Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ सप्तदशोऽध्यायः
युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें
वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजितृका वापस
लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी
प्राप्ति, भगवतीको आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना
तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा
सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः।
मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः॥ ९
किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य बद सुव्रत।
बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम्॥ २
रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता।
राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत्॥ ३
नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत्।
गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल॥ ४
निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम्।
हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति॥ ५
प्रधान उवाच
साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः।
विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष॥ ६
पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रोऽतिविश्रुतः।
विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात्॥ ७
नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान्।
उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः॥ ८
निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना।
ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः॥ ९
व्यासजी बोले [हे राजन्!] भारद्वाजमुनिका
यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान
अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा—
हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना
चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली
मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना
कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ
शत्रुको भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके
समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है ॥ १-३॥
यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है
जो मुझे रोक सके । अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस
सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा। यदि मैं
बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका
राज्य निष्कंटक हो जायगा। सुदर्शनके मर जानेपर
निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा॥ ४-५॥
प्रधान अमात्यने कहा—हे राजन्! ऐसा दुःसाहस
नहीं करना चाहिये। अभी आपने भारद्वाजमुनिका
वचन सुना ही है। हे मान्य! उन्होंने [इस सम्बन्धमें]
विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है॥ ६॥
प्राचीन समयमें गाधितनय विश्वामित्र एक
समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे। एक बार वे
महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा
पहुँचे॥ ७॥
प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र
उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये।
उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये
निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र
अपने सैनिकोंसहित उपस्थित हो गये॥ ८-९॥
अ० १७]
नन्दिन्यासादितं सर्व भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।
भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०
प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिव: ।
ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ १९
विश्वामित्र उवाच
मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।
नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२
वसिष्ठ उवाच
होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।
सहस्त्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३
विश्वामित्र उवाच
अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्
देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४
वसिष्ठ उवाच
कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।
नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५
तच्छुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।
नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६
ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।
वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७
मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।
मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुटुग्धदे॥ १८
बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।
किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९
तृतीय स्कन्ध
३२९
उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी
आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने
उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र
मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव
समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ बसिष्ठजीसे नन्दिनी
गौ माँगने लगे॥ १०-११॥
विश्वामित्र बोले-हे मुने! मैं आपको
पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह
अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही
प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥
वसिष्ठ बोले-हे राजन्! यह गौ होमके लिये
हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार
भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही
पास रहें॥ १३॥
विश्वामित्र बोले-हे साधो! मैं आपकी इच्छाके
| अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ,
आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक
ग्रहण कर लूँगा ॥ १४॥
वसिष्ठ बोले-हे नृपते! जैसी आपकी रुचि
हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे
राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे
आपको नहीं दूँगा ॥ १५॥
यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली
अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको
ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने
आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़
लिया॥ १६३ ॥
तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई
उस नन्दिनीने मुनिसे कहा-हे मुने! आप मुझे
क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच
रहे हैं ॥ १७३ ॥
वबसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली
नन्दिनी ! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ । ये राजा तुम्हें
बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका
| स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने
मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥
३३०
इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह ।
हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २०
उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।
सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१
सैन्यं सर्व हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता ।
एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२
हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।
ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३
तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।
ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।
कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५
मुनिवर्य ब्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।
सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम् ॥ २६
बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।
वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७
दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।
इर्ष्यया किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८
वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।
तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९
शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।
साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३०
श्रीमद्देवीभागवत
[ अ० १७
मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी
और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव
करने लगी॥ २०॥
उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य
“ठहरो-ठहरो ‘—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे
शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे
ढँका हुआ था॥ २१॥
उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और
नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित
होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे
अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी
एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे
विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य
समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षांतक
कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग
करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥
अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न
करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध
निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है ॥ २५॥
अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके
पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे
राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह
आनन्दपूर्वक रह सके ॥ २६॥
हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या
अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके
प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है ॥ २७॥
हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये।
यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या
करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर
ही रहेगी ॥ २८॥
हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन
जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है;
इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको
और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्!
आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन
मानिये॥ २९-३०॥
अ० १७]
तृतीय स्कन्ध
३३९
व्यास उवाच
तच्छृत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तम: ।
प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः॥ ३१
मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता।
पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतब्रतम्॥ ३२
दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः।
मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः॥ ३३
एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम्।
क्लीबेति मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥ ३४
सुदर्शनस्तु तच्छुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्।
अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः॥ ३५
बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा।
जजाप बालकोऽत्यर्थ धृत्वा चेतसि सादरम्॥ ३६
भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम्।
स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै॥ ३७
तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम्।
ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम्॥ ३८
प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि।
विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम्॥ ३९
वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः।
मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा॥ ४०
धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः।
अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव॥ ४१
कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्शं ह।
रक्ताम्बरं रक्तवर्ण रक्तसर्वाङ्गभूषणम्॥ ४२
व्यासजी बोले—[हे जनमेजय!) मन्त्रीको यह
बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको
सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये।
तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस
आश्रममें रहती हुई अपने सत्यत्रती पुत्र सुदर्शनका
पालन करने लगीं॥ ३१-३२॥
अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके
साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन
बढ़ने लगा। एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए
विदल्लको किसी मुनिकुमारने ’ क्लीब’ इस नामसे
पुकारा॥ ३३-३४॥
उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ‘क्लौ’
शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस
अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार-बार उच्चारण
करने लगा॥ ३५॥
बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे
ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक
जपना प्रारम्भ कर दिया। हे महाराज! दैवयोगसे ही
उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत
बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया॥ ३६-३७॥
उस समय केबल पाँच बर्षकी अवस्थामें ही
वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा
न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन-ही-मन उसे जपता
हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका
सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता
था॥ ३८-३९॥
मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन
संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग
धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी। उस
बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका
सम्यक् अभ्यास कर लिया॥ ४०-४१॥
एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन
भी किया। उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये
थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके
सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे
३३२
गरुडे वाहने संस्थां वैष्णवीं शक्तिमद्भुताम्।
दृष्ट्वा प्रसन्नवदनः स बभूव नृपात्मजः॥ ४३
बने तस्मिन्स्थितः सोऽथ सर्वविद्यार्थतत्त्ववित्।
मातरं सेवमानस्तु विजहार नदीतटे॥ ४४
शरासनञ्च सम्प्राप्तं विशिखाश्च शिलाशिताः ।
तूणीरकवचं तस्मै दत्तं चाम्बिकया वने॥ ४५
एतस्मिन्समये पुत्री काशिराजस्य सुप्रिया।
नाम्ना शशिकला दिव्या सर्वलक्षणसंयुता॥ ४६
शुश्राव नृपपुत्रं तं वनस्थञ्च सुदर्शनम्।
सर्वलक्षणसम्पन्नं शूरं काममिवापरम्॥ ४७
बन्दीजनभुखाच्छुत्वा राजपुत्रं सुसम्मतम्।
चकमे मनसा तं बै वरं वरयितुं धिया॥ ४८
स्वप्ने तस्याः समागम्य जगदम्बा निशान्तरे।
उवाच वचनं चेदं समाश्वास्य सुसंस्थिता॥ ४९
बरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः।
सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि॥ ५०
एवं शशिकला दृष्ट्वा स्वप्ने रूपं मनोहरम्।
अम्बाया वचनं स्मृत्वा जहर्ष भूशमानिनी॥ ५९
उत्थिता सा मुदा युक्ता पृष्टा मात्रा पुन: पुन: ।
प्रमोदे कारणं बाला नोवाचातित्रपान्विता॥ ५२
जहास मुदमापन्ना स्मृत्वा स्वप्नं मुहुर्मुहुः ।
सखीं प्राह तदान्यां वै स्वप्नवृत्तं सुविस्तरम्॥ ५३
कदाचित्सा विहारार्थमवापोपवनं शुभम्।
सखीयुक्ता विशालाक्षी चम्पकैरुपशोभितम्॥ ५४
पुष्पाणि चिन्वती बाला चम्पकाधःस्थिताबला।
श्रीपद्देबीभागवत
[ अ० १७
थे। [इस प्रकारका दिव्य स्वरूप धारणकर] वाहन
गरुडपर विराजमान उन अद्भुत वैष्णवी शक्तिको
देखकर राजकुमार सुदर्शनके मुखमण्डलपर प्रसन्नता
छा गयी॥ ४२-४३॥
इस प्रकार समस्त विद्याओंका रहस्य जानेवाला
वह सुदर्शन उस वनमें रहकर जगदम्बाकी उपासना
करता हुआ नदीतटपर विचरण करने लगा। उसी
वनमें भगवती जगदम्बाने उसे धनुष, अनेक तीक्ष्ण
बाण, तूणीर तथा कवच प्रदान किये ॥ ४४-४५ ॥
इसी समय सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त ‘शशिकला’
नामसे विख्यात काशिराजकी परम प्रिय पुत्रीने उस
वनमें रहनेवाले समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, पराक्रमी
तथा दूसरे कामदेवके समान प्रतीत होनेवाले राजकुमार
सुदर्शनके विषयमें सुना ॥ ४६-४७॥
बन्दौजनोंके मुखसे अतिसम्मानित राजकुमारके
विषयमें सुनकर शशिकलाने मन-ही-मन बुद्धिपूर्वक
उसे पतिरूपमें वरण करनेका निश्चय कर लिया ॥ ४८ ॥
[उसी दिन] आधी रातको जगदम्बा स्वप्नमें
शशिकलाके पास आकर स्थित हो गयीं और उसे
आश्वस्त करके यह वचन बोलीं-‘हे सुश्रोणि!
सुदर्शन मेरा भक्त है, तुम उसीको अपना पति स्वीकार
कर लो। हे भामिनि! मेरी आज्ञासे वह तुम्हारी सब
कामनाएँ पूर्ण करेगा’॥ ४९-५० ॥
इस प्रकार स्वप्नमें भगवतीका मनोहर स्वरूप
देखकर तथा उनके इस वचनको स्मरण करके परम
मानिनी शशिकला प्रसन्न हो गयी॥५१॥
वह प्रसन्नताके साथ उठ गयी। उसकी माताने
उसे हर्षित देखकर बार-बार प्रसन्नताका कारण पूछा,
किंतु उस सुन्दरीने अति लज्जाके कारण कुछ नहीं
बताया॥ ५२॥ |
स्वप्नका बार-बार स्मरण करके प्रसन्नतासे
युक्त होकर वह जोरसे हँस पड़ती थी। तब उसने
अपनी एक अन्य सखीसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त
विस्तारपूर्वक कह दिया॥ ५३ ॥
किसी दिन वह विशालनयनी शशिकला अपनी
सखीके साथ चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित एक सुन्दर
| विहारके लिये गयी। वहाँ पुष्प चुनती
हुई वह कुमारी एक चम्पावृक्षके नीचे खडी हो गयी।
अ० ९८]
तृतीय स्कन्ध
३३३
अपश्यद् ब्राह्मणं मार्गे आगच्छन्तं त्वरान्वितम्॥ ५५
तं प्रणम्य द्विजं श्यामा बभाषे मधुरं वचः।
कुतो देशान्महाभाग कृतमागमनं त्वया॥ ५६
द्विज उवाच
भारद्वाजाश्रमाद् बाले नूनमागमनं मम।
जातं वै कार्ययोगेन किं पृच्छसि वदस्व मे॥ ५७
शशिकलोवाच
तत्राश्रमे महाभाग वर्णनीयं किमस्ति वै।
लोकातिगं विशेषेण प्रेक्षणीयतमं किल॥ ५८
ब्राह्मण उवाच
श्रुवसन्धिसुतः श्रीमानास्ते सुदर्शनो नृपः।
यथार्थनामा सुश्रोणि वर्तते पुरुषोत्तमः॥ ५९
तस्य लोचनमत्यन्तं निष्फलं प्रतिभाति मे।
येन दृष्टो न वामोरु कुमारस्तु सुदर्शन: ॥ ६०
एकत्र निहिता धात्रा गुणा: सर्वे सिसृक्षुणा ।
गुणानामाकरं द्रष्टुं मन्ये तेनैव कौतुकात्॥ ६९
तब योग्यः कुमारोऽसौ भर्ता भवितुमर्हति।
योगोऽयं विहितोऽप्यासीन्मणिकाञ्चनयोरिव॥ ६२
तभी उसने मार्गमें शीघ्रतापूर्वक आते हुए किसी
ब्राह्मणको देखा। उस ब्राह्मणको प्रणाम करके
सुन्दरी शशिकलाने मधुर वाणीमें कहा-हे महाभाग!
आप किस देशसे आये हैं ?॥ ५४-५६॥
ब्राह्मणने कहा-हे बाले! एक कार्यवश
भारद्वाजमुनिके आश्रमसे मेरा आगमन हुआ है। तुम
कया पूछ रही हो; मुझे बताओ॥ ५७॥
शशिकला बोली-हे महाभाग! उस आश्रममें
अत्यन्त प्रशंसनीय, संसारमें सबसे बढ़कर तथा
विशेषरूपसे दर्शनीय कौन-सी वस्तु है ?॥ ५८॥
ब्राह्मणने कहा—हे सुश्रोणि ! महाराज भ्रुवसन्धिके
पुत्र श्रीमान् सुदर्शन वहाँ रहते हैं। पुरुषोंमें श्रेष्ठ वे
सुदर्शन अपने नामके अनुरूप ही हैं॥ ५९॥
हे सुन्दरि! जिसने राजकुमार सुदर्शनको
नहीं देखा, मैं तो उसके नेत्रोंको अत्यन्त निष्फल
मानता हूँ॥ ६०॥
सृष्टिकी अभिलाषावाले ब्रह्माने कौतूहलवश
उन एक सुदर्शनमें सभी गुणोंको भर दिया है।
अतः गुणोंकी खान सुदर्शनको ही मैं देखनेयोग्य
मानता हूँ॥ ६१॥
वे राजकुमार तुम्हारे अनुरूप हैं और तुम्हारे पति
होनेयोग्य हैं। मणि और कांचनकी भाँति यह तुम
दोनोंका संयोग पहलेसे ही निश्चित हो चुका है॥ ६२॥
इति श्रीमहेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहरतरचां संहितायां तृतीयस्कन्धे विश्वामित्रकथोत्तरं
राजपुत्रस्य कामबीजप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
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अधथाष्टादशोऽध्यायः
राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन-ही-मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी
घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना
व्यास उवाच
श्रुत्वा तद्बचनं श्यामा प्रेमयुक्ता बभूव ह।
प्रतस्थे ब्राह्मणस्तस्मात्स्थानादुक्त्वा समाहित: ॥ ९
सा तु पूर्वानुरागाद्वै मग्ना प्रेम्णातिचञ्चला।
कामबाणहतेवास गते तस्मिन्द्रिजोत्तमे। २
व्यासजी बोले—उस ब्राह्मणका वचन सुनकर
सुन्दरी शशिकला प्रेमविभोर हो गयी और वह
ब्राह्मण इतना कहकर शान्तभावसे उस स्थानसे
चला गया॥ १॥
उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर वह सुन्दरी
पूर्व अनुरागसे तथा विप्रकी बातोंसे प्रेमातिरेकके
कारण अत्यधिक अधीर हो उठी॥ २॥
३३४
अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोनुवर्तिनीम्।
विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छूबणादनु॥ ३
अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम्।
दुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च॥ ४
स्वप्नेषु वा मया दृष्ट: पञ्चबाण इवापरः।
तपते मे मनोऽत्यर्थ विरहाकुलितं मृदु॥ ५
चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्धाति भामिनि।
स्रगियं सर्पवच्यैव चन्द्रपादाश्च वह्विवत्॥ ६
न च हर्म्ये बने शं मे दीर्धिकायां न पर्वते।
न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः॥ ७
न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम्।
प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने॥ ८
प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः।
भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा॥ ९
स्वयंबरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम्।
दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै॥ १०
सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्व॑यः ।
रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनोऽप्यसौ मतः ॥ १९
व्यास उवाच
एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः।
वनवासी फलाहारस्तस्याश््चित्ते सुसंस्थितः ॥ १२
वाग्बीजस्य जपात्सिद्द्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता।
सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम्॥ १३
श्रीमद्देबी भागवत
[ अ० १८
तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार
चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा
उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर
मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है। इस समय
कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है। अब मैं क्या
करूँ और कहाँ जाऊँ ?॥ ३-४॥
जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस
राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ
मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है॥५॥
हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ
चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा
चन्द्रमाको किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६॥
इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा
पर्वतपर-कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा
रही है। नानाविध सुख-साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें
किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७॥
शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन-इनमें
कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही
हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही
कर पा रही है॥८॥
[जी करता है] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ
वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण
भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी
हुँ॥ ९॥
क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं
आयोजित कर रहे हैं। [यदि स्वयंवर हुआ तो] मैं
इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १०॥
यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु
वे मुझे रमणीय नहीं लगते। राज्यहीन होते हुए भी
इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ॥ ११॥
व्यासजी बोले-अकेला, निर्धन, बलहीन,
वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी
सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया
था। भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह
सिद्धि प्राप्त हो गयी थी। वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न
होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता
था॥ १२-१३॥
अ० १८]
तृतीय स्कन्ध
३३५
स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम्।
विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम्॥ ९४
शृङ्कवेरपुराध्यक्षो निषाद: समुपेत्य तम्।
ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम्॥ १५
चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम्।
जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा॥ १६
सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम् ।
वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम्॥ १७
कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा।
मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः॥ १८
राजपुत्र श्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा ।
स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः॥ १९
प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी।
सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत ॥ २०
मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः।
पुत्रस्तेऽद्य धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते॥ २९
सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम्।
दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात्॥ २२
न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन।
केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति॥ २३ |
आशीर्वादैश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः ।
भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः॥ २४
एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त,
| पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी
| सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन
किया ॥ १४॥
उसी समय श्रंगबेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके
पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण
उत्तम रथ प्रदान किया। उस रथमें चार घोड़े जुते हुए
थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था। निषादराजने
राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे
भेंटस्वरूप वह रथ दिया था। सुदर्शने भी प्रेमपूर्वक
उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस
निषादका वन्य फल-मूलोंसे भलीभाँति सत्कार
किया॥ १५-१७॥
तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके
चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न
होकर सुदर्शनसे कहने लगे-हे राजकुमार! आप
धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें
निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह
नहीं है। हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी
भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं। अब
आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता
न करें॥ १८—२० ॥
तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे
कहा-हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र
ही भूमण्डलका राजा होगा॥ २१॥
तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा—
आपलोगोंका वचन सफल हो। हे विप्रगण! यह
सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है। सच्ची उपासनासे
सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही
। क्या? [किंतु] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं,
न कोश है और न कोई सहायक ही है। [ऐसी
दशामें] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन
सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः
आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही
राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२-२४॥
श्रीमहेबीभागवत
[ अ० १८
व्यास उवाच
रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः।
अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा॥ २५
प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते।
एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा॥ २६
सम्प्राप्य सदगुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम्।
जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २७
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम् ।
प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम। २८
ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः ।
येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्चनादिषु॥ २९
या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता।
आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह॥ ३०
बुद्धि: कोतिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः ।
सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते॥ ३१
न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल।
न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्॥ ३२
ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः।
वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भग: ॥ ३३
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणा: ।
सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम्॥ ३४
को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम् ।
सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा॥ ३५
ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी।
योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षणां च वल्लभा॥ ३६
व्यासजी बोले-रथपर सवार होकर मेधावी
सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ बह अपने तेजसे एक
अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था। हे भूप!
यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई
कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक
उसी मन्त्रका जप किया करता था॥ २५-२६॥
जो मनुष्य किसी सदगुरुसे कामराज नामक
अद्भुत बौजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक
उसका जप करता है, बह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण
कर लेता है॥ २७॥
हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई
ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी
भगवतीके प्रसन्न होनेपर न मिल सके ॥ २८॥
वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित
होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें
विश्वास नहीं होता॥ २९॥
हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब
देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता—
| इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति,
लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे
। समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं ॥ ३०-३१॥
जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान
पाते | कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती
शिवाका भजन नहीं करते॥ ३२॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु,
अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग,
आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण—ये सभी
देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन
भगवतीका ध्यान करते हैं ॥ ३३-३४॥
कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका
शक्तिको आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी
कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी
भगवतीको जान लिया था॥ ३५॥
वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही
ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं । बे पराशक्ति योगद्वारा
ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको
विशेष प्रिय हैं ॥ ३६॥
अ० १८]
परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमहति तां बिना ।
या सृष्टि त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने॥ ३७
सुदर्शनस्तु तां देवी मनसा परिचिन्तयन्।
राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः॥ ३८
सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता।
नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः॥ ३९
तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम्।
सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः॥ ४०
स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्धिः परिकीर्तितः।
राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल॥ ४९
इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः।
यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम्॥ ४२
तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः।
इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः॥ ४३
शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभेरास्तरणैर्युताः।
ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः ॥ ४४
एवं कृतेऽतिसम्भारे विवाहार्थं सुविस्तरे।
सखीं शशिकला प्राह दु:खिता चारुलोचना ॥ ४५
इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम।
मया वृतः पतिश्चित्ते श्रुवसन्धिसुतः शुभः॥ ४६
नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम्।
स मे भर्ता नूपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः॥ ४७
व्यास उवाच
इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा।
वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी॥ ४८
तृतीय स्कन्ध
३३७
उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें
कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके
सर्वात्मा भगवान्को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका
मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन
राज्य-प्राप्तिसे भी अधिक सुखका अनुभव करके
वनमें रहता था॥ ३७-३८॥
उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक
पीडित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार
अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी॥ ३९॥
इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको
वरको अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ
स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४०॥
विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं । वह
क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है,
अन्यके लिये नहीं। उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है,
जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती
है। दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण
(शर्त) रखा जाता है। जैसे भगवान् श्रीरामने [जानकीके
स्वयंवरमें] शिवधनुष तोड़ा था। तीसरा स्वयंवर
शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है।
नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन
किया॥ ४१—४३॥
शिल्पियोंद्वारा बहुत-से मंच बनवाये गये और
उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये। तत्पश्चात्
राजाओंके बैठनेयोग्य विविध आकार-प्रकारके सभा-
मण्डप बनवाये गये ॥ ४४॥
इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट
जानेपर सुन्दर नेत्रोंबाली शशिकलाने दुःखित होकर
अपनी सखीसे कहा-एकान्तमें जाकर तुम मेरी
मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें
ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया
है । उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं
बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको
मेरा पति निश्चित कर दिया है ॥ ४५—४७॥
व्यासजी बोले-उसके ऐसा कहनेपर उस
मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकौ माता विदर्भसुताके
पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा—
३३८
पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत् ।
शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना॥ ४९
भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ्रुवसन्धिसुतोऽस्ति यः।
स मे भर्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम्॥ ५०
व्यास उवाच
राज्ञी तद्बचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते।
तच्छुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः ।
भार्यामुवाच वैदर्भी सुबाहुस्तु ऋतं वचः॥ ५२
सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यानिष्कासितो वने।
एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने ॥ ५३
तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता।
स कथं निर्धनो भर्ता योग्यः स्याच्यारुलोचने॥ ५४
ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम् ।
आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे॥ ५५
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १९
“हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर
मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप
| सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही
उसका हित-साधन करें’। [उसका कथन है कि]
| भारद्वाजमुनिके आश्रममें जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन
| रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर
| चुकी हूँ। अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं
| करूँगी ॥ ४८—५०॥
व्यासजी बोले-वह वचन सुनकर रानीने
निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम्॥ ५१ | vars | सारी बातें ज्यों कौ त्यों
उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये
| और बार-बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या
विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे— ॥ ५२॥
हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह
बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन
वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है। उसीके
लिये राजा वीरसेन युधाजित्के द्वारा मार डाले गये।
हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता
है ? ॥ ५३-५४॥
तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि
बड़े-से-बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले
हैं। अत: उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात बह कभी भी
न बोले ॥ ५५॥
इति श्रीमद्देवी भागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरथां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया
मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८॥
eI “स्“य्ट
अधथैकोनविंशोऽध्यायः
माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन
तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्ट्वारा सुदर्शनको
मार डालनेको बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना
व्यास उवाच
भर्त्र साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम्।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम् ॥ १
किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे।
पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते॥ २
व्यासजी बोले-पतिके ऐसा कहनेपर रानीने
सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर
उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा-हे
सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात
क्यों कह रही हो ? हे सुत्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता
बहुत दुःखित हो रहे हैं ॥ १-२॥
अ० १९ ]
सुदर्शनो 5तिदुर्भाग्यो राज्यभ्रष्टो निराश्रयः।
बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः॥ ३
मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशन: कृशः ।
न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भग:॥ ४
राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः ।
तवार्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्लैरलङ्कृताः॥ ५
भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै।
करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ६
अन्यच्च कारणं सुश्रु शृणु यच्च मया श्रुतम्।
युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः॥ ७
दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम्।
वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह॥ ८
भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम्।
मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम्॥ ९
शशिकलोवाच
मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः ।
शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता॥ १०
च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता।
पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ ११
अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रिया: ।
भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम्॥ १२
तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम्।
मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः॥ १३
तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम्।
तृतीय स्कन्ध
३३९
वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राजच्युत, आश्रयहीन
और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु-बान्धवोंने
उसका परित्याग कर दिया है। बह अपनी माताके
साथ वनमें रहकर फल-मूल खाता है और अत्यन्त
दुर्बल है। इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी
बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है॥ ३-४॥
हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ
उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और
राजचिह्लोसे अलंकृत हैं। इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्,
रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणांसे युक्त भाई भी है,
जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है॥ ५-६॥
हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात
सुनी है, तुम उसे सुनो—राजा युधाजित् उस सुदर्शनका
वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है॥ ७॥
उसने घोर संग्राम करके [इसके नाना] राजा
वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा
करके अपने दौहित्र शन्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त
कर दिया है। इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें
शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह
वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर
लौट गया॥ ८-९॥
शशिकला बोली—हे माता! मुझे तो वह
वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है। [पूर्व-
कालमें] शर्यातिको आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री
सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर
हो गयी थी। उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी
सेवा-शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान
करनेवाली होती है। अपने पतिके लिये कपटरहित
व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक
होता है॥ १०-११३ ॥
स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ बरका वरण करनेके
लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं। अतः उनको
छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे
करूँ ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको
ही अंकित कर दिया है। अतः उस प्रिय सुदर्शनको
छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं
बनाऊँगी॥ १२-१३३ ॥
३४०
व्यास उवाच
प्रत्यादिष्टाथ वैदर्भी तया बहुनिदर्शनैः॥ १४
भर्तारं सर्वमाचष्ट पुत्र्योक्तं वचनं भृशम्।
विवाहस्य दिनादर्वांगाप्तं श्रुतसमन्वितम्॥ १५
द्विजं शशिकला तत्र प्रेषयामास सत्वरम्।
यथा न वेद मे तातस्तथा गच्छ सुदर्शनम्॥ १६
भारद्वाजाश्रमे ब्रूहि मद्वाक्यात्तरसा विभो।
पित्रा मे सम्भूतः कामं मदर्थेन स्वयंवरः॥ १७
आगमिष्यन्ति राजानो बलयुक्ता ह्यनेकशः ।
मया त्वं वै वृतश्चित्ते सर्वथा प्रीतिपूर्वकम्॥ १८
भगवत्या समादिष्टः स्वप्ने मम सुरोपम।
विषमद्यि हुताशे वा प्रपतामि प्रदीपिते॥ १९
वरये त्वदूते नान्यं पितृभ्यां प्रेरितापि वा।
मनसा कर्मणा वाचा संवृतस्त्वं मया वरः॥ २०
भगवत्याः प्रसादेन शर्मावाभ्यां भविष्यति।
आगन्तव्यं त्वयात्रैव दैवं कृत्वा परं बलम्॥ २१
यदधीनं जगत्सर्वं वर्तते सचराचरम्।
भगवत्या यदादिष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति॥ २२
यद्वशे देवताः सर्वा वर्तन्ते शङ्करादयः।
वक्तव्योऽसौ त्वया ब्रह्मन्नेकान्ते वै नृपात्मजः॥ २३
यथा भवति मे कार्य तत्कर्तव्यं त्वयानघ।
इत्युक्त्वा दक्षिणां दत्त्वा मुनिर्व्यापारितस्तया॥ २४
गत्वा सर्व निवेदयाशु तत्र प्रत्यागतो द्विजः।
सुदर्शनस्तु तज्ज्ञात्वा निश्चयं गमने तदा॥ २५
चकार मुनिना तेन प्रेरितः परमादरात्।
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १९
व्यासजी बोले-[हे राजन्!] उस समय उस
शशिकलाने अनेक प्रमाणोंके द्वारा विदर्भराजकुमारी
अपनी माताको समझा दिया। तत्पश्चात् पुत्रीके द्वारा
कही गयी सभी बातोंको महारानीने अपने पतिसे
बताया ॥ १४३ ॥
उधर शशिकलाने विवाहके कुछ दिनों पूर्व ही
एक विश्वस्त तथा वेदनिष्ठ ब्राह्मणको शीघ्र ही वहाँ
भेज दिया। [जाते समय उसने ब्राह्मणसे कहा कि]
आप सुदर्शनके पास इस प्रकार जायेँ, जिसे मेरे पिता
न जान पायें ॥ १५-१६॥
हे विभो! आप बहुत शीघ्र ही भारद्वाजके
आश्रम पहुँचकर सुदर्शनको मेरी ओरसे कहिये कि
मेरे पिताने मेरे विवाहार्थ एक स्वयंवर आयोजित
किया है; उसमें अनेक बलवान् राजा आयेंगे, किंतु
मैं तो मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक हर तरहसे आपका
वरण कर चुकी हूँ। हे देवोपम राजकुमार! मुझे
भगवतीने स्वप्नमें आपको वरण करनेका आदेश दिया
है। मैं विष खा लूँगी अथवा जलती हुई अग्निमें कूद
पड़ँगी, किंतु माता-पिताके द्वारा बहुत प्रेरित किये
जानेपर भी मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण
नहीं करूँगी; क्योंकि मैं मन, वचन तथा कर्मसे
आपको अपना पति मान चुकी हूँ। भगवतीकी कृपासे
हम दोनोंका कल्याण होगा। प्रारब्धको प्रबल मानकर
आप इस स्वयंवरमें अवश्य आयें। यह सम्पूर्ण चराचर
जगत् जिनके अधीन है तथा शंकर आदि सभी
देवगण जिनके वशमें रहते हैं, उन भगवतीने जो
आदेश दिया है, वह कभी भी असत्य नहीं होगा!
हे ब्रह्मन्! आप उस राजकुमारसे यह सब एकान्तमें
बताइयेगा। हे निष्पाप! आप वही कीजियेगा, जिससे
मेरा काम बन जाय॥ १७-२३३ ॥
ऐसा कहकर और दक्षिणा देकर शशिकलाने
उस ब्राह्मणको भेज दिया। वह ब्राह्मण सुदर्शनसे सारी
बातें कहकर शीघ्र ही वापस आ गया। उन बातोंको
जानकर राजकुमार सुदर्शनने स्वयंवरमें जानेका निश्चय
कर लिया; उन भारद्वाजमुनिने भी उसे आदरपूर्वक
भेज दिया॥ २४-२५३ ॥
अ० १९]
तृतीय स्कन्ध
३४१
व्यास उवाच
गमनायोद्यतं पुत्रं तमुवाच मनोरमा॥ २६
वेपमानातिदुःखार्ता जातत्रासाश्रुलोचना।
कुत्र गच्छसि पुत्राद्य समाजे भूभृतां किल॥ २७
एकाकी कृतवैरश्च किं विचिन्त्य स्वयंबरे।
युधाजिदद्धन्तुकामस्त्वां समेष्यति महीपतिः॥ २८
न तेऽन्योऽस्ति सहायश्च तस्मान्मा व्रज पुत्रक ।
एकपुत्रातिदीनास्मि तवाधारा निराश्रया॥ २९
नारहसि त्वं महाभाग निराशां कर्तुमद्य माम्।
पिता मे निहतो येन सोऽपि तत्रागतो नृपः॥ ३०
एकाकिनं गतं तत्र युधाजित्त्वां हनिष्यति।
सुदर्शन उवाच
भवितव्यं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा॥ ३१
आदेशाच्च जगन्मातुर्गच्छाम्यद्य स्वयंवरे।
मा शोकं कुरु कल्याणि क्षत्रियासि वरानने॥ ३२
न बिभेमि प्रसादेन भगवत्या निरन्तरम्।
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा रथमारुह्य गन्तुकामं सुदर्शनम्॥ ३३
दृष्ट्वा मनोरमा पुत्रमाशीर्भिश्चान्वमोदयत्।
अग्रतस्तेऽम्बिका पातु पार्वती पातु पृष्ठतः॥ ३४
( पार्वती पार्श्वयोः पातु शिवा सर्वत्र साम्प्रतम्। )
वाराही विषमे मार्गे दुर्गा दुर्गेषु कर्हिचित्।
कालिका कलहे घोरे पातु त्वां परमेश्वरी ॥ ३५
मण्डपे तत्र मातङ्गी तथा सौम्या स्वयंवरे।
भवानी भूषमध्ये तु पातु वां भवमोचनी॥ ३६
गिरिजा गिरिदुर्गेषु चामुण्डा चत्वरेषु च।
कामगा काननेष्वेवं रक्षतु त्वां सनातनी॥ ३७
विवादे वैष्णवी शक्तिरवतात्त्वां रघूद्रह ।
भेरवी च रणे सौम्य शत्रूणां वै समागमे॥ ३८
सर्वदा सर्वदेशेषु पातु त्वां भुवनेश्वरी ।
महामाया जगद्धात्री सच्चिदानन्दरूपिणी॥ ३९
व्यासजी बोले-तब अत्यधिक दु:खसे व्याकुल,
काँपती हुई तथा भयभीत मनोरमा गमनके लिये
तत्पर अपने पुत्र सुदर्शनसे आँखोंमें आँसू भरकर
बोली-पुत्र! तुम इस समय राजाओंके उस समाजमें
कहाँ जा रहे हो? तुम अकेले हो और तुमसे शत्रुता
रखनेवाला राजा युधाजित् तुम्हें मारनेकी इच्छासे उस
स्वयंवरमें अवश्य आयेगा, फिर तुम क्या सोचकर
वहाँ जा रहे हो? तुम्हारा कोई सहायक भी नहीं
है। इसलिये हे पुत्र! वहाँ मत जाओ। तुम ही मेरे
एकमात्र पुत्र हो और मैं अति दीन हुँ तथा मुझ
आश्रयहीनके लिये तुम्हीं एकमात्र आधार हो। हे
महाभाग! इस समय तुम मुझे निराश मत करो।
जिसने मेरे पिताका वध कर दिया है, बह राजा
युधाजित् भी वहाँ आयेगा और वहाँ तुझ अकेले गये
हुएको मार डालेगा॥ २६-३०३ ॥
सुदर्शन बोला—होनी तो होकर रहती है, इस
विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे कल्याणि!
जगज्जननीके आदेशसे मैं आज स्वयंवरमें जा रहा हूँ ।
हे वरानने! तुम क्षत्राणी हो, अतः इस विषयमें चिन्ता
मत करो। भगवतीकी सदा अपने ऊपर कृपा रहनेके
कारण मैं किसीसे भी भयभीत नहीं होता॥ ३१-३२ ॥
व्यासजी बोले-एऐसा कहकर रथपर आरूढ़
होकर स्वयंवरमें जानेके लिये उद्यत पुत्र सुदर्शनको
देखकर मनोरमाने इन आशीर्वादोंसे उसका अनुमोदन
किया-भगवती अम्बिका आगेसे, पार्वती पीछेसे,
(पार्वती दोनों पार्श्वभागमें तथा शिवा सर्वत्र तुम्हारी
रक्षा करें।) विषम मार्गमे वाराही, किसी भी प्रकारके
दुर्गम स्थानोंमें दुर्गा और भयानक संग्राममें परमेश्वरी
कालिका तुम्हारी रक्षा करें। उस मण्डपमें देवी
मातंगी, स्वयंवरमें भगवती सौम्या तथा भव-बन्धनसे
मुक्त करनेवाली भवानी राजाओंके बीचमें तुम्हारी रक्षा
करें। इसी प्रकार पर्वतीय दुर्गम स्थानोंमें गिरिजा,
चौराहोंपर देवी चामुण्डा तथा वनोंमें सनातनी कामगादेवी
तुम्हारी रक्षा करें। हे रघूइह! विवादमें भगवती
वैष्णवी तुम्हारी रक्षा करें। हे सौम्य! शत्रुओंके साथ
युद्धमें भैरवी तुम्हारी रक्षा करें। जगत्को धारण
करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महामाया भुवनेश्वरी
सभी स्थानोंपर सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें॥ ३३-३९॥
३४२
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा तं तदा माता वेपमाना भयाकुला।
उवाचाहं त्वया सार्धमागमिष्यामि सर्वथा॥ ४०
निमिषार्धं विना त्वां वै नाहं स्थातुमिहोत्सहे।
सहेव नय मां वत्स यत्र ते गमने मतिः॥ ४१
इत्युक्त्वा निःसृता माता धात्रेयीसंयुता तदा।
विप्रैर्दत्ताशिषः सर्वे निर्ययुहर्षसंयुताः॥ ४२
वाराणस्यां ततः प्राप्तो रथेनैकेन राघवः।
ज्ञातः सुबाहुना तत्र पूजितश्चार्हणादिभिः॥ ४३
निवेशार्थं॑ गृहं दत्तमन्नपानादिकं तथा।
सेवकं समनुज्ञाप्य परिचर्यार्थथेव च॥ ४४
मिलितास्त्वथ राजानो नानादेशाधिपाः किल।
युधाजिदपि सम्प्राप्तो दौहित्रेण समन्वितः॥ ४५
करूषाधिपतिश्चैव तथा मद्रेश्वरो नृपः।
सिन्धुराजस्तथा वीरो योद्धा माहिष्मतीपतिः॥ ४६
पाञ्चालः पर्वतीयश्च कामरूपोऽतिवीर्यवान्।
कार्णाटश्चोलदेशीयो वैदर्भशच महाबलः ॥ ४७
अक्षौहिणी त्रिषष्टिशच मिलिता संख्यया तदा।
वेष्टिता नगरी सा तु सैन्यैः सर्वत्र संस्थितैः॥ ४८
एते चान्ये च बहवः स्वयंवरदिदृक्षया
मिलितास्तत्र राजानो वरवारणसंयुताः॥ ४९
अन्योन्यं नृपपुत्रास्त इत्यूचुर्मिलितास्तदा।
सुदर्शनो नृपसुतो ह्यागतोऽस्ति निराकुलः॥ ५०
एकाकी रथमारुह्य मात्रा सह महामतिः।
विवाहार्थमिहायातः काकुत्स्थः किन्नु साम्प्रतम्॥ ५९
एतान् राजसुतांस्त्यक्त्वा ससेन्यान्सायुधानथ।
किमेनं राजपुत्री सा वरिष्यति महाभुजम्॥ ५२
श्रीमद्देवी भागवत
[ अ० १९
व्यासजी बोले—ऐसा कहकर भयसे व्याकुल
तथा काँपती हुई उसकी माता मनोरमाने उससे
कहा—मैं भी तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगी। हे पुत्र!
मैं तुम्हारे बिना आधे क्षण भी यहाँ नहीं रह सकती,
अतएव तुम्हारी जहाँ जानेकी इच्छा है, वहीं मुझे भी
अपने साथ ले चलो ॥ ४०-४१॥
तब ऐसा कहकर अपनी दासीको साथ लेकर
माता मनोरमा चल पड़ीं। ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद प्राप्त
करके वे सभी प्रसन्नतापूर्वक चल पडे ॥ ४२॥
इसके बाद वह रघुवंशी सुदर्शन एक रथपर
आरूढ़ होकर वाराणसी पहुँचा। राजा सुबाहुको
उसके आनेकी जानकारी होनेपर उन्होंने आदर-
सम्मान आदिके द्वारा उसका सत्कार किया। उन
लोगोंके निवासके लिये भवन तथा अन्न-जल
आदिकी व्यवस्था कर दी तथा उनकी सेवा-शुश्रूषाहेतु
सेवकको भी नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥
इसके बाद वहाँ अनेक देशोंके राजा-महाराजा
एकत्र हुए। वहाँ अपने नातीको साथ लेकर युधाजित्
भी आया॥ ४५॥
करूषाधिपति, मद्रदेशके महाराज, वीर
सिन्धुराज, युद्धकुशल माहिष्मतीनरेश, पंचालपति,
पर्वतीय राजा, कामरूपदेशके अति पराक्रमी महाराज,
कर्णाटकनरेश, चोलराज और महाबली विदर्भनरेश
वहाँ आये थे॥ ४६-४७॥
उन राजाओंकी कुल मिलाकर तिरसठ अक्षौहिणी
सेना थी। वहाँ सर्वत्र स्थित उन सैनिकोंसे वह
वाराणसी नगरी पूरी तरहसे धिर गयी ॥ ४८॥
इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से राजा भी स्वयंवर
देखनेकी इच्छासे बड़े-बड़े हाथियोंपर आरूढ़ होकर
उस स्वयंवरमें सम्मिलित हुए॥ ४९ ॥
उस समय सभी राजकुमार आपसमें मिलकर
कहने लगे कि राजकुमार सुदर्शन भी निश्चिन्त होकर
यहाँ आया है। वह महाबुद्धिमान् सूर्यवंशी सुदर्शन
अपनी माताके साथ इस समय अकेला ही रथपर
चढ़कर विवाहके लिये यहाँ आ पहुँचा है। सैन्यशक्तिसे
सम्पन्न तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित इन राजकुमारोंको
छोड़कर क्या वह राजकुमारी बड़ी भुजाओंवाले इस
सुदर्शनका वरण करेगी ?॥ ५०-५२॥
अ० १९ ]
तृतीय स्कन्ध
३४३
युधाजिदथ राजेशस्तानुवाच महीपतीन्।
अहमेनं हनिष्यामि कन्यार्थे नात्र संशयः॥ ५३
केरलाधिपतिः प्राह तं तदा नीतिसत्तमः।
नात्र युद्धं प्रकर्तव्यं राजन्निच्छास्वयंवरे॥ ५४
बलेन हरणं नास्ति नात्र शुल्कस्वयंवरः।
कन्येच्छयात्र वरणं विवादः कीदृशस्त्विह॥ ५५
अन्यायेन त्वया पूर्वमसौ राज्यात्प्रवासितः।
दौहित्रायार्पितं राज्यं बलवन्नृपसत्तम॥ ५६
काकुत्स्थोऽयं महाभाग कोसलाधिपतेः सुत: ।
कथमेनं राजपुत्रं हनिष्यसि निरागसम्॥ ५७
लप्स्यसे तत्फलं नूनमनयस्य नृपोत्तम।
शास्तास्ति कश्चिदायुष्मञ्जगतोऽस्य जगत्पतिः ॥ ५८
धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
मानयं कुरु राजेन्द्र त्यज पापमतिं किल॥ ५९
दौहित्रस्तव सम्प्राप्तः सोऽपि रूपसमन्वितः।
राज्ययुक्तस्तथा श्रीमान् कथं तं न वरिष्यति॥ ६०
अन्ये राजसुता: कामं वर्तन्ते बलवत्तराः।
कन्यास्वयंवरे कन्या स्वीकरिष्यति साम्प्रतम् ॥ ६१
वृते तथा विवादः कः प्रवदन्तु महीभुजः।
परस्परं विरोधोऽत्र न कर्तव्यो विजानता॥ ६२
इसके बाद राजा युधाजित्ने उन नरेशोंसे
कहा-राजकुमारीको प्राप्त करनेके लिये मैं इसे
मार डालूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ५३॥
तब महान् नीतिज्ञ केरलनरेशने उस युधाजित्से
| कहा-हे राजन्! इच्छास्वयंवरमें युद्ध नहीं करना
चाहिये। यह शुल्कस्वयंवर भी नहीं है, अत: कन्याका
बलपूर्वक हरण भी नहीं किया जाना चाहिये। इसमें
तो कन्याकी इच्छासे पति चुनना निर्धारित है; तो फिर
इसमें विवाद कैसा ?॥ ५४-५५ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! आपने पहले तो इस सुदर्शनको
अन्यायपूर्वक राज्यसे निकाल दिया और अपने दौहित्रको
बलपूर्वक उस राज्यका स्वामी बना दिया॥ ५६॥
हे महाभाग! यह सूर्यवंशी राजकुमार कोसल-
नरेशका सुपुत्र है। इस निरपराध राजकुमारका वध
आप क्यों करेंगे ?॥ ५७॥
हे नृपोत्तम! आपको अन्यायका फल अवश्य ही
मिलेगा। हे आयुष्मन्! इस संसारपर शासन करनेवाला
कोई और ही जगत्पति परमेश्वर है॥ ५८॥
धर्मको जय होती है, अधर्मकी नहीं। सत्यकी
जय होती है, असत्यकी नहीं। अतएव हे राजेन्द्र!
आप अन्याय न कीजिये और इस प्रकारके पापमय
विचारका सर्वथा परित्याग कर दीजिये॥५९॥
आपका दौहित्र यहाँ आया ही है। वह भी
अत्यन्त रूपवान् और राज्य तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न है;
तब भला कन्या उसका वरण क्यों नहीं करेगी ?॥ ६०॥
अन्य एकसे बढ़कर एक बलवान् राजकुमार
आये हैं। इस स्वयंवरमें कन्या शशिकला किसी भी
राजकुमारको अपनी इच्छासे चुन लेगी॥ ६१॥
हे राजागण! अब आप ही लोग बतायें कि
इस प्रकारके विवाहमें विवाद ही क्या? विवेकवान्
पुरुषको इस विषयमें परस्पर विरोधभाव नहीं रखना
चाहिये ॥ ६२॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रथां संहितायां तृतीयस्कन्धे
राजसंवादवर्णनं नामेकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥
HAD “स्स्स
३४८४
श्रीमहेवीभागवत
[ अ० २०