Hindi prose translation. Source: Gita Press, Gorakhpur. OCR-processed; may contain errors.
अथाष्टादशोऽध्यायः
शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश
सूत उवाच
शरुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।
पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १
कृत्वाईणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।
पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २
स च तां नुपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।
पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३
कृत्वा कुशलसंप्रशनमुपविष्टं सुखासने।
शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४
किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।
जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्य तन्मुनिसत्तम॥ ५
शुक उवाच
व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।
सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६
मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्त्वा बन्धं गुरोरपि।
न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७
इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।
उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८
याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः ।
विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९
कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।
त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १०
पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।
कुरु दारान्महाभाग पूच्छ वा भूपतिं च तम्॥ १९
सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।
तच्छुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२
सूतजी बोले शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर
पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके
मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥
महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम
आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक
दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥
शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि
स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी
कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥
इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर
बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज
जनकने पूछा-हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका
आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रष्ठ! उस
प्रयोजन को बताइये ?॥ ४-५ ॥
शुकदेवजी बोले-महाराज ! मेरे पिता व्यासजीने
मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब
आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी
आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं
किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं
है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥
इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्ताला समझकर
| मुनिश्रेष्ठ व्यासने तध्ययुक्त वचन कहा-तुम मिथिला
चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं,
। वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं | संसारमें विदेह नामसे
विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं ॥ ८-९॥
हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी
मायाके जालमे नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम
वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो? ॥ १०॥
उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें
उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह
करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा
तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे।
तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही
मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥
अ० १८]
सम्प्राप्तो$हं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।
मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३
तपस्तीर्थत्रतेज्याएच स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।
ज्ञानं वा बद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४
जनक उवाच
शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।
उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५
अधीत्य वेदवेदान्तान्दत््वा च गुरुदक्षिणाम्।
समावृत्तस्तु गाईस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६
न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः ।
अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवावशुचिः॥ १७
पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।
तपसा षड़िपूञ्जित्वा भार्या पुत्रे निवेश्य च॥ १८
सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।
वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९
विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित् ।
वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २०
शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।
चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः ॥ २१
अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२
शुक उवाच
उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।
अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३
1897 श्रीमद्देवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]6 ^
प्रथम स्कन्ध
१६९
हे महाराज! मैं उन्हीके आदेशसे आपकी
पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका
अभिलाषी हूँ, अत: जो कार्य मेरे लिये उचित हो
वह बताइये ॥ १३॥
हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय,
तीर्थसेवन और ज्ञान-इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात्
साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥
जनकजी बोले मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो
करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद
सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके
सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन
करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको
विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये ।
[ गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपाजित धनका अर्जन
करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न
रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते
हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा]
पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार]
वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम,
क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य-इन] छहों
शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार
पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् बह धर्मात्मा सब अग्नियोंका
अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक
विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें
विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय
ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है,
अन्य किसीको नहीं-यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है,
असत्य नहीं-एऐसा मेरा मानना है॥ १५—२० ॥
हे शुकदेवजी ! वेदोंमें कुल अड्तालीस संस्कार
कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार
महात्माओंने बताये हैं मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि
आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही
[क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका
आदेश है॥ २१-२२॥
शुकदेवजी बोले—चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-
विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवशय ही गृहस्थादि
आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें ॥ २३॥
जनक उवाच
इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद ।
अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकशः ॥ २४
भोजनेच्छां सुखेच्छां च शब्येच्छामात्मजस्य च।
यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५
दुर्जरं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।
अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६
ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।
परिब्रज्य परिभ्रष्टो न मार्ग लभते पुनः॥ २७
यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।
शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८
विहङ्गस्तरसा याति विध्नशङ्कामुदस्य वै।
श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका ॥ २९
मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।
अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३०
गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।
न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत् ॥ ३१
विहतं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।
आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२
पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।
विचरामि यथाकामं न मे किच्चित्प्रजायते॥ ३३
1897 श्रीमददेवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 8
श्रीमहेवीभागवत
[ अ० ९८
जनकजी बोले—हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी
बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व
बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार
उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥
यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी,
सुखको और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह
संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर
कया कर पायेगा ?॥ २५॥
वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह
शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये
मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६ ॥
ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता
है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-
ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुन: वह कोई
दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥
जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर
चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक
पैरोसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-
शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें
उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु
| चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट
| स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥
मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके
द्वारा सर्वथा अजेय है । इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे
ही इसे क्रमश: जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥
गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त,
बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न
होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें
समान भाव रखता है॥ ३१॥
जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता
हुआ, सभी प्रकारको चिन्ताओंसे मुक्त रहता
हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह
मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्यं करता हुआ
भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम
करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं
होता॥ ३३॥
अ० १८]
भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकश: ।
भविष्यामि यथाहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ॥ ३४
कथ्यते खलु यददूश्यमदूश्यं बध्यते कुतः।
दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः॥ ३५
आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन।
स कथं बध्यते ब्रह्मान्निर्विकारो निरञ्जनः॥ ३६
मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज।
जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्व भवति निर्मलम्॥ ३७
भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुन: ।
निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्व निरर्थकम्॥ ३८
न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित्।
बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति॥ ४०
शत्रुर्मित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः।
एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात्॥ ४१
जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा।
भेदबुद्द्रस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते॥ ४२
अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम्।
विद्याविद्यो च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३
विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम्।
अविद्यया विना तद्ठत्कथं विद्यां च वेत्ति वै॥ ४४
1897 श्रीमहदेवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 ७
प्रथम स्कन्ध
१६३
जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ
तथा अनेक कार्योको करता हुआ भी अनासक्त हूँ,
उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४॥
ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगतू
दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे
बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं
आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श
एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५॥
आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष
नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन्! वह निरंजन एवं
निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ?
हे द्विज! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है,
इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता
है ॥ ३६-३७॥
सभी तीथोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान
करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ
हो जाता है। हे परन्तप! बन्धन तथा मोक्षका कारण
न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही
हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका
कारण है॥ ३८-३९ ॥
आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी
बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके
भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है॥ ४०॥
शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव
भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर
यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न
होता है॥ ४१॥
‘में जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’-इस विषयमें और
विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो
संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है॥ ४२॥
हे महाभाग! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही
है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये
ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा
अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें॥ ४३ ॥
धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो
सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान
कैसे किया जा सकता है॥ ४४॥
१६४
श्रीमदेबी भागवत
[ अ० १८
गुणा गुणेषु वर्तन्ते भूतानि च तथैव च।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु को दोषस्तत्र चात्मनः॥ ४५
मर्यादा सर्वरक्षार्थं कृता वेदेषु सर्वशः।
अन्यथा धर्मनाशः स्यात्सौगतानामिवानघ॥ ४६
धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।
अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥ ४७
झुक उवाच
सन्देहो वर्तते राजन्न निवर्तति मे क्वचित् ।
भवता कथितं यत्तच्छुण्वतो मे नराधिप॥ ४८
वेदधर्मेषु हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।
कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते॥ ४९
प्रत्यक्षेण त्वनाचारः सोमपानं नराधिप।
पशूनां हिंसनं तद्वद्भक्षणं चामिषस्य च॥ ५०
सौत्रामणौ तथा प्रोक्तः प्रत्यक्षेण सुराग्रहः।
द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च॥ ५९
श्रूयते स्म पुरा ह्यासीच्छशबिन्दुर्नृपोत्तमः।
यज्वा धर्मपरो नित्यं वदान्यः सत्यसागरः॥ ५२
गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता चोत्पथगामिनाम्।
यज्ञाश्च विहितास्तेन बहवो भूरिदक्षिणाः॥ ५३
चर्मणां पर्वतो जातो विन्ध्याचलसमः पुनः।
मेघाम्बुप्लावनाज्जाता नदी चर्मण्वती शुभा॥ ५४
सोऽपि राजा दिवं यातः कीर्तिरस्याचला भुवि।
एवं धर्मेषु वेदेषु न मे बुद्धिः प्रवर्तते॥ ५५
स्त्रीसङ्गेन सदा भोगे सुखमाप्नोति मानवः।
अलाभे दुःखमत्यन्तं जीवन्मुक्तः कथं भवेत्॥ ५६
1897 श्रीमददेवी…महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 0
गुणोंमें गुण, पंचभूतोंमें पंचभूत तथा इन्द्रियोंके
विषयोंमें इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्माका
कया दोष है ?॥ ४५ ॥
हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षाके लिये वेदोंमें
सब प्रकारसे मर्यादाकी व्यवस्था की गयी है। यदि
ऐसा न होता तो नास्तिकोंकी भाँति सब धर्मोंका
नाश हो जाता | धर्मके नष्ट हो जानेपर सब कुछ नष्ट
हो जायगा और सब वर्णोंकी आचार-परम्पराका
उल्लंघन हो जायगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्गपर
चलनेवालोंका कल्याण होता है ॥ ४६-४७॥
शुकदेवजी बोले-हे राजन्! आपने जो बात
कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह
किसी प्रकार भी दूर नहीं होता॥ ४८ ॥
हे भूपते! वेदधर्मोमें हिंसाका बाहुल्य है, उस
हिंसामें अनेक प्रकारके अधर्म होते हैं। [ऐसी
दशामें] वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे
राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो
स्पष्ट ही अनाचार है । सौत्रामणियज्ञमें तो प्रत्यक्षरूपसे
सुराग्रहणका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार
द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकारके व्रत बताये गये
हैं ॥ ४९—५१॥
सुना जाता है कि प्राचीन कालमें शशबिन्दु
नामके एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा,
यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी
सेतुके रक्षक तथा कुमार्गगामी जनोंके नियन्ता थे।
उन्होंने पुष्कल दक्षिणावाले अनेक यज्ञ सम्पादित
किये थे॥ ५२-५३ ॥
[उन यजञोंमें] पशुओंके चर्मसे विन्ध्यपर्वतके
समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघोंके जल
बरसानेसे चर्मण्वती नामकी शुभ नदी बह चली ॥ ५४॥
वे राजा भी दिवंगत हो गये, किंतु उनकी कीर्ति
भूमण्डलपर अचल हो गयी। जब इस प्रकारके
धर्मोका वर्णन वेदमें है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि
उनमें नहीं है॥ ५५॥
स्त्रीक साथ भोगमें पुरुष सुख प्राप्त करता है
और उसके न मिलनेपर वह बहुत दुःखी होता है तो
ऐसी दशामें भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा ?॥ ५६॥
अ० १९ ]
जनक उवाच
हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।
उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७
यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।
तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८
अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।
रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९
अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारव्जितम्।
अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६०
गृहस्थानां तु हिंसेव या यज्ञे द्विजसत्तम।
अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१
साहिसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२
प्रथम स्कन्ध
१६५
जनकजी बोले—यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती
है, बह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि
जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती
है, अन्यथा नहीं-एऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥
जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे
धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ
नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त
हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये । रागीजनोंद्वारा
को गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके
लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९ ॥
जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर
किया जाता हो, उस कर्मको बैदिक विद्वान् मनीषीजन
न किये हुएके समान ही कहते हैं ॥ ६०॥
हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें
जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग!
जो कर्म॑ रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर
किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये
अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥
इति श्रीमहेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरयां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकाय
जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
“य्न्ल्य्नये टी
bas vad
अधथैकोनविंशोऽध्यायः
शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके
सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना
शुक उवाच
सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।
मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १
शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।
त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २
अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।
यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।
स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवित्तथा॥ ४
शुकदेवजी बोले—हे महाराज! मेरे हृदयमें
यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए
कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका
ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी
चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त
कैसे हो सकेगा ?॥ १-२॥
मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये
केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे
केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं
होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी
किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे
वह कैसे सम्भव है ?॥ ३-४॥
१६६
वित्तेषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा ।
जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवे: ॥ ५
चरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।
स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६
कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।
शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।
अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८
पदात्यश्वरथेभाशच सर्वे वै बशगा मम।
स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९
मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।
मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १०
विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११
न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।
एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थ चरेयमिति मे मतिः॥ १२
निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।
मृगवद्विचरिष्यामि निईन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ १३
किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।
विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४
चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।
दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५
कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।
कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश््चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६
श्रीमहेबी भागवत
[ अ० १९
अभी भी आपको धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख
तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं
हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं 2॥ ५॥
अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके
प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका
भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्!
आप विदेह कैसे ?॥ ६॥
अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका
तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्!
आपका चित्त शुभ कर्मामें रमता है, अशुभ कर्मोमें
नहीं । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति-ये अवस्थाएँ अभी
आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको
तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी ?॥ ७-८॥
हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक
ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हँ-
ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? आप मधुर
भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही
होंगे । हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान
दृष्टिवाले हैं ?॥ ९-१०॥
हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो बह कहलाता है, जो
मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब
जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका
उपकार करता हो॥ ११॥
मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता।
इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण
करता रहूँ-यही मेरा विचार है॥ १२॥
निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल
पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निनद
एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण
करूँगा ॥ १३॥
हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ
विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है ?॥ १४॥
आप अनेक प्रकारको राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते
हैं, फिर भी ‘मैं विमुक्त हूँ’-एऐसा आप कहते हैं।
यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता
है। आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी
सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप
निश्चिन्त कहाँ ?॥ १५-१६॥
अ० १९ ]
वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितत्रता: ।
तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७
तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।
कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८
विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः ।
लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९
तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।
विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २०
निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।
यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१
निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।
निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२
कृत्वा तस्य मखं पूर्ण करिष्यामि तवापि वै।
तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३
इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।
निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४
तच्छुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।
शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५
राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।
अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६
विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।
विनोद इव मे चित्ते बिभाति नृपसत्तम॥ २७
जनक उवाच
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।
तथापि श्रृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः ॥ २८
प्रथम स्कन्ध
१६७
स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि
हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें
आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥
हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका
नाम विदेह-यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा
समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥
जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर,
जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री
मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी
प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन
राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध
हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥
हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा
हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु
वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस
समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने
मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ
सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा।
अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री
एकत्र कराइये॥ २१-२३॥
ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ
करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने
किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ
सम्पन्न कर लिया॥ २४॥
यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित
हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—‘हे गुरुका
परित्याग करनेवाले ! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय’॥ २५॥
यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि
आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे
दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये-ऐसा मैंने
सुना है॥ २६॥
हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने
गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो
मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥
जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही
कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं
मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र
१६८
श्रीमहेबीभागवत
[ अ० १९
पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।
मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९
महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।
आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चिन्तः स्याः कथं मुने॥ ३०
दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।
तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१
विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।
न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२
सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।
न बद्धोऽस्मीति बुद्धयाहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३
त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।
इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४
देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।
तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५
सूत उवाच
तच्छुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।
आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६
आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।
आलिङ्क्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७
स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८
जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः ।
स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९
गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका
साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ
भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-
सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥
पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान
हैं। तब आप नि:संग कैसे हो पायेंगे? और फिर हे
मुने! भोजन आदिको भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप
निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥
जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी
चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको
भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥
आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये
हैं । मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है;
क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हँ ॥ ३२॥
हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और
सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! “मैं बद्ध नहीं हूँ!
इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके
विपरीत] “मैं बद्ध हूँ’-इस शंकासे आप सर्वदा
दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर
सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥
यह शरीर मेरा है-यही बन्धनका कारण है;
| यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह,
सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय
| है॥ ३५॥
सूतजी बोले महाराज जनकको बात सुनकर
शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर
व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥
व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर
सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे
लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता
पूछी॥ ३७॥
सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर
श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय
आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए
महात्मा जनकको वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी
परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही
स्थित हो गये॥ ३८-३९॥
आ० १९]
प्रथम स्कन्ध
१६९
पितृणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।
शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०
स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।
कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४९
कन्यां कीर्ति समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।
ददौ विश्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२
अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।
ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३
कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।
ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४
पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।
मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निरर्गलम्॥ ४५
नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।
कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः ॥ ४६
ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।
उत्पपात गिरेः शृुङ्गात्सिद्द्धिं च परमां गतः॥ ४७
आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।
गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८
उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।
अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९
तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः।
व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०
गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।
क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१
सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।
तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२
योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने
पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको
पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण,
गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न
किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने
कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका
विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर
दिया॥ ४०—४२॥
शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र
श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं
पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि
नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान
पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने
पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ
नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे
उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न
हुआ॥ ४३-४५३ ॥
उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर
कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग
भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ
ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे
पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे
शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित
होने लगे। तब शुकदेवजीके उडते ही पर्वत-शिखर
दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें
जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे । ऋषियोंके
द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें
वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे
सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६-४९३ ॥
इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर
व्यासजी बार-बार ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहते हुए
उस पर्वतको चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी
रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण
क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे
विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया।
आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट
सुनायी देती है॥ ५०-५२॥
१७०
रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसमन्वितम्।
पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिष्लुतम्॥ ५३
शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत्।
व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः ॥ ५४
परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः।
तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाशोकं विजानता॥ ५५
कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ।
व्यास उवाच
न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते॥ ५६
अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे।
महादेव उवाच
छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम्॥ ५७
तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप।
सूत उवाच
तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम्॥ ५८
दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत।
अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात्॥ ५९
शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः ॥ ६०
श्रीमहेवी भागवत
[ अ० २०
अपने प्रिय पुत्र शुकदेवके विरहमें “हा पुत्र!
हा पुत्र! कहकर विलाप करते हुए व्यासजीको
शोक-सन्तप्त देखकर साक्षात् शंकरजी वहाँ आकर
उन्हें सान्त्वना देने लगे—‘हे व्यासजी! आप शोक
मत कीजिये; आपके पुत्र श्रेष्ठ योगवेत्ता हैं । उन्होंने
अकृतात्माओंके लिये भी दुर्लभ परमगति प्राप्त कर
ली है। अतः ब्रह्मज्ञान रखनेवाले आपको उन
[ब्रह्मज्ञानी] शुकदेवके लिये चिन्ता नहीं करनी
चाहिये; हे पवित्रात्मन्! शुकदेवके समान पुत्रके द्वारा
आपको महान् कीर्ति हुई है’॥ ५३-५५ ॥
व्यासजी बोले—‘हे देवेश! हे जगत्पते! मैं
क्या करूँ, शोक दूर नहीं हो रहा है; पुत्र- दर्शनकी
लालसाबाले मेरे नेत्र अतृप्त हैं’॥ ५६ ॥
महादेवजी बोले-‘अब आप अपने पुत्रकी
रमणीय छाया अपने पास सर्वदा विद्यमान देखेंगे । हे
मुनिवर! हे परन्तप! उस छायाको देखकर आप अपना
शोक दूर कीजिये ’॥ ५७३ ॥
सूतजी बोले-तदनन्तर व्यासजीने अपने पुत्र
शुकदेवकी ओजस्विनी छाया देखी। उन्हें वरदान
देकर शंकरजी वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके
अन्तर्हित हो जानेपर व्यासजी भी अपने आश्रमको
| लौट आये। शुकदेवजीके वियोगसे सन्तप्त होकर वे
अत्यन्त दुःखी रहने लगे॥ ५८-६०॥
इति श्रीमददेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्तरचां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य
विवाहादिकार्यवर्णनं नामैकोनरविशोऽध्यायः ॥ १९॥
ID) लत तट