गुण भिन्न-
भिन्न स्वभाववाले होते हैं; क्योंकि ये तीनों गुण
(क्रमशः) शान्त, घोर तथा मूढ-भेदानुसार तीन
प्रकारके होते हैं ॥ ३३॥
इन तीनों गुणोंसे सदा युक्त रहनेवाला प्राणी
इन गुणोंसे विहीन कैसे रह सकता है ? जिस प्रकार
संसारमें तन्तुविहीन वस्त्रकी सत्ता नहीं हो सकती, उसी
प्रकार तीनों गुणोंसे रहित प्राणीकी सत्ता नहीं हो सकती,
यह पूर्णरूपेण निश्चित है । हे नरेश ! जिस प्रकार मिट्टीके
बिना घटका होना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार देवता,
मानव अथवा पशु-पक्षी भी गुणोंके बिना नहीं रह सकते।
यहाँतक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों भी इन
गुणोंके आश्रित रहते हैं। गुणोंका संयोग होनेसे ही वे
कभी प्रसन्न रहते हैं, कभी अप्रसन्न रहते हैं तथा कभी
विषादग्रस्त हो जाते हैं ॥ ३४—३७॥
अ० ३१]
षष्ठ स्कन्ध
८७९
ब्रह्मा कदाचित्सत्त्वस्थस्तदा शान्त: समाधिमान्।
प्रीतियुक्तो भवेत्सर्वभूतेषु ज्ञानसंयुतः॥ ३८
पुनः सत्त्वविहीनस्तु रजोगुणसमावृतः।
तदा भवेद् घोररूपः सर्वत्राप्रीतिसंयुतः॥ ३९
यदा तमोगुणाविष्टो बाहुल्येन भवेद्विधि: ।
तदा विषादसम्पन्नो मूढो भवति नान्यथा॥ ४०
माधवोऽपि सदा सत्त्वसंश्रितः सर्वथा भवेत्।
यदा शान्तः प्रीतियुक्तो भवेज्ज्ञानसमन्वितः॥ ४१
स एव रजआधिक्यादप्रीतिसंयुतो भवेत्।
घोरश्च सर्वभूतेषु गुणाधीनो रमापतिः॥ ४२
रुद्रोऽपि सत्त्वसंयुक्तः प्रीतिमाञ्छान्तिमान्भवेत्।
रजोनिमीलितः सोऽपि घोरः प्रीतिविवर्जितः॥ ४३
तमोगुणयुतः सोऽपि मूढो विषादयुगभवेत्।
एते यदि गुणाधीना ब्रह्मविष्णुहरादयः॥ ४४
सूर्यवंशोद्धवास्तद्वत्सोमवंशभवा अपि।
मन्वादयश्च ये प्रोक्ताश्चतुर्दश युगे युगे॥ ४५
अन्येषां चैव का वार्ता संसारेऽस्मिन्नुपोत्तम।
मायाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥ ४६
तस्माद् राजन्न कर्तव्यः सन्देहोऽत्र कदाचन।
देही मायापराधीनश्चेष्टते तद्वशानुगः॥ ४७
सा च माया परे तत्त्वे संविद्रूपेऽपि सर्वदा।
तदधीना प्रेरिता च तेन जीवेषु सर्वदा॥ ४८
ततो मायाविशिष्टां तां संविदं परमेश्वरीम्।
मायेश्वरीं भगवतीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्॥ ४९
ध्यायेत्तथाराधयेच्च प्रणमेच्च जपेदपि।
तेन सा सदया भूत्वा मोचयत्येव देहिनम्॥ ५०
जब ब्रह्मा सत्त्वगुणमें स्थित रहते हैं तब वे
शान्त, समाधिस्थ, ज्ञानसम्मन्न तथा सभो प्राणियोंके
प्रति प्रेमसे युक्त हो जाते हैं। वे ही जव सन्चगुणसे
विहीन होकर रजोगुणकी अधिकतासे युक्त होते हैं,
तब उनका रूप भयावह हो जाता है और व सबके
प्रति अप्रीतिको भावनासे युक्त हो जाते हैं। वे हो ब्रह्म
जब तमोगुणकी अधिकतासे आविष्ट हो जाते हैं. तब
वे विषादग्रस्त तथा मूढ़ हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं
| है॥ ३८—४० ॥
सदा सत्त्वगुणमें स्थित रहनेवाले विष्णु इसी
गुणके कारण शान्त, प्रीतिमान् तथा ज्ञानसम्पन्न रहते
| हैं। वे ही रमापति विष्णु रजोगुणकी अधिकताके
कारण अप्रीतिसे युक्त हो जाते हैं और तमोगुणके
अधीन होकर सभी प्राणियोंके लिये घोररूप हो
जाते हैं॥४१-४२॥
इसी प्रकार रुद्र भी सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर प्रेम
तथा शान्तिसे समन्वित रहते हैं, किंतु रजोगुणसे
आविष्ट होनेपर वे भी भयानक तथा प्रेमविहीन हो
जाते हैं। इसी तरह तमोगुणसे आविष्ट होनेपर वे रुद्र
मूढ तथा विषादग्रस्त हो जाते हैं॥ ४३३ ॥
हे नृपश्रेष्ठ ! यदि ये ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि
तथा युग-युगमें जो सूर्यवंशी तथा चन्द्रबंशी चौदहों
मनु कहे गये हैं—वे भी गुणोंके अधीन रहते हैं, तब
इस संसारमें अन्य लोगोंकी कौन-सी बात? देवता,
दानव तथा मानवसमेत यह सम्पूर्ण जगत् मायाका
वशवर्ती है॥ ४४-४६ ॥
अतएव हे राजन्! इस विषयमें कदापि सन्देह
नहीं करना चाहिये । प्राणी मायाके अधीन है और वह
उसीके वशवर्ती होकर चेष्टा करता है ॥ ४७॥
वह माया भी सदा संविद्रूप परमतत्त्वमें स्थित
रहती है। वह उसीके अधीन रहती हुई उसीसे प्रेरित
होकर जीवोंमें सदा मोहका संचार करती है ॥ ४८॥
अतः विशिष्टमायास्वरूपा, प्रज्ञामयी, परमेश्वरी,
मायाकी अधिष्ठात्री, सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती
जगदम्बाका ध्यान, पूजन, वन्दन तथा जप करना
चाहिये। उससे वे भगवती प्राणीपर दया करके उसे
मुक्त कर देती हैं और अपनी अनुभूति कराकर अपनी
८८०
स्वमायां संहरत्येव स्वानुभूतिप्रदानतः ।
भुवनं खलु माया स्यादीश्वरी तस्य नायिका ॥ ५१
भुवनेशी ततः प्रोक्ता देवी त्रैलोक्यसुन्दरी।
तद्रूपे यदि सक्तं स्याच्ित्तं भूमिपते सदा॥ ५२
मायया किं भवेत्तत्र सदसद्भूतया नृप।
तस्मान्मायानिरासार्थं नान्यद्वे देवतान्तरम्॥ ५३
समर्थ तु विना देवीं सच्चिदानन्दरूपिणीम्।
तमोराशिं नाशयितुं शक्तं नैव तमो भवेत्॥ ५४
किन्तु भानुप्रभाचन्द्रविद्युद्रह्निप्रभादयः ।
तस्मान्मायेश्वरीमम्बां स्वप्रकाशां तु संविदम् ॥ ५५
आराधयेदतिप्रीत्या मायागुणनिवृत्तये।
इति सम्यङ्मयाख्यातं वृत्रासुरवधादिकम्॥ ५६
यत्पृष्टं राजशार्दूल किमन्यच्छोतुमिच्छसि।
ूर्वार्धोऽयं पुराणस्य कथितस्तव सुब्रत ॥ ५७
यत्र देव्यास्तु महिमा विस्तरेणोपपादितः।
एतद्रहस्यं श्रीमातुर्न देयं यस्य कस्यचित्॥ ५८
देयं भक्ताय शान्ताय देवीभक्तिरताय च।
शिष्याय ज्येष्ठपुत्राय गुरुभक्तियुताय च॥५९
इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं
निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम्।
पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या
स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र॥ ६०
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० ३१
मायाको हर लेती हैं। समस्त भुवन मायारूप है तथा
वे ईश्वरी उसकी नायिका हैं । इसीलिये त्रैलोक्यसुन्दरी
भगवतीको * भुवनेशी ’ कहा गया है। हे पृथ्बीपते! यदि
उन भगवतीके रूपमें चित्त सदा आसक्त हो जाय तो
सत्-असत्स्वरूपा माया अपना क्या प्रभाव डाल सकती
है? अतः हे राजन्! सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती
परमेशवरीको छोड़कर अन्य कोई भी देवता उम
मायाको दूर करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४९-५३ ॥
एक अन्धकार किसी दूसरे अन्धकारको दूर
करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; किंतु सूर्य, चन्द्रमा.
विद्युत् तथा अग्नि आदिकी प्रभा उस अन्धकारको
मिटा देती है। अतएव मायाके गुणोंसे निवृत्ति प्राप्त
करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक स्वयंप्रकाशित तथा
ज्ञानस्वरूपिणी भगवती मायेशवरीकी आराधना करनी
चाहिये ॥ ५४-५५ ॥
हे राजेन्द्र ! वृत्रासुर-वध आदिकी कथाके विषयमे
आपने जो पूछा था, उसका वर्णन मैंने भलीभाँति कः
दिया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं 2॥ ५६६ ।
हे सुब्रत! श्रीमदेवीभागवतपुराणका पूर्वा
मैने आपसे कहा, जिसमें देवीकी महिमाका विस्तार-
पूर्वक वर्णन किया गया हैं। भगवती जगदम्बाक
यह रहस्य जिस किसीको नहीं सुना देना चाहिये
| भक्त, शान्त, देवीको भक्तिमें लीन, ज्येष्ठ पुत्र तथा
गुरुभक्तिसे युक्त शिष्यके समक्ष ही इसका वर्णन
करना चाहिये॥ ५७—५९॥
इस संसारमें जो मनुष्य सम्पूर्ण कथाओंके सार-
स्वरूप, समस्त वेदोंको तुलना करनेवाले तथा
नानाविध प्रमाणाँसे परिपूर्ण इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका
विशेष श्रद्धाके साथ भक्तिपूर्वक पाठ करता है तथा
इसका श्रवण करता है, वह एऐश्वर्यसम्पन्न तथा
ज्ञानवान् हो जाता है॥ ६०॥
इति श्रीमहेवीभायवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां षष्ठस्कन्धे
भगवतीमाहात्म्यवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१॥
स्टू (®) ध्र ळल
॥ षष्ठः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ श्रीमददेवीभागवतमहापुराण पूर्वार्ध सम्पूर्णम्॥
eA ro
॥ श्रीहरि: ॥ ॥898
श्रीमहेवीभागवतमहापुराण
[ द्वितीय खण्ड ]
( सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित )
गीताप्रेस, गोरखपुर
॥ श्रीहरिः ॥ ॥898
महर्षि वेदव्यासप्रणीत
श्रीमहदेबी भागवतमहापुराण
[ द्वितीय खण्ड ]
( सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित )
स्कन्ध ७ से १२ तक
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्व मम देवदेव॥
————— SD
गीताप्रेस, गोरखपुर
]898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]—। ^
सं० २०६७ प्रथम संस्करण १०,०००
4* मूल्य—१५० रु०
(एक सौ पचास रुपये )
प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर— २७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान )
फोन : (०५५९) २३३४७२९, २३३१२५०: फैक्स : ( ००५१ ) २३३६९९७
e-mail : booksales@ gitapress.org webs’te : www.gitapress.org
१ २ पारडी पराउगाएा दवाय खाइ — सं
अध्याय विषय
सप्तम स्कन्ध
१-पितामह ब्रह्माकी मानसी सृष्टिका वर्णन,
नारदजीका दक्षके पुत्रोंको सन्तानोत्पत्तिसे
विरत करना और दक्षका उन्हें शाप देना,
दक्षकन्याओंसे देवताओं और दानवोंकी
३-सुकन्याका च्यवनमुनिके साथ विवाह ..
४-सुकन्याको पतिसेवा तथा वनमें अश्विनी-
कुमारोंसे भेंटका वर्णन …
५-अश्विनीकुमारोंका च्यवनमुनिको नेत्र तथा
नवयौवनसे सम्पन्न बनाना…
६-राजा शर्यातिके यज्ञमें च्यवनमुनिका
अश्विनीकुमारोंको सोमरस देना …
७-क्रुद्ध इन्द्रका विरोध करना; परंतु च्यवनके
प्रभावको देखकर शान्त हो जाना, शर्यातिके
बादके सूर्यवंशी राजाओंका विवरण…
८-राजा रेवतको कथा…
९-सूर्यवंशी राजाओंके वर्णनके क्रममें राजा
॥ श्रीहरिः ॥
पृष्ठ-संख्या | अध्याय
२९
३५
ककुत्स्थ, युवनाश्व और मान्धाताकी कथा ५०
१०-सूर्यवंशी राजा अरुणद्वारा राजकुमार
सत्यव्रतका त्याग, सत्यव्रतका वनमें भगवती
जगदम्बाके मन्त्र-जपमें रत होना …
११-भगवती जगदम्बाको कृपासे सत्यव्रतका
राज्याभिषेक और राजा अरुणद्वारा उन्हें
नीतिशास्त्रकी शिक्षा देना …
१२-राजा सत्यव्रतको महर्षि वसिष्ठका शाप
तथा युवराज हरिश्चन्द्रका राजा बनना.
१३-राजर्षि विश्वामित्रका अपने आश्रममें आना
]898 श्रीमद्देवी…महापुराण [ द्वितीय खण्ड ]— ०
५६
६१
६५
विषय
और सत्यव्रतद्वारा किये गये उपकारको
१४-विश्वामित्रका सत्यव्रत (त्रिशंकु)-को .
सशरीर स्वर्ग भेजना, वरुणदेवको
आराधनासे राजा हरिशचन्द्रको पुत्रकौ
१५-प्रतिज्ञा पूर्ण न करनेसे वरुणका क्रुद्ध होना
और राजा हरिश्चन्द्रको जलोदरग्रस्त होनेका
लि ppp pm
१६-राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको स्तम्भमें
बाँधकर यज्ञ प्रारम्भ करना …
१७-विश्वामित्रका शुनःशेपको वरुणमन्त्र
देना और उसके जपसे वरुणका प्रकट
होकर उसे बन्धनमुक्त तथा राजाको रोग-
मुक्त करना, राजा हरिश्चन्द्रको प्रशंसासे
विश्वामित्रका वसिष्ठपर क्रोधित होना..
१८-विश्वामित्रका मायाशूकरके द्वारा
हरिश्चन्द्रके उद्यानको नष्ट कराना …
१९-विश्वामित्रको कपटपूर्ण बातोंमें आकर
राजा हरिश्चन्द्रका राज्यदान करना…
२०-हरिश्चन्द्रका दक्षिणा देनेहेतु स्वयं, रानी
और पुत्रको बेचनेके लिये काशी जाना
२१-विश्वामित्रका राजा हरिश्चन्द्रसे दक्षिणा
माँगना और रानीका अपनेको विक्रयहेतु
प्रस्तुत ppm
२२-राजा हरिश्चन्द्रका रानी और राजकुमारका
विक्रय करना और विश्वामित्रो
ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देना तथा
विश्वामित्रका और अधिक धनके लिये
आग्रह करना…
पृष्ठ-संख्या
७१
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८७
९३
९८
१०३
१०९
११३
अध्याय विषय
२३-विश्वामित्रका राजा हरिश्चद्धको चाण्डालके
हाथ बेचकर ऋणमुक्त करना…
२४-चाण्डालका राजा हरिश्चन्द्रको श्मशानघाटमें
नियुक्त करनी: ८६-०५ ५०
२०-सर्पदंशसे रोहितकी मृत्यु, रानीका
करुण विलाप, पहरेदारोंका रानीको
राक्षसी समझकर चाण्डालको सौंपना
और चाण्डालका हरिश्चन्द्रको उसके
वधकी आज्ञा देना …
२६-रानीका चाण्डालवेशधारी राजा हरिश्चन्द्रसे
अनुमति लेकर पुत्रके शवको लाना और
करुण विलाप करना, राजाका पत्नी और
पुत्रको पहचानकर मूच्छित होना और
विलाप करना
२७-चिता बनाकर राजाका रोहितको उसपर
लिटाना और राजा-रानीका भगवतीका
ध्यानकर स्वयं भी पुत्रकौ चितामें जल
जानेको उद्यत होना, ब्रह्माजीसहित समस्त
देवताओंका राजाके पास आना, इन्द्रका
अमृत-वर्षा करके रोहितको जीवित करना
और राजा-रानीसे स्वर्ग चलनेके लिये आग्रह
करना, राजाका सम्पूर्ण अयोध्यावासियोंके
साथ स्वर्ग जानेका निश्चय …
२८-दुर्गम दैत्यकी तपस्या; वर-प्राप्ति
तथा अत्याचार, देवताओंका भगवतीको
प्रार्थना करना, भगवतीका शताक्षी और
शाकम्भरीरूपमें प्राकट्य, दुर्गमका वध
और देवगणोंद्वारा भगवतीको स्तुति
२१ -व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी
महिमाका वर्णन करना और उनसे उन्हींकी
अराधना करनेको कहना, भगवान् शंकर
और जिष्णळ अभिमानको देखकर गौरी
तथा लक्ष्मोका अन्नधान होना और शिव
तथा विक शक्तिहान हाना…
००००००००००००००००+०००००००+१०+००+५००
[इ४फ श्वोसदेवो… महाएराएा ’ दितीय खण्ड ]—। 0
[४]
पृष्ठ-संख्या | अध्याय
१२५
१२७
१२५
१४२
१४६
१५३ |
विषय
३०-शक्तिपीठोंकी उत्पत्तिकी कथा तथा उनके
नाम एवं उनका माहात्म्य …
३१-तारकासुरसे पीडित देवताओंद्वार भगवतीकी
स्तुति तथा भगवतीका हिमालयको पुत्रीके
रूपमें प्रकट होनेका आश्वासन देना…
३२-देवीगीताके प्रसंगमें भगवतीका हिमालयसे
माया तथा अपने स्वरूपका वर्णन…
३३- भगवतीका अपनी सर्वव्यापकता बताते
हुए विराट्रूप प्रकट करना, भयभीत
देवताओंकी स्तुतिसे प्रसन्न भगवतीका
पुनः सौम्यरूप धारण करना …
३४-भगवतीका हिमालय तथा देवताओंसे
परमपदकी प्राप्तिका उपाय बताना…
३५-भगवतीद्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा तथा कुण्डलीजागरणकी
विधि बताना…
३६-भगवतीके द्वारा हिमालयको ज्ञानोपदेश—
ब्रह्मस्वरूपका वर्णन…-
३७-भगवतीद्वारा अपनी श्रेष्ठ भक्तिका
३८-भगवतीके द्वारा देवीतीर्थों, ब्रतों तथा
उत्सवोंका वर्णन …
३९-देवी-पूजनके विविध प्रकारोंका वर्णन ..
४०-देवीकी पूजा-विधि तथा फलश्रुति
अष्टम स्कन्ध
१-प्रजाकी सृष्टिके लिये ब्रह्माजीको प्रेरणासे
मनुका देवीको आराधना करना तथा
देवीका उन्हें वरदान देना…
२-ब्रह्मजीकी नासिकासे वराहके रूपमें भगवान्
श्रीहरिका प्रकट होना और पृथ्वीका उद्धार
करना, ब्रह्माजीका उनकी स्तुति करना.
¦ ३-महाराज मनुकी वंश-परम्पराका वर्णन .
४-महाराज प्रियत्रतका आख्यान तथा समुद्र
और द्वीपोंको उत्पत्तिका प्रसंग…
पृष्ठ-संख्या
१५७
१६५
१७२
१७७
१८२
१८७
१९२
१९६
२००
२०४
२०९
२१३
अध्याय विषय
५-भूमण्डलपर स्थित विभिन्न द्वीपों और
वर्षोका संक्षिप्त परिचय…
६-भूमण्डलके विभिन्न पर्वतोंसे निकलने-
वाली विभिन्न नदियोंका वर्णन … २
७-सुमेरुपर्वतका वर्णन तथा गंगावतरणका
Cran MRR POR ७ पी
८-इलावृतवर्षमें भगवान् शंकरद्वारा भगवान्
श्रीहरिके संकर्षणरूपको आराधना तथा
भद्राश्ववर्षमें भद्रश्रवाद्वारा हयग्रीवरूपको
जप सती 0000000000
९-हरिवर्षमें प्रह्वादके द्वारा नृसिंहरूपकी
आराधना, केतुमालवर्षमें श्रीलक्ष्मीजीके
द्वारा कामदेवरूपकी तथा रम्यकवर्षमें
मनुजीके द्वारा मत्स्यरूपकी स्तुति-
opments
१०- हिरण्मयवर्षमें अर्यमाके द्वारा कच्छप-
रूपकी आराधना, उत्तरकुरुवर्षमें पृथ्वी-
द्वारा वाराहरूपको एवं किम्पुरुषवर्षमें
श्रीहनुमानूजीके द्वारा श्रीरामचन्द्ररूपकी
स्तुति-उपासना …
११-जम्बूद्वीपस्थित भारतवर्षमें श्रीनारदजीके
द्वारा नारायणरूपको स्तुति-उपासना तथा
भारतवर्षकी महिमाका कथन … २
१२-प्लक्ष, शाल्मलि और कुशद्वीपका वर्णन
१३-क्रौंच, शाक और पुष्करद्वीपका वर्णन ..
१४-लोकालोकपर्वतका वर्णन …
१५-सूर्यकी गतिका वर्णन…
१६-चन्द्रमा तथा ग्रहोंकी गतिका वर्णन …
१७-शिशुमारचक्र तथा श्रुवमण्डलका वर्णन
१८-राहुमण्डलका वर्णन
***«««***************९
१९-अतल, वितल तथा सुतललोकका वर्णन २
२०-तलातल, महातल, रसातल और पाताल
तथा भगवान् अनन्तका वर्णन …
[५]
पृष्ठ-संख्या
२३०
२३३
२३६
२४०
अध्याय विषय
२१-देवर्षि नारदद्वारा भगवान् अनन्तकी महिमाका
गान तथा नरकोंकी नामावली …
२२-विभिन्न नरकोंका वर्णन
२३-नरक प्रदान करनेवाले विभिन्न पापोंका
२४-देवीकी उपासनाके विविध प्रसंगोंका वर्णन
नवम स्कन्ध
१-प्रकृतितत्त्वविमर्श; प्रकृतिके अंश, कला
एवं कलांशसे उत्पन्न देवियोंका वर्णन .
२-परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट
चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन .
३-परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी राधासे
प्रकट विराट्रूप बालकका वर्णन…
४-सरस्वतीको पूजाका विधान तथा कवच
५-याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीको स्तुति
६-लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगाका परस्पर
शापवश भारतवर्षमें पधारना …
७-भगवान् नारायणका गंगा, लक्ष्मी और
सरस्वतीसे उनके शापको अवधि
बताना तथा अपने भक्तोंके महत्त्वका
वर्णन करना …
८-कलियुगका वर्णन, परब्रह्म परमात्मा
एवं शक्तिस्वरूपा मूलप्रकृतिकी कृपासे
त्रिदेवों तथा देवियोंके प्रभावका वर्णन
और गोलोकमें राधा-कृष्णका दर्शन …
९-पृथ्वीकी उत्पत्तिका प्रसंग, ध्यान और
पूजनका प्रकार तथा उनको स्तुति…
१०-पृथ्वीके प्रति शास्त्र-विपरीत व्यवहार
करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन…
११-गंगाकी उत्पत्ति एबं उनका माहात्म्य …
१२-गंगाके ध्यान एवं स्तवनका वर्णन,
गोलोकमें श्रीराधा-कृष्णके अंशसे
गंगाके प्रादुर्भावकी कथा
*००००००१०००००००००००
पृष्ठ-संख्या
३३०
अध्याय विषय
१३-श्रीराधाजीके रोषसे भयभीत गंगाका
श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी शरण लेना,
श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ,
ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना
तथा गंगाका प्रकट होना …
१४-गंगाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसंग …
१५-तुलसीके कथा-प्रसंगमें राजा वृषध्वजका
चरित्र-वर्णन …
१६-वेदवतीकी कथा, इसी प्रसंगमें भगवान्
श्रीरामके चरित्रके एक अंशका कथन,
भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका
१८-तुलसीको स्वप्नमें शंखचूड़का दर्शन,
ब्रह्माजीका शंखचूड तथा तुलसीको
विवाहके लिये आदेश देना
१९-तुलसीके साथ शंखचूड़का गान्धर्व-विवाह,
शंखचूड़से पराजित और निर्वासित देवताओंका
ब्रह्मा तथा शंकरजीके साथ वैकुण्ठधाम
जाना, श्रीहरिका शंखचूड्के पूर्वजन्मका
वृत्तान्त बताना…
२०-पुष्पदन्तका शंखचूड़के पास जाकर
भगवान् शंकरका सन्देश सुनाना, युद्धकी
बात सुनकर तुलसीका सन्तप्त होना और
शंखचूड़का उसे ज्ञानोपदेश देना …
२१-शंखचूड़ और भगवान् शंकरका विशद
लात ppp ppm nani
२२-कुमार कार्तिकेय और भगवती
भट्रकालीसे शंखचूड़का भयंकर युद्ध और
आकाशवाणीका पाशुपतास्त्रसे शंखचूड़को
अआव्रध्यताका कारण बताना …
२३- भगवान् शंकर और शंखचूडका युद्ध,
भगवान श्रोहरिका वृद्ध ब्राह्मणके वेशमें
माँग लेना नथा शंखचुड्का
****«
SSS TIS
पृष्ठ-संख्या | अध्याय
[६]
विषय पृष्ठ-संख्या
रूप धारणकर तुलसीसे हास-विलास करना,
शंखचूड़का भस्म होना और सुदामागोपके
रूपमें गोलोक पहुँचना …
२४-शंखचूड्रूपधारी श्रीहरिका तुलसीके
भवनमें जाना, तुलसीका श्रीहरिको पाषाण
होनेका शाप देना, तुलसी-महिमा, शालग्रामके
विभिन्न लक्षण एवं माहात्म्यका वर्णन.
२५-तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा
तुलसीस्तवनका वर्णन…
२६-सावित्रीदेवीकी पूजा-स्तुतिका विधान…
२७-भगवती सावित्रीको उपासनासे राजा
अश्वपतिको सावित्री नामक कन्याको
प्राप्ति, सत्यवानूके साथ सावित्रीका
विवाह, सत्यवान्को मृत्यु, सावित्री
और यमराजका संवाद …
२८-सावित्री-यमराज-संवाद …
२९-सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर और
धर्मराजद्वारा सावित्रीको वरदान …
३०-दिव्य लोकोंको प्राप्ति करानेवाले
पुण्यकर्मोका वर्णन
३१-सावित्रीका यमाष्टकद्वारा
LEE
३६७
३७९
४३६
३८२
४४५
४४९
३८६
३९२
४०५७
३९६ ४५९
४६२
४६८
***********««%
४०५ धर्मराजका
४७९
३२-धर्मराजका सावित्रीको अशुभ कर्मोके
फल बताना…
३३-विभिन्न नरककुण्डोंमें जानेवाले पापियों
तथा उनके पापोंका वर्णन…
३४-विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण
प्राप्त होनेवाले नरकोंका वर्णन …
३५-विभिन्न पापकमाँसे प्राप्त होनेवाली
विभिन्न योनियोंका वर्णन …
३६-धर्मराजद्वारा सावित्रीसे देवोपासनासे
। प्राप्त होनेवाले पुण्यफलोंको कहना …
| ३७-विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी
जानेवाली यातनाका वर्णन
४८१
४१३
४८३
४१९
४९५
४२७ |
५०८
+०+१+१+११००१+०००००००
[७]
अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय
३८-धर्मराजका सावित्रीसे भगवतीको ३-विन्ध्यपर्वतका आकाशतक बढ़कर
महिमाका वर्णन करना और उसके सूर्यके मार्गको अवरुद्ध कर लेना…
पतिको जीवनदान देना … ५२३ | ४- देवताओंका भगवान् शंकरसे विन्ध्य-
३९-भगवती लक्ष्मीका प्राकट्य, समस्त पर्वतकी वृद्धि रोकनेकी प्रार्थना करना
देवताओंद्वारा उनका पूजन… ५३१ और शिवजीका उन्हें भगवान् विष्णुके
४०-दुर्वासाके शापसे इन्द्रका श्रीहीन हो पास भेजना…
जाना शी त की नल DP ५३४ | ५-देवताओंका वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान्
४१-ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ विष्णुको स्तुति करना …
लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका ६-भगवान् विष्णुका देवताओंको काशीमें
उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको अगस्त्यजीके पास भेजना, देवताओंकी
बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजीका अगस्त्यजीसे प्रार्थना …
kL वत NNR ५४२ | ७-अगस्त्यजीको कृपासे सूर्यका मार्ग
४२-इन्द्रद्वरा भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार- तला pnp pein
पूजन एवं स्तवन … ५४८ | ८-स्वारोचिष, उत्तम, तामस और रैवत नामक
४३-भगवती स्वाहाका उपाख्यान … ५५४ मनुओंका वर्णन…
४४-भगवती स्वधाका उपाख्यान … ५५९ | ९-चाक्षुष मनुकी कथा, उनके द्वारा देवीकी
४५-भगवती दक्षिणाका उपाख्यान … ५६३ आराधनाका वर्णन …
४६-भगवती षष्ठीकी महिमाके प्रसंगमें १०-वैवस्वत मनुका भगवतीकी कृपासे
राजा प्रियव्रतकी कथा… ५७१ मन्वन्तराधिप होना, सावर्णि मनुके
४७-भगवती मंगलचण्डी तथा भगवती पूर्वजन्मको कथा …
मनसाका आख्यान … ५७८ | ११-सावर्णि मनुके पूर्वजन्मको कथाके
४८-भगवती मनसाका पूजन-विधान, मनसापुत्र प्रसंगमें मधु-कैटभकी उत्पत्ति और भगवान्
आस्तीकका जनमेजयके सर्पसत्रमें नागोंकी विष्णुद्वारा उनके वधका वर्णन …
रक्षा करना, इन्द्रद्वारा मनसादेवीका स्तवन १२-समस्त देवताओंके तेजसे भगवती
cra OMNI १७५५१. ५८२ महिषमर्दिनीका प्राकट्य और उनके द्वारा
४९-आदि गौ सुरभिदेबीका आख्यान… ५९५ महिषासुरका वध, शुम्भ-निशुम्भका
५०-भगवती श्रीराधा तथा श्रीदुर्गकि मन्त्र, ध्यान, अत्याचार और देवीद्वारा चण्ड-मुण्डसहित
पूजा-विधान तथा स्तवनका वर्णन … ५९८ शुम्भ-निशुम्भका वध …
दशम स्कन्ध - | १३-मनुपुत्रोंकी तपस्या, भगवतीका उन्हें
१-स्वायम्भुव मनुकी उत्पत्ति, उनके द्वारा मन्वन्तराधिपति होनेका वरदान देना,
भगवतीको आराधना… ६०७ दैत्यराज अरुणकी तपस्या और ब्रह्माजीका
२-देवीद्वारा मनुको वरदान, नारदजीका
विन्ध्यपर्वतसे सुमेरुपर्वतको श्रेष्ठता
वरदान, देवताओंद्वारा भगवतीको स्तुति
और भगवतीका भ्रामरीके रूपमें अवतार
लेकर अरुणका वध करना …
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६३०
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[८]
अध्याय विषय
एकादश स्कन्ध
१-भगवान् नारायणका नारदजीसे देवीको
प्रसन्न करनेबाले सदाचारका वर्णन … ६५३
२-शौचाचारका वर्णन… ६५८
३-सदाचार-वर्णन और रुद्राक्ष-धारणका
माहात्म्य…
४-रुद्राक्षकी उत्पत्ति तथा उसके विभिन्न
६६२
स्वरूपोंका वर्णन … ६६६
५-जपमालाका स्वरूप तथा रुद्राक्ष-
धारणका विधान… ६६९
६-रुद्राक्षधारणकी महिमाके सन्दर्भमें
गुणनिधिका उपाख्यान…
७-विभिन्न प्रकारके रुद्राक्ष और उनके
अधिदेवता …- ६७७
८-भूतशुद्धि… ६८१
९-भस्म-धारण (शिरोव्रत) … ६८३
१०-भस्म-धारणकी विधि … ६८७
११-भस्मके प्रकार … ६९०
१२-भस्म न धारण करनेपर दोष … ६९३
१३-भस्म तथा त्रिपुण्ड्र-धारणका माहात्म्य ६९७
१४-भस्मस्नानका महत्त्व …
१५-भस्म-माहात्म्यके सम्बन्धमें दुर्वासामुनि
और कुम्भीपाकस्थ जीवोंका आख्यान,
ऊर्ध्वपुण्ड्का माहात्म्य … ७०६
१६-सन्ध्योपासना तथा उसका माहात्म्य… ७१६
१७-गायत्री-महिमा … ७२६
१८-भगवतीकी पूजा-विधिका वर्णन, अन्नपूर्णा-
देवीके माहात्म्यमें राजा बृहद्रथका
ख्या १ ७ ७३०
१९-मध्याहसन्ध्या तथा गायत्रीजपका फल. ७३६
२०-तर्पण तथा सायंसन्ध्याका वर्णन … ७३८
२१-गायत्रीपुरश्चरण और उसका फल … ७४२
२२-बलिवैश्वदेव और प्राणाग्निहोत्रको विधि ७४७
२३-कृच्छुचान्द्रायण, प्राजापत्य आदि ब्रतोंका
पृष्ठ-संख्या | अध्याय
विषय पृष्ठ-संख्या
२४-कामना-सिद्धि और उपद्रव-शान्तिके लिये
गायत्रीके विविध प्रयोग …
द्वादश स्कन्ध
१-गायत्रीजपका माहात्म्य तथा गायत्रीके
चौबीस वर्णोके ऋषि, छन्द आदिका
वर्णन ०५ ४६५ 06608 60 ७६७
२-गायत्रीके चौबीस वर्णांकी शक्तियों,
रंगों एवं मुद्राओंका वर्णन … ७६९
३-श्रीगायत्रीका ध्यान और गायत्रीकवचका
वर्णन 52058 0050 PN BN ७७०
४-गायत्रीहदय तथा उसका अंगन्यास … ७७२
५-गायत्रीस्तोत्र तथा उसके पाठका फल.. ७७४
६-गायत्रीसहस्त्रनामस्तोत्र तथा उसके
पाठका फल… ७७६
७-दीक्षाविधि… ८००
८-देवताओंका विजयगर्व तथा भगवती
उमाद्वारा उसका भंजन, भगवती उमाका
इन्द्रको दर्शन देकर ज्ञानोपदेश देना … ८१३
९-भगवती गायत्रीकी कृपासे गौतमके द्वारा
अनेक ब्राह्मण-परिवारोंकी रक्षा, ब्राह्मणोंकी
कृतघ्नता और गौतमके द्वारा ब्राह्मणोंको
घोर शाप-प्रदान … ८२०
१०-मणिद्वीपका वर्णन … ८२९
११-मणिद्वीपके रत्नमय नौ प्राकारोंका वर्णन ८३७
१२-भगवती जगदम्बाके मण्डपका वर्णन
तथा मणिट्टीपकी महिमा … ८४५
१३-राजा जनमेजयद्वारा अम्बायज्ञ और
श्रीमदेवी भागवतमहापुराणका माहात्म्य .. ८५१
१४- श्रीमद्देवी भागवतमहापुराणकी महिमा … ८५४
१५-श्रीदुर्गायन्त्रम् [रेखाचित्र] … ८५७
१६-श्रीगायत्रीयन्त्रम् (क) [रेखाचित्र] … ८५८
१७-श्रीगायत्रीयन्त्रम् (ख) [रेखाचित्र] … ८५९
१८-सप्तश्लोकी दुर्गा … ८६०
१९-देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् … ८६१
२०-श्रीदुर्गाजीकी आरती … ८६४
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ 3 ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
श्रीमहेवीभागवतमहापुराण
[ उत्तरार्ध ]
सप्तमः स्कन्ध: