Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीमहेबीभागवतमहापुराणको महिमा
सूत उवाच
अर्धश्लोकात्मकं यत्तु देवीवक्त्राव्जनिर्गतम्।
श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम्॥ १
उपदिष्टं विष्णवे यद्ृटपत्रनिवासिने।
शतकोटिप्रविस्तीर्ण॑ तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा॥ २
तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे।
अष्टादशसहस्त्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम्॥ ३
देवीभागवतं नाम पुराणं ग्रथितं पुरा।
अद्यापि देवलोके तद् बहुविस्तीर्णमस्ति हि॥ ४
नानेन सदूशं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्।
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोति मानवः॥ ५
पौराणिकं पूजयित्वा वस्त्राद्याभरणादिभिः।
व्यासबुद्धया तन्मुखात्तु श्रुत्वैतत्समुपोषितः॥ ६
लिखित्वा निजहस्तेन लेखकेनाथवा मुने।
प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम्॥ ७
दद्यात्पौराणिकायाथ दक्षिणां च पयस्विनीम्।
सालङ्कृतां सवत्सां च कपिलां हेममालिनीम्॥ ८
भोजयेद् ब्राह्मणानन्तेऽप्यध्यायपरिसम्मितान्।
सुवासिनीस्तावतीश्च कुमारीर्बटुकैः सह॥ ९
देवीबुद्धया पूजयेत्तान्वसनाभरणादिभिः।
पायसान्नवरेणापि गन्धस्त्रक्कुसुमादिभिः ॥ १०
पुराणदानेनैतेन भूदानस्य फलं लभेत्।
इहलोके सुखी भूत्वाप्यन्ते देवीपुरं ब्रजेत्॥ ११
सूतजी बोले-पराम्बा देवीके मुखकमलसे वेद-
सिद्धान्तका बोधक जो आधा श्लोक” निकला था और
जिसका उपदेश स्वयं देवीने वट-पटपर शयन करनेवाले
विष्णुको किया था, उसीको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने सौ
करोड़ श्लोकोंके रूपमें विस्तृत कर दिया ॥ १-२॥
तत्पश्चात् व्यासजीने शुकदेवजीको पढ़ानेके
लिये इसके सारभागको एकत्र करके अठारह हजार
श्लोकों तथा बारह स्कन्धोंसे युक्त श्रीमद्देवीभागवत
नामक पुराणको रचना की। वह पुराण अब भी
देवलोकमें वैसे ही विस्तृतरूपसे विद्यमान है ॥ ३-४॥
इस पुराणके समान पुण्यदायक, पवित्र तथा
पापनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है। इसके एक-
एक पदका पाठ करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल
प्राप्त करता है॥५॥
हे मुने! स्वयं अपने हाथसे देवीभागवतपुराण
लिखकर या किसी लेखकसे लिखवाकर पुराणका वाचन
करनेवाले विद्वान्को इसे देकर वस्त्र तथा आभूषण .
आदिसे उनकी पूजा करके उनके प्रति व्यासबुद्धि
रखकर नियमपूर्वक उनके मुखसे इस पुराणका श्रबण
करना चाहिये। कथाको समाप्तिके दिन भाद्रपदपूर्णिमा
तिथिको स्वर्णसिंहासनपर स्थापित करके इस पुराणका
दान उस पौराणिक विद्वान्को करना चाहिये। पुनः
दक्षिणाके रूपमें उन्हें विविध अलंकारों तथा सोनेके
हारसे विभूषित और बछड़ेसे युक्त दूध देनेवाली
कपिला गौ प्रदान करनी चाहिये॥ ६—८॥
कथाके अन्तमें पुराणमें जितने अध्याय हैं; उतने
ही ब्राह्मणों तथा उतनी ही सुवासिनियोंको, उतनी ही
कुमारियों और बालकोंके साथ भोजन कराना चाहिये।
उन सबमें देवीको भावना करके वस्त्र, आभूषण, चन्दन,
माला, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करे एवं उत्तम
पायसान्न (खीर)-का भोजन कराये॥ ९-१०॥
मनुष्य इस पुराणके दानसे पृथ्वीके दानका फल
प्राप्त करता है और इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें
देवीलोकको प्राप्त होता है॥ ११॥
- सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥ (श्रीमद्देबीभा० १।१५।५२) अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा
कोई भी सनातन नहीं है।
अ० १४]
द्वादश स्कन्ध
८५५
नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम्।
न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्कवचिदस्ति हि॥ १२
अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात्।
विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः॥ १३
वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना।
श्रवणादस्य तहोषान्निवर्तेत न संशयः॥ १४
यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति।
तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती॥ १५
नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः।
ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः॥ १६
मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः।
शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति॥ १७
प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः।
एकैकमस्य चाध्यायं स नरो ज्ञानवान्भवेत्॥ १८
शकुनांश्चैव वीक्षेत कार्याकार्येषु चैव हि।
तत्प्रकारः पुरस्तात्तु कथितोऽस्ति मया मुने॥ १९
नबरात्रे पठेन्नित्यं शारदीयेऽतिभक्तिंतः।
तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा ददातीच्छाधिकं फलम्॥ २०
वैष्णवैश्चैव शैवैश्च रमोमा प्रीयते सदा।
सौरेश्च गाणपत्यैश्च स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये॥ २१
पठितव्यं प्रयत्नेन नवरात्रचतुष्टये।
वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये नित्यशो मुने॥ २२
पठितव्यं प्रयत्नेन विरोधो नात्र कस्यचित्।
उपासना तु सर्वेषां शक्तियुक्तास्ति सर्वदा॥ २३
जो इस श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक
श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी
दुर्लभ नहीं है । इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र,
धन चाहनेवालेको धन और विद्याके अभिलाषीको
विद्याको प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण
पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता है॥ १२-१३॥
जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या
हो; वह इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो
जाती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ १४॥
यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित होकर
स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी
नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि
वहाँ झाँकतेतक नहीं । यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श
करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया
जाय तो दाहक ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग
जाता है। इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग
समाप्त हो जाता है॥ १५-१७॥
जो मनुष्य प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त
होकर सन्ध्या-विधि सम्पन्न करके इस पुराणके
एक-एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो
जाता है॥ १८॥
कार्य-अकार्यके अवसरोंपर इस पुराणके द्वारा
शकुनका भी विचार करना चाहिये। हे मुने! उसकी
विधिका वर्णन मेरे द्वारा पहले किया जा चुका है॥ १९॥
शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे इस पुराणका
नित्य पाठ करना चाहिये। इससे जगदम्बा उस
व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी
अधिक फल प्रदान करती हैं॥ २०॥
वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको अपने-
अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टि लिये चैत्र,
आषाढ, आश्विन और माघ-इन मासोंके चारों
नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना
चाहिये; इससे रमा, उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा
प्रसन्न रहती हैं । हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी
अपनी गायत्रीको प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ
करना चाहिये। इस पुराणमें कहीं किसीका विरोधवचन
नहीं है। [वैष्णव, सौर आदि] सभी जनोंकी उपासना
८५६
तच्छक्तेरेव तोषार्थ पठितव्यं सदा द्विजैः।
स्त्रीशूद्रो न पठेदेतत्कदापि च विमोहितः॥ २४
श्रृणुयाद् द्विजवक्त्रात्तु नित्यमेवेति च स्थितिः ।
किं पुनर्बहुनोक्तेन सारं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ २५
वेदसारमिदं पुण्यं पुराणं द्विजसत्तमाः।
वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि॥ २६
सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्रीप्रतिपादिताम्।
नमामि ह्ींमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात्॥ २७
इति सूतवचः श्रुत्वा नैमिषीयास्तपोधनाः।
पूजयामासुरत्युच्यैः सूतं पौराणिकोत्तमम्॥ २८
प्रसन्नहृदयाः सर्वे देवीपादाम्बुजार्चकाः।
निर्वृतिं परमां प्राप्ताः पुराणस्य प्रभावतः॥ २९
नमश्चक्रुः पुनः सूतं क्षमाप्य च मुहुर्मुहुः ।
संसारवारिधेस्तात प्लवोऽस्माकं त्वमेव हि॥ ३०
इति स मुनिवराणामग्रतः श्रावयित्वा
सकलनिगमगुह्यां दौर्गमेतत्पुराणम्।
नतमथ मुनिसङ्घं वर्धयित्वाशिषाम्बा-
चरणकमलभूङ्गो निर्जगामाथ सूतः॥ ३९
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० १४
सदा शक्तियुक्त ही होती है, इसलिये शक्तिको सन्तुष्ट
करनेके लिये द्विजोंको इस पुराणका सदा पाठ करना
चाहिये। स्त्रियों तथा शूद्रोंकी चाहिये कि
वे अज्ञाननश इसका कभी पाठ न करें, अपितु वे
ब्राह्मणके मुखसे ही इसका नित्य श्रवण करें, यही
मर्यादा है। अधिक कहनेसे क्या लाभ, में आपको
इसका वास्तविक सार बताऊँगा॥ २१-२५॥
हे श्रेष्ठ मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा
वेदोंका सारस्वरूप है। इसके पढ्ने तथा सुननेसे
वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है॥ २६॥
गायत्री नामसे प्रतिपादित उन सच्चिदानन्द-
स्वरूपिणी होंमयी भगवतीको मैं प्रणाम करता हूँ,
वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें-
सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्रीप्रतिपादिताम्।
नमामि ह्वींमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात्॥ २७॥
पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका यह वचन सुनकर
नैमिषारण्यवासी तपोधन मुनियोंने बडे समारोहके साथ
उनका सम्मान किया॥ २८॥
भगवतीके चरणकमलोंके उपासक वे सभी मुनि
प्रसन्न हृदयवाले हो गये। इस पुराणके प्रभावसे वे
परम शान्तिको प्राप्त हुए॥ २९॥
मुनियोंने सूतजीको नमस्कार किया और बार-
बार क्षमा-प्रार्थना करके कहा-हे तात! इस संसार-
सागरसे पार करनेके लिये आप ही निश्चितरूपसे
हमारे लिये नौकास्वरूप हैं ॥ ३०॥
इस प्रकार सभी श्रेष्ठ मुनियोंके समक्ष सभी
वेदोंके गुह्य विषयरूप इस दुर्गाचरित्रप्रतिपादक
श्रीमहेबीभागवत-पुराणको विनयसम्पन्न मुनिजनोंको
सुनाकर तथा उनके आशीर्वादसे वृद्धिको प्राप्त होकर
भगवतीके चरणकमलोंके भृंगस्वरूप सूतजी बहाँसे
चले गये॥ ३१॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहर्र्ां संहितायां द्वादशस्कन्धे श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण-
श्रवणफलवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥
SO TSS
॥ द्वादशः स्कन्धः समाप्तः ॥
॥ श्रीमहेवीभागवतमहापुराण सम्पूर्णम्॥
[ सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः ]
AD टलटला्ट
[८५७]
॥ श्रीदुर्गायन्त्रम् ॥
श्रीदुर्गायन्नम्
पूर्व
बजसंयुताथ १, इन्द्राथनमः
|
[ सन्दर्भ श्रीमद्देवीभागवत स्कन्ध ९, अ० ५०]
॥ श्रीगायत्रीयन्त्रम्॥
[ श्रीमहेबीभागवतके गायत्री-प्रकरणसे सम्बद्ध ]
[८५९ ]
-ध्रीगायत्रीयन्त्रम् FN
पराजितायै नमः
वज्रायनमः
गेट
श्री विज्ञामित्नकल्प अ. ९२०१३ से ३५के आधार पर
[ श्रीमहेबीभागवतके गायत्री-प्रकरणसे सम्बद्ध ]
८६०
श्रीमहेबीभागवत
सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ हि कार्यसिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥
देव्युवाच
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।
मया तवैव ्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥
विनियोग:
३ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य
नारायण ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकाली-
महालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थ
सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोग: ।
3» ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥ १॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिव्र्थदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥ २॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ ३॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ ४॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ ५॥
शिवजी बोले-हे देवि! तुम भक्तोंके लिये
सुलभ हो और समस्त कर्मोंका विधान करनेवाली हो।
कलियुगमें कामनाओंको सिद्धि-हेतु यदि कोई उपाय
हो तो उसे अपनी वाणीद्वारा सम्यक्-रूपसे व्यक्त करो।
देवीने कहा—हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत
स्नेह है। कलियुगमें समस्त कामनाओंको सिद्ध
करनेवाला जो साधन है वह बतलाऊँगी, सुनिये!
उसका नाम है ’ अम्बास्तुति’।
विनियोग— 3» इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रके
नारायण ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीमहाकाली,
महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं, श्रीदुर्गाकी
प्रसन्नताके लिये सप्तश्लोकी दुर्गापाठमें इसका विनियोग
किया जाता है।
वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको
बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं॥ १॥
माँ दुर्ग! आप स्मरण करनेपर सब प्राणियोंका
भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन
करनेपर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती
हैं। दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके
सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार
करनेके लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो॥ २॥
नारायणि! आप सब प्रकारका मंगल प्रदान
करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी
शिवा हैं, आप सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली,
शरणागत-वत्सला, तीन नेत्रोंवाली गौरी हैं; आपको
नमस्कार है॥ ३॥
शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न
रहनेवाली तथा सबको पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी
देवि! आपको नमस्कार है॥ ४॥
सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकारकी शक्तियाँसे
सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयोंसे हमारी रक्षा
कीजिये; आपको नमस्कार है ॥ ५॥
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥ ६॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥ ७॥
८६१
देवि! आप प्रसन्न होनेपर सब रोगोंको नष्ट
कर देती हैं और कुपित होनेपर मनोवांछित सभी
कामनाओंका नाश कर देती हैं। जो लोग आपकी
शरणमें हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं; आपकी
शरणमें गये हुए मनुष्य दूसरोंको शरण देनेवाले
हो जाते हैं॥ ६॥
सर्वेश्वरि! आप इसी प्रकार तीनों लोकोंकी
समस्त बाधाओंको शान्त करें और हमारे शत्रुओंका
नाश करती रहें ॥ ७॥
॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा।
AAO ri
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
. न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥ १॥
विधेरज्ञानेन
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
द्रविणविरहेणालसतया
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥ २॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥ ३॥
माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; अहो! मुझे
स्तुतिका भी ज्ञान नहीं है। न आवाहनका पता है, न
ध्यानका । स्तोत्र और कथाकी भी जानकारी नहीं है।
न तो तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ और न मुझे व्याकुल
होकर विलाप करना ही आता है; परंतु एक बात
जानता हूँ, केवल तुम्हारा अनुसरण-तुम्हारे पीछे
चलना। जो कि सब क्लेशोंको-समस्त दुःख-
विपत्तियोंको हर लेनेवाला है॥ १॥
सबका उद्धार करनेवाली कल्याणमयी माता!
मैं पूजाको विधि नहीं जानता, मेरे पास धनका भी
अभाव है, मैं स्वभावसे भी आलसी हूँ तथा मुझसे
ठीक-ठीक पूजाका सम्पादन हो भी नहीं सकता; इन
सब कारणोंसे तुम्हारे चरणोंकी सेवामें जो त्रुटि हो
गयी है, उसे क्षमा करना; क्योंकि कुपुत्रका होना
सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती॥ २॥
माँ! इस पृथ्वीपर तुम्हारे सीधे-सादे पुत्र तो
बहुत-से हैं, किंतु उन सबमें मैं ही अत्यन्त चपल
तुम्हारा बालक हूँ; मेरे-जैसा चंचल कोई विरला
ही होगा। शिवे! मेरा जो यह त्याग हुआ है,
यह तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है; क्योंकि
संसारमें कुपुत्रका होना सम्भव है, किंतु कहीं भी
कुमाता नहीं होती॥ ३॥
८६२
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥ ४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥ ५॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्के रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥ ६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥ ७॥
श्रीमहेवी भागवत
जगदम्ब! मातः! मैंने तुम्हारे चरणोंकी सेवा
कभी नहीं की, देवि! तुम्हें अधिक धन भी समर्पित
नहीं किया; तथापि मुझ-जैसे अधमपर जो तुम
अनुपम स्नेह करती हो, इसका कारण यही है कि
संसारमें कुपुत्र पैदा हो सकता है, किंतु कहीं भी
कुमाता नहीं होती॥ ४॥
गणेशजीको जन्म देनेवाली माता पार्वती!
[अन्य देवताओंकी आराधना करते समय] मुझे
नाना प्रकारको सेवाओंमें व्यग्र रहना पड़ता था,
इसलिये पचासी वर्षसे अधिक अवस्था बीत जानेपर
मैंने देवताओंको छोड़ दिया है, अब उनकी सेवा-
पूजा मुझसे नहीं हो पाती; अतएव उनसे कुछ भी
सहायता मिलनेकी आशा नहीं है। इस समय यदि
तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं अवलम्बरहित होकर
किसकी शरणमें जाऊँगा॥ ५॥
माता अपर्णा ! तुम्हारे मन्त्रका एक अक्षर भी
कानमें पड़ जाय तो उसका फल यह होता है कि मूर्ख
चाण्डाल भी मधुपाकके समान मधुर वाणीका उच्चारण
करनेवाला उत्तम वक्ता हो जाता है, दीन मनुष्य भी
करोड़ों स्त्रर्ण-मुद्राओंसे सम्पन्न हो चिरकालतक
निर्भय विहार करता रहता है। जब मन्त्रके एक
अक्षरके श्रवणका ऐसा फल है तो जो लोग विधिपूर्वक
जपमें लगे रहते हैं, उनके जपसे प्राप्त होनेवाला उत्तम
फल कैसा होगा ? इसको कौन मनुष्य जान सकता
है॥ ६॥
भवानी! जो अपने अंगोंमें चिताकी राख—
भभूत लपेटे रहते हैं, जिनका विष ही भोजन है, जो
दिगम्बरधारी (नग्न रहनेवाले) हैं, मस्तकपर जटा
और कण्ठमें नागराज वासुकिको हारके रूपमें धारण
करते हैं तथा जिनके हाथमें कपाल (भिक्षापात्र)
शोभा पाता है, ऐसे भूतनाथ पशुपति भी जो एकमात्र
‘जगदीश’ को पदवी धारण करते हैं, इसका क्या
कारण है? यह महत्त्व उन्हें कैसे मिला; यह केवल
तुम्हारे पाणिग्रहणकी परिपाटीका फल है; तुम्हारे साथ
विवाह होनेसे ही उनका महत्त्व बढ़ गया॥ ७॥
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥ ९ ॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं
मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥ १०॥।
जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परापरं
न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥ ११॥
मत्समः पातको नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२॥
८६३
मुखमें चन्द्रमाकी शोभा धारण करनेवाली माँ!
मुझे मोक्षको इच्छा नहीं है, संसारके वैभवकी भी
अभिलाषा नहीं है; न विज्ञानको अपेक्षा है, न सुखको
आकांक्षा; अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि
मेरा जन्म ‘मृडानी, रुद्राणी, शिव, शिव, भवानी ’—
इन नामोंका जप करते हुए बीते॥ ८॥
माँ श्यामा! नाना प्रकारकी पूजन-सामग्रियोंसे
कभी विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना मुझसे न हो सकी |
सदा कठोर भावका चिन्तन करनेवाली मेरी वाणीने
कौन-सा अपराध नहीं किया है ! फिर भी तुम स्वयं
ही प्रयत्न करके मुझ अनाथपर जो किंचित् कृपादृष्टि
रखती हो, माँ ! यह तुम्हारे ही योग्य है। तुम्हारी-
जैसी दयामयी माता ही मेरे-जैसे कुपुत्रको भी आश्रय
दे सकती है॥ ९॥
माता दुर्गे! करुणासिन्धु महेश्वरी ! मैं विपत्तियांमें
फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हुँ [पहले
कभी नहीं करता रहा], इसे मेरी शठता न मान लेना;
क्योंकि भूख-प्याससे पीडित बालक माताका ही
स्मरण करते हैं॥ १०॥
जगदम्ब! मुझपर जो तुम्हारी पूर्ण कृपा बनी
हुई है, इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है, पुत्र
अपराध-पर-अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर
भी माता उसको उपेक्षा नहीं करती॥ ११॥
महादेवि! मेरे समान कोई पातकी नहीं है और
तुम्हारे समान दूसरी कोई पापहारिणी नहीं है; ऐसा
जानकर जो उचित जान पड़े, वह करो॥ १२॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्याविरचितं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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| श्रीदुर्गाजीकी आरती |:
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जगजननी जय ! जय !! ( मा! जगजननी जय ! जय !! )
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय! जय॥टेक॥
तू ही सत-चित-सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूपा।
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सत्य सनातन सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥ जग० ॥
१ आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी। |
३ अमल अनन्त अगोचर अज आनन्दराशी॥ जग० ॥ |
१ अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर सँहारकारी॥ जग० ॥ |
। तू विधिवधू, रमा, तू उमा, महामाया।
| मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया॥जग०॥ |
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राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा।
तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥ जग०
दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा।
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अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा॥जग०॥ |
भू तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू। |
१ तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥जग०॥ |
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सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या तू शोभाधारा।
विवसन विकट-सरूपा, प्रलयमयी धारा॥ जग०
तू ही स्नेह-सुधामयि, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना॥ जग०
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निज स्वभाववश जननी! दयादूष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयि! चरण-शरण दीजै॥ जग० ॥
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मूलाधारनिवासिनि, इह-पर-सिद्द्रिप्रदे। |
छ कालातीता काली, कमला तू वरदे॥जग०॥ |
शक्ति शक्तिर तू ही नित्य अभेदमयी। |
| भेदप्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी ॥ जग० ॥ १
| हम अति दीन दुखी मा! विपत-जाल घेरे। ]
शं हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जग०॥
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